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कविता : उमड़-घुमड़कर बरसे बादल
फैला बादल दल, गगन पर मस्ताना, सूखी धरती भीगकर मुस्काई। मटमैले पैरों से हल जोत रहा, कृषक थका गाता पर उमंग भरा। 'मेघा ... -
भारत देश पर कविता : गुदड़ी का लाल
क्या भारत मेरा देश नहीं है? क्या मैं भारत का लाल नहीं हूं? क्यों तन पर चिथड़े हैं मेरे? क्यों मन मेरा रीता उदास है? ... -
लता जी की यादों में खोई गीतकार पं. नरेंद्र शर्मा की बेटी लावण्या शाह
दीदी (लता मंगेशकर) ने अपनी संगीत के क्षेत्र में मिली हर उपलब्धि को सहजता से स्वीकार किया है और उसका श्रेय हमेशा परम ... -
प्रवासी साहित्य : गुंजित पुरवाई...
खिले कंवल से, लदे ताल पर, मंडराता मधुकर, मधु का लोभी। गुंजित पुरवाई, बहती प्रति क्षण, चपल लहर, हंस, संग-संग हो ली। -
बारिश पर प्रवासी कविता : पाहुन...
उमड़-घुमड़कर बरसे, तृप्त हुई, हरी-भरी, शुष्क धरा। बागों में खिले कंवल-दल, कलियों ने ली मीठी अंगड़ाई। फैला बादल दल, गगन ... -
प्रवासी साहित्य : क्या तुम्हें एहसास है?
क्या तुम्हें एहसास है अनगिनत उन आंसुओं का? क्या तुम्हें एहसास है सड़ते हुए नरकंकालों का? क्या तुम्हें आती नहीं आवाज, ... -
प्रवासी साहित्य : गुदड़ी का लाल...
मैं अधजागा, अधसोया क्यों हूं? मैं अब भी भूखा-प्यासा क्यों हूं? क्या भारत मेरा देश नहीं है? क्या मैं भारत का लाल नहीं ... -
प्रवासी साहित्य : मौन में संगीत...
कुहासे से ढंक गया सूरज, आज दिन, ख्वाबों में गुजरेगा। तन्हाइयों में बातें होंगी, शाखें सुनेंगी, नगमे, गम के, गुलों के ... -
हिन्दी में प्रवासी साहित्य : सौगात...
जिस दिन से चला था मैं, वृंदावन की सघन घनी, कुंज-गलियों से, राधे, सुनो तुम मेरी मुरलिया, फिर ना बजी, किसी ने तान वंशी की ... -
प्रवासी कविता : आषाढ़ की रात...
मध्यरात्रि ही लगेगी, आज पूरी रातभर में, आह! ये, आषाढ़ की बरसाती रात है। ऊपर गगन से जल, नीचे धरा पर टूटता जोड़ देता, ... -
प्रवासी कविता : याद तुम्हारी...
जब काली रात बहुत गहराती है, तब सच कहूं, याद तुम्हारी आती है। जब काले मेघों के तांडव से, सृष्टि डर-डर जाती है, तब ... -
प्रवासी साहित्य : स्मृति दीप...
भग्न उर की कामना के दीप, तुम कर में लिए मौन, निमंत्रण, विषम, किस साध में हो बांटती? है प्रज्वलित दीप, उद्दीपित करों ...
