विजय सिंह चौहान की आठ लघुकथाएं
परवरिश
“गलत बात है, सुधाकर जी! आपका बेटा नशे की गिरफ्त में है और आप पिता होकर भी कुछ नहीं कहते।”
रत्नाकर जी के शब्द सुधाकर के कानों में गरम शीशे-से उतर गए।
“मेरा बेटा? न शराब, न सिगरेट। समय का पाबंद, आज्ञाकारी और पढ़ाई में भीअव्वल है।”
रत्नाकर जी ने धीमे से कहा, “बुरा मत मानिए... नशे की शक्ल बदल गई है।”
“क्या मतलब?”
“कभी अपने बेटे के रोजमर्रा के व्यवहार पर नजर डालिए। हर सुविधा हाथ में, हर काम दूसरों के भरोसे, मेहनत से दूरी और आराम की आदत... सोचिए, कल वह कमाएगा क्या और अपना संसार चलाएगा कैसे?”
सुधाकर की आँखों के सामने बेटे का ऐशोआराम तैर गया।
कुछ क्षणों के सन्नाटे के बाद रत्नाकर जी बोले…
“बोतल का नशा छुड़ाना आसान है, सुधाकर जी... आराम का नशा छुड़ाने के लिए पूरी परवरिश बदलनी पड़ती है।”
विजय
“पिताजी, एक बात कहनी है।”
शराबी बेटे की बात सुनकर पिता ने झिड़कते हुए कहा, “पेंशन, पैसा, मान-सम्मान। सब शराब में घोलकर पी गया, अब क्या बचा है?”
“आपकी और छुटकी की बात दिल पर लग गई?” तो मै क्या करूं.… बाबूजी की चिंता हवा में तैर गई।
नज़रें झुकाए पवन बोला, बाबूजी! “श्राद्ध पक्ष और उसके बाद नवरात्र बीत गए, लेकिन मैंने शराब की ओर देखा तक नहीं, आप चाहें तो अपनी बहू से पूछ लीजिए।”
पवन ने झुककर पिता के चरण छुए।
बाबूजी का चेहरा खिल उठा। “अरे वाह! इससे शुभ क्या होगा! सही मायने में आज है हमारा हैप्पी दशहरा।”
पवन के चेहरे पर रौनक लौट आई। उधर, परदे के उस पार शकुंतला गुनगुनाते हुए अपनी माँग भर रही थी।
अँगुलियों पर बाजार
बा रोज की तरह आज भी बच्चों का मन टटोल रही थी। गोद में लेटे काकू के बालों में उँगलियाँ फेरते हुए बोली…
“पहले हर महीने जरूरत और बजट देखकर सामान की सूची बनाते थे। पंसारी को दे आते और पूरे महीने का राशन घर आ जाता। अब तो बाजार अँगुलियों पर आ गया है।”
काकू मोबाइल पर उँगली चलाते हुए मुस्कुराया...
“हाँ बा! घर बैठे जो चाहो, जब चाहो… बस एक क्लिक और सामान हाजिर।”
बा कुछ पल चुप रही। फिर उसके बालों में हाथ फेरते हुए बोली
“सामान तो एक क्लिक पर मिल जाता है… पर क्या जरूरत भी अब एक क्लिक पर पैदा होने लगी है?”
काकू की उँगली स्क्रीन पर ठिठक गई।
बा मुस्कुराई…
“पहले हम जरूरत के हिसाब से बाजार जाते थे… अब बाजार हमारी जरूरतें तय करता है।”
स्माइल प्लीज़
“जल्दी आइए, सब लोग! पारिवारिक तस्वीर लेनी है।” फोटोग्राफर की आवाज़ घर के कोने-कोने में गूँज रही थी।
बड़े और मँझले बेटे विपरीत दिशाओं से लौटे। गुड़िया दादा-दादी के पास पहले से ही सजी-धजी बैठी थी। देवरानी, जेठानी और ननद के बीच कई दिनों से संवाद के किवाड़ बंद थे।
बगीचे में दादा-दादी के लिए कुर्सियाँ लगाई गईं। बाकी सदस्य उनके पीछे कतारबद्ध हो गए। फोटोग्राफर के बार-बार कहने पर कुछ होंठ खिंचे, कुछ चेहरे खिले और देखते ही देखते परिवार मुस्कुरा उठा।
“बस, एक मिनट!” दादाजी अचानक बोल पड़े।
सबकी निगाहें उनकी ओर उठ गईं।
वे परिवारजन के एक-एक चेहरे को देर तक निहारते रहे। फिर धीमे से बोले, “भैया, इस पल को आँखों में बसाना चाहता हूं। तस्वीर तो कागज़ पर रह जाएगी… न जाने, पूरा परिवार मुझे फिर कब एक साथ मुस्कुराता दिखाई दे!”
नीली रोशनी
“हर वक्त मोबाइल में धँसे रहते हो! पढ़ाई का बहाना कब तक चलेगा?”
