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Last Updated : शनिवार, 23 मई 2026 (11:24 IST)

Adhik Maas Purnima 2026: अधिकमास की पूर्णिमा कब है, क्या है इसका महत्व?

The image shows a pilgrimage site, the full moon, devotees performing aarti on the river bank, a water-filled pot placed near Shrihari Narayan, offerings, burning lamps, flowers, garlands and puja materials, with the caption Adhik Maas Purnima 2026
Purushottam Maas significance: वर्ष 2026 में ज्येष्ठ अधिकमास (मलमास) लगने के कारण इस महीने की पूर्णिमा का महत्व कहीं अधिक बढ़ गया है। अधिकमास की पूर्णिमा को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में अधिकमास की पूर्णिमा तिथि 31 मई 2026, रविवार को पड़ रही है।ALSO READ: Purushottam Maas: अधिकमास में ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा, मिलेगा अक्षय पुण्य
 
पूर्णिमा का दिन, यानी पूर्णिमा तिथि, इस महीने में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। क्योंकि अधिकमास की पूर्णिमा में किए गए कर्म और पूजा का फल कई गुना माना जाता है। भक्तजन इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु और अन्य देवताओं की आराधना करते हैं। विशेष रूप से, ज्येष्ठ माह का यह समय धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान की गई पूजा और दान का महत्व बहुत अधिक होता है। इसलिए, यदि आप आध्यात्मिक लाभ और धार्मिक पुण्य की दृष्टि से अपने जीवन को समृद्ध बनाना चाहते हैं, तो अधिकमास की पूर्णिमा और पुरुषोत्तम मास को अवश्य याद रखें।

  • अधिकमास की पूर्णिमा कब है? जानें तारीख और मुहूर्त
  • अधिकमास पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
  • अधिकमास की पूर्णिमा – FAQs

आइए जानते हैं इसकी सही तारीख, मुहूर्त और धार्मिक महत्व:

 

अधिकमास की पूर्णिमा कब है? जानें तारीख और मुहूर्त

 
अधिक पूर्णिमा व्रत-उपवास का दिन, शनिवार, 30 मई, 2026 को
ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा उपवास के दिन चन्द्रोदय का समय - 06:40 पी एम पर।
 

अधिक पूर्णिमा रविवार, 31 मई, 2026 को

ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा तिथि का प्रारम्भ- 30 मई, 2026 को 11:57 ए एम बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त- 31 मई, 2026 को 02:14 पी एम बजे
उदयातिथि के अनुसार व्रत, स्नान और दान 31 मई को ही किया जाएगा।
ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा के दिन चन्द्रोदय- 07:36 पी एम
 

अधिकमास पूर्णिमा का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में सामान्य पूर्णिमा का भी विशेष महत्व होता है, लेकिन जब पूर्णिमा अधिकमास या पुरुषोत्तम मास में आती है, तो इसका फल कई हजार गुना बढ़ जाता है:
 
भगवान विष्णु की असीम कृपा: अधिकमास के स्वामी स्वयं भगवान विष्णु हैं। इसलिए इस पूर्णिमा पर श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
 
'मल' से 'पावन' होने का दिन: मलमास को अशुद्ध मास माना जाता है, लेकिन पूर्णिमा की तिथि इस पूरे महीने के दोषों को दूर कर देती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
 
अक्षय पुण्य और लक्ष्मी योग: इस दिन माता लक्ष्मी की साधना करने से 'अचल लक्ष्मी' यानी स्थिर धन की प्राप्ति होती है। रविवार का संयोग होने के कारण इस दिन सूर्य देव की पूजा करने से मान-सम्मान और आरोग्य की प्राप्ति भी होगी।
 
पुण्य की वृद्धि: इस दिन किए गए धार्मिक कार्य (दान, पूजा, जप, उपवास) का फल सामान्य पूर्णिमा की तुलना में कई गुना माना जाता है।
 
दान-पुण्य का महत्व: विशेष रूप से गरीबों और ब्राह्मणों को दान देने का शुभ समय माना जाता है।
 
कृषि और ऋतु से जुड़ा: इस मास को अक्सर वर्षा और खेती के अनुकूल समय से जोड़ा जाता है।
 
पूजा और उपवास: इस दिन किसी विशेष देवता की पूजा या विशेष रूप से विष्णु और लक्ष्मी करने से मोक्ष और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
 
अधिकमास व्रत: कुछ लोग इस पूर्णिमा पर व्रत और कथा सुनते हैं।ALSO READ: पुरुषोत्तम मास 2026: कब समाप्त होगा अधिकमास?

अधिकमास की पूर्णिमा – FAQs

 
1. अधिकमास की पूर्णिमा कब आती है?
उत्तर: अधिकमास की पूर्णिमा हर तीन साल में एक बार आती है, जब चंद्र कैलेंडर के अनुसार साल में अतिरिक्त महीना जोड़ना पड़ता है। इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।
 
2. पुरुषोत्तम मास और अधिकमास में क्या अंतर है?
उत्तर: पुरुषोत्तम मास और अधिकमास दोनों ही वही महीना हैं, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। इसे विशेष रूप से भगवान विष्णु की पूजा और दान के लिए शुभ माना जाता है।
 
3. अधिकमास की पूर्णिमा का महत्व क्या है?
उत्तर: अधिकमास की पूर्णिमा का महत्व बहुत अधिक है। इस दिन किए गए व्रत, पूजा, और दान का फल कई गुना माना जाता है। इसे आध्यात्मिक शुद्धि और पुण्य कमाने का उत्तम अवसर कहा गया है।
 
4. ज्येष्ठ मास और अधिकमास की पूर्णिमा में क्या विशेष है?
उत्तर: ज्येष्ठ मास की यह पूर्णिमा धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होती है। ज्येष्ठ मास में सूर्य का प्रभाव अधिक होता है, इसलिए इस दिन किए गए दान और पूजा का फल अत्यधिक माना जाता है।
 
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