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    <title><![CDATA[सामयिक]]></title>
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    <description><![CDATA[Get latest Views and Analysis of all the Current Affairs, International Affairs, Political News, Political News India and many more in Hindi. सामयिक विषय, सामयिक वार्ता, विचार विमर्श, सामयिक लेख, सामयिक घटनाक्रम.]]></description>
    <copyright>Copyright webdunia.com</copyright>
    <lastBuildDate>Tue, 30 Jun 2026 19:10:07 +0530</lastBuildDate>
    <language>en-us</language>
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      <title>सामयिक</title>
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    <item>
      <title><![CDATA[भीषण गर्मी के चलते पेरिस के मुर्दाघरों में जगह कम पड़ी]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/france-heatwave-2026-paris-morgues-full-climate-change-deaths-126063000002_1.html</link>
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      <description><![CDATA[पेरिस के एक शवगृह में लगातार फोन आ रहे हैं। फोन करने वाले यही पूछते हैं कि, क्या एक शव रखने की जगह मिलेगी? जौहर एर्टेली अफसोस भरी आवाज में जवाब देते हैं, "नहीं।" और ऐसा जवाब वह दिन में कई बार देते हैं।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="Europe killer heat wave" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/24/full/1782288159-2734.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
	ओंकार सिंह जनौटी</p>
<p>
	पेरिस के एक शवगृह में लगातार फोन आ रहे हैं। फोन करने वाले यही पूछते हैं कि, क्या एक शव रखने की जगह मिलेगी? जौहर एर्टेली अफसोस भरी आवाज में जवाब देते हैं, "नहीं।" और ऐसा जवाब वह दिन में कई बार देते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	एर्टेली के कोल्ड रूम में 32 शवों को रखने की जगह है। वह कहते हैं, "मुझे सैकड़ों फोन आ रहे हैं। हम एक बड़ी त्रासदी देख रहे हैं।" <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/immigration-benefits-rich-countries-economy-gdp-growth-research-126062900009_1.html" target="_blank">पिछड़े देशों में पलायन से अमीर देशों को हुआ खूब फायदा</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	एर्टेली ने अपने पेशे से जुड़े अन्य लोगों से भी बातचीत की। उन्होंने भी हेर्टेली को बताया कि 80 किलोमीटर दूर से भी शव पेरिस के शवगृहों तक लाए जा रहे हैं। ज्यादा जगह बनाने के लिए एर्टेली ने प्रशासन से अपने शवगृह के बाहर रेफ्रीजेरेटर लगाने की अनुमति मांगी है। पेरिस एयरपोर्ट के पास मौजूद उनके शवगृह को अब तक अतिरिक्त रेफ्रीजेरेटर लगाने की अनुमति का इंतजार है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	एर्टेली कहते हैं, "परिवार पीड़ा में हैं। हमारे पास उन्हें राहत देने के लिए कोई समाधान नहीं है क्योंकि अंत्येष्टि गृह भरे हुए हैं। हमारी पूरी संवेदनाएं उनके साथ हैं, लेकिन फिर भी हम कुछ नहीं कर सकते। हम एक मुश्किल से जूझ रहे हैं, बहुत बड़ी मुश्किल से।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	फ्रांस में पिछले हफ्ते भीषण गर्मी ने हजारों लोगों की जान ली। 24 से 27 जून तक देश के कई हिस्सों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया। पब्लिक हेल्थ फ्रांस के मुतबिक, 24 जून को देश में 1,200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई। 25 जून को 1,400 लोग मारे गए और फिर 26 जून को भी 1,400 जानें गईं। अधिकारियों के मुताबिक, भीषण गर्मी से पहले अप्रैल और मई में औसतन एक दिन में 900 से 1,000 लोगों की मौत होती थी। शवगृहों का सिस्टम इसी संख्या के लिए तैयार किया गया था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अंतिम संस्कार सेवाएं देने वाले व्यवसाय से जुड़े लोगों के मुताबिक, राजधानी पेरिस में शव रखने वाले मुर्दाघर भर चुके हैं। शहर के सिटी हॉल के मुताबिक, 20-20 की क्षमता वाली दो अस्थायी स्टोरेज यूनिट्स भी शुरू की गई है। इनके अलावा शहर के अस्पतालों में 50 अन्य शवों के लिए जगह बनाई गई है। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/family-seeks-justice-after-indian-sailor-killed-in-us-strike-126062700003_1.html" target="_blank">इंसाफ मांगता अमेरिकी हमले में मारे गए भारतीय नाविक का परिवार</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<h3>
