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22 जुलाई 2026: आषाढ़ की भड़ली नवमी पर महा अबूझ मुहूर्त, इसके बाद 4 महीने तक थमेगी शहनाइयां
हिंदू धर्म और पंचांग में शुभ कार्यों के लिए सही समय यानी 'मुहूर्त' का बहुत महत्व होता है। लेकिन साल में कुछ दिन ऐसे भी आते हैं, जब आपको किसी पंडित जी से पूछने या पंचांग देखने की जरूरत नहीं होती। ऐसा ही एक महा-मुहूर्त इस साल 22 जुलाई 2026 को आ रहा है। यह दिन भड़ली नवमी का है, जो अपने आप में एक 'अबूझ मुहूर्त' है। इसके ठीक बाद देवशयनी एकादशी से चातुर्मास शुरू हो जाएगा और अगले 4 महीनों के लिए सभी मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाएगा।
1. क्या है भड़ली नवमी और इसका महत्व?
हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भड़ली नवमी (या भडल्या नवमी) कहा जाता है। इसी पावन दिन पर आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का समापन भी होता है।
धार्मिक दृष्टिकोण से इस तिथि को बेहद पवित्र और दोषमुक्त माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन ग्रहों की स्थिति इतनी अनुकूल होती है कि पूरे 24 घंटे का समय हर तरह के शुभ काम के लिए सर्वोत्तम बन जाता है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई ग्रह दोष हो या शादी-ब्याह के लिए सामान्य दिनों में मुहूर्त न निकल रहा हो, तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के इस दिन अपना कार्य कर सकते हैं।
2. भड़ली नवमी (अबूझ मुहूर्त) पर कौन-कौन से कार्य किए जा सकते हैं?
अबूझ मुहूर्त का अर्थ ही है- असीम शुभता। इस दिन आप नीचे दिए गए सभी मांगलिक और व्यावहारिक कार्य बिना संकोच के संपन्न कर सकते हैं।
विवाह और सगाई: यदि किसी के विवाह के लिए कुंडली के मिलान में दिक्कत आ रही हो या कोई अन्य अड़चन हो, तो इस दिन शादी करना अत्यंत शुभ और सुखद दाम्पत्य जीवन देने वाला माना जाता है।
गृह प्रवेश: नए घर में प्रवेश करने या नए कार्यालय/दुकान का उद्घाटन करने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ दिन है।
मुंडन और जनेऊ संस्कार: बच्चों का मुंडन संस्कार या यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने जैसे धार्मिक कार्य इस दिन निर्विघ्न पूरे होते हैं।
वाहन और संपत्ति की खरीदारी: नया वाहन खरीदना, नया मकान या प्लॉट बुक करना, या सोने-चांदी के गहने खरीदना इस दिन समृद्धि लाता है।
नया व्यापार या निवेश: अगर आप कोई नया बिजनेस शुरू करना चाहते हैं या कोई बड़ा वित्तीय निवेश करने जा रहे हैं, तो भड़ली नवमी का दिन आपको सफलता दिलाएगा।
3. इसके बाद 4 महीने तक क्यों नहीं होंगे मांगलिक कार्य?
भड़ली नवमी के तुरंत बाद देवशयनी एकादशी आती है, जिससे चातुर्मास (चार पवित्र महीने) की शुरुआत होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इन चार महीनों में भगवान विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में चले जाते हैं। सृष्टि के पालनहार के शयनकाल में रहने के कारण सभी प्रकार के मांगलिक और मांगलिक कार्य जैसे विवाह, जनेऊ और गृह प्रवेश पूरी तरह वर्जित हो जाते हैं। अब सीधे देवउठनी एकादशी (कार्तिक मास) पर भगवान के जागने के बाद ही शहनाइयाँ दोबारा गूँजेंगी। इसलिए, चातुर्मास से पहले भड़ली नवमी मांगलिक कार्यों के लिए आखिरी और सबसे बड़ा अवसर है।
4. वर्ष में कितने अबूझ मुहूर्त होते हैं और ये कब-कब आते हैं?
हिंदू संस्कृति में वर्षभर में मुख्य रूप से 4 अबूझ मुहूर्त (जिन्हें स्वयंसिद्ध मुहूर्त भी कहा जाता है) माने गए हैं। इन दिनों में बिना पंचांग देखे कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। ये चारों इस प्रकार हैं:
पहला अबूझ मुहूर्त: अक्षय तृतीया (आखा तीज)
यह वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आती है (आमतौर पर अप्रैल या मई के महीने में)। इसे साल का सबसे बड़ा अबूझ मुहूर्त माना जाता है। इस दिन दान-पुण्य और सोने की खरीदारी का विशेष महत्व है।
दूसरा अबूझ मुहूर्त: देवउठनी एकादशी
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवउठनी एकादशी कहते हैं (आमतौर पर नवंबर में)। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की निद्रा के बाद जागते हैं और इसी दिन से देश में शादियों का सीजन फिर से शुरू हो जाता है।
तीसरा अबूझ मुहूर्त: वसंत पंचमी
माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को वसंत पंचमी मनाई जाती है (आमतौर पर जनवरी या फरवरी में)। यह ज्ञान की देवी मां सरस्वती का दिन है और विद्यारंभ, कला, संगीत और विवाह के लिए बेहद शुभ अबूझ मुहूर्त माना जाता है।
चौथा अबूझ मुहूर्त: भड़ली नवमी
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आने वाली भड़ली नवमी (आमतौर पर जून या जुलाई में) साल का आखिरी अबूझ मुहूर्त होती है। इसके बाद चातुर्मास लगने के कारण लोग इस दिन अपने छूटे हुए सभी जरूरी मांगलिक कार्य जल्द से जल्द पूरे कर लेते हैं।
नोट: कुछ क्षेत्रों में दशहरा यानी विजयादशमी को भी अबूझ मुहूर्त के रूप में माना जाता है, लेकिन मुख्य रूप से ऊपर दिए गए चार ही सबसे बड़े स्वयंसिद्ध मुहूर्त स्वीकार किए गए हैं।
