कागजों पर रिकॉर्ड बना रहा इंदौर, हकीकत में कई प्रोजेक्ट पड़े अधूरे
इंदौर। देश भर में स्वच्छता का सिरमौर और 'स्मार्ट सिटी' का तमगा हासिल कर चुका इंदौर कागजों में तो उपलब्धियों और रिकॉर्ड्स की नई इबारत लिख रहा है, लेकिन अगर शहर के विकास कार्य (Infrastructure) की जमीनी हकीकत पर नजर डालें, तो कई बड़े प्रोजेक्ट्स समय-सीमा बीतने के बाद भी अधूरे पड़े हैं।
हाल ही में सफाई को लेकर पांच लाख सेल्फी का रिकॉर्ड बनाया गया, लेकिन यह सब सिर्फ देखने में अच्छा लगा, इसी दिन कई ऐसे लोगों ने भी कचरे के ढेर के साथ सेल्फी शेयर की जो सफाई के दावों की खिल्ली बना रहा था। वहीं, कागजी दावों और जमीनी हकीकत के इस बड़े अंतर से न केवल इंदौर की जनता रोजाना ट्रैफिक जाम और धूल से जूझ रही है, बल्कि सरकारी खजाने पर भी लागत बढ़ने का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
'कागजी रिकॉर्ड' बनाम 'जमीनी हकीकत'
फ्लाईओवर्स का जाल: कागजों में ट्रैफिक-फ्री चौराहा, सड़क पर रोज़ का जाम
कागजी दावा: शहर के व्यस्ततम चौराहों—जैसे खजराना, भंवरकुआं और फूटी कोठी—पर ट्रैफिक को सुगम बनाने के लिए फ्लाईओवर्स का निर्माण 'रिकॉर्ड गति' से पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था।
जमीनी हकीकत: डेडलाइन बीत जाने के बाद भी फ्लाईओवर्स का काम कछुआ गति से चल रहा है। निर्माण कार्य के चलते डायवर्जन और आधी अधूरी सड़कों के कारण इन चौराहों पर पीक आवर्स में घंटों का ट्रैफिक जाम लगता है। एम्बुलेंस से लेकर दफ्तर और स्कूल जाने वाले लोग रोजाना इस अव्यवस्था का शिकार हो रहे हैं।
यशवंत सागर और बिलावली तालाब: रिकॉर्ड सफाई के दावे, पर जलसंकट बरकरार
कागजी दावा : इंदौर नगर निगम द्वारा जल स्रोतों के संरक्षण और 'कैच द रेन' अभियानों के तहत रिकॉर्ड पौधारोपण और तालाबों के जीर्णोद्धार के बड़े-बड़े दावे किए गए।
जमीनी हकीकत : मानसून के इस दौर में भी यशवंत सागर और बिलावली जैसे प्रमुख जलाशयों में जलस्तर चिंताजनक बना हुआ है। तालाबों को अतिक्रमण मुक्त करने और उनमें गिरने वाले सीवरेज के गंदे पानी को शत-प्रतिशत रोकने की योजनाएं कागजी फाइलों में ही सिमटी हैं। नतीजा यह है कि शहर के कई कॉलोनियों में आज भी बोरिंग सूख रहे हैं और लोग टैंकरों पर निर्भर हैं।
मेट्रो प्रोजेक्ट: 'ट्रायल रन' का जश्न, लेकिन आम जनता के लिए सफर दूर
कागजी दावा : इंदौर मेट्रो के सुपर प्रियोरिटी कॉरिडोर पर 'सफल ट्रायल रन' के बाद दावा किया गया था कि बहुत जल्द इंदौरी मेट्रो की सवारी करेंगे।
जमीनी हकीकत : कमर्शियल रन (आम जनता के लिए शुरुआत) की तारीखें लगातार आगे बढ़ रही हैं। स्टेशन बिल्डिंग्स, अंडरग्राउंड ट्रैक्स और कनेक्टिविटी से जुड़े कई अहम सिविल वर्क्स अब भी पूरे नहीं हो सके हैं। रिंग रोड और रेडिसन चौराहे की तरफ मेट्रो सिविल वर्क के कारण आधी सड़कें बंद हैं, जिससे पूरा निचला ट्रैफिक तंत्र प्रभावित है।
24x7 वाटर सप्लाई योजना: 'स्मार्ट वॉटर मीटर्स' लगे, पर नल अब भी सूखे
कागजी दावा : स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत इंदौर के चुनिंदा वार्डों में 24 घंटे निर्बाध पानी की आपूर्ति (24x7 Water Supply) और स्मार्ट डिजिटल वाटर मीटर लगाने का रिकॉर्ड प्रोजेक्ट शुरू किया गया था।
जमीनी हकीकत : जिन क्षेत्रों में स्मार्ट मीटर लगे हैं, वहां भी आज तक 24 घंटे पानी नहीं पहुंच पा रहा है। नलों में गंदे पानी की सप्लाई और कम प्रेशर की शिकायतें बनी हुई हैं। योजना का विस्तार पूरे शहर में करने का खाका सिर्फ बैठकों और प्रेजेंटेशन तक सीमित है।
क्यों पिछड़ रहे हैं प्रोजेक्ट्स?
