क्या सूर्य और चंद्र ग्रहण से आते हैं भूकंप? पुराने रिकॉर्ड से समझिए सच और क्या है आने वाली तबाही का दावा
भूकंप आने के कई कारण होते हैं, जिनमें से एक मुख्य कारण पृथ्वी की आंतरिक हलचलों के साथ-साथ सूर्य और चंद्र ग्रहण के दौरान ग्रहों का गोचर माना जाता है। पूर्णिमा और अमावस्या के दिन समुद्र में ज्वार-भाटा (High Tide) बढ़ जाता है और जलस्तर में वृद्धि होती है। इसका मुख्य कारण चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव है। यह गुरुत्वाकर्षण खिंचाव पृथ्वी के भीतर स्थित टेक्टोनिक प्लेटों पर भी दबाव डालता है, जो भूकंप का कारण बन सकता है।
ज्योतिषीय और प्राचीन मान्यताएं
भारतीय ज्योतिष और वराहमिहिर रचित 'वृहत संहिता' के अनुसार, सूर्य व चंद्र ग्रहण के दौरान प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ प्राणियों में मानसिक बेचैनी भी बढ़ जाती है। वराहमिहिर के अनुसार भूकंप के प्रमुख कारणों में वायुवेग तथा पृथ्वी के धरातल का आपस में टकराना शामिल है।
ग्रहण और भूकंप के मुख्य संबंध व संकेत:
80 दिनों का संवेदनशील अंतराल: किसी भी ग्रहण के 40 दिन पूर्व और 40 दिन बाद (कुल 80 दिनों के अंतराल) के भीतर भूकंप आने की आशंका बढ़ जाती है। कुछ स्थितियों में यह समय घटकर ग्रहण के 15 दिन पूर्व या पश्चात भी हो सकता है।
लगातार दो ग्रहणों का प्रभाव: यदि दो पूर्ण ग्रहण (सूर्य और चंद्र) बहुत कम अंतर पर पड़ते हैं, तो ग्रहण के एक दिन पूर्व या बाद में भूकंप आने की संभावना अधिक होती है।
भूकंप का समय: अधिकांश भूकंप दोपहर 12 बजे से सूर्यास्त के बीच या मध्यरात्रि से सूर्योदय के बीच दर्ज किए जाते हैं।
संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्र: ग्रहण के अलावा यूरेनस, प्लूटो, नेपच्यून, शनि, मंगल और बृहस्पति की विशेष स्थिति जिस क्षेत्र पर प्रभाव डालती है, वहां भूकंप की संभावना अधिक होती है। हिमालयी क्षेत्र इस दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है।
जल व वायु चक्र में बदलाव: ग्रहण के कारण वायुवेग बदलता है और आंधी-तूफान का प्रभाव बढ़ता है। समुद्र में जल की गति बदलने से आंतरिक प्लेटों पर दबाव बढ़ता है और वे आपस में टकराती हैं।
ग्रहण के प्रकार का असर: मान्यताओं के अनुसार, सूर्य ग्रहण के बाद थल (धरती) से जुड़ी आपदाएं और चंद्र ग्रहण के दौरान समुद्री या जल से संबंधित आपदाएं अधिक आती हैं।
ग्रहण और भूकंप का प्राचीन व ऐतिहासिक उल्लेख
424 ईसा पूर्व (यूनान): ग्रीक इतिहासकार थ्यूसिडाइड्स के अनुसार, 21 मार्च 424 ईसा पूर्व को आंशिक सूर्य ग्रहण के लगभग 10 दिन बाद बड़ा भूकंप आया था।
29 ईस्वी (मध्य पूर्व): प्राचीन भूमध्यसागरीय लेखों के अनुसार, सूर्य ग्रहण के दौर में मृत सागर (Dead Sea) के आसपास भूकंप दर्ज किया गया था।
एज़्टेक सभ्यता (मेक्सिको): मेक्सिको की प्राचीन एज़्टेक पांडुलिपियों में भी कई बार सूर्य ग्रहण और भूकंपीय हलचलों के एक ही वर्ष में होने का उल्लेख मिलता है।
इतिहास के प्रमुख भूकंप और ग्रहणों का रिकॉर्ड
विश्व का सबसे शक्तिशाली भूकंप (1960): 13 मार्च 1960 को चंद्र ग्रहण और 27 मार्च 1960 को सूर्य ग्रहण के बाद, 22 मई 1960 को चिली में $9.5$ तीव्रता का अब तक का सबसे शक्तिशाली भूकंप दर्ज किया गया था।
9 जनवरी 2001 (भारत): चंद्र ग्रहण के बाद 26 जनवरी 2001 को गुजरात (भुज) में भयानक भूकंप आया।
9 नवंबर 2003 (अलास्का): चंद्र ग्रहण के बाद 17 नवंबर को अलास्का में झटके महसूस किए गए।