	बदलती जलवायु की चोट कितनी घातक</h3>
<p>
	फ्रांस में अब तक दर्ज मौतों में से करीब 85 फीसदी लोग 65 वर्ष से अधिक उम्र के हैं। बुजुर्गों की मौत के सबसे ज्यादा मामले राजधानी क्षेत्र पेरिस और उसके आस पास सामने आए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जलवायु परिवर्तन के विकराल होते असर के बीच जून 2026 के आखिर में पड़ी गर्मी ने 2003 के रिकॉर्ड भी तोड़ दिए। 2003 की गर्मियों में फ्रांस में करीब 15,000 लोगों की मौत हुई थी। उसके बाद बुजुर्गों की देखभाल को लेकर देश में कई वादे व दावे किए गए। 2025 में भी असामान्य गर्मी के कारण 5,700 से ज्यादा मौतें हुई थीं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पेरिस की अंतिम संस्कार सेवा से जुड़ी वेरोनिक बेरत्रां कहती हैं कि लोग पिछली सीख भूल चुके हैं। उन्होंने कहा, "जिन लोगों की मौत हुई, उनमें से ज्यादातर अकेले रह रहे थे। उनकी स्थिति देखकर यही लगता है कि ये मौतें गर्मी के कारण हुईं।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उन्होंने लोगों से ज्यादा जागरूक होने की अपील की है। उनके मुताबिक, पड़ोसियों का ध्यान रखना जरूरी है और जो लोग अकेले रहते हैं, उनकी समय समय पर मदद की जानी चाहिए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बेरत्रां कहती हैं, "समय के साथ हम शायद भूल गए हैं कि ये फिर से हो सकता है। और हालात और भी खराब हो सकते हैं।" <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/brexit-10-years-later-impact-on-uk-economy-politics-and-immigration-126062200010_1.html" target="_blank">ब्रेक्जिट के 10 साल: ब्रिटेन को भारी पड़ा अलग होने का फैसला</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<h3>
	शवगृहों में इतनी भीड़ क्यों?</h3>
<p>
	एशिया और अफ्रीका के कई देशों में जहां मृतक का अंतिम संस्कार जल्द ही कर दिया जाता है, वहीं यूरोप और अमेरिका में अंतिम संस्कार कुछ दिनों या हफ्तों बाद किया जाता है। नोटरी से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद और मृतक के रिश्तेदार, कब्रगाह में जगह के लिए कागजी कार्रवाई करते हैं, स्मृति पटल तैयार करवाते हैं। इसी दौरान शुभचिंतकों को सूचित कर, कई हफ्ते बाद की एक तारीख दी जाती है, ताकि अंतिम संस्कार में सब लोग शामिल हो सकें।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	तब तक शव को मॉर्चुरी में रखा जाता है। अंतिम संस्कार से जुड़ी सेवाएं, दफनाने वाले दिन शव को ताबूत में तैयार करके लाते हैं और फिर आखिरी विदाई दी जाती है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	कितना ज्यादा तपा यूरोप</h3>
<p>
	22 से 28 जून तक रही भीषण गर्मी के दौरान फ्रांस और जर्मनी के बड़े हिस्से में तापमान औसत से 12.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा। ब्रिटेन में यह तपिश 10 से 12.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रही। वहीं इटली के बड़े हिस्से में तापमान औसत से 7.5 से 10 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जलवायु परिवर्तन का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों के मुताबिक, 2015 से 2025 के बीच, आर्कटिक (1.18 डिग्री) और यूरोप (.87 डिग्री) का बेसलाइन टेम्प्रेचर सबसे ज्यादा बढ़ा है। जर्मनी, चेक गणराज्य, पोलैंड और हंगरी में 27 जून को अब तक का सबसे ज्यादा गर्म दिन रिकॉर्ड किया गया।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 08:00:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 30 Jun 2026 08:08:35 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पिछड़े देशों में पलायन से अमीर देशों को हुआ खूब फायदा]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/immigration-benefits-rich-countries-economy-gdp-growth-research-126062900009_1.html</link>
