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जैसे ओस से भीगी भोर में चुपके से किसी ने हाथ पर हरसिंगार रख दिया हो
स्मृति आदित्य, मीडिया जगत का सुपरिचित और प्रतिष्ठित नाम। शानदार फीचर्स के लिए तीन बार लाड़ली मीडिया अवार्ड विजेता स्मृति ... -
मित्रता दिवस पर कविता: सहेलियां जब मिलती हैं...
सहेलियां जब मिलती हैं...हंसी तितलियों-सी उड़ती है, बातें झरने-सी झरती है, आंखें अनकहे राज़ सुनाती है, ...सहेलियां जब ... -
ललित निबंध : स्मृति, तुम्हारा स्मरण रहे..!
हम स्वयं नहीं जानते कि कब कौन-सी बात स्मृति-पटल पर अंकित हो जाती है और जाने किस मोड़ पर ये बावरी दबे पांव हमारी पथ-सखी ... -
शब्द! तुम जी उठो फिर से...!
हे शब्द-शक्ति! मेरे आराध्य.... सुनो! एक अकिंचन भक्त की आर्त पुकार है.... जागृत हो! कहां हो तुम? अपनी शक्ति किसी सीपी ... -
मैं और मेरी मां : मां मेरे हिस्से बहुत कम आती है
मां मेरे हिस्से बहुत कम आती है..! शिकायत नहीं, बस एक हकीकत है. मां हूं, पर मां की मुझे भी ज़रूरत है. देहरी लांघने से ... -
हैप्पी फादर्स डे : क्योंकि पिता कभी बूढ़े नहीं होते...
स्त्री मां होती है पर पुरुष पिता बनते हैं, बहुत धीमे, गढ़े जाते हैं, समय की आंच पर| कांपते सख्त हाथों में नन्हें जीव ... -
आयशा : आत्महत्या या प्रेम का कपट-वध?
8 मार्च, महिला दिवस... हर साल की तरह पत्र-पत्रिकाएं अपने विशेषांकों की तैयारी में जुटी थीं, चैनल्स में उस दिन की विशेष ... -
mothers day poem : जो मां का आंचल मुट्ठी में भर गहरी नींद में सोया हो
सबसे खूबसूरत है वह जिसके माथे और हथेलियों पर मां ने काला दीठौना लगाया हो। सबसे तृप्त है वह जिसे मीठी झिड़की के ... -
mothers day poem : तुम सर्वस्व हो, सृष्टि हो मेरी
माँ, तुम्हारी स्मृति, प्रसंगवश नहीं अस्तित्व है मेरा। धरा से आकाश तक शून्य से विस्तार तक। कर्मठता का अक्षय ... -
lockdown poem : संभाल कर रखिए जनाब ये फ़ुरसत के लम्हें
संभाल कर रखिए जनाब ये फ़ुरसत के लम्हें बड़ी क़ीमत अदा कर ये दौर ए सुकूं पाया है अपने हाथों से दे रहे थे ज़ख्म ... -
वेलेंटाइन डे : हमारा प्रेम ढूंढेंगे फिर किसी दिन फुरसत में......
सुनो..मैंने कहीं पढ़ा था, बहुत पास की चीज वातावरण का अंग बन जाती है, इतनी घुल-मिल जाती है कि नजर नहीं आती.... हमारा ... -
वेलेंटाइन डे : चलो, खोज लाएं प्रेम को....
बहुत पास की चीज वातावरण का अंग बन जाती है, इतनी घुल-मिल जाती है कि नजर नहीं आती.... हमारा प्रेम भी ऐसा ही है ... -
एक प्रार्थना, कुछ सवाल.....
सारा इंदौर स्तब्ध है. इंदौर ही क्यों, जहां-जहां इस दर्दनाक हादसे की आंच पहुंची, हर संवेदनशील मन स्तब्ध है.... शब्द पिघल ... -
मां मेरे हिस्से बहुत कम आती है..!
मेहमान चिरैया-सी दो दिन मां के आंगन में फुदकती हूं। हर पल मां के आस-पास मंडराती रहती हूं। मां गुझिया-मठरी तलती है, ... -
महिला दिवस विशेष : मैं, तुम और 8 मार्च.....!
सुनो, कल डिनर बाहर करेंगे। तुम्हारा महिला दिवस है। क्यों, ठीक है न?” “नहीं, ठीक नहीं है।” “अच्छा! जाने का मन नहीं है, ... -
महिला दिवस : उजली सुबह की धूप स्त्री
स्त्री जाग गई है, स्त्री, बुहार रही हैं आंगन, फेंक देगी आज बीती रात की चुभती किरचें -
मनु कथा अनंता.......!
फिर भी यह बात तो है कि मनु घर में बेझिझक सब कुछ कह लेता है। मन में कैसी भी उथल-पुथल हो, सवाल हो या उसे किसी भी बात से ... -
मनु की मम्मा का इंदौर....
इस शहर की मिट्टी में वह सौंधापन है, हवा में पुरसुकून अहसास है, पानी मिठास है कि यहां का बाशिंदा दुनिया के किसी कोने में ... -
मैं, तुम और प्रेम.....
सुनो..मैंने कहीं पढ़ा था, बहुत पास की चीज वातावरण का अंग बन जाती है, इतनी घुल-मिल जाती है कि नजर नहीं आती.... हमारा ... -
बड़ों के साथ, मनु की बात....
मनु सिर्फ अपनी ही नहीं कहता, बुजुर्गों की सुनता भी है। उनके बीच एक भावनात्मक संवाद सेतू है। शायद मम्मा की दृष्टि ही गलत ...
