एल्गोरिथम से अपना पर्सपेक्टिव मत बनाओ: तुम्हारे लिए जो 6 है वह मेरे लिए 9 है...
आजकल लोग सोशल मीडिया के आधार पर ही अपनी धारणाएं बनाने लगे हैं। जबकि इस मंच की सच्चाई यह है कि जिसे धर्म का ज़रा भी ज्ञान नहीं है, वह भी ज्ञानी बना बैठा है; और जिसे राजनीति की रत्ती भर समझ नहीं है, वह भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर अपने प्रवचन दे रहा है। जो न तो पत्रकार हैं, न संत, न एक्सपर्ट और न ही डॉक्टर—वे भी इन सभी भूमिकाओं का दावा कर रहे हैं। आइए, इसी विषय और नजरिये पर आधारित यह आलेख पढ़ते हैं:-
सोशल मीडिया हमारे दैनिक जीवन और सोच-विचार का सबसे बड़ा आधार बन चुका है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, हम लगातार रील्स, ट्वीट्स और पोस्ट्स की भरमार से घिरे रहते हैं। धीरे-धीरे इस डिजिटल दुनिया के प्रभाव में आकर लोग हर विषय पर अपनी एक निश्चित धारणा (Opinion) बनाने लगे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया के जरिए किसी विषय के 'सत्य' तक पहुँचा जा सकता है?
डिजिटल क्रांति के इस दौर में ज्ञान की परिभाषा ही बदल गई है। सोशल मीडिया एक ऐसा विशाल मंच बन चुका है जहाँ हर व्यक्ति के पास अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार तो है, लेकिन उस राय के पीछे सत्यता और प्रमाणिकता का अभाव तेजी से बढ़ रहा है। आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया हमारी दिनचर्या ही नहीं, बल्कि हमारी सोच और धारणाओं को संचालित करने वाला सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। लेकिन इस आभासी दुनिया की सबसे चिंताजनक सच्चाई यह है कि यहाँ बिना किसी योग्यता या प्रामाणिकता के हर विषय पर ज्ञान बांटा जा रहा है।
1. सोशल मीडिया पर बढ़ता छद्म ज्ञान:
इस डिजिटल प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ हर किसी को अपनी बात रखने की आज़ादी तो है, लेकिन उस बात के पीछे सत्यता, प्रामाणिकता या अध्ययन का भारी अभाव है।
अधसूचकों का वर्चस्व: जिस व्यक्ति को धर्म, आध्यात्म और शास्त्रों की रत्ती भर समझ नहीं है, वह भी सोशल मीडिया पर धार्मिक ज्ञानी बनकर उपदेश दे रहा है।
बिन मांगे सलाह: जिसे राजनीति का 'र' भी नहीं पता, वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था व कूटनीति जैसे गंभीर विषयों पर अपने लंबे-चौड़े प्रवचन झाड़ रहा है।
फर्जी विशेषज्ञता: जो लोग न तो पत्रकार हैं, न संत, न वैज्ञानिक, न ज्योतिष, न विषय-विशेषज्ञ और न ही डॉक्टर—वे भी इन तमाम भूमिकाओं का मुखौटा पहनकर सोशल मीडिया पर बैठे हैं और लाखों लोग बिना जांचे-परखे उनकी बातों को 'परम सत्य' मान लेते हैं।
2. 'नजरिया' और 'सत्य' में मूलभूत अंतर
जब हम सोशल मीडिया के किसी 15-सेकंड के वीडियो या किसी व्यक्ति की निजी राय को सच मानने लगते हैं, तो हम यह भूल जाते हैं कि नजरिये से कभी पूरे सच को नहीं जाना जा सकता।
नजरिये की सीमा: हमारा नजरिया हमारे अतीत के अनुभवों, हमारी परवरिश, सोच, पूर्वाग्रहों और हमारी सीमित परिस्थितियों से तय होता है। यह एक छोटी सी खिड़की की तरह है, जिससे पूरा आसमान नहीं देखा जा सकता।
सत्य का स्वरूप: सत्य निरपेक्ष, सर्वव्यापी और अखंड होता है। वह किसी एक व्यक्ति के देखने या न देखने पर निर्भर नहीं करता। सत्य एक विशाल और अनंत आकाश की तरह है, जबकि हमारा 'नजरिया' उस आकाश को देखने वाली एक छोटी सी खिड़की है। जीवन में हम जो कुछ भी देखते, सुनते या महसूस करते हैं, उसे अक्सर 'परम सत्य' मान लेते हैं। लेकिन वास्तव में, वह केवल हमारा एक दृष्टिकोण या नजरिया होता है। किसी एक नजरिये से सच को पूरी तरह जान पाना असंभव है, क्योंकि नजरिया व्यक्ति की मान्यताओं, प्रभाव, अनुभवों और परिस्थितियों की सीमा में बंधा होता है।