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      <description><![CDATA[जिन अमीर देशों में बीते 35 साल में आप्रवासन की दर ज्यादा रही है, उनकी अर्थव्यवस्था को इससे बड़ा फायदा हुआ है। एक नए शोध के मुताबिक, ऐसे देश अब भी अधिक कामगारों को अपने ढांचे में पिरो सकते हैं। कैलिफोर्नियां यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर के इस शोध को ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="immigration benefits" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/29/full/1782703515-119.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Photo : AI Generated" width="1200" /></p>
	</p>
	<strong>ओंकार सिंह जनौटी</strong></p>
<p>
	जिन अमीर देशों में बीते 35 साल में आप्रवासन की दर ज्यादा रही है, उनकी अर्थव्यवस्था को इससे बड़ा फायदा हुआ है। एक नए शोध के मुताबिक, ऐसे देश अब भी अधिक कामगारों को अपने ढांचे में पिरो सकते हैं। कैलिफोर्नियां यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर के इस शोध को अगले हफ्ते यूरोपीय सेंट्रल बैंक के एक अहम सम्मेलन में पेश किया जाएगा। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/family-seeks-justice-after-indian-sailor-killed-in-us-strike-126062700003_1.html" target="_blank">इंसाफ मांगता अमेरिकी हमले में मारे गए भारतीय नाविक का परिवार</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	शोध के लेखक और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जियोवानी पेरी कहते हैं, "जिन देशों में आव्रजन दर ज्यादा रही, वहां लेबर प्रोडक्टिविटी में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। यह वृद्धि आव्रजन के दौरान और उसके बाद भी जारी रही।" उनके मुताबिक इस वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा निवेश में बढ़ोतरी के कारण आया। इससे प्रति कामगार जीडीपी में सुधार हुआ।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हाल के बरसों में आव्रजन को लेकर राजनीतिक तनाव बढ़ा है। कई देशों में दक्षिणपंथी और आप्रवासन विरोधी दल मजबूत हुए हैं। अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों में यह मुद्दा राजनीति के केंद्र में आ गया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लेकिन इस अध्ययन में आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के कई समृद्ध देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। विश्लेषण बताता है कि आव्रजन से आर्थिक वृद्धि और उत्पादकता में साफ इजाफा हुआ। दक्षिणपंथी पार्टियां और संगठन आरोप लगाते हैं कि ज्यादा विदेशियों के आने से आर्थिक मुश्किलें खड़ी हो रही है, यह शोध इस दावे को आंकड़ों के साथ चुनौती दे रहा है। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/united-nations-secretary-general-antonio-guterres-appealed-to-artificial-intelligence-companies-126062400028_1.html" target="_blank">UN महासचिव ने AI कंपनियों से मांगा बिजली, पानी और जमीन का हिसाब</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<h3>
	उत्पादकता को कैसे बेहतर किया विदेशी कामगारों ने</h3>
<p>
	ओईसीडी देशों में बाहरी देशों से आने वाले प्रवासियों की संख्या 1990 में करीब 2.5 करोड़ थी। 2024 में यह बढ़कर करीब 10 करोड़ हो गई। इसी दौरान कई देशों में मूल आबादी की वृद्धि दर नकारात्मक हो गई। अध्ययन के मुताबिक, यदि किसी देश में आबादी के एक प्रतिशत  बराबर अतिरिक्त आप्रवासी आते हैं, तो पांच साल में प्रति कामगार जीडीपी में 1.2 प्रतिशत और दस साल में 1.9 प्रतिशत की वृद्धि होती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ये निष्कर्ष यूरोपीय संघ के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं। वहां 2015 से जन्मदर काफी कम है। कोविड महामारी के बाद यह गिरावट और ज्यादा हो गई। अध्ययन नतीजे के तौर पर कहता है कि ब्रिटेन, इटली और स्पेन की 1990 से 2024 के बीच हुई प्रति व्यक्ति आर्थिक तरक्की में इसका बड़ा योगदान है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	भविष्य की तैयारी में मदद करते आप्रवासी</h3>
<p>
