1. लाइफ स्‍टाइल
  2. साहित्य
  3. मेरा ब्लॉग
  4. rajneeti-dharm-aur-adhyatma

राजनीति और धर्म का मूल जीवन का अध्यात्म हैं!

Politics and religion
डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने कहा था राजनीति अल्पकालीन धर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीति। राजनीति और धर्म ने काल के प्रवाह में जीवन को गहराई से सजाया संवारा और सतत मानव जीवन के समक्ष प्रस्तुत चुनौतियां का समाधान निकाला है। राजनीति और धर्म ने कमजोर से कमजोर परिस्थिति वाले नागरिक को भी बेहतरी के सपने देखने और अपने सपनों को साकार करने का आनंदमयी साधन प्रदान किया है।
 
आज का अधिकांश राजनीतिक नेतृत्व और धार्मिक समूह भांति भांति के रंग रूप की पताकाएं फहराकर धर्म-कर्म की इतिश्री समझने लगा है। इस तरह की ताकतें एकजुट होकर समूची दुनिया में राजनीति और धर्म के मूल स्वरूप को ही एक तरह से बदलने में लगे हैं। देश और दुनिया भर में राजनैतिक और धार्मिक नेतृत्व करने वाले अधिकांश समूहों ने राजनीति और धर्म की गहराई और मर्म को अपने मूल स्वरूप से उलट एकदम भिन्न पर लगभग पूरी तरह एक ऐसी उथली मन:स्थिति के करीब पहुंचा दिया हैं, जिससे बाहर निकलना आज की दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती है। राजनीति यानि एक तरह से सत्ता की जोड़-तोड़ का अंधा एवं यंत्रवत खेल और धर्म यानी अध्यात्म से दूर अशांति और अकारण लोभ-लालच मय असहिष्णुता की पराकाष्ठा का अविवेकी हल्ला हो गया है। यह स्थिति या परिस्थिति तो राजनीति और धर्म की मूल अवधारणा किसी भी तरह से नहीं मानी जा सकती है। ALSO READ: आभासी दुनिया और वास्तविक दुनिया!
 
राजनीति और धर्म दोनों ही अपने मूल स्वरूप से उलट एक भिन्न स्थिति में लगभग पहुंच गए हैं। दोनों की मूल भूमिका लोक समाज की चेतना और वैचारिक सम्पन्नता को निरन्तर आगे बढ़ाने वाली होना चाहिए। पर आज के कालखंड में दोनों ही लोकसमाज मे एक तरह से प्रायः आपसी मनमुटाव, वैमनस्य और नाहक वितंडावाद के पोषक बनते हुए आभासित होते या दिखाई पड़ते है। इसीलिए आज राजनीति और धर्म दोनों ने देश और दुनिया में जो रूप धारण कर लिया है, उससे लोक समाज एक अत्यंत जटिल यांत्रिक भूलभुलैया में निरंतर उलझता जा रहा है। ALSO READ: सृष्टि का आनंद बनाम आनंद की सृष्टि!
 
राजनीति एक तरह से यंत्रवत, अकारण उत्तेजित तथा ऊलजलूल बयानबाजी करने वाले अविचारशील व्यक्तिओं का एक बड़ा हिस्सा या जमावड़ा बनती जा रही है। जिसका कुल नतीजा निष्क्रिय भीड़भाड़ वाली या अकारण उत्तेजित भीड़ की मनोदशाग्रस्त  अधिकांश मनुष्य वर्तमान समय में लगातार उलझते ही जा रहे हैं। लोकसमाज में सामान्य सहज विचार और विवेक का आग्रह लगातार क्षीण हो रहा है। मनुष्य जीवन को विवेक सम्मत तरिके से समस्या सुलझाने की प्रेरणा देना राजनीति का मूल काम है जिसे सत्ता की अंधी दौड़ में निरंतर दौड़ती हुई राजनीतिक जमातों ने पूरी तरह उलट दिया है। धर्म पताका हवा में लहराते रहने मात्र से धर्म की आध्यात्मिक भूमिका मनुष्य के मन में स्वत: ही विकसित नहीं हो सकती। ALSO READ: मानवीय सवालों की सुनामी में बढ़ती समाधान शून्यता!
 
