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डॉक्टरों को मुफ्त गोवा-थाईलैंड ट्रिप, हजारों की शराब पार्टीज, मरीजों की जेब पर पल रहा है 'प्रोपेगेंडा मेडिसिन माफिया'
प्रोपेगंडा मेडिसिन को बढ़ावा देने के बदले इंदौर की 18 फीमेल डॉक्टरों ने गोवा में उड़ाई मौज-मस्ती
- हर साल डॉक्टर्स जा रहे मुफ्त की विदेशी ट्रिप पर, प्रोपेगंडा मेडिसिन माफिया दे रहा डॉक्टरों को इनाम
- कमिशनखोरी के चक्कर में डॉक्टर इलाज के बदले बढ़ा रहे मरीजों का मर्ज
- मप्र में टैक्स ज्यादा, इसलिए हिमाचल के बद्दी, पंजाब के मोहाली, जालधंर और महाराष्ट्र में बन रही प्रोपेगंडा मेडिसिन
इंदौर में कुछ डॉक्टर्स हाई-प्रोफाइल पार्टीज, पर्क्स, गोवा और विदेश की मुफ्त ट्रीप के बदले प्रोपेगेंडा मेडिसिन माफिया के साथ मिलकर इस पूरे खेल को अंजाम दे रहे हैं। वेबदुनिया की पडताल में सामने आया कि हाल ही में इंदौर की 18 फीमेल नामचीन डॉक्टर्स मौज-मस्ती के लिए गोवा गईं थी। यह मुफ्त ट्रीप प्रोपेगेंडा कंपनी की तरफ से थी। इसके पहले 6 डॉक्टर थाइलैंड गए थे। वहीं एक पार्टी में कुछ फीमेल डॉक्टर्स मुफ्त में 60 हजार की शराब पी गई, यह पार्टी भी एक तरह से कमिशन थी। इसी धंधे के इनाम के तौर पर आए दिन कुछ डॉक्टरों की ट्रीप विदेश यात्राओं पर जाती रही है।
एक ही कंपनी की दवा क्यों : मेडकिल संचालकों का कहना है कि क्यों डॉक्टर बार-बार एक ही कंपनी की दवा लिखता है, या फिर ऐसी दवा लिखता है जो हर जगह नहीं, बल्कि कुछ तय जगहों पर ही मिलती हैं। दरअसल, प्रोपेगंडा मेडिसिन कंपनियां मेडिकल फील्ड से जुड़े कुछ लोगों को कमिशन के जाल में लेकर बाजार में अपनी दवाएं खपा रही हैं। चौंकाने वाली बात है कि कोई भी व्यक्ति खुद अपनी दवाएं बनवा सकता है, अपना ब्रांड नाम रख सकता है, यहां तक कि दवाओं की एमआरपी भी तय की जा सकती है।
प्रोपेगंडा मेडिसिन कंपनी और कमिशनखोरी का खेल : अक्सर दवाइयों में ड्रग के कॉम्बिनेशन को लेकर सवाल उठते रहे हैं, जिसकी वजह से कोल्ड्रिफ कफ सिरप पीने से मध्यप्रदेश और राजस्थान में 32 बच्चों की मौत हुई थी। लेकिन अब भी मेडिकल प्रोफेशनल्स और प्रोपेगंडा मेडिसिन कंपनियों की मिलीभगत से भी कई तरह की धांधलियां हो रही हैं। प्रोपेगंडा मेडिसन कंपनियां अपनी दवाइयों को बाजार में खपाने के लिए कमिशनखोरी का खेल खेल रही हैं। कुछ डॉक्टर्स इस खेल में शामिल होकर मरीज को ऐसी प्रोपेगंडा दवा लिख रहे हैं जो इलाज तो दूर उल्टा मरीज के किडनी, लीवर और दिल का कबाड़ा कर सकती है। नकली, मिलावटी या तय मानकों पर नहीं होने की वजह से ये दवाइयां असर ही नहीं करती हैं, ऐसे में मरीज को डबल डोज वाली वही दवाई फिर से दी जाती है और इस तरह मरीज मर्ज ठीक होने की बजाए ज्यादा दर्दनाक और जानलेवा हो जाता है।
ऐसे समझे नकली या मिलावटी दवाओं का स्कैंडल
क्या है प्रोपेगेंडा स्कैंडल : दवाई निर्माता और मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े कुछ लोगों की मिलीभगत से पूरे प्रदेश में एक प्रोपेगेंडा स्कैंडल चल रहा है। वेबदुनिया की पड़ताल में मेडिकल फील्ड से जुड़े कई लोगों ने नाम प्रकाशित नहीं करने की गुजारिश पर बताया कि हर दवाई की एक ग्रेड होती है। जैसे सिप्ला, रेड्डी या सनफार्मा जैसी लिस्टेड कंपनियों की एक ग्रेड है, इन कंपनियों की दवाइयों में कोई दिक्कत नहीं आएगी, ये महंगी और उच्च गुणवत्ता वाली दवाइयां होती है। दूसरी मेनकाइंड और एफडीसी कंपनियों की दवाइयों की एक ग्रेड होती है। यहां तक भी ठीक है। डॉक्टर ये दवाइयां लिखते हैं और मरीज ठीक भी होता है। लेकिन दवाइयों की एक तीसरी कैटेगरी या ग्रेड होती है, जिसे पीजी यानी प्रोपेगंडा कंपनी कहा जाता है। दवाई जिसमें कंपनी संचालक कमिशन का लालच देता है और मरीज को दवाई लिखने के लिए कहता है। कुछ डॉक्टरों ने बताया कि इस ग्रेड की दवाओं में पोटेंसी यानी क्षमता ही नहीं होती है। सबसे दुखद बात यह है कि पहले इन प्रोपेगंडा कंपनी का प्रतिशत 10 था, लेकिन अब यह बढ़कर 40 प्रतिशत हो गया है। अंदाजा लगा सकते हैं कि इस तरह की कितनी प्रोपेगंडा मेडिसिन बाजार में मिल रही होगी।
