बाल्यकाल में एक बार पिताजी ने किसी बात पर नाराज़ होकर मुझे कहा-"अपनी बड़ी बहन को देखो। वह कितनी शांत है। तुम्हें भी उसकी तरह बनना चाहिए।"
बात गुस्से में कही गई थी,लेकिन मेरे तर्कशील मस्तिष्क में तीर की भांति चुभी। मैंने तत्क्षण अपना तर्क प्रस्तुत कर ही दिया-"पापा! सब व्यक्ति एक जैसे नहीं हो सकते। यदि ऐसा संभव होता,तो भगवान सभी की शक्ल-सूरत भी एक समान ही बनाते।"
बात आई-गई हो गई। लेकिन मेरी तेज़ स्मृति में बात की खटक बनी रही और मैंने कभी दीदी जैसा बनने का प्रयास नहीं किया। अपनी निजता को भरपूर ढंग से सुरक्षित रखा और इस तरह से जीया कि आगे चलकर वो माता-पिता के गर्व का कारण भी बनी।
बहरहाल,यहां स्वकथा कहना मेरा प्रेय नहीं है बल्कि उस गलती की ओर इंगित करना है, जो हममें से अनेक अभिभावक करते हैं।
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हम प्रायः अपने बच्चों को उसके भाई-बहनों या मित्रों का अनुकरण करने को कहते हैं। जो हमारी दृष्टि में योग्य है, वही बच्चों को भी मानना चाहिए क्योंकि हम अनुभवी हैं।
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जब इस तर्क पर हम अपनी बात प्रस्थापित करते हैं,तो वहीं से विवाद आरम्भ हो जाता है। बच्चों को लगता है कि आप उन्हें दबाव दे रहे हैं और हमें लगता है कि वे अनुशासनहीन हो रहे हैं।
दोनों तरफ़ तनाव का नतीजा यह होता है कि घर का माहौल सहज और स्नेहपूर्ण नहीं रह पाता। परस्पर संबंधों में कटुता घुलने लगती है।
ऐसे में जो पक्ष झुक जाता है,वो आजीवन इस कसक के साथ जीता है कि मेरे मन को सुना-समझा नहीं गया। एक थोपे हुए जीवन को जीना वास्तव में कष्टकारी होता है।
अब यहां तर्क उपस्थित किया जा सकता है कि माता-पिता तो बच्चों का सदा हित ही चाहते हैं। किसी के अनुकरण में भी वे बच्चे की भलाई ही देख रहे होते हैं। लेकिन यह अधूरा सच है।
कोई ज़रूरी नहीं कि आपके बच्चे में वह योग्यता या क्षमता हो,जो अन्य में हो। कोई बच्चा यदि लेखकीय प्रतिभा से सम्पन्न है,तो उसके भाई या बहन अच्छे खिलाड़ी हो सकते हैं। चिकित्सक माता-पिता की संतान इंजीनियर हो सकती है और शिक्षक अभिभावक के बच्चे गीत-संगीत की दुनिया में ख्याति पा सकते हैं।
आप अपने बच्चों को दूसरों जैसा बनने का दबाव देकर उनकी उन संभावनाओं का अंत कर रहे हैं, जो यदि उचित माहौल में पल्लवित होंगी,तो निश्चित रूप से पुष्पित भी होंगी। इसलिए परस्पर तुलना मत कीजिए क्योंकि तुलना हीन भावना को जन्म देती है और तब बच्चे अपनी मौलिकता भी खो बैठते हैं।
वस्तुतः बच्चे विराट संभावनाओं के पुंज होते हैं।फिर उनमें अकूत क्षमता भी होती है।यदि विवेकपूर्ण तरीके से उन्हें दिशा और अवसर दिए जाएं,तो परिणाम इतने ज़बरदस्त होंगे कि गर्व और हर्ष हमारे जीवन की स्थायी निधि बन जाएंगे।
अनुकरण भी बुरा नहीं है, लेकिन उसे दबाव की तानाशाही वृत्ति से नहीं,स्नेह की मृदु भाषा का उपयोग कर भी सम्भव बनाया जा सकता है। बच्चों को आदेश की रुक्षता से बांधने के स्थान पर अपनत्व की बोली में आबद्ध किया जा सकता है। आखिर वे हैं तो हमारे अपने ही ना!
मैं मानती हूं कि बच्चों में दिशा-बोध अधिक समर्थ नहीं होता और अभिभावक व गुरु ही उन्हें सही दिशा दिखा सकते हैं। लेकिन ये दिशा-बोध उनकी रुचि और योग्यता के अनुकूल होना चाहिए। आप ही सोचकर देखें कि एक शिक्षक को यदि चिकित्सक का काम दे दिया जाए अथवा एक संगीतकार के हाथों में बल्ला थमा दिया जाये,तो परिणाम सकारात्मक तो नहीं ही होंगे।
आप बच्चों को उनका आकाश दीजिए।उड़ने दीजिए उन्हें उनकी मुक्तता के साथ। डोरी अवश्य अपने हाथों में रखिए।जब उन्हें ढील (स्वतंत्रता) दी जाएगी,तो वे अपनी समग्र क्षमता का उपयोग स्वरुचि को जीने,विकसित करने और परिष्कृत कर आपको गर्वित करने हेतु करेंगे।
हां,जहां उनके रुख में भटकाव लगे,तत्काल डोरी खींच लीजिए और अपने अनुभव की स्नेहमयी आंच में उन्हें तपाइए ताकि वे खरा सोना बन सकें।
बच्चे हमारी जीवन-बगिया के वो फूल हैं, जिनकी सुवास से घर सदा महकता रहता है और जो हमारे गृहस्थ धर्म की पूर्णता के वाहक होते हैं।
तो ज़रा स्नेह और समझदारी से उनके अभिभावक बनिए। उम्र के सभी पड़ावों पर उन्हें आप सबसे बड़े सहयोगी लगें ना कि सबसे बड़ी बाधा।