माँ की झुंझलाहट पर विवान ने स्क्रीन से नज़र हटाए बिना कहा…
“माँ, ज़माना बदल गया है। अब किताबें भी मोबाइल में आ गई हैं।”
माँ कुछ पल चुप रहीं। खिड़की से भीतर आती धूप को देखती हुई बोलीं…
“हाँ बेटा, ज़माना बदला है। पढ़ने का ढंग बदला है, साधन बदले हैं। नई तकनीक का स्वागत होना ही चाहिए।”
उन्होंने विवान के सिर पर हाथ रखा और धीमे से कहा… “बस, इतना याद रखना... तकनीक की यह नीली रोशनी पढ़ाई का उजाला बने, कहीं तुम्हारी ज़िंदगी का अँधेरा न बन जाए।”
पंद्रह सौ
“आप समझते ही नहीं! शर्माइन ने अपने बच्चों का स्टेटस डाला है। लकदक करते मॉल में ट्रॉली पर बैठे चुन्नू-छोटू कैसे बत्तीसी दिखा रहे हैं! आप, कभी तो पैसे न होने का रोना बंद करें।”
सुमन कड़कती बिजली-सी बरस पड़ी।
सुधाकर ने चुपचाप पैसे गिने। पंद्रह सौ पर गिनती रुक गई। सोलहवीं बार नोटों पर हाथ फेरते हुए जैसे उसने खुद को सीमित बजट की कसम दिलाई।
ट्रॉली के भीतर बैठा सार्थक मॉल की चमक-दमक निहार रहा था। मेघा पिता की उँगली थामे नन्हे हाथों से बिस्किट, चॉकलेट, गुड्डा, पेंसिल-कॉपी और जाने क्या-क्या ट्रॉली में भरती जा रही थी। दूसरी ओर सुमन स्टेटस के लिए तस्वीरें खींचने में तल्लीन थी।
“पापा, ये भी ले लें न... बहुत अच्छा है।”
“हाँ बेटा... देखते हैं।”
सुधाकर मुस्कुराए।
मेघा की नजर हटते ही सुधाकर एक-एक करके सामान ट्रॉली से हटाते रहे ।
काउंटर पर बिल पंद्रह सौ के आसपास आकर हांफने लगा।
सुमन ने मोबाइल में तस्वीर देखी, ट्रॉली सामान से लबालब थी और दोनों बच्चे खिलखिला रहे थे, बस फिर क्या था, नीली स्क्रीन पर स्टेट्स फैल चुका था।
घर लौटकर सार्थक ने फोटो गौर से देखते हुए पूछा
“मम्मी, मेघा दीदी ने तो ट्राली में बहुत सारी चीजें रखी थीं... वो घर कब आएँगी?”
सुमन की उँगली मोबाइल की स्क्रीन पर ठिठक गई।
स्टेट्स वाली फोटो में ट्रॉली भरी थी...
बस, बच्चों के सपने रास्ते में कही उतर गए थे।
यशोदा
“मिसेज धींगरा! आपका बेटा कोको आपको आंटी क्यों कहता है?”
सत्यवती के सवाल पर किटी पार्टी में ठहाका अचानक थम गया।
मिसेज धींगरा मुस्कुराईं।
“कोको बरसों से लक्ष्मी के साथ रहा है। बचपन से उसी ने उसकी देखभाल की है… मगर माँ तो मैं ही हूँ। इससे क्या फर्क पड़ता है?”
लक्ष्मी ने अनसुना करते हुए सबको कोल्ड ड्रिंक परोसना जारी रखा तभी उसके मोबाइल पर एक संदेश चमका…“माँ, आज दाल मखनी बनाना… और फुल्के गरम-गरम रखना। जल्दी आ रहा हूँ।”
लक्ष्मी की पलकें भीग गईं। उसने पल्लू से आँसू पोंछते हुए लिखा…“हाँ बेटा… जल्दी आ जा।”
वात्सल्य से भीगी लक्ष्मी को देखकर किटी पार्टी का माहौल अचानक बदल गया।
किचन में कुकर की सीटी गूँज रही थी। उधर मिसेज धींगरा के हाथ में थमा कप काँप उठा।
सेवानिवृत्ति
“वाह! क्या पार्टी है! स्वादिष्ट भोजन, मनमोहक सजावट… पुरुषोत्तम जी ने तो दिल खोलकर खर्च किया है!”
प्रशंसा के बीच विवेक ने गुरमीत के कान में फुसफुसाकर पूछा, “यार, पुरुषोत्तम जी को सेवानिवृत्त हुए तो बरसों बीत गए, फिर आज यह जश्न किस बात का?” तभी पुरुषोत्तम जी ठहाका लगाते हुए बोले, “मित्रों, आपका सवाल सौ टका सही है! नौकरी से तो बरसों पहले विदा हो गया था, मगर घर की जिम्मेदारियों ने कहाँ छुट्टी दी?”
“अब बच्चे अपने पैरों पर खड़े हैं। उन्होंने अपने दायित्व सँभाल लिए हैं। आर्थिक चिंता और भविष्य की फिक्र से भी अब मुक्ति मिल गई है। आज जाकर लगा है कि मैं सचमुच सेवानिवृत्त हुआ हूँ।”
गुरमीत ने विवेक की ओर देखा और मुस्कराकर बोला, “सही कहा भाई! नौकरी की सेवानिवृत्ति की तारीख तय होती है, पिता की सेवानिवृत्ति का दिन बच्चे तय करते हैं।”
-विजय सिंह चौहान