कैसे काम करती है प्रोपेगंडा कंपनियां : इंदौर के दवा बाजार के हमारे एक सूत्र ने बताया कि हिमाचल से लेकर पंजाब और महाराष्ट्र में दवाएं बनाने वाली ये प्रोपेगंडा कंपनियां किसी भी शहर में मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े कुछ लोगों की सूची तैयार करती है। सूची बनाकर इनसे संपर्क किया जाता है। मरीज को उनकी कंपनी की दवा देने पर कमिशन तय होता है। अब ये मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े कुछ लोगों मरीज को वही दवा देते हैं जिस पर उसे प्रोपेगंडा कंपनी की तरफ से भारी भरकम कमिशन मिलना है। यही वजह है कि कई बार ऐसी दवाई चुनिंदा दुकानों के सिवा कहीं भी चले जाओ, आपको नहीं मिलेगी। डॉक्टरों को कमिशन का लालच और दवा बनाने वाली कंपनी का मुनाफा। दोनों का गठजोड़ मिलकर मरीज की जान के साथ खिलवाड़ कर रहा है। ये एक बड़ा स्केंडल है।
क्यों नहीं मिलती किसी डॉक्टर की प्रिस्क्राइब्ड दवा कहीं भी?
डॉक्टर खुद बनवा रहे अपनी दवाइयां : अक्सर मरीज के सामने यह समस्या आती है कि किसी डॉक्टर की लिखी दवाएं पूरे शहर में कहीं नहीं मिलती हैं। ये दवाएं सिर्फ डॉक्टर के बताए गए मेडिकल स्टोर या खुद उनके क्लिनिक पर संचालित स्टोर पर ही मिलती हैं। इसके पीछे की बेहद चौंकाने वाली जानकारी वेबदुनिया को मिली है। सूत्रों के मुताबिक कुछ डॉक्टर खुद अपनी दवाइयां बनवा रहे हैं, इनकी दवाइयां कहीं नही मिलेगी, जो नाम बोलेंगे उस ब्रांड से दवाई बन जाएगी, अपने नाम से। यहां तक कि दवाइयों की एमआरपी भी डॉक्टर ही तय करते हैं। यहां तक कि कोई भी अपनी दवाई बनवा सकता है। सूत्रों ने वेबदुनिया को इंदौर के ऐसे डॉक्टरों के नाम भी बताए और दावा किया कि इन डॉक्टरों की लिखी दवाएं पूरे शहर में सिर्फ उन्हीं के पास मिलेगी और कहीं नहीं।
एमपी फार्मासिस्ट एसोशिएशन के जिलाध्यक्ष दीप मंडवानी ने वेबदुनिया को बताया कि हमारा एक ही मोटो हैं, जहां दवा मिल रही है, वहां फार्मासिस्ट होना चाहिए। लेकिन ऐसा हकीकत में हो नहीं रहा है। जब यहीं नियमों की अनदेखी हो रही है तो आप ही सोच लीजिए मरीजों को क्या और कौनसी दवाएं मिल रही होंगी। इसके बाद भी कोई मॉनिटरिंग नहीं है। मेडिकल और दवाओं के कारोबार में यह एक बहुत बड़ा लूप-होल है, जिसकी तरफ शासन का ध्यान नहीं है।
कैसे और कहां से चलती हैं प्रोपेगंडा मेडिसिन कंपनियां : मध्यप्रदेश में टेक्स ज्यादा लगता है, ऐसे में ज्यादातर प्रोपेगंडा मेडिसिन का उत्पादन हिमाचल प्रदेश के बद्दी, पंजांब में मोहाली, अमृतसर, जालधंर और महाराष्ट्र के कई शहरों में इस तरह की प्रोपेगंडा मेडिसिन की कंपनियां दवाएं बना रही हैं। बहुत कम लागत में बनने वाली इन बेअसर दवाओं को बाजार में खपाने के लिए देशभर के डॉक्टरों को कमिशन दिया जाता है। यह पूरा धंधा एमआर की मदद से चलता है। एमआर ही वो पुल है जो डॉक्टरों को इन दवाइयों के बारे में अवगत कराता है, जिसके बाद डॉक्टर मरीजों को वही दवाएं लिखते हैं।