	अच्छी पढ़ाई, बढ़िया करियर या फिर एक अच्छी लाइफस्टाइल की तलाश में भारत समेत कई देशों के हर साल लाखों प्रतिभाशाली युवा अमीर देशों का रुख करते हैं। समृद्ध देश कई तरीकों से यह तय भी करते हैं कि प्रतिभाशाली या फिर वित्तीय रूप से सक्षम युवा ही उनके देश में पहुंचे। 1980 के दशक से ही अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जैसे देश, कई गरीब या पिछड़े देशों के युवाओं को रिझा रहे हैं। अमेरिका की सिलिकॉन वैली, ब्रिटेन का हेल्थकेयर सिस्टम, जर्मनी, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में श्रम से जुड़े कई काम इसका उदाहरण हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पलायन की इस प्रक्रिया से जहां समृद्ध देशों के ऊर्जा से भरे प्रतिभाशाली कामगार मिलते हैं, वहीं पीछे छूटे देशों कोब्रेन ड्रेन या प्रतिभा पलायन का सामना करना पड़ता है। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/brexit-10-years-later-impact-on-uk-economy-politics-and-immigration-126062200010_1.html" target="_blank">ब्रेक्जिट के 10 साल: ब्रिटेन को भारी पड़ा अलग होने का फैसला</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि पलायन देखने वाले देशों को भी इसका बड़ा आर्थिक लाभ तो मिलता ही है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल समेत विकास कर रहे कई देशों की अर्थव्यवस्था में, विदेशों में काम करने वाले लोगों द्वारा भेजे गए पैसे (रेमिटेंस) का बड़ा योगदान है। भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था को बीते कई साल से हर वर्ष ऐसी रेमिटेंस से 100 अरब डॉलर से ज्यादा मिल रहे हैं। यह रकम विदेशी मुद्रा भंडार को स्वस्थ बनाए रखने में भी मदद करती है। वहीं पाकिस्तान की जीडीपी में इस रेमिटेंस का योगदान करीब 9.4 प्रतिशत है तो नेपाल की जीडीपी में 25 से 27 फीसद।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आप्रवासियों की लगातार होने वाली आवक से भी आर्थिक वृद्धि के ये फायदे खत्म नहीं होते हैं। बड़ी संख्या में विदेशियों को अपनाने वाले कनाडा और ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण देते हुए प्रोफेसर पेरी कहते हैं कि उत्पादकता और निवेश को नुकसान पहुंचाए बिना भी ज्यादा कामगारों शामिल करने के सकारात्मक तरीके बरकरार हैं।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 08:16:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Mon, 29 Jun 2026 08:55:35 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[इंसाफ मांगता अमेरिकी हमले में मारे गए भारतीय नाविक का परिवार]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/family-seeks-justice-after-indian-sailor-killed-in-us-strike-126062700003_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/family-seeks-justice-after-indian-sailor-killed-in-us-strike-126062700003_1.html</guid>
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      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/27/thumb/1_1/1782529948-2808.jpg</image>
      <description><![CDATA[ओमान की खाड़ी में अमेरिकी हमले में मारे गए एक भारतीय नाविक के मामले से नाविकों की सुरक्षा, जवाबदेही और भारत की प्रतिक्रिया को लेकर जरूरी सवाल उठ रहे हैं। डीडब्ल्यू ने इस हादसे का शिकार हुए नाविक के परिवार से भी बात की।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="family seeks justice after indian sailor killed in us strike" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/27/full/1782529948-2808.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Photo : Richard Kujur/DW" width="1200" /></p>
	</p>
	<strong>-आदिल भट</strong></p>
<p>
