हिन्दी कविता: सवर्ण हैं हम
सवर्ण हैं हम
पर किसी सिंहासन पर बैठे हुए नहीं
हम भी उसी मिट्टी से बने हैं
जिससे पसीने की गंध आती है
जिसमें इतिहास की राख मिली है
और भविष्य की अनिश्चितता भी।
हमारे कंधों पर
अपराधों की वे गठरियां रख दी गई हैं
जो हमने किए ही नहीं
पर जिनका बोझ
हर नए दिन के साथ
हमारी संतानों की पुस्तकों में
अंकित कर दिया जाता है।
हम स्वीकारते हैं
कि समय के अंधे गलियारों में
अन्याय हुआ
घाव दिए गए
मानवता लहूलुहान हुई
उन पीड़ाओं से
हम कभी मुख नहीं मोड़ते
न ही उन्हें नकारते हैं।
पर क्या अपराध की वंशानुगत सजा
किसी नए समाज की नींव बन सकती है
क्या कल के अन्याय का प्रतिशोध
आज के विवेक को निगल जाना चाहिए
क्या सुधार की राह
घृणा की बैसाखी पर चल सकती है।
हमें गालियां दी जाती हैं
मानो हम मनुष्य नहीं
केवल एक पहचान हों
जिसे अपमानित करना
अब नैतिक साहस कहलाता है
और मौन रहने को
हमारी सहमति मान लिया जाता है।
राजनीति के कठपुतली मंच पर
हम धीरे धीरे
हाशिए पर सरका दिए गए हैं
हमारे अधिकार
मतपेटियों की गणना में
अनावश्यक ठहरा दिए गए हैं
और नियम पुस्तिकाओं में
हमें पहले ही दोषी मान लिया गया है।
हम न तो विशेषाधिकार का शोर चाहते हैं
न किसी के हक का अपहरण
हम केवल यह कहते हैं
कि न्याय का पलड़ा
इतिहास से नहीं
विवेक से तौला जाए।
हमें दया नहीं चाहिए
हमें अपराधी भी मत ठहराइए
हमें केवल
एक मनुष्य की तरह देखिए
जिसकी पीड़ा
भी उतनी ही सच्ची है
जितनी किसी और की।
सवर्ण हैं हम
पर सबसे पहले
इंसान हैं हम
यदि समाज को सचमुच आगे बढ़ना है
तो घावों की गिनती नहीं
घाव भरने की भाषा सीखनी होगी।
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लेखक के बारे में
सुशील कुमार शर्मा