फरवरी माह और बसंती बयार के इस अद्भुत मेल से संपन्न वेलेंटाइन डे का बेसब्री से इंतज़ार धड़कते दिलों को रहता है। इस दिन का इंतजार पूरे साल पलक-पावड़े बिछाकर किया जाता है। इस दिन दिल खोलकर मीठे बोल, सरसों के फूलों की तरह खिल उठते हैं।
इजहार-दिवस के पावन अवसर पर भावनाएं संवेदनाओं के आचमन की तरह गटकी जाती हैं, कभी-कभी तो पत्थर पर भी बुवाई कर दी जाती। कभी नजरों से, तो कभी तोहफों से इम्प्रेस किया जाता है।
प्रेम के सागर में नेह उफान मारता है। प्रेमी युगल, दो जिस्म, एक जान। एक मिठास, एक पकवान हो जाते हैं। ये झील-सी नीली आंखें…राज है इनमें गहरा। महज गीत नहीं, बल्कि प्रेम-श्लोक बन जाता है। यकीन न आए तो डूबकर देखो। यह बात अलग है कि अभी डल झील में भी बर्फ जमी है। पानी बर्फ बन चुका है, इसलिए डूबना भी हो तो समय उत्तम है।
प्रेयसी की एक झलक पाने के लिए, उससे बतियाने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता। यह तो हाल-ए-दिल ही बता सकता है। हमारे कलेजे के छल्ले, जिसे हम प्यार से 'चकरे' कहते हैं, को 'सुरीली' से प्यार हो चला। कभी मिलने के लिए टेकरी पर चढ़ता, तो कभी सुनहरे ख़्वाब बुनता। दिन में तीन बार पतली मूंछों पर ताव देता फिरता।
जहां सुरीली का नाम आया नहीं कि उसके मन का हिरण कुलांचे भरने लगता। जब भी सुरीली नयनों के तीर छोड़ती, बेचारा चकरा दौड़ पड़ता। कल्याण जी से उल्टी दाढ़ी बनवाना, टेरीकॉट के कपड़ों को कलफ में डुबोना, फिर तलवार की धार की तरह प्रेस करना, यकीनन किसी उद्यम से कम नहीं।
चकरे के गाल-बाल ऐसे चमकते थे कि अनपढ़ भी प्रेम की इबारत पढ़ ले। पेंसिल जैसी मूंछों पर फिदा सुरीली के दिन-ब-दिन सुर बदलने लगे। पहले प्यार के पंछी के संग गाने गाए, फिल्में देखीं, खूब घूमाया-फिराया। सुरीली भी सुर लगाती रही। मेरे यार के लिए आज का दिन कुछ ख़ास है, क्योंकि आज वेलेंटाइन डे है।
पुराने दिनों की याद ताजा करते हुए हमारा यार बन संवरकर झील किनारे बैठा रहता था, कि कभी तो लहर आएगी। प्रेम, प्यार, इश्क, लव को उसने इतने करीब से जाना कि लोग उसे लवगुरु के नाम से जानते थे। लड़की पटाने के आसान नुस्ख़े, बेरोजगारी में भी प्रेम को कैसे जिंदा रखें, उधार के पहियों पर लड़की घुमाने जैसे गंभीर विषयों पर रायशुमारी करता था।
काव्य-गोष्ठी, शेरो-शायरी सभी का शौक हुआ करता था मेरे यार को।
' ये इश्क नहीं आसान, बस इतना समझ लीजिए,
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।'
यही मुख्य शेर उसकी जुबान पर रहता था।
कल रात ही बड़बड़ा रहा था या तो आप डूबकर पार निकल जाओगे, या आग का दरिया आपको जला कर राख कर देगा।
गंभीर विषय पर बात चल ही रही थी कि 'सुरीली' ने आठवां सुर लगाया। चाय का छलकता कप दचकते हुए आंखें तरेरने लगी 'बंद करो बकवास! कब तक डींगे हांकते रहोगे? शादी हुए पच्चीस साल हो गए, अब तो चुन्नू का भी ब्याह हो गया। आज तक एक फूल तो लाकर दिया नहीं। जब देखो तब गोभी का फूल ले आते हो।
पहले कहते थे कि मेरे लिए चांद-तारे तोड़ लाओगे, तारे जमीन पर बिछा दोगे। एक साड़ी तो सुखा नहीं सकते। तारे क्या ख़ाक बिछाओगे?' यकीन मानिए, हमारे यार का बुख़ार बिना दवाई के ही उतर गया। प्यार का भूत बिना ओझा के ही भाग गया। अब हैं चुन्नू-छोटू की फरमाइशें, बीवी की दवा और भतीजी की जिम्मेदारियां।
बेगम अब गम में बदल चुकी है। चंद्रमुखी हरदम ज्वालामुखी जान पड़ती है और हमारा यार तीन तरह की तुअर दाल बिना तेल के बघारता है, पुलाव पकाता है। ससुराल वालों की राल और उसकी चाल कदमताल करती नजर आती है।
वेलेंटाइन पहले भी था, वेलेंटाइन अब भी है। बस मायने बदल गए हैं।
Edited BY: Raajshri Kasliwal