धर्म मनुष्य के प्राकृतिक स्वरूप और मूल चेतना का जीवंत विस्तार है और आध्यात्मिक भूमिका की बुनियाद या आधारशिला है। धर्म मनुष्य जीवन की आध्यात्मिक भूमिका का निर्धारण और विस्तार करता है। धर्म एक तरह से मानव जीवन की आचार संहिता और मनुष्य मात्र के प्राकृतिक स्वरूप को व्यवस्थित रूप में जीवन के दर्शन और आचरण में उतारने का व्यवहारिक रूप स्वरूप हैं। एक सवाल मन में यह भी उठता है कि धर्म का धर्म क्या है? क्या धर्म मनुष्य मात्र तक ही सीमित है या धर्म समूचे जगत के लिए है। जैसे हवा का धर्म निरंतर हर कहीं मौजूद रहना है। जल का धर्म भी किसी न किसी रूप में हर कहीं भूमि और भुवन में बने रहना है। वायु और जल किसी न किसी रूप में इस धरती पर मौजूद वातावरण और जीवन के विभिन्न रूपों में चाहे वह जीव जगत हो या वनस्पति जगत हो दोनों का अस्तित्व वायु और जल के अभाव में संभव ही नहीं है।
 
इसी तरह एकता और अनेकता एक दूसरे से वायु और जल की तरह ही आपस में रची-बसी है, उसको एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है। मनुष्य अपने आप में एक ही रूप स्वरूप में होते हुए भी अनेक रूप-स्वरूप में जगत में बना रहता है। मनुष्य और वनस्पति का धर्म एक ही है जीवन की निरंतरता को कायम रखना। क्या मनुष्य या जीव और वनस्पति के अभाव में जीवन संभव हो सकता है? अनेक जीव जंतुओं और वनस्पति जगत के जीवन के प्रवाह से ही जीवन या जीवन की निरंतरता बनी रहती है। तो इस तरह से सहजता से समझा जा सकता है कि अनेकता और एकता दोनों ही जीवन की निरंतरता या प्रवाह का ही मूल रूप है। हम इस अर्थ में एक और अनेक को एक दूसरे से अलग नहीं कर सकते।
 
राजनीति और धर्म को हम खंडित रुप में देखने परखने और अनुभूत करने के कारण दोनों को मूलतः एक दूसरे से अलग ही समझने लगे हैं। दोनों ही मूलत: जीवन के मूल प्रवाह से ही जन्मे हैं और कालक्रम अनुसार एक दूसरे से लिपटकर अपने गुण-धर्म को सदैव मूल रूप में कायम रखते हैं और कालक्रम में विरोधाभासी रूप से अपने मूल गुण धर्म से विचलित होते हुए आभासित होते दिखाई पड़ते हैं। राजनीति और धर्म इस जगत में जीवन की ऐसी अनोखी मानवीय गतिविधियां हैं जो जीवन काल में शांति और अशांति से परे रहकर जीवन को आध्यात्मिक साधना की दुनिया में निरंतर लेजाने का मार्ग प्रशस्त करती है।
 
राजनीति और धर्म हमारे जीवन का क्षणिक तमाशा या कोरी हलचल न होकर इस जगत में जीवन का गहरा सनातन अध्यात्म है। जैसे जल की एक बूंद और वायु या धूल का एक कण की ताकत हमें दिखाई नहीं देती पर जगत और जीवन में जो भी कुछ घटता है वह पंचतत्व के सूक्ष्म स्वरूप के विराट साकार स्वरूप में आ जाने और पुनः मूल स्वरूप में विलीन हो जाने का अंतहीन सिलसिला ही है। राजनीति और धर्म अध्यात्म के विस्तार और संकुचित होते रहने की अनंत लहरें हैं। लहरों का आना जाना आभासी दुनिया का एक एक क्षण या कण है जिसमें जीव और जीवन रचा बसा है। यही वह मूल विचार हैं जिसे हम जीवन और जगत का अध्यात्म मान सकते हैं।
लेखक के बारे में
अनिल त्रिवेदी (एडवोकेट)
लेखक वरिष्ठ अभिभाषक हैं.... और पढ़ें