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  4. Mahavir Jayanti 2025 Date Time
Written By WD Feature Desk
Last Updated : गुरुवार, 3 अप्रैल 2025 (16:44 IST)

महावीर जयंती कब है, जानिए पूजा करने का मुहूर्त और तरीका

2025 Mahavir Jayanti
Lord Mahavir Jayanti 2025: पंचांग के अनुसार, प्रतिवर्ष चैत्र महीने के 13वें दिन अर्थात चैत्र शुक्ल की त्रयोदशी तिथि पर भगवान महावीर जयंती मनाई जाती है। जैन कैलेंडर के अनुसार 2025 में महावीर जयंती गुरुवार, 10 अप्रैल को मनाई जाएगी। यह त्योहार भगवान महावीर के जन्म की याद में मनाया जाता है। 

जैन पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं। बता दें कि इस साल भगवान महावीर स्वामी की 2623वीं वर्षगांठ मनाई जाएगी। दुनिया भर में यह दिन जैन भक्तों द्वारा प्रार्थना, उपवास, कार्यक्रम और दान आदि गतिविधियों के साथ मनाया जाता है।
 
कब है महावीर जयंती 2025 में, जाने शुभ मुहूर्त : Mahavir Jayanti Muhurat 2025
 
त्रयोदशी तिथि प्रारंभ- 09 अप्रैल 2025 को शाम 10 बजकर 55 मिनट से।
त्रयोदशी तिथि का समापन- 11 अप्रैल 2025 को रात 01 बजे।
तिथिनुसार महावीर जयंती बृहस्पतिवार, 10 अप्रैल 2025 को मनाई जाएगी।
 
महावीर स्वामी पूजन विधि : Bhagwan Mahavir Puja Vidhi
 
श्री महावीर जिन-पूजा को श्री वर्द्धमान जिन-पूजा भी कहते हैं। पूजा आरंभ करने के पूर्व इसे एक बार जरूर पढ़ लें जिससे कि पूजा के दौरान त्रुटि न हो।
 
।। श्री महावीर जिन-पूजा ।।
 
छन्द मत्तगयन्द :
श्रीमत वीर हरें भवपीर, भरें सुखसीर अनाकुलताई।
केहरि अंक अरीकरदंक, नए हरि पंकति मौलि सुआई॥
मैं तुमको इत भापत हों प्रभु, भक्ति समेत हिये हरषाई।
हे करुणा-धन-धारक देव, इहां अब तिष्ठहु शीघ्रहि आई॥
 
ओं ह्रीं श्री वर्द्धमान जिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर। संवीषट्।
ओं ह्रीं श्री वर्द्धमान जिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। स्थापनम्‌।
ॐ ह्रीं श्री वर्द्धमान जिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव। वषट्।
 
छन्द अष्टपदी :
क्षीरोदधिसम शुचि नीर, कंचन भृंग भरों।
प्रभु वेग हरो भवपीर, यातें धार करों॥
श्रीवीर महा अतिवीर, सन्मति नायक हो।
जय वर्द्धमान गुणधीर, सन्मतिदायक हो॥1॥
 
ॐ ह्रीं श्री महावीर जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
 
मलयागिर चन्दनसार, केसर संग घसों।
प्रभु भवआताप निवार, पूजत हिय हुलसों। श्रीवीर...
 
ॐ ह्रीं श्री महावीर जिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा॥2॥
 
तंदुलसित शशिसम शुद्ध, लीनो थार भरी।
तसु पुंज धरों अविरुद्ध, पावों शिवनगरी। श्रीवीर...
 
ॐ ह्रीं श्री महावीरजिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतान्‌ निर्वपामीति स्वाहा॥3॥
 
सुरतरु के सुमन समेत, सुमन सुमन प्यारे।
सो मनमथ भंजन हेत, पूजों पद थारे॥ श्रीवीर...
 
ॐ ह्रीं श्री महावीरजिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा॥4॥
 
रसरज्जत सज्जत सद्य, मज्जत थार भरी।
पद जज्जत रज्जत अद्य, भज्जत भूख अरी॥ श्रीवीर...
 
ॐ ह्रीं श्री महावीरजिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा॥5॥
 
तमखंडित मंडित नेह, दीपक जोवत हों।
तुम पदतर हे सुखगेह, भ्रमतम खोवत हों॥ श्रीवीर...
 
ॐ ह्रीं श्री महावीरजिनेन्द्राय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा॥6॥
 
हरिचंदन अगर कपूर, चूर सुगंध करा।
तुम पदतर खेवत भूरि, आठौं कर्म जरा॥ श्रीवीर...
 
ॐ ह्रीं श्री महावीरजिनेन्द्राय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा॥7॥
 
रितुफल कल-वर्जित लाय, कंचन थार भरों।
शिव फलहित हे जिनराय, तुम ढिंग भेंट धरों।
 
श्री वीर महा अतिवीर, सन्मति नायक हो।
जय वर्द्धमान गुणधीर, सन्मति दायक हो॥
 
ॐ ह्रीं श्री महावीरजिनेन्द्रायमोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा॥8॥
 
जल फल वसु सजि हिम थार, तन मन मोद धरों।
गुणगाऊँ भवदधितार, पूजत पाप हरों॥ श्रीवीर...
 
ओं ह्रीं श्री महावीरजिनेन्द्राय अनर्ध्यपद प्राप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा॥9॥
 
पंचकल्याणक
 
राग टप्पा :
मोहि राखो हो सरना, श्री वर्द्धमान जिनरायजी, मोहि राखो.॥
गरभ साढ़सित छट्ट लियो थित, त्रिशला उर अघ हरना।
सुर सुरपति तित सेव करौ नित, मैं पूजूं भवतरना॥ मोहि...
 