	ओमान की खाड़ी में अमेरिकी हमले में मारे गए एक भारतीय नाविक के मामले से नाविकों की सुरक्षा, जवाबदेही और भारत की प्रतिक्रिया को लेकर जरूरी सवाल उठ रहे हैं। डीडब्ल्यू ने इस हादसे का शिकार हुए नाविक के परिवार से भी बात की। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/donald-trump-mark-rutte-nato-europe-allies-iran-war-dispute-2026-126062600004_1.html" target="_blank">नाटो प्रमुख से खुश लेकिन यूरोपीय साझेदारों से चिढ़े ट्रंप</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	सुशीला देवी गहरे सदमे और दुख में डूबी हुई हैं। उनके पति और भारतीय नाविक शिवानंद चौरसिया की बीते 9 जून को ओमान की खाड़ी में एक व्यापारिक जहाज ‘एमटी सेटेबेलो&#39; पर हुए अमेरिकी हमले में मौत हो गई थी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पेशे से इंजीनियरिंग फिटर, शिवानंद ने अपने परिवार के बेहतर भविष्य के लिए सालों तक समंदर में काम करने की कड़ी ट्रेनिंग ली थी। लेकिन अब, उनका परिवार उनके बिना अपने भविष्य की कल्पना करने और इस कड़वे सच को स्वीकार करने की जद्दोजहद में जुटा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस महीने की शुरुआत में जब अमेरिकी सेना ने पलाऊ के झंडे वाले इस तेल और केमिकल टैंकर जहाज पर हमला किया, तो उसमें तीन भारतीय नाविक मारे गए थे, जिनमें चौरसिया भी एक थे। अमेरिकी सेना का कहना था कि वे ईरान युद्ध के बीच ईरान से होने वाले तेल के निर्यात पर लगी पाबंदी या नाकेबंदी  को लागू कर रहे थे। इस हमले में चीफ इंजीनियर पटनाला सुरेश और डेक कैडेट आदित्य शर्मा भी मारे गए थे। जहाज पर मौजूद बाकी 21 भारतीय क्रू सदस्यों को बचा लिया गया था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि टैंकर में ईरानी तेल था और उसे बार-बार चेतावनी दी गई थी। वहीं, जहाज के मैनेजर ने इस बात का खंडन किया है। उनका कहना है कि जहाज का ईरान से कोई संबंध नहीं था और हमले से पहले उन्हें कोई चेतावनी नहीं मिली थी। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/united-nations-secretary-general-antonio-guterres-appealed-to-artificial-intelligence-companies-126062400028_1.html" target="_blank">UN महासचिव ने AI कंपनियों से मांगा बिजली, पानी और जमीन का हिसाब</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<h3>
	‘अमेरिका ने मेरे पति को मारा&#39;</h3>
<p>
	सुशीला देवी ने डीडब्ल्यू से कहा, "उन्होंने मेरी सारी खुशियां छीन ली। अमेरिका ने ही मेरे पति की जान ली है। इसीलिए प्रधानमंत्री [नरेंद्र] मोदी और [उत्तर प्रदेश के] मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुप हैं। उन्हें अपने लोगों के लिए आवाज उठानी चाहिए थी और पूछना चाहिए था कि उन्होंने हमारे साथ ऐसा क्यों किया।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शिवानंद चौरसिया का परिवार पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के एक खेतिहर गांव में रहता है, जहां मुख्य रूप से धान की खेती होती है। गांव के ज्यादातर मकान मिट्टी और ईंट से बने हुए हैं। ईंट से बने अपने साधारण से घर के भीतर पूरा परिवार गुमसुम और शांत बैठा है। रिश्तेदार और पड़ोसी लगातार घर आ-जा रहे हैं और उन्हें सांत्वना दे रहे हैं। शिवानंद की बहन सोनी चौरसिया कहती हैं, "भाई की मौत से हमें बहुत ज्यादा दुख पहुंचा है। अब मेरा इस दुनिया में जीने का मन नहीं करता, क्योंकि परिवार ने अपनी एकमात्र उम्मीद खो दी है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	परिवार को लगता है कि भारतीय सरकार की चुप्पी ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया है। किसी भी नेता ने शोक संतप्त परिवार से मुलाकात नहीं की है। सोनी ने कहा, "हम गरीब हैं। इसीलिए, मोदी सरकार को कोई परवाह नहीं है। अगर हम अमीर होते, तो वे हमसे मिलने जरूर आते।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उत्तर प्रदेश के इस इलाके के ज्यादातर परिवारों की तरह, चौरसिया परिवार भी खेती-बाड़ी पर निर्भर है और बमुश्किल इतना अनाज उगा पाता है जिससे सबका पेट भर सके। समंदर की यह नौकरी शिवानंद चौरसिया के लिए तंगहाली से बाहर निकलने का रास्ता थी। उनके मरीन इंजीनियरिंग के कोर्स की फीस भरने के लिए परिवार ने अपनी जमीन बेच दी थी और करीब 8,60,000 रुपये का कर्ज लिया था। आखिरकार, उन्हें एक ऑयल टैंकर पर नौकरी मिल गई थी।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	समंदर में कितने भारतीय कर्मचारी मौजूद</h3>
<p>
