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तीखा सामाजिक-आर्थिक व्यंग्य: दो जून की रोटी

An image featuring sharp satire on the country's economy and rising inflation
साहब! दो जून की रोटी मिल जाए, बस और क्या चाहिए? यह वाक्य सुनने में जितना सरल लगता है, उतना ही भयावह है। दरअसल यह कोई संतोष का वाक्य नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का मृत्युलेख है जिसने करोड़ों लोगों की पूरी जिंदगी को सिर्फ रोटी तक सीमित कर दिया। जिस देश ने चंद्रयान भेज दिया, डिजिटल क्रांति कर दी, जीडीपी के ग्राफ आसमान तक पहुँचा दिए, उसी देश का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी सुबह उठकर यह तय नहीं कर पाता कि शाम को चूल्हा जलेगा भी या नहीं।
 
एक तरफ कांच की ऊंची इमारतों में बैठे लोग वर्क फ्रॉम होम करते हुए एवोकाडो टोस्ट और ग्रीन टी के साथ हेल्दी लाइफस्टाइल पर वेबिनार कर रहे हैं, दूसरी तरफ शहर के किसी नाले किनारे बैठा रिक्शेवाला अपनी पत्नी से पूछ रहा है आज आटा बचेगा या फिर बच्चों को कहानी सुनाकर सुला दें?
 
यह वही देश है जहां भूख अब आं तों से कम और भाषणों में अधिक पाई जाती है। यहां रोटी पेट से ज्यादा राजनीति में फूलती है। चुनाव आते ही हर दल गरीब की थाली में उतर आता है। कोई कहता है मुफ्त राशन देंगे, कोई कहता है पोषण देंगे, कोई कहता है सब्सिडी देंगे, लेकिन कोई यह नहीं कहता कि ऐसी व्यवस्था देंगे जहां आदमी खुद अपनी रोटी सम्मान से कमा सके। क्योंकि आत्मनिर्भर गरीब राजनीति के लिए उतना उपयोगी नहीं होता जितना राशन कार्ड वाला गरीब।
 
अब रोटी भी वर्ग देखकर परोसी जाती है। अमीर आदमी की थाली में मल्टीग्रेन, लो कार्ब, ग्लूटन फ्री, ऑर्गेनिक रोटियां हैं। गरीब की थाली में रोटी नहीं, समझौता रखा होता है। आधी जली हुई दो बासी रोटियाँ, नमक-मिर्च और बच्चों को यह समझाने की कोशिश कि आज भूख कम लग रही होगी। अमीर के यहां डाइट प्लान बनते हैं, गरीब के यहां रोटी प्लान। वहां लोग वजन घटाने के लिए खाना छोड़ते हैं, यहां लोग पैसे बचाने के लिए।
 
देश की अर्थव्यवस्था बड़ी तेज़ी से बढ़ रही है। हर महीने कोई नया आंकड़ा आता है जो बताता है कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने वाला है। मगर अजीब बात है कि यह अर्थव्यवस्था हमेशा गरीब की थाली के ऊपर से छलांग लगाकर निकल जाती है। स्टॉक मार्केट ऊपर जाता है तो मजदूर की कमर और झुक जाती है। सेंसेक्स को देखकर कॉर्पोरेट जगत मुस्कुराता है, लेकिन दिहाड़ी मजदूर रोज सुबह इस डर से उठता है कि आज काम मिला तो रोटी मिलेगी, नहीं मिला तो लोकतंत्र का भाषण पीकर सोना पड़ेगा।
 
बिहार का मजदूर राजस्थान में ईंट ढो रहा है। उड़ीसा का युवक पंजाब की मंडियों में धूप सेंक रहा है। बुंदेलखंड का किसान दिल्ली में निर्माणाधीन इमारतों पर सीमेंट मल रहा है। और इन सबका सपना क्या है? कोई बंगला नहीं, कोई कार नहीं बस इतना कि घर में चूल्हा जलता रहे। ये लोग इस देश की अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक देवता हैं, लेकिन व्यवस्था इन्हें अनस्किल्ड लेबर कहती है, जैसे भूख मिटाने के लिए डिग्री जरूरी हो।
 
महंगाई अब आर्थिक समस्या नहीं रही, वह एक संगठित साजिश जैसी लगती है। प्याज अब सब्जी कम, भावनात्मक हथियार अधिक हो गया है। टमाटर कभी आम आदमी की पहुंच से बाहर जाकर अचानक वीआईपी व्यवहार करने लगता है। गैस सिलेंडर की कीमत सुनकर गृहिणी रोटी बेलने से पहले बजट बेलती है। अब रसोई में मसाले कम और गणित अधिक पकता है। महीने के अंतिम सप्ताह में घर की महिलाएँ वैज्ञानिकों की तरह प्रयोग करती हैं कि बची हुई दाल से कितने दिन और लोकतंत्र चलाया जा सकता है।
 
