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हिंदी साहित्य में पहेली के रूप में लिखी जाने वाली एक लयात्मक कविता: कह मुकरियां
पहेली के रूप में लिखी जाने वाली हिंदी साहित्य में एक लयात्मक कविता। मुझको देता शीतल छाया। देख उसे मन बहुत लुभाया। वर्षा ... -
पृथ्वी और पर्यावरण पर कविता: काश प्रकृति भी बोल पाती
Poem on Environment : काश पेड़ चीख पाते तो शायद कुल्हाड़ियों की धार इतनी निर्दयी न होती वे कहते यह धूप केवल तुम्हारी ... -
लोकतंत्री कॉकरोच
तीन दिन के भीतर 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम से एक फेसबुक पेज बन गया और देखते ही देखते उस पर बारह मिलियन लाइक आ गए। यह ... -
बाल कविता: टप्पा टप्पा टुन टुन
टप्पा टप्पा टुन टुन। सुबह सुनहरी गुनगुन। चिड़िया दाना चुनचुन। मुन्नी हंसती खुनखुन। टप्पा टप्पा टुन टुन। सूरज निकला सुन ... -
ध्यान पर दोहे: भटके पथ से लौटकर, मन पाए विश्राम
मन चंचल घोड़े सदिश, खींचे ध्यान लगाम। भटके पथ से लौटकर, मन पाए विश्राम।। शब्द भाव जब सब थमें, भीतर बहे प्रकाश। ध्यान ... -
नवगीत: कांच हुए सब रिश्ते-नाते
कांच हुए सब रिश्ते-नाते, मन भी टूट भरे। भीतर-भीतर सन्नाटे अब, मन में खटक रहे। शहरों की इस भीड़ में रिश्ते, खूंटी लटक ... -
हिन्दी कविता: पृथ्वी की पुकार
समय की अनंत धारा में पृथ्वी अब भी शांत नहीं है वह बोल रही है अपनी दरकती मिट्टी की लकीरों में सूखते जलस्रोतों की निस्पंद ... -
परीक्षा, तनाव और विद्यार्थी : दबाव के बीच संतुलन की राह
परीक्षा, तनाव और वितनाव कोई शत्रु नहीं है। थोड़ी मात्रा में तनाव हमें सजग बनाता है, पर जब वह डर में बदल जाए, तब समस्या ... -
एक सामयिक व्यंग्य: विश्वशांति का महायुद्ध
Iran and America War: ईरान और अमेरिका के बीच चल रही तनातनी को देखिए। दोनों ही पक्ष अत्यंत गंभीर, जिम्मेदार और ... -
प्रेम कविता: जिनके लिए
जिनके लिए देर तक रुका रहा मैं अपने ही समय की देहरी पर अपनी धड़कनों को धीरे धीरे समझाता हुआ और वे समय की सटीकता ओढ़े ... -
श्री हनुमंत स्तवन: अतुल्य शक्ति
अतुल्य शक्ति पुंज रूप राज देव रंजनं, प्रचंड वेग वायु पुत्र शत्रु सैन्य भंजनं। सुवर्ण शैल काय दीप्ति भाल चंद्र सोहने, ... -
कुंडलिया छंद : हनुमत स्तवन
बलवीरा हनुमंत तुम, संकट मोचन नाम। रामदूत अतुलित प्रभा, त्रिभुवन पूजित काम।। त्रिभुवन पूजित काम, दहन लंका करि डारे। ... -
राम- राष्ट्र की जीवनधारा और शाश्वत चेतना का प्रवाह
राम नवमी केवल एक जन्मतिथि का उत्सव नहीं, बल्कि उस जीवनदर्शन का स्मरण है, जिसने भारत को ‘भारत’ बनाया। यह उस मर्यादा का ... -
सीता परित्याग पर दोहे
सन्नाटे में थी सभा, सम्मुख खड़ा समाज। कठिन घड़ी थी राम को, चुनना धर्म-जहाज॥ धोबी तो बस नाम था, संशय था चहुं ओर। मर्यादा ... -
सामयिक व्यंग्य: होली के शूरवीर
होली साल का वो इकलौता दिन है जब इंसान स्वेच्छा से बंदर बनने के लिए तैयार होता है। सुबह-सुबह आप नहा-धोकर, क्रीम लगाकर ... -
विश्व नारी दिवस पर कविता: नारी, सृष्टि की अजस्र धारा
जब सृष्टि की प्रथम भोर अभी पूर्णत: खुली भी नहीं थी जब पृथ्वी की निस्तब्ध मिट्टी में जीवन की हल्की हलचल भर उठी थी तभी ... -
बहुआयामी कविताएं
कविताएं केवल शब्दों का अनुशासन नहीं होतीं वे चेतना की वह खुली खिड़की होती हैं जहां से समय, समाज और आत्मा एक साथ झांकते ... -
होली पर लघुकथा: स्मृति के रंग
होली की सुबह थी। आंगन में धूप ऐसे उतर आई थी मानो आकाश ने स्वयं गुलाल ओढ़ लिया हो। गली के बच्चे रंग और पिचकारियों के साथ ... -
नवगीत: सुलग रहा है मन के भीतर
सुलग रहा है मन के भीतर घाव पुराना किसे दिखाएं। होंठों पर आकर बैठी है गुमसुम तन्हाई। विस्मित सा मन रिश्ते सूखे। लुक्का ... -
प्रेम, आत्म-विलय से वैश्विक चेतना तक का महाप्रस्थान
वेलेंटाइन डे पर विशेष आलेख: अक्सर हम प्रेम को अपेक्षा का पर्याय मान लेते हैं। हम अपेक्षा करते हैं कि प्रिय हमारे अनुरूप ...
