माफिया के आगे बेबस खाकी, कानून का राज या गुंडाराज?
जब अपराधी पुलिस को चुनौती देने लगें, पुलिस अधिकारियों को ट्रक और ट्रैक्टर से कुचलकर मारने का दुस्साहस करें, तब सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, सत्ता, संरक्षण और व्यवस्था के चरित्र का भी होता है।
किसी प्रदेश की कानून-व्यवस्था का आकलन इस बात से नहीं होता कि पुलिस कितने अपराध दर्ज कर रही है, कितने चालान काट रही है या कितने अपराधियों को गिरफ्तार कर रही है। असली कसौटी यह है कि अपराधी कानून से कितना डरता है और कानून लागू करने वाली वर्दी का कितना सम्मान करता है।
जब शराब माफिया, खनन माफिया, रेत माफिया, ड्रग्स माफिया और भू-माफिया पुलिस को भी कुछ नहीं समझने लगें, तब समझ लेना चाहिए कि समस्या केवल अपराधियों की बढ़ती संख्या नहीं है, कहीं न कहीं व्यवस्था के भीतर भी कुछ ऐसा है, जिसने अपराधियों को निर्भीक और कानून को असहाय बना दिया है। ALSO READ: देवास में शराब तस्करों ने टीआई दिलीप पुरी को ट्रक से रौंदा, अस्पताल में तोड़ा दम, आरोपी ट्रक ड्राइवर फरार
इसी तरह राज्य के मुरैना जिले में आईपीएस नरेंद्र सिंह की ट्रैक्टर से कुचलकर हत्या ने यह सवाल खड़ा किया था कि अवैध खनन के कारोबार में लगे लोगों के हौसले आखिर इतने बुलंद कैसे हो जाते हैं कि वे कानून के प्रतिनिधियों की जान लेने से भी नहीं हिचकते?
वन विभाग, राजस्व विभाग और पुलिस के अधिकारियों-कर्मचारियों पर हमले, उन्हें कुचलने के प्रयास और सरकारी कार्रवाई का हिंसक प्रतिरोध कोई सामान्य घटनाएं नहीं हैं। ये उस समानांतर सत्ता के संकेत हैं, जो कानून से ऊपर होने का भ्रम पाल बैठी है। और यह भ्रम अचानक पैदा नहीं होता। ALSO READ: देवास में शराब तस्करों के हाथों जान गंवाने वाले टीआई के परिजनों को एक करोड़ रुपए की सहायता, पत्नी को SI के पद पर मिलेगी नौकरी
जब शराब माफिया, खनन माफिया, रेत माफिया, ड्रग्स माफिया और भू-माफिया पुलिस को भी कुछ नहीं समझने लगें, तब समझ लेना चाहिए कि समस्या केवल अपराधियों की बढ़ती संख्या नहीं है, कहीं न कहीं व्यवस्था के भीतर भी कुछ ऐसा है, जिसने अपराधियों को निर्भीक और कानून को असहाय बना दिया है। ALSO READ: देवास में शराब तस्करों ने टीआई दिलीप पुरी को ट्रक से रौंदा, अस्पताल में तोड़ा दम, आरोपी ट्रक ड्राइवर फरार
पुलिस की हत्या, कानून के इकबाल की हत्या
देवास जिले के खातेगांव में शराब माफियाओं द्वारा तत्कालीन थाना प्रभारी दिलीप पुरी को ट्रक से कुचलकर मार डालने की घटना केवल एक पुलिस अधिकारी की हत्या नहीं थी, वह उस व्यवस्था के मुंह पर तमाचा था, जिसके हाथों में कानून लागू करने की जिम्मेदारी है।इसी तरह राज्य के मुरैना जिले में आईपीएस नरेंद्र सिंह की ट्रैक्टर से कुचलकर हत्या ने यह सवाल खड़ा किया था कि अवैध खनन के कारोबार में लगे लोगों के हौसले आखिर इतने बुलंद कैसे हो जाते हैं कि वे कानून के प्रतिनिधियों की जान लेने से भी नहीं हिचकते?
मुरैना से देवास तक... मौत के तरीके बदलते हैं, माफिया का दुस्साहस नहीं!
