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Guru Hargobind Jayanti 2026: गुरु हरगोविंद सिंह जयंती: जानें उनके बताए सिद्धांत, जो आज भी हैं प्रासंगिक

The image features Sri Guru Hargobind Singh- the sixth Guru of Sikhism- alongside Sri Akal Takht Sahib and the Golden Temple (Harmandir Sahib) of Amritsar
Sixth Sikh Guru Guru Hargobind: छठे सिख गुरु, गुरु हरगोविंद सिंह जी की जयंती या प्रकाश पर्व सिख इतिहास का एक ऐसा गौरवशाली पन्ना है, जिसने सिख कौम को एक नई दिशा दी। गुरु हरगोविंद सिंह जी ही थे जिन्होंने सिखों को संत के साथ-साथ 'सिपाही'/ संत-सिपाही बनने की प्रेरणा दी। उन्होंने सिखाया कि धर्म केवल माला जपने में नहीं, बल्कि अत्याचार के खिलाफ तलवार उठाने में भी है।ALSO READ: Guru Amar Das Jayanti: गुरु अमरदास जयंती कैसे मनाएं, जानें जीवन परिचय, महत्व और योगदान
 
आज के इस आधुनिक और उथल-पुथल भरे दौर में भी गुरु हरगोविंद सिंह जी के जीवन मूल्य और उनके द्वारा स्थापित सिद्धांत बेहद प्रासंगिक हैं। 
 

आइए जानते हैं उनके ऐसे ही 5 बड़े सिद्धांत जो आज भी हमारा मार्गदर्शन करते हैं:

 

1. 'मीरी' और 'पीरी' का सिद्धांत: अध्यात्म और शक्ति का संतुलन

गुरु हरगोविंद सिंह जी ने सिख इतिहास में सबसे बड़ा क्रांतिकारी बदलाव करते हुए 'मीरी और पीरी' नामक दो तलवारें धारण कीं।
 
मीरी: सांसारिक, राजनीतिक और सैन्य शक्ति का प्रतीक है, जो समाज की रक्षा करती है।
 
पीरी: आध्यात्मिक शक्ति और गुरुता का प्रतीक है, जो आत्मा को शुद्ध करती है।
 
आज के दौर में प्रासंगिकता: यह सिद्धांत हमें सिखाता है कि जीवन में संतुलन बेहद जरूरी है। इंसान को अंदर से शांत, दयालु और आध्यात्मिक होना चाहिए, लेकिन समय आने पर अन्याय, अत्याचार और शोषण के खिलाफ शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत होकर डटने की क्षमता भी उसमें होनी चाहिए। केवल कोरी बातें नहीं, बल्कि एक्शन भी जरूरी है।
 

2. अकाल तख्त की स्थापना (स्वतंत्र विचार और न्याय)

गुरु जी ने अमृतसर में हरिमंदिर साहिब स्वर्ण मंदिर के ठीक सामने 'श्री अकाल तख्त साहिब' (काल से रहित ईश्वर का सिंहासन) की नींव रखी। जहां हरिमंदिर साहिब अध्यात्म का केंद्र था, वहीं अकाल तख्त दुनिया के राजनीतिक और सामाजिक फैसलों का मंच बना।
 
* अकाल तख्त का संदेश था कि सच और न्याय किसी भी दुनियावी राजा या सरकार के अधीन नहीं होते। आज के समाज में यह सिद्धांत हमें स्वतंत्र सोच रखने, सच का साथ देने और किसी भी प्रकार की तानाशाही या गलत व्यवस्था के आगे न झुकने की प्रेरणा देता है।
 

3. 'संत-सिपाही' का निर्माण/ कमजोरों की रक्षा

अपने पिता और पांचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव जी की शहादत के बाद गुरु हरगोविंद सिंह जी ने महसूस किया कि केवल शांति से क्रूर शासकों का हृदय परिवर्तन नहीं किया जा सकता। उन्होंने सिखों को शास्त्र विद्या, घुड़सवारी और आत्मरक्षा के गुर सिखाए।
 
* गुरु जी ने सेना का गठन किसी पर हमला करने या साम्राज्य विस्तार के लिए नहीं, बल्कि कमजोरों, मजलूमों और धर्म की रक्षा के लिए किया था। आज के समाज में महिलाओं, बच्चों और समाज के पिछड़े वर्गों की सुरक्षा के लिए आत्मरक्षा/ सेल्फ डिेफेंस और शारीरिक रूप से सक्षम होना कितना जरूरी है, यह गुरु जी सदियों पहले बता गए थे।
 

4. 'बंदी छोड़' दाता: मानवाधिकार और सबको साथ लेकर चलना

जब मुगल बादशाह जहांगीर ने गुरु हरगोविंद सिंह जी को ग्वालियर के किले में कैद कर दिया था, तो बाद में गुरु जी की महानता को देखकर उसने उन्हें रिहा करने का आदेश दिया। लेकिन गुरु जी ने अकेले जाने से मना कर दिया और शर्त रखी कि उनके साथ कैद सभी 52 हिंदू राजाओं को भी आजाद किया जाए। गुरु जी ने 52 कलियों वाला एक विशेष चोगा सिलवाया, जिसकी एक-एक कली पकड़कर सभी राजा जेल से बाहर आए। इसी याद में उन्हें 'बंदी छोड़ दाता' कहा जाता है।
 
आज के दौर में यह घटना सिखाती है कि सच्ची सफलता या आजादी वह है जिसमें हम स्वार्थी न बनें, बल्कि समाज के हर वर्ग को अपने साथ लेकर आगे बढ़ें। यह सिद्धांत आज के वैश्विक मानवाधिकारों और सर्वधर्म समभाव का सबसे बड़ा उदाहरण है।
 

5. स्वाभिमान और निडरता से जीना

गुरु हरगोविंद सिंह जी ने सिखों को आदेश दिया कि वे अब उनके पास धन-दौलत के बजाय अच्छे घोड़े और उत्तम हथियार भेंट स्वरूप लाएं। उन्होंने सिखों के अंदर से गुलामी की मानसिकता और डर को पूरी तरह निकाल फेंका और उन्हें राजाओं की तरह 'शाही ठाट' और स्वाभिमान से जीना सिखाया।
 
* आज के समय में जब लोग डिप्रेशन, मानसिक तनाव और हीनभावना का शिकार हो रहे हैं, गुरु जी का यह सिद्धांत याद दिलाता है कि ईश्वर ने हर इंसान को स्वतंत्र और संप्रभु बनाया है। अपनी पहचान पर गर्व करें, निडर रहें और किसी के सामने घुटने न टेकें।
 
संक्षेप में, गुरु हरगोविंद सिंह जी की जयंती पर उनका संदेश और जीवन हमें यही सिखाता है कि एक हाथ में माला/ अध्यात्म और दूसरे हाथ में समाज की रक्षा के लिए सामर्थ्य/ शक्ति होना जरूरी है। सच्चे अर्थों में धर्म वही है जो कायरता नहीं, बल्कि वीरता और करुणा दोनों एक साथ सिखाए। उन्होंने दुनिया को आध्यात्मिक शक्ति और सांसारिक उत्तरदायित्व के संतुलन का जो मार्ग दिखाया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था।

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