26 दिसंबर 2004 (हिंद महासागर सुनामी): 28 अक्टूबर 2004 के चंद्र ग्रहण के बाद 26 दिसंबर को 9.1-9.3तीव्रता की सुनामी आई। इससे पूर्व 23 अक्टूबर को जापान में भी तबाही हुई थी।
3 मार्च 2007 (सुमात्रा): चंद्र ग्रहण के बाद 6 मार्च को सुमात्रा में विनाशकारी भूकंप आया।
12 जनवरी 2010 (हैती): 7.0 तीव्रता का भूकंप 15 जनवरी 2010 के वलयाकार सूर्य ग्रहण से 3 दिन पहले आया था।
11 मार्च 2011 (जापान): 4 जनवरी 2011 को आंशिक सूर्य ग्रहण के बाद तोहोकू में 9.1 तीव्रता का भूकंप आया।
25 अक्टूबर 2022 (भारत): सूर्य ग्रहण के बाद मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भूकंपीय झटके महसूस किए गए।
8 नवंबर 2022 (नेपाल व भारत): चंद्र ग्रहण के बाद नेपाल और उत्तर भारत में 6.3 तीव्रता का भूकंप आया।
वर्ष 2025 में कुल 4 ग्रहण (2 चंद्र और 2 सूर्य ग्रहण) हुए। इस दौरान वैश्विक स्तर पर कई शक्तिशाली भूकंप दर्ज किए गए। 14 मार्च को पूर्ण चंद्र ग्रहण और 29 मार्च को आंशिक सूर्य ग्रहण। 7-8 सितंबर को पूर्ण चंद्र ग्रहण (भारत में दृश्यमान) और 21-22 सितंबर को आंशिक सूर्य ग्रहण। 28 मार्च को म्यांमार में 7.7 M का भूकंप सूर्य ग्रहण से 1 दिन पहले आया। 30 सितंबर व 10 अक्टूबर को फिलीपींस में 6.9 M व 7.4 M के भूकंप आया।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Science Viewpoint)
वैज्ञानिकों और अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, ग्रहण और भूकंप का आपस में कोई सीधा संबंध साबित नहीं हुआ है:
टाइडल स्ट्रेस (Tidal Stress): सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी के एक पंक्ति में आने से गुरुत्वाकर्षण खिंचाव बढ़ता है, जिससे समुद्र में ज्वार-भाटा और धरती की सतह पर 'अर्थ टाइड' (Earth Tide) बनता है।
फॉल्ट लाइन्स पर प्रभाव: जो टेक्टोनिक प्लेट्स पहले से ही अत्यधिक दबाव में और फटने की कगार पर होती हैं, वे कभी-कभार इस खिंचाव से प्रभावित हो सकती हैं। हालांकि, ऐसा खिंचाव हर अमावस्या और पूर्णिमा को होता है—चाहे ग्रहण लगे या न लगे।
पूर्वानुमान की सीमाएं: विज्ञान के अनुसार भूकंप की सटीक तारीख या समय की भविष्यवाणी करना संभव नहीं है।
हिमालयी क्षेत्र में 'मेगा अर्थक्वेक' की आशंका
भूवैज्ञानिकों के अनुसार, प्रत्येक 1,000 वर्षों में हिमालय की तराई में एक 'मेगा अर्थक्वेक' (8 से 9 तीव्रता) आने की संभावना रहती है। इस क्षेत्र में पिछला बड़ा संचित दबाव रिलीज़ हुए लंबा समय हो चुका है, इसलिए वैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर बुनियादी ढांचे के सेफ्टी ऑडिट की सलाह दी जाती है।
ज्योतिषीय गणना व संभावित भविष्यवाणियां
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से वर्ष में 5 या उससे अधिक ग्रहणों का होना अशुभ माना जाता है। वर्ष 2027 में 5 ग्रहणों (सूर्य और चंद्र ग्रहण) का संयोग बन रहा है। ज्योतिषीय आकलन के आधार पर निम्नलिखित प्रमुख आशंकाएं व्यक्त की जाती हैं:
बड़ी आतंकी घटना के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव या युद्ध जैसी स्थिति।
भारत के किसी क्षेत्र में बड़े भूकंप के कारण तबाही के संकेत।
देश के किसी प्रमुख नेता का आकस्मिक निधन।
आंतरिक अस्थिरता पैदा करने के उद्देश्य से बड़ा आंदोलन या उपद्रव।
पूर्वोत्तर राज्यों और बंगाल में हिंसा को नियंत्रित करने के लिए कड़े नीतिगत फैसले।

