पृथ्वी और पर्यावरण पर कविता: काश प्रकृति भी बोल पाती
काश
पेड़ चीख पाते
तो शायद
कुल्हाड़ियों की धार
इतनी निर्दयी न होती
वे कहते
यह धूप केवल तुम्हारी नहीं
हमारी पत्तियों की भी है
यह आकाश
हमारे घोंसलों का भी घर है
और यह धरती
सिर्फ़ मनुष्यों की जागीर नहीं।
काश
नदियां भी चुन पातीं सरकार
तो वे उन हाथों को कभी न चुनतीं
जो उनके जल में
कारखानों का ज़हर घोलते हैं
वे चुनतीं
उन आंखों को
जो उन्हें मां की तरह देखतीं
न कि
नालों की तरह उपयोग करतीं।
काश! गाय कह पाती
कि भूख
धर्म नहीं देखती
और स्नेह
सड़कों पर बेसहारा नहीं छोड़ा जाता
वह पूछती जिसे तुम माता कहते हो
उसी को प्लास्टिक खाते हुए
कैसे देख लेते हो निस्पंद होकर?
काश
बेटियां कह पातीं
कि वे कोई वस्तु नहीं
जिसे परंपराओं के संदूक में रखकर
एक दिन
किसी और घर भेज दिया जाए
वे कहतीं
पिता
मुझे विदा मत करो
मुझे विश्वास दो
कि यह घर
मेरे सपनों का भी उतना ही है।
काश
जंगल भी वोट डाल सकते
तो वे
अपने विनाश पर हस्ताक्षर करने वालों को
कभी सत्ता तक न पहुंचने देते
वे चुनते
उन हाथों को
जो वृक्षों को
लकड़ी नहीं
जीवन मानते।
काश
पंछी भी कह पाते
कुछ शाखाएं
हमारे लिए भी छोड़ दो
तुम्हारे महलों की ऊंचाई से अधिक
महत्वपूर्ण हैं
हमारे छोटे छोटे घोंसले।
पर मनुष्य
अपनी प्रगति के शोर में
इतना बहरा हो चुका है
कि उसे
अब चिड़ियों की चहचहाहट भी
संगीत नहीं
व्यवधान लगती है।
काश
पर्वत भी चुनाव में खड़े होते
तो वे बताते
कि स्थिर रहना क्या होता है
कैसे सहना पड़ता है
बारूद का अपमान
खनन की यातना
और विकास के नाम पर
अपनी छाती का चीरना।
वे कहते
ऊंचा होना
अहंकार नहीं होता
सहनशीलता होता है।
यह पृथ्वी
अब भी
मनुष्यों से कम घायल नहीं
बस उसका मौन
हमारी संवेदनहीनता से बड़ा है।
हमने
हर उस चीज को
मताधिकार से वंचित रखा
जिससे हमारा जीवन बचा है।
पेड़
नदियां
पर्वत
जंगल
पशु
पक्षी
और बेटियां
सभी
हमारे निर्णयों का भार ढोते हैं
पर निर्णय लेने का अधिकार
सिर्फ़ मनुष्य के पास है।
और शायद
यही पृथ्वी का सबसे बड़ा अन्याय है।
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