देवी कुब्जिका जयंती: तंत्र साधना और वक्रेश्वरी की महिमा का महापर्व
भारतीय तंत्र परंपरा और शाक्त संप्रदाय में कुछ देवियां अत्यंत गूढ़ और शक्तिशाली मानी गई हैं, उन्हीं में से एक हैं- देवी कुब्जिका। वैशाख मास (पूर्णिमान्त पञ्चाङ्ग) की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को उनकी जयंती मनाई जाती है। इस वर्ष यह पर्व 15 अप्रैल 2026 को श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा।
तिथि और शुभ मुहूर्त (2026)
त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 15 अप्रैल, 12:12 AM बजे
त्रयोदशी तिथि समाप्त: 15 अप्रैल, 10:31 PM बजे
कौन हैं देवी कुब्जिका?
देवी कुब्जिका को 'द्वादश सिद्धिविद्या' देवियों में एक प्रमुख स्थान प्राप्त है। कौल तंत्र और कुब्जिकामत के अनुयायी इन्हें वक्रेश्वरी, वक्रिका और छिञिनी जैसे नामों से पूजते हैं। संस्कृत में 'कुब्जिका' का अर्थ होता है "टेढ़ा होना" या "झुका हुआ होना"। यह देवी की एक विशेष मुद्रा और उनकी योग शक्ति का प्रतीक है।
पौराणिक कथा: क्यों पड़ा 'कुब्जिका' नाम?
देवी के इस अनूठे नाम के पीछे एक सुंदर आध्यात्मिक लीला छिपी है। शास्त्रों के अनुसार, एक बार भगवान शिव (नवात्मा) ने अपनी शक्ति 'वक्रिका' को प्रेमपूर्वक आलिंगन में लिया। इस दिव्य मिलन और लज्जा के कारण देवी ने अपने शरीर को एक ओर झुका लिया। उनकी इसी संकुचित और झुकी हुई मुद्रा के कारण वे 'कुब्जिका' कहलाईं। शतसाहस्रसंहिता के अनुसार, वह शक्ति जो 'कुब्ज' (झुककर) होकर संपूर्ण ब्रह्मांड में संकुचित रूप से व्याप्त है, वही कुब्जिका है।
इतिहास के पन्नों में कुब्जिका उपासना
देवी कुब्जिका की पूजा का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रहा है:
पुराणों में उल्लेख: गुप्त काल (5वीं से 9वीं शताब्दी) के दौरान रचित अग्निपुराण, मत्स्यपुराण और गरुड़पुराण में देवी का विस्तार से वर्णन मिलता है।
उपासना का स्वर्ण युग: 10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच उत्तर भारत में उनकी आराधना अपने चरम पर थी। हालांकि, 15वीं शताब्दी के आते-आते यह परंपरा धीरे-धीरे गुप्त (Secret) हो गई।
नेपाल में जीवित परंपरा
यद्यपि भारत में यह साधना कुछ हद तक गुप्त हो गई, लेकिन नेपाल में यह आज भी जीवित है। 900 से 1600 ईस्वी के बीच नेपाल में इसके गहरे साक्ष्य मिलते हैं। वहां आज भी मन्थानभैरवतन्त्र और कुब्जिकामततन्त्र जैसे हस्तलिखित ग्रंथ सुरक्षित हैं और 'पश्चिमाम्नाय कुब्जिकाक्रम' परंपरा के अनुसार देवी की पूजा की जाती है।
महत्व: देवी कुब्जिका की जयंती हमें अपनी लुप्त होती तांत्रिक विरासतों को याद करने और शक्ति के उस स्वरूप की वंदना करने का अवसर देती है, जो सूक्ष्म रूप से कण-कण में विद्यमान हैं। यह पर्व साधकों के लिए सिद्धि और आध्यात्मिक चेतना जागृत करने का दिन है।
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वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम
पौराणिक कथा, इतिहास, धर्म और दर्शन के जानकार, अनुभवी ज्योतिष, लेखक और विषय-विशेषज्ञों द्वारा लिखे गए आलेखों का प्रकाशन किया जाता है।....
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