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समाचार
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अपना इंदौर
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इंदौरी शख्सियत
पद्मश्री से सम्मानित डॉ.जनक पलटा मगिलिगन ग्राम सनावादिया में पौधारोपण के साथ मनाएंगी 75 वां जन्मदिन
Wednesday,February 15, 2023
लेखक शरद पगारे को 2020 के लिए ‘व्यास सम्मान’, उपन्यास 'पाटलीपुत्र की सम्राज्ञी' के लिए मिला पुरस्कार
इंदौर का पहला फोटोग्राफर
वेदमूर्ति पं. वीरसेन : वेदश्रमी 'वेद विज्ञानाचार्य'
तात्या सरकार : राजसी गुणों-अवगुणों की मिसाल
इंदौर की पहचान दानवीर राव राजा सर सेठ हुकुमचंद
Thursday, May 19, 2022
जुझारू होलकर शासिका कृष्णाबाई
Thursday, May 19, 2022
खासगी जागीर के व्यवस्थापक 'खासगीवाले'
Thursday, May 19, 2022
होलकर राजवंश की इतिहास प्रसिद्ध महिलाएं
Thursday, May 19, 2022
मल्हारराव होलकर (प्रथम)
Thursday, May 19, 2022
संवेदनशील प्रशासक श्री सिरेमल बापना
Thursday, May 19, 2022
होलकर शासकों के दीवान- पलशीकर बंधु
Thursday, May 19, 2022
होलकर का राज और किबे का ब्याज
Thursday, May 19, 2022
प्रजामंडल से सत्ता तक
Thursday, May 19, 2022
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इतिहास-संस्कृति
इंदौर के समस्त महलों का सिरमौर लालबाग पैलेस
इंदौर के समस्त महलों का सिरमौर है- लालबाग पैलेस। इस महल के साथ बाग का नाम इसलिए जुड़ा कि महल व बाग एक-दूसरे के सौंदर्य में चार चांद लगाने वाले हैं। लालबाग पैलेस के वर्तमान स्वरूप का निर्माण कार्य 1886 से प्रारंभ हुआ। 6 वर्ष के अंतराल में ही कुल 36 लाख रु. महल के निर्माण पर राज्य ने खर्च किए थे। 1903 से 1911 ई. तक महाराजा तुकोजीराव (तृतीय) अल्प वयस्क थे। अत: होलकर प्रशासन कौंसिल ऑफ रीजेंसी द्वारा संचालित किया जा रहा था। इस अवधि में ही इस महल को पाश्चात्य शैली में कीमती संगमरमर से सुसज्जित किया गया।
इंदौर का प्राचीनतम गणेश मंदिर, खतों के आईने में
जूनी इंदौर स्थित गणपति मंदिर संभवत: नगर का सबसे प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर सरस्वती नदी के पूर्वी तट पर एक ऊंचे टीले पर बना हुआ है। मंदिर की पीठिका में लगे हुए कुछ शिलाखंडों को देखने से जान पड़ता है कि इस स्थान पर परमार काल (9वीं से 12वीं सदी) में किसी देवालय का निर्माण करवाया गया था जिस पर आगे चलकर राजपूत काल में इस मंदिर का विस्तार किया गया। इस मंदिर को होलकरों का भी पर्याप्त संरक्षण मिला।
इंदौर नगर की महत्वपूर्ण इमारतें
इंदौर नगर में राजप्रासादों के अतिरिक्त राज्य की ओर से कुछ महत्वपूर्ण इमारतों का भी निर्माण करवाया गया। महाराजा तुकोजीराव (तृतीय) की अल्पवयस्कता काल में (1903 से 1911 ई.) होलकर प्रशासन, कौंसिल ऑफ रीजेंसी द्वारा संचालित था। उक्त अवधि में राज्य के लोक निर्माण विभाग में आमूल प्रशासनिक परिवर्तन किए गए। योरपियन इंजीनियर श्री कावले की सेवाएं ब्रिटिश इंडिया से प्राप्त की गईं। नवंबर 1903 में इंदौर आकर श्री कावले ने कार्यभार ग्रहण किया। इंदौर में भवनों के निर्माण की विशिष्ट शैली अपनाई गई जिनकी छाप स्पष्ट परिलक्षित होती है।
इंदौर नगर की होलकरकालीन प्रमुख छत्रियां