विभागीय तालमेल का अभाव (Inter-department Coordination): नगर निगम, इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA), लोक निर्माण विभाग (PWD) और मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के बीच समन्वय की कमी। एक विभाग सड़क बनाता है, दूसरा केबल या पाइपलाइन के लिए उसे खोद देता है।
ठेकेदारों पर ढिलाई : डेडलाइन मिस करने वाली निर्माण एजेंसियों और ठेकेदारों पर सख्त पेनाल्टी लगाने के बजाय बार-बार समय-सीमा (Extension) बढ़ा दी जाती है।
पब्लिक कंसल्टेशन की कमी : निर्माण से पहले स्थानीय दुकानदारों, रहवासियों और ट्रैफिक पुलिस से जमीनी स्तर पर सही समन्वय न बनाना। इंदौर की पहचान हमेशा से देश के सबसे जागरूक और स्वच्छता-प्रिय शहर की रही है। लेकिन सिर्फ फाइलों में नए रिकॉर्ड बनाने या रैंकिंग सुधारने से शहर की बुनियादी समस्याएं हल नहीं होंगी। जब तक निर्माण कार्यों में जवाबदेही (Accountability) तय नहीं होगी, तब तक 'स्मार्ट सिटी' का सपना कागजों में चमकता रहेगा और इंदौरी सड़कों पर हिचकोले खाते रहेंगे।
'कागजी रिकॉर्ड' बनाम 'जमीनी हकीकत'
फ्लाईओवर्स का जाल: कागजों में ट्रैफिक-फ्री चौराहा, सड़क पर रोज़ का जाम
कागजी दावा: शहर के व्यस्ततम चौराहों—जैसे खजराना, भंवरकुआं और फूटी कोठी—पर ट्रैफिक को सुगम बनाने के लिए फ्लाईओवर्स का निर्माण 'रिकॉर्ड गति' से पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था।
जमीनी हकीकत: डेडलाइन बीत जाने के बाद भी फ्लाईओवर्स का काम कछुआ गति से चल रहा है। निर्माण कार्य के चलते डायवर्जन और आधी अधूरी सड़कों के कारण इन चौराहों पर पीक आवर्स में घंटों का ट्रैफिक जाम लगता है। एम्बुलेंस से लेकर दफ्तर और स्कूल जाने वाले लोग रोजाना इस अव्यवस्था का शिकार हो रहे हैं।
यशवंत सागर और बिलावली तालाब: रिकॉर्ड सफाई के दावे, पर जलसंकट बरकरार
कागजी दावा : इंदौर नगर निगम द्वारा जल स्रोतों के संरक्षण और 'कैच द रेन' अभियानों के तहत रिकॉर्ड पौधारोपण और तालाबों के जीर्णोद्धार के बड़े-बड़े दावे किए गए।
जमीनी हकीकत : मानसून के इस दौर में भी यशवंत सागर और बिलावली जैसे प्रमुख जलाशयों में जलस्तर चिंताजनक बना हुआ है। तालाबों को अतिक्रमण मुक्त करने और उनमें गिरने वाले सीवरेज के गंदे पानी को शत-प्रतिशत रोकने की योजनाएं कागजी फाइलों में ही सिमटी हैं। नतीजा यह है कि शहर के कई कॉलोनियों में आज भी बोरिंग सूख रहे हैं और लोग टैंकरों पर निर्भर हैं।
कागजी दावा : इंदौर मेट्रो के सुपर प्रियोरिटी कॉरिडोर पर 'सफल ट्रायल रन' के बाद दावा किया गया था कि बहुत जल्द इंदौरी मेट्रो की सवारी करेंगे।
जमीनी हकीकत : कमर्शियल रन (आम जनता के लिए शुरुआत) की तारीखें लगातार आगे बढ़ रही हैं। स्टेशन बिल्डिंग्स, अंडरग्राउंड ट्रैक्स और कनेक्टिविटी से जुड़े कई अहम सिविल वर्क्स अब भी पूरे नहीं हो सके हैं। रिंग रोड और रेडिसन चौराहे की तरफ मेट्रो सिविल वर्क के कारण आधी सड़कें बंद हैं, जिससे पूरा निचला ट्रैफिक तंत्र प्रभावित है।
24x7 वाटर सप्लाई योजना: 'स्मार्ट वॉटर मीटर्स' लगे, पर नल अब भी सूखे
कागजी दावा : स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत इंदौर के चुनिंदा वार्डों में 24 घंटे निर्बाध पानी की आपूर्ति (24x7 Water Supply) और स्मार्ट डिजिटल वाटर मीटर लगाने का रिकॉर्ड प्रोजेक्ट शुरू किया गया था।
जमीनी हकीकत : जिन क्षेत्रों में स्मार्ट मीटर लगे हैं, वहां भी आज तक 24 घंटे पानी नहीं पहुंच पा रहा है। नलों में गंदे पानी की सप्लाई और कम प्रेशर की शिकायतें बनी हुई हैं। योजना का विस्तार पूरे शहर में करने का खाका सिर्फ बैठकों और प्रेजेंटेशन तक सीमित है।
क्यों पिछड़ रहे हैं प्रोजेक्ट्स?
विभागीय तालमेल का अभाव (Inter-department Coordination): नगर निगम, इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA), लोक निर्माण विभाग (PWD) और मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के बीच समन्वय की कमी। एक विभाग सड़क बनाता है, दूसरा केबल या पाइपलाइन के लिए उसे खोद देता है।
ठेकेदारों पर ढिलाई : डेडलाइन मिस करने वाली निर्माण एजेंसियों और ठेकेदारों पर सख्त पेनाल्टी लगाने के बजाय बार-बार समय-सीमा (Extension) बढ़ा दी जाती है।

