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केरल में आरएसएस अब तक बीजेपी को चुनावी फ़ायदा क्यों नहीं पहुंचा पाई?
ज़ुबैर अहमद, बीबीसी संवाददाता, कोच्चि से लौटकर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केरल में रोज़ 4,500 शाखाएं लगाती है जो भारत के किसी राज्य में इस संस्था की लगने वाली शाखाओं में सबसे ज़्यादा है। साढ़े तीन करोड़ आबादी वाले इस राज्य में आरएसएस 80 साल से सक्रिय है। इसका वजूद लगभग हर मोहल्ले, गाँव और तालुक़ा में है और इसकी सदस्यता लगातार बढ़ती रही है।
इसके बावजूद इससे जुड़ी भारतीय जनता पार्टी को इसका कोई ख़ास चुनावी लाभ अब तक क्यों नहीं मिल सका है? ये सवाल मैंने बीजेपी, आरएसएस, निष्पक्ष बुद्धिजीवियों और संस्था की विचारधारा के विरोधियों से पूछा।
मैं इसका जवाब खोजने के लिए कोच्चिन में संघ के राज्य मुख्यालय भी गया। आप ये पूछ सकते हैं कि बीजेपी की हार-जीत में आरएसएस की भूमिका को क्यों तलाश करें?
दरअसल, परम्परागत रूप से किसी भी चुनाव से पहले आरएसएस के कार्यकर्ता बीजेपी के पक्ष में अनुकूल माहौल तैयार करने हफ़्तों पहले आम वोटरों से जुड़ने मोहल्लों, गाँवों और क़स्बों में फैल जाते हैं और चुनाव प्रचार के दौरान संस्था के ख़ास पदाधिकारियों को बीजेपी के उम्मीदवारों की मदद के लिए साथ लगा दिया जाता है।
आरएसएस की भूमिका
जैसे कि पालक्काड विधानसभा सीट से बीजेपी के उम्मीदवार डॉक्टर ई श्रीधरन के साथ साये की तरह घूमने वाले एडवोकेट पप्पन आरएसएस से भेजे गए हैं।
वे कहते हैं, "मैं बीजेपी का सदस्य नहीं हूँ। मैं फुल टाइम आरएसएस का कार्यकर्ता हूँ और पेशे से वकील हूँ। मुझे चुनाव तक श्रीधरन के साथ ड्यूटी पर लगाया गया है।"
मैंने देखा उनका काम मीडिया से निपटने के अलावा हाउसिंग सोसाइटी के कर्ताधर्ता, संस्थाओं के प्रतिनिधियों और अलग-अलग लोगों को श्रीधरन से मिलवाना भी था।
साथ ही ऊंचे क़द के और अच्छी सेहत के मालिक पप्पन अपने 88 वर्षीय बॉस को सीढ़ियों से उतरने और स्टेज पर चढ़ने-उतरने में उनकी मदद भी करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले छह सालों में बिहार, हरियाणा, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अगर बीजेपी की भारी जीत हुई है तो इसका कुछ हद तक श्रेय आरएसएस को भी जाता है।
आरएसएस के कार्यकर्ता
संघ के स्वयंसेवक ज़मीन पर पार्टी के लिए पूरे कमिटमेंट के साथ काम करते हैं और चुनाव के नतीजे आने तक वापस नहीं लौटते। लेकिन स्वयं आरएसएस के कुछ कार्यकर्ताओं में आम धारणा ये है कि केरल में संघ बीजेपी को चुनावी लाभ पहुँचाने में अब तक काफ़ी हद तक नाकाम रहा है।
केरल विधानसभा के इतिहास में अब तक बीजेपी को एक सीट हासिल हुई है जो 2016 के चुनाव में नेमम चुनावी क्षेत्र से जीत के रूप में मिली थी। राज्य में 140 सीटों वाली विधानसभा के लिए छग अप्रैल को चुनाव हैं। क्या इस बार आरएसएस की मेहनत बीजेपी के लिए रंग लाएगी?