3. 'हाथी और छह अंधे व्यक्तियों' की मिसाल
सत्य और नजरिये के इस अंतर को समझने के लिए छह दृष्टिहीन व्यक्तियों और हाथी की प्रसिद्ध पौराणिक कथा सबसे सटीक बैठती है। जब छह दृष्टिहीन व्यक्तियों ने पहली बार हाथी को छुआ, तो सबने अपने-अपने अनुभव के आधार पर राय बनाई।
जिसने कान पकड़ा, उसने कहा—"हाथी सूपा (सूप) जैसा है।"
जिसने पैर छुआ, उसने कहा—"हाथी खंभे जैसा है।"
जिसने पूंछ पकड़ी, उसने कहा—"हाथी तो केवल एक रस्सी है।"
जिसने सुंड पकड़ी, उसने कहा—"हाथी तो केवल एक सर्प है।"
जिसने पीठ पकड़ा, उसने कहा—"हाथी तो पर्वत है।"
जिसने पेट पकड़ा, उसने कहा—हाथी तो एक विशाल दीवार की तरह होता है।
जिसने सुंड पकड़ी, उसने कहा—"हाथी तो केवल एक सर्प है।"
जिसने पीठ पकड़ा, उसने कहा—"हाथी तो पर्वत है।"
जिसने पेट पकड़ा, उसने कहा—हाथी तो एक विशाल दीवार की तरह होता है।
व्यावहारिक रूप से देखें तो वे छहों अपनी-अपनी जगह सही थे, क्योंकि उन्होंने जो महसूस किया, वही कहा। लेकिन क्या उनमें से किसी का भी नजरिया पूरे हाथी का 'सत्य' था? बिल्कुल नहीं! हाथी उन सभी अनुभवों का एक पूरा और बड़ा समुच्चय था। ठीक इसी तरह, सोशल मीडिया पर दिखने वाला हर वीडियो या विचार किसी एक व्यक्ति का सीमित 'नजरिया' हो सकता है, लेकिन पूरे विषय का 'सत्य' नहीं।
4. संख्या 6 और 9 का भ्रम
एक और व्यावहारिक उदाहरण लें—फर्श पर लिखा एक अंक एक तरफ खड़े व्यक्ति को 6 दिखता है, तो ठीक सामने खड़े व्यक्ति को 9। दोनों अपने-अपने नजरिये से शत-प्रतिशत सही हैं, लेकिन मूल सत्य यह है कि वह फर्श पर उकेरी गई एक तटस्थ (neutral) आकृति मात्र है। आज सोशल मीडिया पर भी यही हो रहा है; लोग 6 और 9 के फेर में एक-दूसरे से भिड़ रहे हैं, जबकि असल मुद्दे और सत्य से सब दूर हैं।
5. विवेक और निष्पक्षता की आवश्यकता
सोशल मीडिया केवल 'सूचना' देने का काम करता है, 'ज्ञान' या 'सत्य' देने का नहीं। जब लोग दूसरों की रील, पोस्ट या वीडियो के आधार पर अपनी धारणाएं बनाने लगते हैं, तो वे संकीर्ण सोच और वैचारिक टकराव के जाल में फंस जाते हैं। दुनिया में बढ़ते मतभेद और ऑनलाइन नफरत का मुख्य कारण यही है कि हर कोई अपने 'नजरिये' को ही 'सत्य' मान बैठा है।
सत्य तक पहुँचने के लिए हमें सोशल मीडिया के इस शोर से बाहर निकलकर अपने विवेक, गहराई से अध्ययन और निष्पक्षता का सहारा लेना होगा। जब हम यह स्वीकार करेंगे कि सामने वाले का नजरिया भी सच का एक हिस्सा हो सकता है, तभी हम छद्म विशेषज्ञों के भ्रमजाल से मुक्त होकर वास्तविक सत्य को समझ पाएंगे।
अंत में आज के संदर्भ में:
जब हम यह मान लेते हैं कि "केवल मेरा ही नजरिया सच है", तो वहीं से अहंकार, विवाद और पूर्वाग्रह का जन्म होता है। दुनिया के तमाम वैचारिक मतभेद, युद्ध और पारिवारिक कलह का मूल कारण यही है कि लोग अपने 'नजरिये' को ही 'सत्य' मान बैठने की भूल कर बैठते हैं। दूसरों की रील्स और पोस्ट्स से अपना नजरिया बनाने के बजाय, तथ्यों की जांच करना, मूल किताब को पढ़ना और विवेक का प्रयोग करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है, क्योंकि वर्तमान में सभी राजनीतिक दल जेन जी का नजरिया बदलने में लगे है।