	दुनिया भर के समुद्री जहाजों पर काम करने वाले कर्मचारियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा भारत के लोगों का है। उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, दुनिया के कुल नाविकों में से करीब 12 फीसदी भारतीय नागरिक हैं। इनमें से हजारों नाविक उन व्यापारिक जहाजों पर काम करते हैं, जो दुनिया के सबसे अशांत और खतरनाक समुद्री रास्तों से होकर गुजरते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	चौरसिया के घर के पास एक पेड़ के नीचे कुछ लोग इकट्ठा होकर यह चर्चा कर रहे थे कि आखिर वहां क्या हुआ था और इससे उनके जीवन पर क्या असर पड़ेगा। उनमें से कई लोगों के रिश्तेदार समंदर में काम करते हैं, जिनमें से कुछ फारस की खाड़ी में भी तैनात हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जो परिवार पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबे थे, उनके लिए समंदर की यह नौकरी कभी गरीबी से बाहर निकलने के रास्ते के तौर पर दिखती थी। लेकिन अब यह एक ऐसा जुआ बन चुकी है, जहां दांव पर सीधे इंसान की जिंदगी लगी है। गांव के एक व्यक्ति ने कहा, "हम अब अपने आदमियों को समुद्र में नहीं भेजेंगे।” वहां मौजूद दूसरे लोगों ने भी सहमति जताते हुए अपना सिर हिलाया। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/iran-war-impact-what-did-trump-achieve-126061800003_1.html" target="_blank">ईरान युद्ध के लक्ष्यों में डोनाल्ड ट्रंप को क्या हासिल हुआ</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<h3>
	गए थे रोजी-रोटी के लिए, फंस गए जंग में</h3>
<p>
	ईरान-अमेरिका संघर्ष शुरू होने के बाद, ईरानी हमलों में भी भारतीय नाविक घायल हुए हैं। भूमेश (जो सिर्फ अपने पहले नाम से जाने जाते हैं) एक ऐसे नाविक हैं जो 1 मार्च को ‘स्काईलाइट&#39; नामक टैंकर जहाज पर हुए ईरानी हमले में बाल-बाल बचे थे। यह हमला तब हुआ था जब तेहरान होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री जहाजों की आवाजाही पर रोक लगाने के लिए नाकेबंदी कर रहा था। यह जहाज इस युद्ध के दौरान हमले का शिकार होने वाले सबसे शुरुआती जहाजों में से एक था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जब हमला हुआ, उस वक्त भूमेश जहाज के मुख्य कंट्रोल रूम (ब्रिज) पर ही मौजूद थे। भूमेश ने बताया, "मुझे नहीं पता था कि मैं जिंदा बचूंगा या नहीं। मैं बस लगातार यही सोच रहा था कि मेरे बिना मेरा परिवार इस सदमे को कैसे झेलेगा और क्या मैं कभी सही-सलामत घर वापस लौट पाऊंगा।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उस धमाके में जहाज के कप्तान और एक अन्य भारतीय नाविक की मौत हो गई थी। भूमेश के मुताबिक, इस हादसे की यादें आज भी उनका पीछा करती हैं। हफ्तों तक वे सो नहीं पाए। उन्होंने कहा, "नाविक वहां कोई जंग लड़ने नहीं जाते हैं। हम तो सिर्फ अपनी रोजी-रोटी कमाने वहां जाते हैं।” अब समंदर में वापस न जाने के कारण, वे दिल्ली के बाहरी इलाके में किराए के एक कमरे में रहते हैं और ट्रक चलाते हैं। तीन महीने से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन वे अब भी शिपिंग कंपनी से मिलने वाले मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भूमेश का यह अनुभव उन दर्जनों मामलों में से एक है, जिन पर भारतीय नाविक यूनियन लगातार नजर रखे हुए है। फॉरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया के जनरल सेक्रेटरी मनोज यादव ने डीडब्ल्यू को बताया, "यह गंभीर चिंता का विषय है। बिना किसी चेतावनी के उन पर हमला क्यों किया गया?” यादव के पास फंसे हुए नाविकों के फोन दिन भर आते रहते हैं। ये नाविक बताते हैं कि खाड़ी में फंसे कई जहाजों पर खाने-पीने की चीजों और जरूरी सामान की भारी किल्लत हो रही है और वे बहुत मुश्किलों से जूझ रहे हैं। यूनियन के पास हर दिन उन नाविकों के परेशान और चिंतित घरवालों के भी ढेरों फोन आते हैं। यादव ने कहा, "वे जानना चाहते हैं कि क्या उनका बेटा सुरक्षित है? क्या उनका पति घर लौट रहा है?”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भले ही अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ रही है और समुद्री रास्ते (होर्मुज जलडमरूमध्य) में तनाव कम हो रहा है, लेकिन वहां फंसे हर एक जहाज को सुरक्षित बाहर निकालने में अब भी कई अड़चनें आ रही हैं। इसी हफ्ते, संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन&#39; (आईएमओ) ने होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे 11,000 से ज्यादा नाविकों और सैकड़ों जहाजों को वहां से सुरक्षित निकालने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	कूटनीति और परिवार की पीड़ा</h3>