नेमम से बीजेपी के अब तक के अकेले कामयाब विधायक ओ राजगोपाल से मैंने पूछा कि आख़िर आरएसएस अब तक बीजेपी को एक से अधिक सीट पर जीत दिलाने में नाकाम क्यों रही है, तो उनका जवाब ईमानदारी वाला, लेकिन थोड़ा चौंका देने वाला भी था।
ज़मीनी हक़ीक़त
ओ राजगोपाल कहते हैं, "ऐतिहासिक कारणों से (हम कामयाब नहीं हो सके हैं) यहाँ लंबे समय से कम्युनिस्ट वर्चस्व रहा है। यहाँ के लोग उच्च शिक्षित हैं, न कि ऐसे लोगों की तरह जो अशिक्षित क्षेत्रों में हमारे लिए आंख बंद करके मतदान करते हैं। यहाँ के लोग रोज़ाना चार या पाँच अख़बार पढ़ते हैं। उन्हें पता है कि हर जगह क्या हो रहा है। इसलिए, वे अधिक भेदभावपूर्ण हैं।"
ये बीजेपी के नेताओं को पसंद न आने वाला बयान है लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त ये है कि चुनावी कामयाबी नहीं मिलने के बावजूद आरएसएस राज्य में असर रखती है और इसकी हिंदुत्व विचारधारा फैल रही है।
बीजेपी और आरएसएस के स्थानीय पदाधिकारी कम से कम इस बात से संतुष्ट नज़र आते हैं कि पिछले 10-12 सालों से राज्य में बीजेपी का वोट शेयर लगातार बढ़ता ही जा रहा है।
यह विडंबना है कि हिंदुत्व दक्षिणपंथी विचारधारा एक ऐसे राज्य में समृद्ध हो रही है जहाँ वामपंथी विचारधारा बहुत पुरानी और मज़बूत है और इसका क़ब्ज़ा सत्ता पर भी है।
लेकिन बीजेपी चाहती है कि इस बार के चुनाव में पार्टी को इतनी सीटें हासिल हों कि वो किंग मेकर की स्थिति में हो ताकि सरकार के बनाए जाने में इसकी एक अहम भूमिका हो।
आरएसएस एक सामाजिक संस्था
लेकिन एशिया न्यूज़ नेटवर्क के संपादक एमजी राधाकृष्णन के विचार में बीजेपी को आरएसएस की कोशिशों के बावजूद इस बार भी कुछ ख़ास चुनावी लाभ नहीं मिलेगा।
वे कहते हैं कि आरएसएस की चुनावी असफलता को समझने के लिए केरल की आबादी को ध्यान में रखना है। राज्य की 45 प्रतिशत आबादी मुसलमानों और ईसाइयों की है। हिन्दू 55 प्रतिशत हैं और वो कई विचारधाराओं में बंटे हुए हैं। बहुमत उनका है जो लेफ़्ट पार्टियों का समर्थन करते आए हैं।
राधाकृष्णन कहते हैं, "जब तक वो आबादी के इस सामाजिक-राजनीतिक समीकरण को तोड़ने में कामयाब नहीं होते, उन्हें चुनावी लाभ नहीं मिलेगा। हाँ, इसमें इन्हें थोड़ी कामयाबी ज़रूर मिली है। वो हाल के वर्षों में राज्य के कुछ इलाक़ों में कांग्रेस और वाम मोर्चे के वोटरों को कामयाबी से लुभाने में सफल हुए हैं। लेकिन इनकी संख्या काफ़ी कम है। तो हम कह सकते हैं कि अब तक आरएसएस की बड़ी उपस्थिति ने बीजेपी को केरल में चुनावी फ़ायदा नहीं दिया है।"
राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर जे. प्रभाष का तर्क ये है कि आरएसएस को एक सियासी ताक़त के रूप में देखना सही नहीं होगा। वे कहते हैं, "केरल में आरएसएस एक सामाजिक ताक़त है, सियासी नहीं। केरल में भारत में सब से अधिक रोज़ाना शाखाएं लगने के बावजूद आरएसएस सीधे तौर पर यहाँ की राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करती है। केरल की जनता भी इसे केवल एक सामाजिक संस्था के रूप में देखती है।"
ये सही है कि आरएसएस से जुडी शैक्षिक संस्था अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान, विद्या भारती राज्य में कई स्कूल चलाती है, पिछड़ी जातियों और आदिवासियों के समाज में इसके कई स्कूल हैं। कोच्चिन में इसके मुख्यालय की सीमा के अंदर विद्या भारतीय स्कूल की एक विशाल इमारत है, जो किसी भी आधुनिक संस्था से कम नहीं।
