-
राजनीतिक होली
हर साल की तरह इस बार भी माघ के बाद फाल्गुन लग चुका था। मौसम का मिज़ाज क्या बदला, राजनीतिक मिजाज भी बदल गया पर अपना मिज़ाज ... -
होली के ठहाके और व्यंग्य : बुरा न मानो होली है
राजनीतिक होली में लफंगी रंग, हुड़दंगी रंग, चेला-चपाटी रंग, जुमलेबाजी रंग, घोटालेबाजी रंग, देशभक्ति रंग, मन की बात का ... -
हिन्दी दिवस पर व्यंग्य : हिंदी हैं हम वतन हैं
हिन्दी दिवस हो और स्कूल कालेज इसका जश्न ना मनाएं, ऐसा कैसे हो सकता है? जश्न का मजा भी वही ले सकता है जिसके पास उसका ... -
अगर आज मैं चुप रही, तो कल मेरे लिए कोई नहीं बोलेगा
बेंगलुरु की पचपन वर्षीय पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता गौरी लंकेश की उनके घर पर गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनकी एक पहचान ... -
कब्र का अजाब
नहीं, मदरसे में रूही नहीं जाएगी। 'पर क्यों अम्मी?' 'कहा ना अब वो नहीं जाएगी मदरसे में बस...।' 'तो क्या रूही आपा ... -
व्यंग्य : सेल्फी, सेल्फी और सेल्फी...
एक महाशय सुबह से इसी बात पर नाराज थे कि जिसे देखो, सेल्फी खींचकर डालने पर अड़ा है, पड़ा है, सड़ा है। सेल्फी देख-देखकर ... -
बेवकूफी का तमाशा
अप्रैल आने वाला था। बेवकूफ बनाने वाले, लोगों को बेवकूफ बनाने की फिराक में थे। वैसे अब कोई महीना निश्चित नहीं है, ... -
ईमानदारी का पर्व और वो...
एक रात जब देश सोने की तैयारी कर रहा था, उस वक्त देश के आला अधिकारी ने बड़े नोटों को बंद करने का ऐलान कर दिया, जिसे ... -
ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर
देश की आजादी के इतने दिनों बाद भी जल, जंगल, जमीन के लिए समझौता वार्ता, शांति वार्ता, सीबीआई जांच, लाखों लोगों का पलायन, ... -
बहिष्कारी तिरस्कारी व्यापारी
एक जमाना था, जब गांधी जी ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और भारत की जनता गांधी जी साथ खड़ी थी। भारत के कुछ लोगों को ... -
गोद में गांव, शहर बने स्मार्ट
भारत सरकार ने स्मार्ट सिटी के बहाने देश को स्मार्ट बनाने का बीड़ा उठाया है। यह उसकी महत्त्वाकांक्षा वाली परियोजना है। ... -
योग के बहाने...
गुप्ता साहब ने यूं तो कभी योगा किया नहीं, पर भला आज कैसे न करते ! हम तो कहते हैं ऐसे योग रोज हों, जिसमें रोजाना कुछ न ... -
व्यंग्य आलेख : घोड़ा की टांग पे, जो मारा हथौड़ा
बचपन में गाय पर निबंध लिखा था। दो बिल्ली के झगड़े में बंदर का न्याय देखा था। गुलजार का लिखा गीत ‘काठी का घोड़ा, घोड़े की ... -
हरेक बात पर कहते हो, घर छोड़ो
घर के मुखिया ने कहा यह वक्त छोटी-छोटी बातों को दिमाग से सोचने का नहीं है। यह वक्त दिल से सोचने का समय है, क्योंकि ... -
व्यंग्य रचना : शिकार करने का जन्मसिद्ध अधिकार
एक बार जंगल राज्य में राजा का चुनाव होना था। अजी चुनाव क्या... बस खाना-पूर्ति तो करनी थी, ताकि जंगल लोकतंत्र का भी ... -
व्यंग्य : बोलो अच्छे दिन आ गए
देश के उन लोगों को शर्म आनी चाहिए जो सरकार की आलोचना करते हैं और कहते हैं कि अच्छे दिन नहीं आए हैं। उनकी समझ को दाद तो ... -
व्यंग्य रचना : भारत माता की जय
जब सवाल देशभक्ति का हो तो कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। हम जिस देश में रहें, उसके प्राचीन सामंती विचारों की कोई कदर न करें ... -
व्यंग्य : पुरस्कार का मापदंड
पुरस्कार किसी भी श्रेष्ठ व्यक्ति के कर्मों का फल है। बिना पुरस्कार के किसी भी व्यक्ति को श्रेष्ठ नहीं माना जाना चाहिए। ... -
व्यंग्य रचना : पुल गिरा है कोई पहाड़ नहीं...
पुल गिरा है कोई पहाड़ नहीं गिरा, जो इतनी आफत कर रखी है। रोज ही तो दुर्घटनाएं होती हैं, अब सबका रोना रोने लगे तो हो गया ... -
व्यंग्य रचना : पानी नहीं है तो क्या, कोका-कोला पियो
देखो भाई बात एकदम साफ है, क्रिकेट ज्यादा जरूरी है या खेती-किसानी? जाहिर है क्रिकेट ही ज्यादा जरूरी है क्योंकि यह तो ...
