किताबें देख रहा हूं. कल रात से बार- बार,
रोमा रोलां का नॉवेल ज्यां क्रिस्टोफ याद आ रहा है. जिसे मैंने कहीं खो दिया है. कई बार खोजा अलमारी में नहीं दिख रहा है. (शायद) कोई चुरा गया है. मैं फिर से उसे ढूंढूंगा— अवकाश के दिन सारी किताबें उलट- पलट कर खोजूंगा. शायद, कहीं मिल जाए. सिर्फ कवर देखकर खरीद लाया था. मूल रूप से यह एक मोटा उपन्यास है. शायद कई खंडों में. मेरे पास उसका सार था. तब उतनी समझ नहीं थी कि ये किताब किस बारे में है! अंग्रेज़ी की समझ बढ़ाने के यत्न में पढ़ भी डाली थी. किन्तु उससे तब ज़्यादा आत्मीयता हुई जब उसका रेफरेंस निर्मल जी के निबंधों में आया. पता नहीं वो किताब अब कहां है?
मैंने उसे किसी को दिया नहीं है, न किसी ने चुराया है, कुछ किताबें अनायास ग़ायब हो जाती हैं. शायद घर बदलने में— या शहर बदलने में?
रह- रहकर ज्यां क्रिस्टोफ याद आ रहा है. संगीत और कला से बेइंतहा प्रेम करने वाला. किसी के सामने नहीं झुकने वाला संगीतकार ज्यां क्रिस्टोफ. क्या क्रिस्टोफ बीथोवन था? पढ़ने के बहुत शुरुआती दिनों में पढ़ा था. ठीक से याद नहीं है क्रिस्टोफ के साथ अंत में क्या हुआ? उसकी धुंधली स्मृति साथ है. जिन किताबों को बहुत पहले पढ़ा और जिन्हें पढ़ा जाना है वे हर समय स्मृति में बनी रहती है. वे इस बात को जलाए रखती है कि उन्हें पढ़ा जाना है, उनमें से कुछ याद दिलाती है कि उन्हें अधूरा छोड़ दिया गया है.
ई.एम.फोर्स्टर की A Passage to India भी गुम हो गई. कई साल तक रखी रही. यह भी बहुत पहले खरीदी थी. किंतु इस किताब में देवास में नौकरी करते हुए दिलचस्पी जागी थी. वहां पता चला था कि ई.एम.फोर्स्टर लंबे वक्त तक देवास में रहे. वे वहां मोती महल नाम की इमारत में रहते थे. यह इमारत अब जर्जर हो चुकी है. यहां रहते हुए उन्होंने
हिल ऑफ देवी लिखी थी.
जिन किताबों को अधूरा पढ़कर छोड़ दिया उन्हें पढ़ ली गईं किताबों के पीछे छुपाकर रख देता हूं. ऐसा न करूं तो अधूरी छोड़ दी गईं किताबें घूरती रहती हैं. पूरी पढ़ ली गई किताबें संतुष्ट और सुखी नज़र आती हैं, वे इतनी विनम्र हैं कि दोबारा पढ़े जाने की उम्मीद नहीं करती, पढ़ ली गईं किताबें अपनी गरिमा बनाए रखती हैं.
अधूरी छोड़ दी गई किताबों में सबसे पहला नाम
विक्रम सेठ के नॉवेल An equal music का है. इस किताब को 10 बार से ज़्यादा पढ़ने की कोशिश की, किंतु पचास पन्ने भी नहीं पढ़ पाया. इसे पढ़ने के लिए बहुत यत्न किए. तकरीबन हर रात सिरहाने रखकर प्रतीक्षा करता रहा. वजह थी बेहद ख़राब अनुवाद. थक- हारकर कुछ- कुछ अंतराल में पढ़ता रहा. इसे पढ़ने की गति और अंतराल इतना धीमा कर दिया कि उपन्यास को समग्रता से देख ही नहीं पाया. वेस्टर्न संगीत की जानकारी और म्यूजिक बैंड के आसपास के किरदारों की वजह से मेरी दिलचस्पी थी. संगीत, नायिका के सुनने की क्षमता का धीमे- धीमे कम होना और पुराने प्रेम का लौट के आना. इसका अनुवाद निर्मल जी करते तो यह एक बेहतरीन कृति होती. कुछ मध्य और कुछ अंत के 10-15 सफहें पढ़ लिए. किंतु यह तय नहीं कर पा रहा हूं कि माइकल और यूलिया कहानी से निकलकर कहां गए? आखिर उनके प्रेम का क्या हुआ?
मैं विक्रम सेठ के पास उनकी एक कविता की वजह से गया था. यह कविता अंदर हमेशा बजती रहती है...
