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लोक के बिना संस्कृति खड़ी ही नहीं हो सकती, 'नर्मदा साहित्य मंथन' में वक्ताओं ने रखे विचार

Narmada Sahitya Manthan
दिनांक 6 मार्च 2022 को मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल एवं विश्व संवाद केंद्र इंदौर के तत्वावधान में महेश्वर में आयोजित 'नर्मदा साहित्य मंथन' कार्यक्रम के तृतीय एवं अंतिम दिवस अनेक राष्ट्रीय विमर्शों को साहित्यिक परिप्रेक्ष में चिंतन के रूप में संपन्न किया गया।

प्रथम सत्र में वक्ता विनय कुमार सिंह ने 'आंतरिक सुरक्षा-चुनौतियां एवं समाधान' के अंतर्गत भारत में विभिन्न प्रकारों से चल रहे षड्यंत्रों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आंतरिक सुरक्षा को माइक्रो स्तर पर कार्य किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

द्वितीय सत्र में संस्कृत के महान विद्वान मिथिला प्रसाद त्रिपाठी ने ‘लोक साहित्य का साहित्यिक अवदान’ विषय पर कहा कि भारतीय संस्कृति ‘लोक’ पर आधारित है। लोक के बिना संस्कृति खड़ी ही नहीं हो सकती। उन्होंने साहित्य के दायित्वों को भी इंगित किया।

तृतीय सत्र में ‘जैन, बौद्ध एवं सिख दर्शन में सनातन परंपरा’ पर ख्यात विदुषी सुश्री डॉ. नीरजा गुप्ता ने अनुभवों पर आधारित उद्धरणों के माध्यम से सनातन धर्म से तात्विक एकात्मकता सिद्ध की। उन्होंने कहा कि भले ही ऊपरी तौर पर यह दर्शन भिन्न दिखते हों, मगर मूल रूप से वे सनातनी परंपरा के वाहक ही हैं।

चतुर्थ सत्र में विद्वान श्रीधर जी पराड़कर ने ‘साहित्य के प्रयोजन एवं सामाजिक अवदान’ को रेखांकित किया एवं समाज में साहित्य की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साहित्य का प्रदेय मनुष्य को मनुष्य (नर से नारायण) बनाना है।

सत्र के अंत में हिंदी साहित्य अकादमी भोपाल के विकास दवे ने तीन दिवसीय कार्यक्रम का सत्व प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी कहा कि यह कार्यक्रम का अंत नहीं, बल्कि प्रारंभ है और ‘नर्मदा साहित्य मंथन’ कार्यक्रम प्रतिवर्ष नर्मदा जयंती से वसंत पंचमी के मध्य करवाने के संकल्प को दोहराया। आभार विश्व संवाद केंद्र के दिनेश गुप्ता ने प्रकट किया।
'Narmada Sahitya Manthan' program concluded in Maheshwar
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