मत उछालो बात अब घोटालों की
घोटाले तो सचमुच कहीं होते नहीं।
आम-जन का हुआ यह विश्वास दृढ़,
बात यह ही है सही, कही-अनकही।।
सौ बरस भी करते रहोगे खोज तो,
एक घोटाला न कहीं तुम पाओगे।
पीढ़ियां लग जाएंगी इस खोज में,
और फिर भी ढूंढते रह जाओगे।।
हमारी चिन्तनशील उदार न्याय व्यवस्था में,
हर जांच है एक बीस वर्षी योजना।
बस यही एक सजा है आरोपी अपराधी की,
इस अवधि में है उसे सोना मना।।
mgid
अब बदल दो नाम इन घोटालों का,
कहो इनको 'मार्जिनल एडजस्टमेंट'
ये (घोटाले) तो हैं बड़े पदों की कुर्सियों के पाए,
aniview
उन पदों की (प्रच्छ्न्न)' महिमा के एनलार्जमेंट'।।
सोचिए! यदि खत्म घोटाले हुए,
आमजन का जीवन-रस खो जाएगा।
वह अपनी बेबसी पर करने को प्रलाप,
इतना सुविधाजनक बहाना कहां पाएगा।।
ये घोटाले ही हमारी दैनिक उत्सुकता,
खीझ, निराशा, (नपुंसक) क्रोध के लिए मसाले हैं।
मनरेगा से पल रही झोपड़ियों के अंधेरे हैं,
रसूखधारियों की पीढ़ियों के उजाले हैं।।
(छोटी मछलियां ही फंसेंगी जाल में,
उनको तो सब भून कर खा जाएंगे।
बड़ी मछलियों का तो है समुन्दर पे राज,
पकड़ने वाले जाल ही फट जाएंगे।)