पद्य कथा: छोटे प्राणी बड़े काम के
गई एक दिन चुनमुन चींटी,
नदी किनारे पानी पीने।
फिसला पैर गिरी पानी में,
डर से छूटे उसे पसीने।
नदी किनारे वहीँ पेड़ पर,
एक कबूतर ने जब देखा।
जान बचे चींटी की कैसे?,
एक तोड़कर पत्ता फेका।
चींटी ने जब पत्ता देखा,
उस पर चढ़कर जान बचाई।
पत्ता जब लग गया किनारे,
चींटी ने थी राहत पाई।
आकर मिली कबूतर से वह,
बोली भैया हूं आभारी।
अगर जरूरत पड़ी कभी तो,
कर दूंगी मैं मदद तुम्हारी।
हंसा कबूतर मन ही मन में,
ये नन्हीं क्या मदद करेगी।
जान जरा सी तो है इसकी,
मेरे दुख क्या दूर करेगी।
तभी अचानक एक शिकारी,
ने गुलेल से साध निशाना।
उसी कबूतर के ऊपर ही,
एक बड़ा सा पत्थर ताना।
चींटी ने जब यह देखा तो,
उस व्याध पर गुस्सा फूटा।
काट लिया उसके पैरों पर,
उसका हाय! निशाना चूका।
अब तो हुआ कबूतर भावुक,
बोला तुमने जान बचाई।
तुम हो मेरी प्यारी बहना,
मैं हूं बहना तेरा भाई।
छोटे प्राणी बड़े काम के,
काम बड़े अक्सर कर जाते।
पता नहीं हम बड़े लोग क्यों,
इन छोटों को समझ न पाते।
(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है...)
लेखक के बारे में
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
12, शिवम सुंदरम नगर, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश (Mo.-+919131442512)....
और पढ़ें