कब है दूसरा मंगला गौरी व्रत? जानिए पूजा का खास मुहूर्त और पूजन विधि
Mangala Gauri Vrat : सावन (श्रावण) माह में पड़ने वाले मंगला गौरी व्रत का विशेष धार्मिक महत्व है। यह व्रत सावन के प्रत्येक मंगलवार को मां पार्वती (देवी मंगला गौरी) को रखा जाता है। यह व्रत माता पार्वती (गौरी) को समर्पित है, जिसे सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और पति की लंबी उम्र के लिए रखती हैं। साल 2026 में सावन मास का दूसरा मंगला गौरी व्रत 11 अगस्त 2026, मंगलवार को रखा जाएगा।
मंगला गौरी व्रत पूजा के शुभ मुहूर्त
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:18 से 01:09 तक
विजय मुहूर्त: दोपहर 02:52 से 03:43 तक
ब्रह्म मुहूर्त: 04:49 से 05:34 तक
दूसरे मंगला गौरी व्रत की मुख्य बातें
यह व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए रखती हैं। अविवाहित कन्याएं मनचाहा और योग्य वर प्राप्त करने के लिए यह व्रत पूरी श्रद्धा से करती हैं। मां मंगला गौरी की कृपा से घर-परिवार से कलह और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
खास मुहूर्त और पूजन विधि
- श्रावण मास के द्वितीय मंगला गौरी यानी मंगलवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठें।
- नित्य कर्मों से निवृत्त होकर साफ-सुथरे अथवा नए वस्त्र धारण कर व्रत करें।
- मां मंगला गौरी (पार्वती जी) का एक चित्र अथवा प्रतिमा लें।
- फिर निम्न मंत्र के साथ व्रत करने का संकल्प लें।
- मम पुत्रापौत्रासौभाग्यवृद्धये श्रीमंगलागौरीप्रीत्यर्थं पंचवर्षपर्यन्तं मंगलागौरीव्रतमहं करिष्ये।
अर्थात्- मैं अपने पति, पुत्र-पौत्रों, उनकी सौभाग्य वृद्धि एवं मंगला गौरी की कृपा प्राप्ति के लिए इस व्रत को करने का संकल्प लेती हूं।
- तत्पश्चात मंगला गौरी के चित्र या प्रतिमा को एक चौकी पर सफेद फिर लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित करें।
- प्रतिमा के सामने एक घी का दीपक (आटे से बनाया हुआ) जलाएं। दीपक ऐसा हो जिसमें 16 बत्तियां लगाई जा सकें।
- फिर 'कुंकुमागुरुलिप्तांगा सर्वाभरणभूषिताम्।
नीलकण्ठप्रियां गौरीं वन्देहं मंगलाह्वयाम्...।।'
- यह मंत्र बोलते हुए माता मंगला गौरी का षोडशोपचार पूजन करें।
- माता के पूजन के पश्चात उनको (सभी वस्तुएं 16 की संख्या में होनी चाहिए) 16 मालाएं, लौंग, सुपारी, इलायची, फल, पान, लड्डू, सुहाग की सामग्री, 16 चूड़ियां तथा मिठाई अर्पण करें। इसके अलावा 5 प्रकार के सूखे मेवे, 7 प्रकार के अनाज-धान्य (जिसमें गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर) आदि चढ़ाएं।
- इसके बाद मंगला गौरी की कथा सुनें या पढ़ें।
- इस व्रत में एक ही समय अन्न ग्रहण करके पूरे दिन मां पार्वती की आराधना की जाती है।
मंगला गौरी व्रत कथा
मंगला गौरी व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय की बात है एक शहर में धरमपाल नाम का एक व्यापारी रहता था। उसकी पत्नी काफी खूबसूरत थी और उसके पास काफी संपत्ति थी, लेकिन उनके कोई संतान नहीं होने के कारण वे काफी दुखी रहा करते थे।
ईश्वर की कृपा से उनको एक पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वह अल्पायु था। उसे यह श्राप मिला था कि 16 वर्ष की उम्र में सांप के काटने से उसकी मौत हो जाएगी। संयोग से उसकी शादी 16 वर्ष से पहले ही एक युवती से हुई जिसकी माता मंगला गौरी व्रत किया करती थी। परिणामस्वरूप उसने अपनी पुत्री के लिए एक ऐसे सुखी जीवन का आशीर्वाद प्राप्त किया था, जिसके कारण वह कभी विधवा नहीं हो सकती थी।
अत: अपनी माता के इसी व्रत के प्रताप से धरमपाल की बहु को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति हुई। इस वजह से धरमपाल के पुत्र ने 100 साल की लंबी आयु प्राप्त की, तभी से ही मंगला गौरी व्रत की शुरुआत मानी गई है। यही कारण है कि सभी नवविवाहित महिलाएं इस पूजा को करती हैं तथा गौरी व्रत का पालन करती हैं और अपने लिए एक लंबी, सुखी तथा स्थाई वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
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