लीबिया के कर्नल मुअम्मर गद्दाफी को एक कठोर तानाशाह के रूप में देखा जाता है,किन्तु उनके शासनकाल में कुछ ऐसे लोक कल्याणकारी काम भी हुए जिसकी मिसाल और कहीं नहीं मिलती। लीबिया का रेगिस्तान विश्व के सबसे विशाल और शुष्क रेगिस्तानों में से एक है,जो उत्तरी अफ्रीका में स्थित लीबिया के अधिकांश भू-भाग को घेरता है। यह सहारा रेगिस्तान का ही हिस्सा है और अपने अत्यंत कठोर जलवायु, कम वर्षा और विस्तृत रेत के टीलों के लिए जाना जाता है। लीबिया जैसे विशाल रेगिस्तानी देश में गद्दाफी ने ग्रेट मैन-मेड रिवर परियोजना के माध्यम से भूमिगत जल को निकालकर दूरदराज़ के क्षेत्रों तक पहुंचा कर दुनिया को चमत्कृत कर दिया था,जिससे इस देश में कृषि,पेयजल आपूर्ति और शहरी विकास को नई दिशा मिली। 1984 में शुरू की गई परियोजना को चरणबद्ध तरीके से विकसित किया गया।
इसका मुख्य उद्देश्य सहारा रेगिस्तान के नीचे मौजूद प्राचीन भूमिगत जल को पाइपलाइनों के माध्यम से तटीय शहरों और कृषि क्षेत्रों तक पहुंचाना था। यह परियोजना दुनिया की सबसे बड़ी सिंचाई और जल आपूर्ति योजनाओं में से एक मानी जाती है जो संसाधनों के साहसिक उपयोग और राजनीतिक इच्छाशक्ति का उदाहरण थी। ग्रेट मैन-मेड रिवर परियोजना ने यह दिखाया कि सीमित प्राकृतिक परिस्थितियों के बावजूद भी यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति चाह लें तो तस्वीर बदल सकती है।
भारत,रेगिस्तान में नहीं है,यहां भरपूर जल है लेकिन जल संसाधनों का वितरण अत्यंत असमान है। कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा,कहीं नदियों की अधिकता तो कहीं जल का अभाव। इसी असंतुलन को दूर करने के लिए नदी जोड़ो परियोजना की परिकल्पना की गई थी,जिसका उद्देश्य जल का समान वितरण,सिंचाई विस्तार और बाढ़-सूखा प्रबंधन था। इस परियोजना की शुरुआत गद्दाफी से पहले अर्थात् 1980 में कर दी गई थी। 2002 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद इस परियोजना को नई गति मिली और इसे समयबद्ध तरीके से पूरा करने पर जोर दिया गया। हालांकि अब तक यह परियोजना पूरी तरह लागू नहीं हो सकी है और केवल कुछ हिस्सों पर ही काम आगे बढ़ पाया है। यदि इस परियोजना को समयबद्ध और प्रभावी ढंग से लागू किया गया होता,तो न केवल कृषि उत्पादकता में वृद्धि होती,बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन भी संभव था। निर्माण,जल प्रबंधन,परिवहन और सहायक उद्योगों में करोड़ों लोगों को काम मिल सकता था।
भारत में यह परियोजना दशकों से राजनीतिक इच्छाशक्ति,केंद्र-राज्य विवाद, पर्यावरणीय बहस और प्रशासनिक जटिलताओं के कारण अधूरी बनी हुई है। गद्दाफी ने एक केंद्रीकृत निर्णय प्रणाली के तहत बड़े प्रोजेक्ट को तेजी से पूरा किया,वहीं भारत में लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर निर्णय प्रक्रिया बेहद धीमी रही। दरअसल भारत की राजनीति की एक प्रमुख कमी यही रही है कि दीर्घकालिक और बुनियादी परियोजनाओं पर निरंतरता और सहमति का अभाव रहा है। यदि नदी जोड़ो जैसी परियोजना को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाकर निरंतरता के साथ लागू किया जाता,तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होती,कृषि आधारित रोजगार बढ़ते और बड़ी संख्या में लोगों को जीविका के लिए विदेश जाने की आवश्यकता कम हो सकती थी।
भारत,पचास करोड़ के विशाल कार्यबल के साथ आज विश्व की सबसे बड़ी श्रम आपूर्तिकर्ता अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसकी नब्बे फीसदी से अधिक श्रमशक्ति असंगठित क्षेत्र में कार्य करती है,जहां न तो नियमित वेतन की गारंटी होती है और न ही सामाजिक सुरक्षा। यही कारण है कि बड़ी संख्या में भारतीय श्रमिक बेहतर अवसरों की तलाश में विदेशों की ओर प्रवास करते है। आज विश्वभर में लगभग साढ़े तीन करोड़ भारतीय मूल के लोग रहते हैं और हर साल बीस से पच्चीस लाख भारतीय रोजगार के लिए बाहर जाते है। विदेशों में खाड़ी देश भारतीय श्रमिकों का सबसे बड़ा केंद्र हैं,जहां करीब एक करोड़ भारतीय काम करते है। इनमें संयुक्त अरब अमीरात में लगभग तैंतालीस लाख,सऊदी अरब में पच्चीस लाख तथा कतर,कुवैत,ओमान और बहरीन में भी बड़ी संख्या में भारतीय श्रमिक कार्यरत हैं। इन देशों में भारतीय निर्माण,तेल-गैस और सेवा क्षेत्रों में कार्य करते है और वे बुनियादी ढांचे के विकास की रीढ़ बने हुए है।
