Fri, 26 Jun 2026

Notifications

  1. धर्म-संसार
  2. व्रत-त्योहार
  3. नानक जयंती
  4. Guru Nanak ki kahani

गुरु नानक देव की कहानी : सच्चा यज्ञोपवीत...

Guru Nanak ki kahani
बालक नानक के पिता कल्याणराय ने उनका यज्ञोपवीत कराने के लिए अपने इष्ट संबंधियों एवं परिचितों को निमंत्रित किया। बालक नानक को आसन पर बिठाकर जब पुरोहितों ने उन्हें कुछ मंत्र पढ़ने को कहा, तो उन्होंने उसका प्रयोजन पूछा। 


 
पुरोहित समझाते हुए बोले,' तुम्हारा यज्ञोपवीत संस्कार हो रहा है। धर्म की मर्यादा के अनुसार यह पवित्र सूत का डोरा प्रत्येक हिंदू को इस संस्कार में धारण कराया जाता है। धर्म के अनुसार यज्ञोपवीत संस्कार पूर्ण होने के बाद तुम्हारा दूसरा जन्म होगा। इसीलिए तुम्हें भी इसी धर्म में दीक्षित कराया जा रहा है।'  
 
' मगर यह तो सूत का है, क्या यह गंदा न होगा?'  बालक ने प्रश्न किया।
 
' हां, पर साफ भी तो हो सकता है।' 
 
' और टूट भी सकता है न?' 
 
' हां, पर नया भी तो धारण किया जा सकता है।' 
 
नानक फिर कुछ सोचकर बोले,-अच्छा, मगर मृत्यु के उपरांत यह भी तो शरीर के साथ जलता होगा? यदि इसे धारण करने से भी मन, आत्मा, शरीर तथा स्वयं यज्ञोपवीत में पवित्रता नहीं रहती, तो इसे धारण करने से क्या लाभ?' 
 
पुरोहित और अन्य लोग इस तर्क का उत्तर न दे पाए। 
 
तब बालक नानक बोले,-यदि यज्ञोपवीत ही पहनाना है तो ऐसा पहनाओ कि जो न टूटे, न गंदा हो और न बदला जा सके। जो ईश्वरीय हो, जिसमें दया का कपास हो, संतोष का सूत हो। ऐसा यज्ञोपवीत ही सच्चा यज्ञोपवीत है। पुरोहित जी! क्या आपके पास ऐसा यज्ञोपवीत है?' और यह सुन सब अवाक्‌ रह गए, उनसे कोई उत्तर न देते बना। 
 
सच ही कहा गया है कि पूत के पांव पलने में ही दिखाई देने लगते हैं। उन्हें संत ही होना था।

 
ये भी पढ़ें
गुरु नानक देव की रचनाएं...