Pandit Lekh Ram Biography: पंडित लेखराम भारतीय समाज के महान विचारक, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थे। उनका जन्म 1858 में पंजाब के शहजादपुर गांव में हुआ था। पंडित लेखराम का जीवन सत्य, न्याय और भारतीय समाज की पुरानी जड़ता के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक था।
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'सत्य को स्वीकार करने और असत्य को छोड़ने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए।' - यह पंडित लेखराम के जीवन का मूल मंत्र था।
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पुलिस की नौकरी का त्याग
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'आर्य मुसाफिर' बनने का संकल्प
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स्वामी दयानंद का अधूरी जीवनी पूरी करना
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शास्त्रार्थ और निडरता
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मिर्जा गुलाम अहमद से मुकाबला
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पंडित लेखराम के जीवन का सार
यहां उनके जीवन के कुछ अत्यंत रोचक और प्रेरक संस्मरण दिए गए हैं:
1. पुलिस की नौकरी का त्याग
पंडित लेखराम पहले पंजाब पुलिस में एक ऊंचे पद पर थे। एक बार उनके विभाग के अधिकारियों ने उन्हें किसी निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर करना चाहा। सत्य के खोजी लेखराम ने अन्याय के आगे झुकने के बजाय तुरंत पुलिस की वर्दी उतार दी और त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने कहा, 'अब मैं केवल सत्य का प्रचार करूंगा।'
2. 'आर्य मुसाफिर' बनने का संकल्प
नौकरी छोड़ने के बाद, उन्होंने अपना पूरा जीवन वैदिक धर्म के प्रचार के लिए समर्पित कर दिया। वे पैदल ही पूरे भारत और अफगानिस्तान (काबुल) तक की यात्राएं करते थे। वे अक्सर रेलगाड़ी के बजाय पैदल चलना पसंद करते थे ताकि रास्ते में आने वाले गांवों में लोगों से मिल सकें। इसी कारण उन्हें 'आर्य मुसाफिर' कहा जाने लगा। उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि आजीवन वैदिक धर्म के प्रचार और स्वामी दयानंद सरस्वती के जीवन पर शोध हेतु निरंतर यात्राओं को करने के कारण भी उन्हें 'आर्य मुसाफिर' कहा जाता है।
3. स्वामी दयानंद का अधूरी जीवनी पूरी करना
जब स्वामी दयानंद सरस्वती का देहांत हुआ, तो उनकी कोई विस्तृत जीवनी मौजूद नहीं थी। पंडित लेखराम ने संकल्प लिया कि वे ऋषि दयानंद के जीवन के हर तथ्य को खोजेंगे। उन्होंने उन सभी जगहों की यात्रा की जहां स्वामी जी गए थे। उन्होंने उन लोगों से मुलाकात की जिन्होंने स्वामी जी को देखा या सुना था। इस शोध के लिए उन्होंने अपना घर-बार तक दांव पर लगा दिया, ताकि आने वाली पीढ़ियां ऋषि के जीवन को जान सकें।
4. शास्त्रार्थ और निडरता
पंडित लेखराम अपने समय के सबसे बड़े शास्त्रार्थी माने जाते थे। वे अक्सर उन क्षेत्रों में भी चले जाते थे जहां उनके विचारों का भारी विरोध होता था। एक बार एक चर्चा के दौरान उन पर हमला करने की कोशिश की गई, लेकिन वे टस से मस नहीं हुए और अपनी बात तर्क के साथ रखते रहे। उनकी तर्कशक्ति इतनी प्रबल थी कि उनके विरोधी भी उनके ज्ञान का लोहा मानते थे।
5. मिर्जा गुलाम अहमद से मुकाबला
पंडित लेखराम का नाम इतिहास में अहमिया संप्रदाय के संस्थापक मिर्जा गुलाम अहमद के साथ उनके वैचारिक टकराव के लिए भी प्रसिद्ध है। लेखराम ने उनके द्वारा किए गए दावों को खुलेआम चुनौती दी थी। कहा जाता है कि लेखराम की मृत्यु की भविष्यवाणी भी की गई थी, लेकिन वे अंत तक अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे और 6 मार्च 1897 को एक जिहादी हमले में शहीद हुए।
पंडित लेखराम के जीवन का सार
उपनाम- आर्य मुसाफिर
मुख्य कार्य- शुद्धि आंदोलन और वैदिक धर्म का प्रचार
साहस- सत्य के लिए पुलिस की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़ी
लेखन- स्वामी दयानंद सरस्वती की प्रथम विस्तृत जीवनी लिखी
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