मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026
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हिन्‍दी कविता : लगने लगता है तुम बैठे हो अदृश्य से मेरी साथ की सीट पर

hindi poem
लगने लगता है

लगने लगता है
तुम बैठे हो अदृश्य से
मेरी साथ की सीट पर
जब बैठ जाती हूं
मैं ड्राइविंग सीट पर

लगने लगता है
तुम्हें नहीं पसंद है 
गियरलेस गाड़ी चलाना
तुम्हारे लिए तो 
गियरलेस गाड़ियां बस
औरतों के लिए बनी हैं
मर्द तो गियर वाली
गाडियां चलाया करते हैं
एक सौ बीस की स्पीड में

लगने लगता है 
जैसे मेरा उल्टा हाथ
पकड़ कर हंसते हो
और कहते हो मुझे
गियर तो बदलने नहीं
फिर इस हाथ से
कुछ काम ही कर लो 
पिरोकर मेरी उंगलियां
अपनी उंगलियों में
हल्के से दबा देते हो
जैसे कह रहे हो
मदद कर रहा हूं
ड्राइविंग में तुम्हारी

लगने लगता है
कहते हो जैसे मुझसे
डिपर क्यों नहीं देतीं
तुम भुल्लकड़ हो
सच तुम औरतें भी
कभी नहीं कर सकतीं
ढंग की ड्राइविंग

mgid

लगने लगता है
मैं कह रही हूं तुमसे
जोर से हंसकर जैसे
तो खुद चला लो ना
सुनती हूं एक अना
मर्द के दंभ की
नहीं चलाता मैं ये
औरतों वाली गाड़ी
बिना गियर की
और तभी आ जाती हूं
आज के मकाम पर
मुस्कुराकर देखती हूं
साथ वाली सीट पर
दिख जाते हो तुम
एक अदृश्य लिबास में
जहां भी में जाऊंगी 
साथ चलोगे जैसे
अनंत तक
लगने लगता है

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