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मां के लिए कविता : जब वो आंचल में छुपाती है...
हर दर्द की दवा होती है जब कोई नहीं होता तब हमदर्द होती है। मेरी नींदों में स्वप्न की तरह। मेरी खुशियों में दुआओं की तरह -
मातृ दिवस कविता : उसका ही अंश हूं मैं
उसकी ही पहचान हूं वो जिसने मुझे नकारा नहीं वो जिसने मुझे अपनाया है वो औरत है एक मां मेरी मां! -
मदर्स डे पर कविता : वह एक मां है...
उलझे हुए से फिरते हैं नादिम सा एहसास लिए दस्तबस्ता शहर में वो नूर है अंधेरे गुलिस्तां में। -
कविता : पेड़ एक मंदिर
हर पेड़ एक मंदिर है, कोई नया, कोई पुराना। कोई पतझड़ में बिखरा, कोई बसंत में खिलता। -
कविता : दे कोई दुहाई
नयनों की पुकार है, उस आंख वाले को, जो नासमझ बना है, जो नि:शब्द आगे बढ़ा है। -
कविता : जीवन सत्य कहां?
झूठे मंदिर, झूठे मस्जिद, झूठे चर्च यहां। कोई ना समझे, कोई ना जाने -
हिन्दी कविता : नि:स्वार्थ भाव
हर पेड़ एक मंदिर है, कोई नया, कोई पुराना। कोई पतझड़ में बिखरा, कोई बसंत में खिलता। -
कविता : शील बचाने उठ अब नारी
चल उठ स्त्री बांध कफन अब, कोई रक्षक नहीं आएगा, हत्या-शोषण-बलात्कार से अब, कोई तुझे नहीं बचाएगा। -
कविता : नंगी जिंदा लाशें
था भूख का शिकार वो, कुपोषण का शिकार बता रहे थे। आते-जाते सभी उसकी, हालत पर शोक जता रहे थे।
