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Diwali 2025: गोवा में क्यों भगवान श्रीकृष्ण हैं दिवाली के असली हीरो, जानिए नरक चतुर्दशी पर किसका जलाया जाता है पुतला
Why narak chaturdashi is celebrated in Goa: भारत के अलग-अलग हिस्सों में दीवाली के त्योहार को अलग-अलग परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। गोवा में इस त्योहार की खास पहचान है नरक चतुर्दशी, जिसे 'नरकासुर वध' के नाम से भी जाना जाता है। यहां इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को असली हीरो माना जाता है, जो राक्षस नरकासुर का वध करते हैं। इस दिन गोवा के विभिन्न हिस्सों में बड़े पैमाने पर पुतला दहन किया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
गोवा में श्रीकृष्ण क्यों हैं दीवाली के नायक: भारत के बाकी हिस्सों में दीवाली का संबंध श्रीराम के अयोध्या लौटने और रावण पर विजय से है। लेकिन गोवा में इस पर्व का मुख्य पात्र भगवान श्रीकृष्ण होते हैं। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था और उसके अत्याचारों से दुनिया को मुक्त किया था। इस घटना को प्रतीकात्मक रूप से गोवा में हर साल नरक चतुर्दशी के दिन पुतला दहन करके मनाया जाता है।
नरकासुर वध की पौराणिक कथा: कृष्ण अपनी आठों पत्नियों के साथ सुखपूर्वक द्वारिका में रह रहे थे। एक दिन स्वर्गलोक के राजा देवराज इंद्र ने आकर उनसे प्रार्थना की, 'हे कृष्ण! प्रागज्योतिषपुर के दैत्यराज भौमासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर के श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा को साथ लेकर गरुड़ पर सवार हो प्रागज्योतिषपुर पहुंचे। वहां पहुंचकर भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से सबसे पहले मुर दैत्य सहित मुर के छः पुत्र- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण का संहार किया।
मुर दैत्य के वध हो जाने का समाचार सुन भौमासुर अपने अनेक सेनापतियों और दैत्यों की सेना को साथ लेकर युद्ध के लिए निकला। भौमासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया और घोर युद्ध के बाद अंत में कृष्ण ने सत्यभामा की सहायता से उसका वध कर डाला। भागवत पुराण में बताया गया है कि भौमासुर भूमि माता का पुत्र था। विष्णु ने वराह अवतार धारण कर भूमि देवी को समुद्र से निकाला था। इसके बाद भूमि देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया। पिता एक दैवीशक्ति और माता पुण्यात्मा होने पर भी पर भौमासुर क्रूर निकला। वह पशुओं से भी ज्यादा क्रूर और अधमी था। उसकी करतूतों के कारण ही उसे नरकासुर कहा जाने लगा।
नरकासुर प्रागज्योतिषपुर का दैत्यराज था जिसने इंद्र को हराकर इंद्र को उसकी नगरी से बाहर निकाल दिया था। नरकासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे थे। नरकासुर अपने मित्र मुर और मुर दैत्य के छः पुत्र- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण के साथ रहता था। भगवान कृष्ण ने सभी का वध करने के बाद नरकासुर का वध किया और उसके एक पुत्र भगदत्त को अभयदान देकर उसका राजतिलक किया। श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर किया था। इसी दिन की याद में दीपावली के ठीक एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी मनाई जाने
नरक चतुर्दशी के दिन गोवा में पुतला दहन: नरक चतुर्दशी के दिन गोवा के स्थानीय लोग बड़े-बड़े पुतले बनाते हैं, जो राक्षस नरकासुर का प्रतीक होते हैं। ये पुतले कागज, लकड़ी और कपड़े से बनाए जाते हैं, जिनमें आतिशबाजी भरी जाती है। ये पुतले ज्यादातर गांवों और शहरों के प्रमुख स्थानों पर स्थापित किए जाते हैं। सुबह होते ही इन पुतलों का दहन किया जाता है, जो बुराई के अंत का प्रतीक है। इस मौके पर लोग एकजुट होकर श्रीकृष्ण की आराधना करते हैं और बुराई के अंत की खुशी मनाते हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक इस त्योहार में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं और इसे धूमधाम से मनाते हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer) : सेहत, ब्यूटी केयर, आयुर्वेद, योग, धर्म, ज्योतिष, वास्तु, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार जनरुचि को ध्यान में रखते हुए सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं। इससे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
गोवा में श्रीकृष्ण क्यों हैं दीवाली के नायक: भारत के बाकी हिस्सों में दीवाली का संबंध श्रीराम के अयोध्या लौटने और रावण पर विजय से है। लेकिन गोवा में इस पर्व का मुख्य पात्र भगवान श्रीकृष्ण होते हैं। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था और उसके अत्याचारों से दुनिया को मुक्त किया था। इस घटना को प्रतीकात्मक रूप से गोवा में हर साल नरक चतुर्दशी के दिन पुतला दहन करके मनाया जाता है।
नरकासुर वध की पौराणिक कथा: कृष्ण अपनी आठों पत्नियों के साथ सुखपूर्वक द्वारिका में रह रहे थे। एक दिन स्वर्गलोक के राजा देवराज इंद्र ने आकर उनसे प्रार्थना की, 'हे कृष्ण! प्रागज्योतिषपुर के दैत्यराज भौमासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर के श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा को साथ लेकर गरुड़ पर सवार हो प्रागज्योतिषपुर पहुंचे। वहां पहुंचकर भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से सबसे पहले मुर दैत्य सहित मुर के छः पुत्र- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण का संहार किया।
नरकासुर प्रागज्योतिषपुर का दैत्यराज था जिसने इंद्र को हराकर इंद्र को उसकी नगरी से बाहर निकाल दिया था। नरकासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे थे। नरकासुर अपने मित्र मुर और मुर दैत्य के छः पुत्र- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण के साथ रहता था। भगवान कृष्ण ने सभी का वध करने के बाद नरकासुर का वध किया और उसके एक पुत्र भगदत्त को अभयदान देकर उसका राजतिलक किया। श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर किया था। इसी दिन की याद में दीपावली के ठीक एक दिन पूर्व नरक चतुर्दशी मनाई जाने
नरक चतुर्दशी के दिन गोवा में पुतला दहन: नरक चतुर्दशी के दिन गोवा के स्थानीय लोग बड़े-बड़े पुतले बनाते हैं, जो राक्षस नरकासुर का प्रतीक होते हैं। ये पुतले कागज, लकड़ी और कपड़े से बनाए जाते हैं, जिनमें आतिशबाजी भरी जाती है। ये पुतले ज्यादातर गांवों और शहरों के प्रमुख स्थानों पर स्थापित किए जाते हैं। सुबह होते ही इन पुतलों का दहन किया जाता है, जो बुराई के अंत का प्रतीक है। इस मौके पर लोग एकजुट होकर श्रीकृष्ण की आराधना करते हैं और बुराई के अंत की खुशी मनाते हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक इस त्योहार में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं और इसे धूमधाम से मनाते हैं।
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