राजपरिवार के व्यक्तियों, सुल्तानों व सम्राटों की स्मृति में उनके स्मारक-मकबरे या छत्रियों का निर्माण भारत में मध्यकाल से चली आ रही एक परंपरा है। मुस्लिम शासकों ने मकबरों का निर्माण करवाया, वहीं राजपूतों ने छत्रियां बनवाईं। राजपुताना की इस परंपरा ने मालवा के मराठा शासकों को भी प्रभावित किया और मालवा में सिंधिया व पंवार ने जहां पूर्व प्रचलित परंपराओं का पालन किया है, वहीं होलकरों ने छत्रियों के वास्तु विन्यास में नए प्रयोग किए हैं, जो महत्वपूर्ण हैं।
इंदौर में ऐसे आई होलकर राज्य की रेलवे
होलकर रियासत की नैरोगेज (मीटरगेज या छोटी) रेलवे लाइन इंदौर शहर को ग्रेट इंडियन पैनिन्सुला रेलवे लाइन से निमाड़ के प्रमुख शहर खंडवा को जोड़ने वाली प्रमुख लाइन थी। इस लाइन को बनाने के लिए ग्रेट इंडियन पैनिन्सुला रेलवे कंपनी ने कुछ समय के लिए इरादा भी किया था। साथ ही पटरी बिछाने के लिए इलाके का सर्वे भी किया था, लेकिन नर्मदा नदी तथा विंध्याचल पर्वत माला में रेल चलाने की लागत बहुत अधिक होने के कारण इसे वर्ष 1869 तक महाराजा तुकोजीराव होलकर (द्वितीय) से समझौता होने तक स्थगित कर दिया गया।
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रोचक तथ्य
गांधी दूल्हा 1 लाख के दहेज के लालच में बड़वाह से मोटर में दौड़ पड़े!
मध्यभारत में इंदौर प्रारंभ से ही शिक्षा व शैक्षणिक गतिविधियों का अग्रणी केंद्र रहा। नगर में अनेक विद्यालयों व महाविद्यालयों की स्थापना ने नगर में एक बौद्धिक वातावरण निर्मित किया। शिक्षितजनों के लिए अपनी साहित्यिक गतिविधियां संचालित करने वाली कोई संस्था न थी।
जब सिंधिया की फौज ने इंदौर को लूटा
जुलाई 1801 में यशवंतराव होलकर ने उज्जैन पर आक्रमण कर सिंधिया फौज को पराजित कर नगर को लूटा था जिसका बदला लेने के लिए अक्टूबर 1801 में सिंधिया सेनापति सर्जेराव घाटगे अपने साथ 12 सैनिक दस्ते व 20,000 घुड़सवारों की फौज लेकर इंदौर पर आक्रमण के लिए चल पड़ा।
सन् 1784 में सराफा में डाकुओं ने डाका डाला था
राजबाड़ा अपने निर्माण के बाद से ही इंदौर का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। राजबाड़े के समीप ही व्यापारियों ने सुरक्षा की दृष्टि से अपने व्यापारिक संस्थान कायम किए। बर्तन बाजार, मारोठिया, सराफा व कपड़ा मार्केट की स्थापना व उत्तरोत्तर उनका विकसित होना इसी सुरक्षा की भावना के प्रतीक हैं।
तात्या सरकार : राजसी गुणों-अवगुणों की मिसाल
इतिहास में ऐसे बहुत सारे राजा, महाराजा व सरदार मिल जाएंगे, जो अपनी राजसी ठसक और शौकों के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। इंदौर के होलकर राजघराने से जुड़े 'तात्या सरकार' को उनके इन्हीं शौकों के कारण याद किया जाता है। शराब, शबाब तथा राजसी सभी गुणों की वजह से लोग उन्हें जानते थे। एक बार महाराजा होलकर को उन्हें सही रास्ते पर लाने के लिए कठोर निर्णय लेना पड़ा था।
इंदौर की पहचान दानवीर राव राजा सर सेठ हुकुमचंद
इक्कीसवीं सदी के महानगर इंदौर में व्यापार, वाणिज्य व उद्योग पर किसी एक जाति, संप्रदाय या वर्ग विशेष का अधिकार नहीं है। एक तरफ यदि यहां महानगर की 'मॉल संस्कृति' पनप रही है तो दूसरी ओर पारंपरिक खुदरा व्यापार भी जीवित है। सिंधी, पंजाबी, ठाकुर, मुस्लिम, जैन कोई भी कहीं भी अपना व्यापार-व्यवसाय चला सकता है।
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