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महायुद्ध पर कविता: सुलग रहा संसार है
सुलग रहा संसार क्यों अब और छाया हा हकार है पल में बदलेगी किसकी दुनिया इसका ना कोई ऐतबार है हो रही रक्त रंजित धरा आसमां ... -
प्रवासी कविता: फ़रिश्ते
ज़िंदगी में कई इंसान ऐसे मिल जाते हैं जो इंसा ही नहीं फरिश्तों सा फ़र्ज़ निभाते हैं बहुत कठिन होता है आंखों के आंसू को ... -
पहलगाम हमले पर प्रवासी कविता : निःशब्द
शब्द हुए हैं खामोश, इस मंजर को देखकर कल्पांत कर रही आत्मा इस करुण बेबस अनजान पर खून खौलता है हर हिंदुस्तानी का मन ... -
प्रवासी कविता : मां सरस्वती
हे मां तेरी महिमा मैं क्या बखानू तू तो है मां जगतदात्री, हम सब अज्ञानी बालक तुझको मां हम शीश नवाते है, करते हैं ... -
प्रवासी कविता : कवयित्री की जिंदगी की किताब के कुछ पन्ने
जिंदगी की अधूरी किताब से चुराए कुछ पन्ने एक कवयित्री ने, और छुपाकर रख दिया उन्हें मन के किसी कोने में, जब होती है ... -
प्रवासी कविता : बेटियां
आसमां को छू जाना है, उन हवाओं में खो जाना है, वो भीनी-सी सुगंध संग बहती है, सुगंधित हवाएं उस बचपन के अनोखे आलम में ख़ुद ... -
होली के त्योहार पर प्रवासी कविता : कान्हा होली खेले राधा संग
ऋतु राज वसंत और महीना हुआ फागुन टेसुओं का बरसे रंग और बृज में खेलें कान्हा होली राधा के संग मन मयूर नाचे छम छम ... -
प्रवासी कविता : वंदे मातरम
कविता : एक कंपन सी हो जाती है, एक लहरी सी उठ जाती है, जब-जब देखूं मां भारती तेरी तस्वीर, हृदय वीणा झंकृत सी हो जाती है, ... -
प्रवासी कविता : अगले जनम तक
जैसे लहरें बातें करते आईं हैं किनारों से आज तक, दिवा स्वप्न था बैठे थे पास पास और मूंदी (बंद) आंखों से, सपने संजोने लग ... -
हिन्दी कविता : मेरे कृष्ण-कन्हैया, बंशी बजैया
वो सपने सुनहरे भविष्य के हमने, किस आस पर किस सहारे पे देखे। वो शक्ति वो प्रेरणा आपकी थी, एक हारे हुए मन का बल आपसे था। ... -
पन्द्रह अगस्त पर कविता : आजादी का पावन पर्व
Poem on 15 August कहते थे बरसों पहले तुम हैं हिन्दी-चीनी भाई-भाई, फिर सीमा पर चुपके-चुपके किसने थी आग लगाई। फेंगशुई का ... -
प्रवासी कविता : मेरी भारत माता
मेरी भारत माता याद तो बहुत आती है, आंखें भी भर जाती हैं, दूर हूं तुझसे इतनी कि तेरी, सीमा भी नजर न आती है, तू तो ... -
रूस-यूक्रेन वॉर पर कविता : युद्ध
भरा आकाश और नभ मंडल बारूद और धुएं की बौछार है, सिसक रही मानवता ये कैसा नरसंहार है, जहां थी तारों की लड़ियां वहां बमों ... -
National Girl Child Day: घर आई नन्ही-सी कली
सुंदर, नाजुक, कोमल-कोमल, मानो कोई खिली थी नन्ही-सी कली, देख-देख मैं मन ही मन खुश होती लहराती मेरे मन की बगिया -
happy global parents day पर कविता : माता-पिता के चरणों में...
जिनके साथ बचपन में खेला, जिनसे सुनी लोरियां मैंने, जिनका साया छांव थी मेरी -
Republic Day Poem : भारत माता हम सबकी जान है
तू तो रही है सदा से आरजू मेरी मेरी भारत माता तू तो बसी है मेरे मन में पर क्या करूं यहां से तुझे न देखा जाता -
बेटी पर कविता : मेरे जीवन की बगिया महका दी
जीवन ज्योत जल जाती मानो तेरे आने से, लोग मुस्कुराते थे मेरे इतराने से -
24 January Girl Child Day poem: घर आई मेरी नन्ही परी
सुंदर, नाजुक, कोमल-कोमल मानो कोई खिली थी नन्ही-सी कली देख-देख मैं मन ही मन खुश होती लहराती मेरे मन की बगिया -
मकर संक्रांति पर प्रवासी कविता : पतंग, पंछी और मेहमाननवाजी
आई खिचारहाई कहीं देश के एक कोने में कहते लोग इसे खिचारहाई, कहीं कहते मकर संक्रांति तो कहीं पतंगबाजी के लिए होती इसमें ... -
प्रवासी कविता : जगमगाते दीयो का संदेश...
दिन ढला हो गई रात लो आई सुबह नई वक्त सदा चलता ही रहता बिना कोई विश्राम लिए