सरकारें कहती हैं डिजिटल इंडिया बन रहा है। बिल्कुल बन रहा है। अब भूख भी डिजिटल हो गई है। राशन चाहिए तो आधार लिंक कराइए। अंगूठा लगाइए। ओटीपी डालिए। सर्वर डाउन हो तो भूखे रहिए। गरीब आदमी अब रोटी से पहले नेटवर्क खोजता है। सरकारी पोर्टल कहता है भोजन की गारंटी। गांव वाला कहता है साहब, यहां तो नेटवर्क ही नहीं आता। ऐसा लगता है मानो अब पेट भी ऐप डाउनलोड करके ही भरेगा।
 
शिक्षा और भूख का रिश्ता भी बड़ा विचित्र है। गांव के स्कूलों में बच्चे ज्ञान लेने कम, मध्यान्ह भोजन लेने अधिक आते हैं। शिक्षक उपस्थिति दर्ज करते समय जानते हैं कि बच्चे गणित से पहले खिचड़ी गिनना सीख रहे हैं। ऑनलाइन शिक्षा का सपना उन घरों में भेजा गया जहां मोबाइल से ज्यादा जरूरी आटा था। जिन बच्चों के घर में बिजली नहीं, उनसे कहा गया- डिजिटल बनो। यानी इस देश में गरीब से कहा जा रहा है कि वह भूखे पेट आधुनिक हो जाए।
 
राजनीति भूख की सबसे पुरानी व्यापारी रही है। हर चुनाव में गरीब की थाली कैमरे के सामने परोसी जाती है। नेता रोटी खाते हुए फोटो खिंचवाते हैं, फिर पांच साल तक गरीब लाइन में खड़ा होकर वही रोटी मांगता रहता है। पिछली सरकार कहती है हमने राशन दिया। वर्तमान सरकार कहती है हमने मुफ्त अनाज बढ़ाया। अगली सरकार शायद कहे हमने गरीब को खाने के लिए प्रेरित किया। लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी करोड़ों लोग मुफ्त राशन पर निर्भर क्यों हैं।
 
सबसे भयावह दृश्य सोशल मीडिया पर दिखाई देता है। किसी भूखे बच्चे की वीडियो वायरल होती है। लोग दुखी इमोजी भेजते हैं, मानवता पर लंबी पोस्ट लिखते हैं, फिर अगले ही क्षण किसी सेलिब्रिटी की शादी या क्रिकेट मैच में व्यस्त हो जाते हैं। भूख अब ट्रेंडिंग कंटेंट है। गरीब की पीड़ा अब एल्गोरिद्म के भरोसे चलती है।
 
और इस पूरी व्यवस्था का सबसे क्रूर पक्ष यह है कि अब रोटी भी इज्जत मांगती है। भूखा होना अपराध नहीं माना जाता, लेकिन रोटी मांगना अपमान बना दिया गया है। लोग दान तो करते हैं, पर इस अंदाज़ में कि सामने वाले को उसकी गरीबी का पूरा अहसास हो जाए। अब रोटी पेट नहीं भरती, आत्मसम्मान भी तोड़ती है।
 
सवाल यह नहीं कि देश में अनाज की कमी है। गोदाम भरे पड़े हैं। सवाल यह है कि व्यवस्था की संवेदना खाली क्यों है। एक तरफ शादी-ब्याह में टनों खाना कूड़ेदान में फेंका जाता है, दूसरी तरफ कोई मां अपने बच्चे को पानी पिलाकर सुला देती है ताकि उसे भूख कम लगे। यह केवल आर्थिक असमानता नहीं, सभ्यता की असफलता है।
 
आज दो जून की रोटी कोई साधारण आवश्यकता नहीं रही। यह एक युद्ध है महंगाई और मजदूरी के बीच, भूख और व्यवस्था के बीच, इंसान और उपभोक्ता के बीच। आदमी अब रोटी नहीं खा रहा, वह अपनी जिंदगी किस्तों में चुका रहा है।
 
और शायद इस समय का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जिस लोकतंत्र में रोटी सबसे बड़ा मुद्दा हो, वहां भूखा आदमी आंकड़ा कहलाता है और भरी थाली वाला राष्ट्रवाद समझाता है।

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लेखक के बारे में
सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ अध्यापक, गाडरवारा.... और पढ़ें