बीएमडब्ल्यू से टैक्सी तक: क्या गोविंदा सच में गिर गए हैं, या हम ही छोटे हो गए हैं?
बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज, फ्लैश लाइट्स और हजारों लोगों की भीड़, गोविंदा को हमने हमेशा इसी फ्रेम में देखा है। 90 के दशक का वह सुपरस्टार, जिसकी एक मुस्कान पर सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में सीटियां गूंज उठती थीं। लेकिन वक्त के साथ फ्रेम बदला और उसी के साथ बदली हमारी नजर।
इन दिनों गोविंदा कुछ छोटे शहरों में शादियों और निजी कार्यक्रमों में नाचते नजर आए। कुछ तस्वीरें सामने आईं, जिनमें वे किसी आम टैक्सी या साधारण कार में बैठे दिखे। बस यहीं से सोशल मीडिया की अदालत सज गई। फैसले सुनाए गए: “स्टार गिर गया”, “अब मामूली कार्यक्रमों में नाच रहा है”, “कभी लग्ज़री कारों में घूमता था, अब ये हाल है।”
लेकिन सवाल यह है कि क्या गोविंदा सच में नीचे आ गए हैं, या हम अब भी उन्हें एक जमी हुई छवि में कैद रखना चाहते हैं?
गोविंदा एक अभिनेता हैं, एक डांसर हैं, एक परफॉर्मर हैं। उनका काम है लोगों का मनोरंजन करना। अगर वे आज भी नाच रहे हैं, तालियां बटोर रहे हैं और अपनी कला से कमाई कर रहे हैं, तो इसमें अपमान कहां है? क्या मंच का आकार ही कलाकार की हैसियत तय करता है?
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यह विडंबना ही है कि एक तरफ हम उन सितारों को सम्मान देते हैं जो गुटका, शराब या ऑनलाइन सट्टा ऐप के विज्ञापन कर करोड़ों रुपये कमा रहे हैं, और दूसरी तरफ एक कलाकार को इसलिए नीचा दिखाते हैं क्योंकि वह अपनी असली कला और परफॉर्मेंस से पैसा कमा रहा है।
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गोविंदा का यह दौर शायद ग्लैमर से ज्यादा ईमानदारी का है। न कोई झूठी छवि, न दिखावे की जरूरत। छोटे शहर, सीमित भीड़ और सीधा संवाद यह वह जगह है जहां कलाकार और दर्शक के बीच कोई पर्दा नहीं होता।
दरअसल, यह कहानी गोविंदा की नहीं, हमारे समाज की है। हम सितारों से उम्मीद करते हैं कि वे हमेशा ऊंचे रहें, चाहे उनकी जिंदगी किसी भी मोड़ पर हो। हम उन्हें इंसान नहीं, एक शोपीस मान लेते हैं, जो हमेशा चमकता रहे।
लेकिन जिंदगी कभी भी सीधे रास्ते पर नहीं चलती। आज अगर गोविंदा साधारण कार में हैं, तो वह उनकी असफलता नहीं, बल्कि उनकी स्वतंत्रता भी हो सकती है कि उन्हें अब किसी छवि को ढोने की मजबूरी नहीं।
हो सकता है कि यही असली स्टारडम हो जहां तालियां कम हों, लेकिन आत्मसम्मान पूरा हो। जहां कैमरे कम हों, लेकिन आईने में नजरें झुकी न हों।