All you who sleep tonight, Far from the ones you love, No hands to left or right, And emptiness above – Know that you arent alone. The whole world shares your tears, Some for two nights or one, And some for all their years. इन पंक्तियों की वजह से मुझे विक्रम सेठ पसंद है.
मैंने मांडू नहीं देखा दिलचस्प किताब है. किंतु जगह- जगह से पढ़ा है. सिर्फ वहां जहां- जहां निर्मल जी आते हैं. फिलहाल अधूरी है. जल्द पूरा करूंगा. शायद पता चल सके कि स्वदेश दीपक का क्या हुआ और वे कहां चले गए?
अज्ञेय की शेखर एक जीवनी के दोनों भाग बहुत धीमे हैं. बहुत धैर्य चाहिए. इन्हें पढ़ते हुए पाठक का जीवन धीमा हो जाता है. ठहर जाता है. सुख है कि दोनों को पढ़ पाया, किंतु एक बार फिर से पढ़ा जाना चाहिए. हिंदी साहित्य में बहुत ज़रूरी किताबें हैं अज्ञेय की शेखर एक जीवनी.
इस बीच
अलेक्सांद्र फेदएव, कारेल चापेक और रवीन्द्रनाथ टैगोर की कुछ किताबें बगैर किसी विघ्न के पढ़ डाली हैं. जिन्हें इत्मीनान से पढ़ना चाहता हूं उन किताबों की फेहरिस्त बहुत लंबी है. ये सारी किताबें मायूसी के साथ प्रतीक्षा करती दिखाई देती हैं. किसी हारे हुए प्रेमी की तरह. इस आशंका के साथ कि इन्हें पढ़ने का समय कभी मिलेगा या नहीं. जबकि यह भी जानता हूं कि जो समय है वो यही है.
मैं एक पढ़ी गई किताब की स्मृति को किसी दूसरी नई किताब की अनजान कहानी से रिप्लेस नहीं करना चाहता हूं. मैं कोशिश करता हूं कि पढ़ी गई किताब की स्मृति में लंबे वक्त तक रहा जाए. उसे वक्त दिया जाए कि ख़त्म होने के बाद भी वो भीतर अपनी जगह बना पाए.
हालांकि पहले पढ़ने की क्षमता कुछ ज़्यादा थी, एक साथ चार किताबें पढ़ लेता था. और सभी की स्मृतियां और इंप्रेशन कई महीनों तक रहते थे. भीतर सभी कहानियों के कोने भी अलग-अलग बनने और मिटते रहते थे. अब एक बार में एक ही किताब ठीक है. सबसे ज़्यादा समय तक रहने वाली किताबों में निर्मल जी, काफ्का और कामू की किताबें हैं. निर्मल जी की किताबें तो ख़त्म होने के बाद और ज़्यादा भीतर जगह बनाती हैं. लगता है उनका असल काम तो किताब खत्म होने के बाद शुरू होता है.
मेरी कोशिश है कि पढ़त में कुछ रफ़त आए. किंतु माइंड शिफ्टिंग और मूड स्विंग तेज़ी से बढ़े हैं. अचानक किताब और उनमें छपे हुए शब्दों से मोह भंग हो जाता है. फिर भी पढ़ने और पढ़कर समझने का विवेक कुछ बढ़ा और बचा है, किंतु जिस तेजी से अधीरता बढ़ी है, वो बहुत ख़तरनाक मालूम होती है. इस वक्त की सबसे बड़ी हानि है किताबें नहीं पढ़ी जाना. नहीं पढ़ पाना मेरे लिए सबसे बड़ी क्षति है. शेष सभी नुकसान मुझे स्वीकार है.
किताबें की सूची लंबी है.
बोर्हेस से लेकर तॉल्सटॉय, नीत्शे, दोस्तोएवस्की, कामू, मार्केज, मिलान, प्रेमचंद, काशीनाथ और शम्सुर्रहमान. नाम लेते जाएं. बहुत लंबी फेहरिस्त है, बढ़ती भी जाएगी. समय कम है. सबसे पहले निर्मल जी के सारे रेफरेंस प्राथमिकता में हैं.
इस मानसून में
ज्यां क्रिस्टोफ और सॉल बैलो का सीज द डे सबसे पहले और फिर शेष किताबें इस डर के साथ शुरू करूंगा कि इन्हें पढ़ने से पहले कहीं मैं होर्खे लुई बोर्हेस की तरह अपनी आँखें न गवां दूं! मैं इस भय से कांप उठता हूं और तय करता हूं कि इसके पहले कि मैं बोर्हेस की तरह दृष्टिहीन हो जाऊं, मुझे सारी किताबें पढ़ लेना चाहिए— और एक नई किताब का इंतजार करना चाहिए.