मध्य प्रदेश में पुलिस और प्रशासन पर माफिया के हमले कोई नई घटना नहीं हैं। प्रदेश का इतिहास ऐसे दर्दनाक उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिनमें कानून लागू करने की कोशिश करने वाले अधिकारी अपनी जान गंवा बैठे।- 8 मार्च 2012 को मुरैना में युवा आईपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार सिंह को अवैध पत्थर खनन रोकने के दौरान ट्रैक्टर-ट्रॉली से कुचलकर मार दिया गया। एक युवा अधिकारी, जिसके पास कानून लागू करने की जिम्मेदारी थी, खनन माफिया के दुस्साहस का शिकार हो गया।
- इसी वर्ष भिंड में शराब माफिया से जुड़े लोगों ने पुलिस अधिकारी जयदेवन और उनके दल पर हमला किया। पन्ना में अवैध रेत उत्खनन की जांच करने पहुंचे SDM, SDOP और पुलिस दल पर गोलियां चलाई गईं।
- 2015 में मुरैना में अवैध रेत परिवहन रोकने के दौरान आरक्षक धर्मेंद्र सिंह चौहान को डंपर से कुचलकर मार दिया गया।
- 2016 में ग्वालियर में वनरक्षक नरेंद्र शर्मा की अवैध रेत ले जा रही ट्रैक्टर-ट्रॉली की चपेट में आने से मौत हुई।
- नवंबर 2023 में शहडोल में अवैध रेत उत्खनन रोकने गए पटवारी प्रसन्न सिंह बघेल को ट्रैक्टर से कुचलकर मार दिया गया।
- मई 2024 में इसी क्षेत्र में रेत से लदे ट्रैक्टर की चपेट में आने से ASI महेंद्र बागड़ी की मौत का मामला सामने आया।
- और अप्रैल 2026 में मुरैना में वनरक्षक हरिकेश गुर्जर की ट्रैक्टर-ट्रॉली से कुचलकर हत्या कर दी गई।
मौत के तरीके बदलते रहे। ट्रैक्टर, ट्रक, डंपर और गोलियां... लेकिन कानून को चुनौती देने का दुस्साहस नहीं बदला।
यह केवल कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की हत्याओं का विवरण नहीं है। यह उस समानांतर सत्ता का इतिहास है, जो अवैध कारोबार के बल पर कानून को चुनौती देने की कोशिश करती रही है।
पुलिस पर हमले का आंकड़ा... क्या यह सामान्य स्थिति है?
मध्य प्रदेश विधानसभा में अगस्त 2025 में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, जनवरी 2024 से जून 2025 के बीच पुलिसकर्मियों पर हमले की 461 घटनाएं दर्ज हुईं। इन हमलों में 612 पुलिसकर्मी घायल हुए और पांच की मृत्यु हुई।
यह आंकड़ा अपने आप में एक गंभीर चेतावनी है। यदि डेढ़ वर्ष में सैकड़ों पुलिसकर्मियों पर हमले हों, कई घायल हों और कुछ अपनी जान गंवा दें, तो सवाल केवल अपराध नियंत्रण का नहीं रह जाता। सवाल यह भी है कि कानून लागू करने वालों की सुरक्षा और सम्मान की गारंटी कौन देगा?
एक पुलिसकर्मी जब अपराधी को गिरफ्तार करने जाता है, तो उसे यह भरोसा होना चाहिए कि उसके पीछे पूरा पुलिस विभाग, प्रशासन और सरकार खड़ी है। यदि यही भरोसा कमजोर हो जाए, तो अपराधियों के हौसले बढ़ना स्वाभाविक है।
माफिया की ताकत केवल उसके हथियारों में नहीं होती
माफिया के पास पैसा होता है, संसाधन होते हैं, गुर्गे होते हैं और हिंसा करने की क्षमता होती है। लेकिन उसका सबसे बड़ा हथियार अक्सर उसका राजनीतिक संपर्क होता है।
जब किसी अपराधी को यह भरोसा हो जाए कि उसके पीछे कोई नेता खड़ा है, किसी मंत्री का फोन उसके लिए ढाल बन सकता है और किसी कार्रवाई को राजनीतिक दबाव से रुकवाया जा सकता है, तब कानून का डर धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
अपराधी यह समझने लगता है कि उसका अपराध ही उसकी ताकत नहीं, बल्कि उसके अपराध के बावजूद बच निकलने की क्षमता उसकी असली ताकत है।
यहीं से जन्म लेता है माफियाराज।
यह आरोप किसी एक दल, सरकार या व्यक्ति तक सीमित नहीं होना चाहिए। सत्ता किसी भी दल की हो, यदि उसके संरक्षण में अपराध फलता-फूलता है तो वह लोकतंत्र के लिए खतरा है। राजनीतिक संरक्षण का प्रश्न केवल आरोपों से नहीं, निष्पक्ष जांच और जवाबदेही से तय होना चाहिए। लेकिन इस सवाल से बचा भी नहीं जा सकता कि अवैध कारोबार करने वाले इतने निश्चिंत आखिर किस भरोसे पर होते हैं?