ॐ ह्रीं आषाढ़ शुक्ल षष्टयां गर्भमंगल मंडिताय श्री महावीर जिनेन्द्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा॥1॥
 
जनम चैत सित तेरस के दिन, कुण्डलपुर कनवरना।
सुरगिरि सुरगुरु पूज रचायो, मैं पूजों भवहरना॥
मोहि राखो हो...॥
 
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्ला त्रयोदश्यां जन्ममंगलप्राप्तया श्री महावीर जिनेन्द्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा॥2॥
 
मंगसिर असितमनोहर दशमी, ता दिन तप आचरना।
नृप कुमार घर पारन कीनों, मैं पूजों तुम चरना॥ मोहि।
राखो हो...॥
 
ॐ ह्रीं मार्गशीर्षकृष्णदशम्यां तपोमंगलमंडिताय श्री महावीर जिनेन्द्राय अर्घ निर्वपामोति स्वाहा॥3॥
 
शुक्लदशै वैसाख दिवस अरि, घात चतुक क्षय करना।
केवललहि भवि भवसर तारे, जजो चरन सुख भरना॥
मोहि राखो हो...॥
 
ॐ ह्रीं वैशाखशुक्ल-दशम्यां केवलज्ञानमंडिताय श्री महावीर जिनेन्द्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा॥4॥
 
कातिक श्याम अमावस शिवतिय, पावापुरतैं वरना।
गणफनिवृन्द जजें तित बहुविध, मैं पूजों भयहरना॥
मोहि राखो हो...॥
 
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णअमावस्यायां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्री महावीरजिनेन्द्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा॥5॥
 
जयमाला
 
छंद हरिगीता (28 मात्रा) :
गणधर अशनिधर, चक्रधर हलधर, गदाधर वरवदा।
अरुं चापधर, विद्यासुधर तिरशूलधर सेवहिं सदा॥
दुखहरन आनंदभरन तारन, तरन चरन रसाल हैं।
सुकुमाल गुण मनिमाल उन्नत भालकी जयमाल है॥1॥
 
छंद घत्तानन्द :
जय त्रिशलानंदन, हरिकृतवंदन, जगदानंदन चंदवरं।
भवतापनिकंदन, तनकनमंदन, रहित सपंदन नयन धरं॥2॥
 
छंद त्रोटक :
जय केवलभानु-कला-सदनं। भवि-कोक-विकाशन कंदवनं।
जगजीत महारिपु मोहहरं। रजज्ञान-दृंगावर चूर करं॥1॥
 
गर्भादिक-मंगलमंडित हो। दुखदारिदको नितखंडित हो।
जगमाहिं तुम्हीं सतपंडित हो। तुमही भवभाव-विहंडित हो॥2॥
 
हरिवंश सरोजनको रवि हो। बलवंत महंत तुम्हीं कवि हो।
लहि केवलधर्म प्रकाश कियो। अबलों सोइमारग राजतियो॥3॥
 
पुनि आप तने गुण माहिं सही। सुरमग्न रहैं जितने सबही।
तिनकी वनिता गुनगावत हैं। लय माननिसों मनभावत हैं॥4॥
 
पुनि नाचत रंग उमंग-भरी। तुअ भक्ति विषै पग एम धरी।
झननं झननं झननं झननं। सुर लेत तहां तननं तननं॥5॥
 
घननं घननं घनघंट बजै॥ दृमदं दृमदं मिरदंग सजै।
गगनांगन-गर्भगता सुगता। ततता ततता अतता बितता॥6॥
 
धृगतां धृगतां गति बाजत है। सुरताल रसालजु छाजत है।
सननं सननं सननं नभ में। इकरूप अनेक जु धारि भ्रमें॥7॥
 
कई नारि सुबीन बजावत हैं। तुमरो जस उज्ज्वल गावत हैं।
करताल विषै करताल धरैं। सुरताल विशाल जुनाद करैं॥8॥
 
इन आदि अनेक उछाह भरी। सुरभक्ति करें प्रभुजी तुमरी।
तुमही जग जीवन के पितु हो। तुमही बिन कारनते हितु हो॥9॥
 
तुमही सब विघ्न विनाशन हो। तुमही निज आनंदभासन हो।
तुमही चितचिंतितदायक हो। जगमाहिं तुम्हीं सबलायक हो॥10॥
 
तुमरे पन मंगल माहिं सही। जिय उत्तम पुन्य लियो सबही।
हमको तुमरी शरणागत है। तुमरे गुन में मन पागल है॥11॥
 
प्रभु मोहिय आप सदा बसिये। जबलों वसु कर्म नहीं नसिये।
तबलों तुम ध्यान हिये वरतो। तबलों श्रुतचिंतन चित्त रतो॥12॥
 
तबलों व्रत चारित चाहतु हों। तबलों शुभभाव सुगाहतु हों।
तबलों सतसंगति नित्त रहो। तबलों मम संजम चित्त गहो॥13॥
 
जबलों नहिं नाश करों अरिको, शिव नारि वरों समता धरिको।
यह द्यो तबलों हमको जिनजी। हम जाचतु हैं इतनी सुनजो॥14॥
 
घत्तानंद :
श्रीवीर जिनेशा नमित सुरेशा, नाग नरेशा भगति भरा।
'वृंदावन' ध्यावै विघन नशावै बाँछित पावै शर्म वरा॥15॥
 
ॐ ह्रीं श्री वर्द्धमान जिनेन्द्राय महार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
 
दोहा :
श्री सन्मति के जुगल पद, जो पूजैं धरि प्रीति।
वृंदावन सो चतुर नर, लहैं मुक्ति नवनीत॥
 
॥ पुष्पांजलिं क्षिपामि ॥
 
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