मुख्य कार्यालय में मौजूद संस्था के एक अधिकारी ने मुझे बताया कि स्कूल में आधुनिक शिक्षा के अलावा चरित्र निर्माण पर भी ज़ोर दिया जाता है और एक आदर्श नागरिक बनने पर भी। मैं जब दफ़्तर पहुँचा तो ये लगभग ख़ाली था। इस पदाधिकारी ने मुझे इसका कारण ये बताया कि कई पदाधिकारी ज़िलों और विधानसभा क्षेत्रों में फैल गए हैं और चुनावी प्रचार में बीजेपी के उम्मीदवारों की मदद कर रहे हैं।
ई. श्रीधरन से जुड़े आरएसएस के पदाधिकारी एडवोकेट पप्पन के मुताबिक़ उनकी संस्था की सफलता या विफलता को सीटों के जीतने के दृष्टिकोण से देखना सही नहीं होगा। पप्पन कहते हैं, "हमारा असर बढ़ रहा है। हमारी विचारधारा बढ़ रही है। शिक्षा के क्षेत्र में बहुत काम हो रहा है। मैं भी आरएसएस के एक स्कूल से पढ़ कर निकला हूँ।"
क्या है ख़ास रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषक जी. प्रमोद कुमार कहते हैं कि बीजेपी केरल में उस समय सफल होगी जब इसे हिन्दू समुदाय का बहुमत वोट दे, जो हिन्दू वोट का ध्रुवीकरण करने से ही संभव है।
वे कहते हैं, "पार्टी केरल में ये करने में नाकाम रही है। अब इसके पास एक ही विकल्प है और वो है अल्पसंख्यक मुस्लिम और ईसाई समुदाय के वोटों को हासिल करने की कोशिश। मुस्लिम वोट उन्हें मिलने से रहा, इक्का-दुक्का वोटों को छोड़ कर। कुछ मुसलमान पार्टी में शामिल भी हुए हैं। ईसाई समुदाय में यहाँ (केरल में) बहुमत सीरियन क्रिश्चियन की है जो ऊंची जाति के हैं। इस समाज में हाल में थोड़ा ध्रुवीकरण हुआ हैं। इस ध्रुवीकरण का मुख्य कारण इस समुदाय में आपसी मतभेद है। ये समुदाय कई सम्प्रदायों में बंटा हुआ है। हर संप्रदाय उसी पार्टी को वोट देना चाहता जो उनके हित की रक्षा करने का वादा करे। जैकोबाइट (जैकबवादी) संप्रदाय बीजेपी के क़रीब ज़रूर गया था लेकिन बात बनी नहीं।"
परम्परागत रूप से केरल में मुस्लिम और ईसाई समुदायों ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ़ को हमेशा वोट दिया है। लेकिन ईसाई समुदाय की शिकायत ये रही है कि यूडीएफ़ में मुस्लिम लीग हावी रही है जिसके कारण भी उनका हाल में झुकाव बीजेपी की तरफ़ हुआ है। इसके अलावा आरएसएस के ऊंचे पदाधिकारी हाल में चर्च के लीडरों से मिले हैं और बीजेपी को जिताने की अपील की है।
जी. प्रमोद कुमार कहते हैं कि ये संभव है, इस बार कुछ ईसाई वोट बीजेपी को जाए। लेकिन आरएसएस के एक कार्यकर्ता केतन मेनन कहते हैं कि उनकी संस्था का विश्वास ये है कि काम हिन्दू समाज के बीच ही करना है। वे कहते हैं, "केरल का हिन्दू एलडीएफ़ को वोट देता है। एक दिन आएगा ये समुदाय बीजेपी को वोट देगा।"
केरल के अधिकतर हिन्दू लेफ़्ट फ्रंट को ही क्यों चुनते हैं?
जे. प्रभाष इसका जवाब यूँ देते हैं, "केरल के इतिहास में परंपरागत रूप से समाज सुधार आंदोलन लेफ़्ट फ्रंट ने चलाया है। केरल के हिन्दू इसी आंदोलन से निकल कर आए हैं। इसलिए वो परम्परागत रूप से लेफ़्ट फ्रंट को वोट देते आये हैं।"
राधाकृष्णन ये स्वीकार करते हैं कि राज्य में आरएसएस का ज़ोर बढ़ा है। वे कहते हैं, "इनकी अहमियत बढ़ी है। 15 साल पहले की तुलना में बीजेपी एक तीसरा मोर्चा बन कर ज़रूर उभरा है।"
आरएसएस वालों का कहना है कि 1980 के शुरुआती सालों में बीजेपी में केवल दो सांसद थे लेकिन आज इसके सांसद सबसे अधिक हैं और ये सबसे बड़ी पार्टी। इन्हें उम्मीद है कि उनकी मेहनत बीजेपी के लिए रंग लाएगी।