भ्रष्टाचार: अपराधियों के लिए सबसे मजबूत सुरक्षा कवच
पुलिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार अपराधियों के हौसले बढ़ाने वाला सबसे बड़ा कारक बन सकता है।यदि अपराधी को पता है कि पैसा देकर कार्रवाई टाली जा सकती है, सूचना पहले ही मिल सकती है, जांच प्रभावित की जा सकती है और गिरफ्तारी के बाद भी बच निकलने के रास्ते हैं, तो कानून उसके लिए भय नहीं, सौदेबाजी का विषय बन जाता है।
यह स्थिति पुलिस के ईमानदार अधिकारियों के लिए भी घातक है। वे अपराधियों से ही नहीं, कई बार व्यवस्था के भीतर मौजूद दबावों से भी लड़ते हैं।
एक ईमानदार थाना प्रभारी की ताकत केवल उसकी पिस्तौल नहीं होती। उसकी ताकत यह भरोसा होता है कि उसके पीछे पूरी व्यवस्था खड़ी है। यदि यही भरोसा कमजोर हो जाए तो वर्दी पहनने वाला अधिकारी अकेला पड़ जाता है और वर्दी का सम्मान धीरे-धीरे भय के बजाय औपचारिकता बनकर रह जाता है।
वर्दी का इकबाल लौटाना होगा
पुलिस का इकबाल होना चाहिए। अपराधियों की इतनी औकात नहीं होनी चाहिए कि वे पुलिस पर हाथ डालने का दुस्साहस करें। लेकिन इकबाल का अर्थ केवल कठोरता, गोली या एनकाउंटर नहीं है। पुलिस का वास्तविक इकबाल उसकी निष्पक्षता, कानूनसम्मत कार्रवाई, राजनीतिक दबाव से मुक्त निर्णय और अपराधी को निश्चित सजा दिलाने की क्षमता में होता है।
जो पुलिस निर्दोष को प्रताड़ित करे, कमजोर पर रौब जमाए और प्रभावशाली अपराधी के सामने विवश हो जाए, उसका इकबाल नहीं हो सकता।
वर्दी का सम्मान तभी स्थापित होगा, जब पुलिस को अपराधियों से निपटने के लिए पर्याप्त अधिकार और संसाधन मिलें, साथ ही उसके दुरुपयोग पर भी कठोर जवाबदेही तय हो।
अपराधी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, पुलिस अधिकारी पर हमला करने का अर्थ केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि राज्य की कानून लागू करने की क्षमता को चुनौती देना है। ऐसे मामलों में त्वरित, निष्पक्ष और कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
सवाल सरकार से भी है, पुलिस नेतृत्व से भी
सरकार को यह तय करना होगा कि वह माफिया के साथ खड़ी है या कानून के साथ। पुलिस नेतृत्व को यह सुनिश्चित करना होगा कि ईमानदार अधिकारी राजनीतिक दबाव में अकेले न पड़ें। प्रशासन को यह साबित करना होगा कि अवैध खनन, शराब और ड्रग्स का कारोबार किसी राजनीतिक संपर्क की आड़ में सुरक्षित नहीं रह सकता।
और सबसे जरूरी, पुलिसकर्मियों पर हमला करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई केवल घटना के बाद गिरफ्तारी तक सीमित न रहे। ऐसी घटनाओं में न्यायिक प्रक्रिया तेज हो, अभियोजन मजबूत हो और दोषियों को सजा मिले।
क्योंकि अपराधी को केवल गिरफ्तार करना पर्याप्त नहीं है। उसे यह संदेश भी मिलना चाहिए कि कानून से टकराने की कीमत चुकानी पड़ेगी।
अंततः सवाल यही है...
यदि शराब माफिया पुलिस अधिकारी को ट्रक से कुचल सकता है, खनन माफिया आईपीएस अधिकारी को ट्रैक्टर से मार सकता है और अवैध कारोबार करने वाले सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने से नहीं डरते, तो यह केवल अपराधियों की निर्भीकता नहीं, व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
जिस प्रदेश में अपराधी पुलिस से नहीं डरता, वहां आम नागरिक किससे सुरक्षा की उम्मीद करेगा?
पुलिस का इकबाल लौटाना केवल पुलिस विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। यह सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासन की निष्पक्षता, न्याय व्यवस्था की गति और समाज के कानून के प्रति विश्वास का संयुक्त प्रश्न है।
वर्दी का सम्मान भाषणों से नहीं, कार्रवाई से स्थापित होता है। माफिया का आतंक बुलडोजर के प्रदर्शन से नहीं, कानून के निष्पक्ष और निरंतर प्रवर्तन से समाप्त होता है।
अपराधी को यह भरोसा नहीं होना चाहिए कि सत्ता उसके पीछे है। उसे यह भरोसा होना चाहिए कि कानून उसके सामने है।
यही कानून का राज है। यही लोकतंत्र का इकबाल है। और यही वह व्यवस्था है, जिसमें किसी पुलिस अधिकारी की वर्दी अपराधी के सामने नहीं, बल्कि कानून के सामने सिर झुकाती है।
क्योंकि अंततः वर्दी का इकबाल ही नागरिक के विश्वास का इकबाल है।

