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मैं गीत बन अधरों पर आऊंगा

Poetry
ये चांद तारे नील गगन में
कुछ गीत प्यारे गुनगुनाते है
ये गीत कुछ और नही बस
तेरी मेरी कहानी सुनाते है
 
उस कहानी को सुनते-सुनते
फिर ये भावुक मन फिर रोया है
अधर तो कुछ सुना न सके
पर नयनों ने सब कुछ बोला है
 
इन नयनों की भाषा को पढ़ तुम
मेरे आंगन में आ जाओ
सूनी पड़ी दिल की बगिया में
रातरानी बनकर बिखर जाओ
 
तुम्हारे संग जो पल है गुजारे
मैं उसे भुला ना पाऊंगा
तुम छन्दों में बस जाओ
मैं गीत बन अधरों पर आऊंगा। 
लेखक के बारे में
राकेशधर द्विवेदी
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