bmc election results : महाराष्ट्र के BMC चुनाव में राज ठाकरे की हार, क्या उद्धव आगे देंगे भाई का साथ
मुंबई की राजनीति में राज ठाकरे हमेशा से एक ऐसे नाम रहे हैं, जिनका भाषण सुनने के लिए भीड़ तो उमड़ती है, लेकिन वह भीड़ अक्सर वोटों में तब्दील नहीं हो पाती। ये एक बार फिर बीएमसी चुनावों में साबित हुआ। राज ठाकरे उद्धव ठाकरे के साथ मिलकर चुनाव लड़े थे, उसके बाद भी बीएमसी में दहाई का अंक नहीं पार कर सके। 22 शहरों में उनकी पार्टी का खाता तक नहीं खुला।
राज ठाकरे ने अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी और चचेरे भाई उद्धव ठाकरे के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। उद्धव ठाकरे को अनिच्छुक नेता के तौर पर देखा जाता रहा है जबकि राज ठाकरे शुरू से ही बहुत आक्रामक रहे हैं। 2009 के विधानसभा चुनाव में 13 सीटें जीतकर धमाका करने वाली राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस का ग्राफ लगातार नीचे गिरा है।
हिन्दुत्व और विकास के मुद्दे ने लगाई सेंध
दशकों की कड़वाहट के बाद राज और उद्धव ठाकरे का एक साथ आना महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा भावनात्मक मोड़ था। बाल ठाकरे के निधन के क़रीब 13 साल बाद राज ठाकरे ने अपने परिवार के साथ आने का फैसला किया है। इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य 'मराठी वोट' के बिखराव को रोकना और भाजपा-शिंदे गठबंधन (महायुति) को चुनौती देना था। हिन्दुत्व और विकास के मुद्दे पर भाजपा ने मराठी वोटों के एक बड़े हिस्से में सेंध लगा दी है।
राज ठाकरे एक कुशल वक्ता और कद्दावर नेता हैं, लेकिन चुनावी राजनीति केवल भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस रणनीति और गठबंधन की सफलता से चलती है। बीएमसी चुनाव में हार उनके लिए 'करो या मरो' जैसी स्थिति है। यदि वे इस हार से सीखकर अपनी रणनीति नहीं बदलते, तो 'ठाकरे' ब्रांड की विरासत को बचाने की जिम्मेदारी अब केवल उद्धव गुट या शिंदे गुट के पास रह जाएगी। बीएमसी की जीत ने एकनाथ शिंदे को और ताकतवर कर दिया है।
कहां चूक गए ठाकरे ब्रदर्स
एमएनएस का कैडर और शिव सेना (UBT) का कैडर वैचारिक रूप से लंबे समय तक एक-दूसरे के खिलाफ रहा है, जिससे जमीनी स्तर पर तालमेल की कमी दिखी। राज ठाकरे के पास अब खोने के लिए बहुत कम और पाने के लिए पूरा मैदान है। 'मराठी मानुष' बनाम 'कट्टर हिन्दुत्व' के बीच झूलती विचारधारा ने मतदाताओं को भ्रमित किया है। Edited by : Sudhir Sharma