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Shri Krishna 11 Oct Episode 162 : जब पहले दिन का युद्ध हार जाते हैं पांडव
निर्माता और निर्देशक रामानंद सागर के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 11 अक्टूबर के 162वें एपिसोड ( Shree Krishna Episode 162 ) में भीष्म पितामह शिखंडी से युद्ध करने से इंनकार कर देते हैं और कहते हैं- जाओ बेटी जाओ, पहले अपना रथ ठीक कराओ और उसके बाद युद्ध करने की सोचना, चलो सारथी आगे।
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फिर महाराज शल्य ने पांडव सेना की ओर से लड़ रहे विराट नरेश के पुत्र उत्तर और श्वेत का वध कर दिया। पहले दिन के युद्ध में पांडवों को भारी क्षति का सामना करना पड़ा। विराट नरेश अपने पुत्रों का शोक मनाते हैं और वहीं पर धृष्टदुम्न सहित पांचों पांडव खड़े रहते हैं। युधिष्ठिर विराट नरेश को शांत्वना देते हैं और कहते हैं कि हमें ऐसे योद्धाओं का खो देने का खेद है। विराट नरेश कहते हैं कि मुझे गर्व है कि मेरे पुत्रों को वीरगती प्राप्त हुई है। हमारा उद्देश्य केवल वीरगति प्राप्त करना नहीं है। आज शत्रु सेना ने हमारे जितने योद्धाओं का वध किया है कल हमें इससे अधिक उनके योद्धाओं का वध करना होगा। इसलिए कल की रणनीति हमें आज ही तय कर लेनी चाहिए।
उधर, कौरवों के शिविर में शकुनि, दुर्योधन, कर्ण आदि पहले दिन के युद्ध में अपनी विजय का जश्न मनाते हैं। शकुनि कहता है कि भांजे हमने तो पहले ही दिन युद्ध में पांडवों को मजा चखा दिया। यह सुनकर कर्ण कहता है कि शत्रु को कायर समझना और फिर पहले दिन के युद्ध पर इतना खुश होना उचित नहीं है। यदि आज मैं युद्ध में भाग लेता तो मैं यह जानने का प्रयास करता कि पांडवों की आज के युद्ध में सहज हार का कारण क्या है।... इस पर दुर्योधन कहता है कि आज की हार का मुख्य कारण हम कौरव ही हैं। यह सुनकर सभी हंसने लगते हैं। फिर शकुनि कहता है कि भांजे पांडवों की हार का असल कारण है पितामह। यह सुनकर दुर्योधन कहता है मामाश्री यह तो हम भी जानते हैं।
उधर, श्रीकृष्ण पांडवों सहित पहले दिन की हार पर चर्चा करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि हम अपनी भूल को संजोग कहकर शत्रु की युद्ध कुशलता पर पर्दा नहीं डाल सकते। ये तो आप सभी जानते हैं कि आज के युद्ध में भीष्म पितामह ने बढ़-बढ़ कर आक्रमण किया था। उन्होंने प्रतिदिन हमारे 10 हजार सैनिकों की हत्या करने का जो प्रण लिया था उससे कहीं अधिक सैनिकों कही हत्या की है।...फिर सेनापति इस हार की जिम्मेदारी जब अपने उपर लेते हैं तो युधिष्ठिर कहते हैं कि नहीं आप इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। यह सुनकर भीम कहता है कि मैंने तो अपनी गदा से कौरवों को छठी का दूध याद दिया दिया था।
तब युधिष्ठिर कहते हैं कि प्रिय भीम! एक तुम्हीं तो हो जिसने आज के युद्ध को युद्ध समझकर लड़ा है। परंतु महाभारत के इस महाभयंकर युद्ध का परिणाम दोनों पक्ष के केवल दो योद्धाओं पर निर्भर है और वह है कौरव पक्ष से पितामह भीष्म और पांडव पक्ष से अर्जुन। पितामह को तो अपना कर्तव्य भलिभांति याद है जिसका प्रदर्शन उन्होंने आज के युद्ध में किया भी परंतु हमारे पक्ष का योद्धा अपना कर्तव्य भूल गया। यह सुनकर अर्जुन अपनी गर्दन नीचे झुका लेता है।
तब युधिष्ठिर कहते हैं कि उसे तो ये भी याद नहीं रहा कि वह संपूर्ण जगत का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है। जिसके गांडिव से निकले बाण की गति से वायु भी स्पर्धा नहीं कर सकती। हमारी सेना पितामह के बाणों की वर्षा से कीड़े-मकौड़ों की तरह मारी जा रही थी। परंतु अर्जुन ये जानते हुए भी कि पितामह के बाणों की बाड़ को बांध बनकर वही रोक सकता है फिर भी उसके हाथ पितामह के आगे उसका गांडिव उठाते हुए कांप रहे थे। जिस राजा की सेना में ऐसा हथबल योद्धा हो वह राजा युद्ध कैसे कर सकता है?
यह सुनकर अर्जुन कहता कि भ्राताश्री मेरे प्रति आपका ये क्रोध उचित है सचमुच मैंने भूल की है। कौरवों के विरुद्ध में जी-जान से युद्ध नहीं कर सका परंतु मेरा विश्वास कीजिये ये भूल मैंने जानबूझकर नहीं की। पितामह के आदर के कारण मैं संकोच करता रहा। फिर श्रीकृष्ण कहते हैं कि बड़े भैया आज युद्ध में अर्जुन या अन्य योद्धाओं की भुजाओं ने अपने ज्येष्ठों के आदर में उनके विरुद्ध उठना स्वीकार नहीं किया परंतु कल जब युद्ध भूमि में जब दोनों सेनाएं आमने-सामने होंगी तब अवश्य अर्जुन अपना गांडिव उठाएगा। तब अवश्य अर्जुन पितामह के सामने लोहे की दीवार बनकर खड़ा होगा।... फिर सभी आज के युद्ध का प्रतिकार करने की शपथ लेते हैं।
फिर प्रात: काल पुन: युद्ध का आरंभ होता है। धृतराष्ट्र संजय से कहता है कि कल तो पितामह ने पांडवों के छक्के छुड़ा दिए थे और कौरवों ने अपनी पहली विजय पताका लहराई थी। यह सुनकर संजय कहता है कि एक ही दिन के युद्ध से यह अनुमान लगाना उचित नहीं है जैसे जुएं में एक ही पास बाजी पलट देता है वैसे ही युद्ध का पासा भी किसी भी क्षण पलट सकता है महाराज। यह सुनकर धृतराष्ट्र हंसते हुए कहते हैं कि जब तक भीष्म पितामह कौरवों की अगवानी कर रहे हैं तब तक पांडव लाख सिर मारे कुछ नहीं कर सकते हैं। संजय कहता है- परंतु आज पांडव अपनी जान लड़ा देंगे, भीषण युद्ध होगा आज।
फिर अर्जुन युद्ध में हाहारकर मचा देता है। यह देखकर दुर्योधन चिंतित होकर अर्जुन से युद्ध करने लगता है परंतु युद्ध में अर्जुन से हारता देखकर वह वहां से भाग जाता है। अर्जुन पुन: सेना का संहार करने लगता है। जय श्रीकृष्णा।
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