ड्रग माफियाओं को नहीं लचर कानून से कोई डर : इस तरह की नकली, मिलावटी और तय मानकों पर नहीं बनी प्रोपेगंडा दवाइयां बनाने वाली कंपनियों को हकीकत में कानून का भी कोई डर नहीं है, इसलिए इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। दरअसल, भारत में नकली और मिलावटी दवाओं पर लगाम लगाने के लिए जो कानून बना है, वो बेहद लचर है। 2023 में इस कानून में बदलाव के बाद तो इससे ड्रग माफियाओं का काम और ज्यादा आसान हो गया।
क्या है ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट-1940 : भारत में औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम- 1940 (ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट- 1940) बनाया गया था। इस कानून के तहत किसी भी दवा का निर्माण, बिक्री और वितरण के लिए राज्य सरकार से ड्रग लाइसेंस लेना जरूरी है। दवाओं और कॉस्मेटिक्स प्रोडक्ट का सेफ्टी और क्वालिटी के तय मानकों पर खरा होना जरूरी है। इस कानून के तहत नकली, गलत ब्रांड वाली या खराब क्वालिटी वाली दवाइयों का निर्माण, बिक्री और डिस्ट्रिब्यूशन प्रतिबंधित है।
आजीवन कारावास : यदि नकली या मिलावटी दवाओं के कारण किसी रोगी की मृत्यु हो जाती है या उसे गंभीर शारीरिक चोट पहुंचती है तो दोषी व्यक्ति को आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती है।
25 लाख तक का जुर्माना : वहीं मिलावटी दवा बनाने या बिना लाइसेंस के दवा बनाने के मामले में 5 साल की सजा के बजाए अब नए संशोधन में 25 लाख तक का जुर्माना कर दिया गया है। अन्य मामलों में 7 साल तक की सजा का प्रावधान था, अब यह हटा लिया गया है। अब सिर्फ जान के नुकसान में ही दोषी को आजीवन कारावास की सजा हो सकती है।
संशोधन के बाद लचर हुआ कानून : भारत में नकली दवाइयों के कारोबार को बढ़ावा मिलने के पीछे की सबसे बड़ी वजह इसे लेकर तय कानून का लचर होना है। दरअसल, साल 2023 में इस कानून में संशोधन किया गया था। मिलावटी या बिना लाइसेंस के दवा बनाने के मामले में 5 साल की सजा के बजाए अब नए संसोधन में 25 लाख तक का जुर्माना कर दिया गया है। ऐसे में कई मामलों में ड्रग निर्माता जुर्माना देकर छूट जाता है।
QR Code का नियम: बता दें कि ड्रग्स कंट्रोल जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) ने नकली दवाओं के बाजार को खत्म करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। जिसके तहत 300 बड़ी दवाओं (जैसे डोलो, कालपोल, एलेग्रा आदि) के पत्तों और बोतलों पर यूनिक क्यूआर कोड लगाना अनिवार्य किया है।
क्या जानकारी मिलती है?: इस कोड को स्कैन करने पर दवा का जेनेरिक नाम, ब्रांड का नाम, मैन्युफैक्चरर की डिटेल, बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपायरी डेट की सही जानकारी मिलती है।
QR Code हूबहू कॉपी कर डाला: पश्चिम बंगाल और गुजरात जैसे राज्यों में पकड़े गए नकली दवाओं के जखीरे में देखा गया कि जालसाजों ने असली पत्तों की तरह दिखने वाले नकली पत्ते बनाए और उन पर क्यूआर कोड भी हूबहू कॉपी (Clone) कर दिए।
फर्जी वेबसाइट्स: कुछ मामलों में जब मरीज उस क्यूआर कोड को स्कैन करता है, तो वह कंपनी की असली वेबसाइट पर जाने के बजाय जालसाजों द्वारा बनाई गई किसी फर्जी (Fake) वेबसाइट पर ले जाता है, जहां लिखा होता है— "This is a Genuine Pack" (यह असली दवा है)। इससे मरीज धोखे में आ जाता है।
स्कैन न होना : बिहार और यूपी में कुछ ऐसी खबरें भी आईं जहां मेडिकल स्टोर्स पर रेड के दौरान कुछ ब्रांडेड दवाओं के क्यूआर कोड स्कैन ही नहीं हो रहे थे। ड्रग विभाग ने आशंका जताई कि जेनरिक या नकली दवाओं को महंगे ब्रांड के रैपर में पैक कर नकली क्यूआर कोड छाप दिए गए थे।
