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Vat Savitri Vrat 2026: ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा का क्या है महत्व, पढ़िए पौराणिक कथा

Women worshipping the banyan tree on the occasion of the Vat Savitri Purnima Vrat
Savitri and Satyavan Story: हिंदू धर्म में ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस दिन को ज्येष्ठ पूर्णिमा या वट पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन स्नान, दान और व्रत करने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। विशेष रूप से शादीशुदा महिलाएं इस दिन अपने पति की लंबी उम्र के लिए वट सावित्री का व्रत भी रखती हैं।ALSO READ: Vat Savitri Vrat: वट सावित्री व्रत का अर्थ, पूजा विधि, आरती, चालीसा और कथा

 

ज्येष्ठ पूर्णिमा का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूर्णिमा की रात को धन की देवी लक्ष्मी की पूजा करने से घर में कभी आर्थिक तंगी नहीं होती। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन सुहागिन महिलाएं बरगद (वट) के पेड़ की पूजा करती हैं, जिससे उनके पति को लंबी आयु और अच्छी सेहत मिलती है। ज्येष्ठ के महीने में तीव्र गर्मी होती है, इसलिए इस पूर्णिमा पर पानी, घड़ा, छाता, सत्तू और पंखा दान करने का विशेष महत्व है।
 

पौराणिक कथा: सती सावित्री और सत्यवान

ज्येष्ठ पूर्णिमा से जुड़ी सबसे प्रमुख और लोकप्रिय कथा सती सावित्री और सत्यवान की है। इसी कथा के कारण इस दिन वट वृक्ष की पूजा की जाती है।
 

1. सावित्री का संकल्प

भद्र देश के राजा अश्वपति की कन्या सावित्री ने द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। सत्यवान सर्वगुण संपन्न थे, लेकिन देवर्षि नारद ने राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान की आयु बहुत कम है और विवाह के ठीक एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। पिता के समझाने के बाद भी सावित्री अपने फैसले पर अडिग रही और सत्यवान से विवाह कर लिया।
 

2. यमराज का आगमन

विवाह के बाद सावित्री अपने सास-पसार के साथ जंगल में रहने लगी। जब सत्यवान की मृत्यु का दिन आया, तो वह लकड़ी काटने के लिए जंगल में जाने लगा। सावित्री भी उसके साथ चल दी। जंगल में लकड़ी काटते समय अचानक सत्यवान के सिर में तेज दर्द हुआ और वह बरगद के पेड़ के नीचे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। कुछ ही देर में वहां प्राण हरने के लिए साक्षात यमराज प्रकट हुए।
 

3. सावित्री का यमराज के पीछे जाना

यमराज ने सत्यवान के प्राण लिए और दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने उसे रोकने की कोशिश की और कहा, 'हे देवी! मृत्यु अटल है, तुम वापस लौट जाओ।' लेकिन सावित्री ने कहा, 'जहां मेरे पति जाएंगे, वहां मुझे जाना ही होगा। यही मेरा पत्नी धर्म है।'ALSO READ: वट सावित्री व्रत: सुहागिनों के लिए महाव्रत, जानें पूजा से जुड़ी 10 अनसुनी और जरूरी बातें vat savitri vrat 2026
 

4. यमराज से वरदान

सावित्री के पतिव्रत धर्म और बुद्धिमानी भरी बातों से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे सत्यवान के प्राणों को छोड़कर तीन वरदान मांगने को कहा:
 
पहला वरदान: सावित्री ने अपने अंधे सास-ससुर की आंखों की रोशनी मांगी।
 
दूसरा वरदान: उसने अपने ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा।
 
तीसरा वरदान: सावित्री ने यमराज से सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान मांग लिया।
 

5. सत्यवान के प्राण वापस मिले

यमराज ने बिना सोचे-समझे 'तथास्तु' कह दिया। इसके बाद सावित्री ने बड़ी चतुराई से कहा, 'हे प्रभु! आप तो न्याय के देवता हैं। आपने मुझे सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान दिया है, लेकिन अपने पति के बिना मैं मां कैसे बन सकती हूं? इसलिए आपको अपने वचन को पूरा करने के लिए मेरे पति के प्राण लौटाने ही होंगे।'
 
यमराज सावित्री की इस बुद्धिमानी और दृढ़ता के आगे हार गए। उन्होंने सत्यवान के प्राण वापस कर दिए और अंतर्ध्यान हो गए। सावित्री तुरंत उसी बरगद के पेड़ के पास लौटी, जहां सत्यवान का शव रखा था। सत्यवान ऐसे उठ बैठा जैसे गहरी नींद से जागा हो।
 
सार: तभी से ज्येष्ठ माह की इस तिथि को वट पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। महिलाएं बरगद के पेड़ पर सूत बांधकर फेरे लेती हैं ताकि सावित्री की तरह उनके पति पर भी आने वाले सभी संकट टल जाएं।ALSO READ: Vat Savitri Purnima 2026: सुहागिनें नोट कर लें तारीख और शुभ मुहूर्त, इस दिन बरगद पूजा से मिलेगा अखंड सौभाग्य का वरदान!

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