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भोजपुर : विराट शिवलिंग, बेजोड़ स्थापत्य कला

भोजपुर
विनय कुशवाहा

फरवरी की गुलाबी सुबह और सूरज की सोने सी किरण बहुत ही सुंदर लग रही है। हरे-भरे लहलहाते खेत मन को मोह लेने वाले हैं। कांक्री़ट के जंगल को पीछे छोड़ते हुए मैं प्रकृति के आगोश में जाता जा रहा हूं। बंगरसिया से आगे बढ़ते हुए मुझे कुछ ऐसा ही लग रहा है। मैं चलता जा रहा हूं और मेरा साथ दे रही है कलियासोत नदी। थोड़ी देर साथ देने के बाद वह भी कहीं नदारद सी हो गई। मैं आगे बढ़ता गया और नए-ऩए साथी मिलते गए ...कहीं जंगल, तो कहीं पठार, तो कहीं पहाड़, तो कभी-कभी पीछे छोड़ी हुई नदी साथ देती फिर नदारद हो जाती। आखिरकार मैंने कलियासोत को पार किया और मेरे सामने दिखाई देने लगी पहाड़ी पर स्थित भव्य इमारत जिसका नाम है 'भोजेश्वर मंदिर'। 
 
भोपाल से लगभग 30 किमी दूर रायसेन जिले में स्थित है भोजपुर। भोजपुर अपने शिव मंदिर के लिए जाना जाता है। प्रकृति की गोद में स्थित यह मंदिर अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर से आसपास का नजारा बहुत ही आकर्षक है।  यहां से मंडीदीप के कारखानों की ऊंची-ऊंची चिमनियां, कलियासोत और बेतवा नदी का विहंगम दृश्य और दूर तक फैला मैदान।
 
भोजपुर में स्थित इस मंदिर का निर्माण परमार वंश के परम प्रतापी राजा भोज ने करवाया था। भोजेश्वर मंदिर का निर्माण 11 वी शताब्दी में किया गया था। इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग दुनिया का सबसे बड़ा शिवलिंग है। शिवलिंग की ऊंचाई लगभग 21.5 फीट है जो विस्मित करने वाली है। मंदिर को बहुत ही कलात्मक ढंग से तैयार किया है जो भारतीय इंजीनिरिंग और स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है। इस मंदिर की ऊंचाई लगभग 115 फीट है। इस मंदिर को बहुत कलात्मकता के साथ बनाया गया है जिसमें मुख्य द्वार, मंदिर के अंदर स्थित कलात्मक खंभे और इसमें स्थापित की गई मूर्तियां हैं। इस मंदिर में सती, सावित्री, नारद, विष्णु, सरस्वती, अप्सराओं की मूर्तियां दर्शनीय है।
इस मंदिर का निर्माण पूरा नहीं हो सका जिसके बारे में अनेक कहानियां है परंतु इसके बारे में एक सर्वमान्य तथ्य है कि इसका शिखर का पूरा ना होना। कहा जाता है कि मंदिर का शिखर यदि पूरी तरह निर्मित होता तो यह मुख्य मंदिर से भारी होता और मंदिर इस भार को सहन नहीं कर पाता अंतत: ढह जाता। आज शिखर की जगह पर प्लास्टिक के द्वारा इसे कवर किया गया है। इस मंदिर को घंटों तक निहारा जा सकता है पर मन नहीं भरता। इस मंदिर के निर्माण में स्थानीय पहाड़ी के पत्थर का उपयोग बड़ी मात्रा में किया गया है, जिसके साक्ष्य आज भी मौजूद है। मंदिर की दाईं ओर एक पहाड़ी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह पहाड़ी पत्थर को मंदिर के शिखर तक ले जाने में उपयोग किया जाता था। 
 
भोजेश्वर सच में कला का अद्वितीय नमूना है। इस मंदिर में कई हैरान करने वाली चाजें दिखाई देती हैं, जिनमें रॉक ड्रॉइंग सबसे अलग है। मंदिर के समीप चट्टानों पर बनी रॉक ड्रॉइंग (भित्ती चित्र) मंदिर से संबंधित है। यहां मंदिर का शिखर, मुख्य द्वार, खंभों आदि पर विलक्षण चित्रकारी मिलती हैं। इन सभी कलाकृतियों को देखने के बाद मन में केवल एक ही शब्द आता है 'बेजोड़'। इन रॉक ड्रॉइंग देखने के बाद मैं भोजपुर संग्रहालय की ओर बढ़ा। संग्रहालय में परमार वंश की वंशावली, मंदिर का निर्माण कैसे हुआ, मंडीदीप को मंडीदीप क्यों कहते हैं इसकी जानकारी चित्रों के माध्यम से मिली।
 
भोजपुर कोई साधारण जगह नहीं यह तो धार्मिकता, ऐतिहासिकता और इंजानियरिंग का अद्भुत मिलन स्थल है। भोजपुर एक बार जरूर देखें।  

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