Narak Chaturdashi 2026: नरक चतुर्दशी की रात हनुमान जी की पूजा क्यों की जाती है? जानें इसके पीछे का बड़ा रहस्य
Narak Chaturdashi 2026: कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन रात में हनुमानज पूजा, यमदेव पूर्व, श्रीकृष्ण पूजा और काली पूजा होती है। नरक चतुर्दशी की रात को हनुमान जी की विशेष पूजा करने के पीछे पौराणिक कथाएं, धार्मिक मान्यताएं और तांत्रिक महत्व जुड़े हुए हैं। इस रात हनुमान जी की पूजा करने से सभी तरह का भय और दोष समाप्त हो जाता है।
1. हनुमान जी का जन्म/प्राकट्य दिवस
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी) तिथि को हनुमान जी का प्राकट्य दिवस भी माना जाता है। दक्षिण भारत की मान्यता और अन्य पुराणों के अनुसार, इसी तिथि को माता अंजना के गर्भ से संकटमोचन हनुमान जी का जन्म हुआ था। इसलिए इस रात उनकी विशेष पूजा और दीपदान करने की परंपरा है।
2. नकारात्मक शक्तियों से रक्षा
नरक चतुर्दशी को 'छोटी दिवाली' या 'रूप चौदस' भी कहते हैं। तंत्र साधना और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की रात को बेहद प्रभावशाली माना गया है। हनुमान जी महाराज रुद्रावतार हैं और सभी तरह की भूत-प्रेत, डाकिनी-शाकिनी, बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाले हैं। इस रात हनुमान साधना करने से व्यक्ति हर प्रकार के भय और संकटों से मुक्त हो जाता है।
3. शनिदेव के प्रकोप और दुखों से मुक्ति
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी की शरण में जाने वाले भक्तों को शनिदेव कभी परेशान नहीं करते। नरक चतुर्दशी पर हनुमान जी की उपासना करने से कुंडली के ग्रह-दोष (विशेषकर शनि की ढैया, साढ़े साती या राहु-केतु का कष्ट) शांत होते हैं और अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।
4. कार्य सिद्धि और शक्ति प्राप्ति
यह तिथि 'सिद्धि की रात्रि' मानी जाती है। जो भक्त इस रात सुंदरकांड, हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का पाठ करते हैं, उन्हें बल, बुद्धि, आरोग्य और कार्यों में सफलता की प्राप्ति होती है।
पूजा की विधि (संक्षिप्त):
समय: संध्याकाल या मध्यरात्रि (निशिता काल)।
चमेली का तेल और सिंदूर: हनुमान जी को चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर चोला चढ़ाएं।
दीपक: उनके सामने सरसों या चमेली के तेल का चार मुखी दीपक जलाएं।
भोग: गुड़, चना, बेसन के लड्डू या बूंदी का भोग लगाएं।
पाठ: हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करें।