इसके साथ ही अमेरिका,ब्रिटेन,कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में भी भारतीयों की उल्लेखनीय उपस्थिति है। यहां भारतीय आईटी,स्वास्थ्य, इंजीनियरिंग में कार्यरत है। तकनीकी,स्वास्थ्य और निर्माण कार्यों जर्मनी,जापान और इजरायल जैसे देशों में भी भारतीय श्रमिकों की मांग तेजी से बढ़ रही है। दक्षिण-पूर्व एशिया में मलेशिया और सिंगापुर में भी भारतीय श्रमिक लंबे समय से कार्यरत हैं। खाड़ी देशों में अधिकतर श्रमिक अकुशल या अर्ध-कुशल होते है,जबकि विकसित देशों में कुशल और पेशेवर वर्ग की भागीदारी अधिक है।
खाड़ी देशों में काम करने वाले श्रमिक अक्सर कठिन परिस्थितियों,लंबे कार्य घंटे, सीमित श्रम अधिकार और कभी-कभी कम वेतन सुरक्षा का सामना करते है, हालांकि वे यह कष्ट फिर भी भोगते है क्योंकि उनकी आय भारत की तुलना में अधिक होती है। विदेश में रहने वाले यह मजदूर संकटों का सामना करते हुए भी भारत के लिए मुद्रा अर्जित करके अर्थव्यवस्था मजबूत करने में अपना योगदान देते है। विदेशों से भारत जो कुछ वे कमाकर भेजते है,वह राशि भारत की अर्थव्यवस्था,विदेशी मुद्रा भंडार और करोड़ों परिवारों के जीवन स्तर को सुधारने में सहायक होती है।
अब बात करते है भारत के इतिहास की। प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत विश्व अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख केंद्र था,जिसे उसकी समृद्धि,विकसित व्यापारिक नेटवर्क और उच्च स्तरीय शिल्प-कौशल के कारण सोने की चिड़िया कहा जाता था। इस दौरान विदेशों से व्यापारी और श्रमिक भारत की ओर आकर्षित होते थे। किन्तु आधुनिक काल में यह प्रवृत्ति उलट गई और बड़ी संख्या में भारतीय श्रमिक विदेशों की ओर प्रवास कर रहे हैं। इस परिवर्तन के पीछे कई ऐतिहासिक,सामाजिक,प्रशासनिक और आर्थिक कारण है। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारत की पारंपरिक उद्योग व्यवस्था को नष्ट कर दियाथा,जिससे आर्थिक गिरावट आई और भारत कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता बनकर रह गया। इसके साथ ही औद्योगिक क्रांति के कारण यूरोप और पश्चिमी देशों में तीव्र औद्योगिक विकास हुआ,जिससे रोजगार के अवसर वहां बढ़े और भारत अपेक्षाकृत पिछड़ गया। स्वतंत्रता के बाद भी बढ़ती जनसंख्या और सीमित रोजगार अवसरों ने श्रमिकों को बेहतर आय की तलाश में विदेश जाने के लिए प्रेरित किया। 1970 के दशक में तेल संपन्न खाड़ी देश में आर्थिक उभार और बड़े पैमाने पर निर्माण कार्यों ने भारतीय अकुशल एवं अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए नए अवसर खोले। वहीं वैश्वीकरण और उदारीकरण के बाद अंतरराष्ट्रीय श्रम प्रवाह तेज हुआ और अमेरिका,जर्मनी तथा जापान जैसे देशों में कुशल भारतीय पेशेवरों की मांग बढ़ी। विदेशों में अधिक वेतन,बेहतर जीवन स्तर और पेशेवर अवसरों ने भी भारतीयों को आकर्षित किया। इस प्रकार जहां प्राचीन काल में भारत अवसरों का केंद्र था,वहीं आज भारतीय श्रमिक वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर विभिन्न देशों की विकास प्रक्रिया में योगदान दे रहे है।
भारत में बेरोजगारी का यह हाल है की इजराइल फिलिस्तीन युद्द के बीच भी इजराइल जाने के लिए भारतीय श्रमिक लंबी कतारों में नजर आएं। दुनिया चाहती है की भारत के मजदूर उनके देश आएं और अपने ज्ञान कौशल से उस देश के विकास में गहरा योगदान दें जबकि हम उन्हें भारत में ही रोजगार देकर उनका और देश का भविष्य संवार सकते है। विदेशों से भारत वापस आने वाले प्रवासी मजदूर और कुशल पेशेवर देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। उनका वापस आना अनुभव,कौशल और पूंजी की वापसी होगा जिसे रिवर्स ब्रेन गेन कहा जाता है। ये भारतीय अपनी बचत,वैश्विक कौशल और उद्यमी मानसिकता के साथ आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने में बड़ा योगदान दे सकते हैं।