<p>
	हमले के कई दिनों बाद भी भारत के ज्यादातर नेता पूरी तरह चुप रहे। जबकि, पीड़ितों के परिवार पल-पल की जानकारी के लिए इंतजार करते रहे। नेताओं की यह चुप्पी जल्द ही एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	नई दिल्ली (भारत सरकार) ने एक वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक के सामने अपनी कड़ी आपत्ति और कड़ा विरोध दर्ज कराया। वहीं दूसरी ओर, भारत के जहाजरानी और बंदरगाह मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इस घटना पर दुख जताते हुए कहा कि यह ‘समुद्री क्षेत्र से जुड़े हमारे परिवार के लिए एक बहुत बड़ी और गहरी क्षति&#39; है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विपक्ष ने सरकार पर बहुत कम कदम उठाने का आरोप लगाया और हमले को लेकर प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी पर सवाल उठाए। आखिरकार, जी7 सम्मेलन के दौरान मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के सामने यह मुद्दा उठाया और दुनिया भर के शिपिंग रूट पर काम करने वाले भारतीय नाविकों की सुरक्षा के महत्व पर जोर दिया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि, चौरसिया परिवार के लिए, यह उच्च-स्तरीय कूटनीति बहुत दूर की बात लग रही थी। उनके मन में अब भी कई ऐसे सवाल थे जिनका कोई जवाब नहीं मिला था। मसलन, क्या उन्हें कोई मुआवजा मिलेगा? क्योंकि उनके घर का कमाने वाला मुख्य सदस्य अचानक उनसे छिन चुका है और सिर पर कर्ज का भारी बोझ अब भी बना हुआ है। वे यह भी जानना चाहते हैं कि क्या उन खतरनाक समुद्री रास्तों पर काम कर रहे अन्य भारतीय नाविकों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं?</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आखिरकार, वे बस यही चाहते थे कि उनके परिवार के सदस्य का शव उन्हें वापस मिल जाए। कई दिनों तक, शिवानंद चौरसिया के छोटे भाई रामप्रवेश का ध्यान बस अपने फोन पर ही लगा रहा। फोन की हर घंटी के साथ एक नई उम्मीद जगती थी। फिर, नौवें दिन, आखिरकार वह फोन कॉल आ ही गया। शिवानंद का पार्थिव शरीर आखिरकार उनके गांव पहुंचा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कुछ घंटों बाद, सैकड़ों ग्रामीण शिवानंद की अंतिम यात्रा में शामिल हुए, चिता से लहरे उठीं और अंतिम संस्कार पूरा हो गया। शिवानंद का शव देश में आने का इंतजार तो खत्म हो गया, लेकिन उनके परिवार के लिए, जवाबदेही, मुआवजे और न्याय की तलाश तो अभी शुरू ही हुई है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 08:37:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 27 Jun 2026 08:50:06 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[नाटो प्रमुख से खुश लेकिन यूरोपीय साझेदारों से चिढ़े ट्रंप]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/donald-trump-mark-rutte-nato-europe-allies-iran-war-dispute-2026-126062600004_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2025-12/11/thumb/1_1/1765418927-3486.jpg"/>
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      <description><![CDATA[नीदरलैंड्स के पूर्व प्रधानमंत्री और नाटो के महासचिव मार्क रुटे को डोनाल्ड ट्रंप ने अपना दोस्त बताया है। लेकिन उनके देश समेत नाटो के यूरोपीय साझेदारों को अमेरिकी राष्ट्रपति ने फिर से तीखे ताने सुनाए हैं।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="US President Donald Trump" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2025-12/11/full/1765418927-3486.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="US President Donald Trump" width="1200" /></p>
	<strong>ओंकार सिंह जनौटी</strong></p>
<p>
	नीदरलैंड्स के पूर्व प्रधानमंत्री और नाटो के महासचिव मार्क रुटे को डोनाल्ड ट्रंप ने अपना दोस्त बताया है। लेकिन उनके देश समेत नाटो के यूरोपीय साझेदारों को अमेरिकी राष्ट्रपति ने फिर से तीखे ताने सुनाए हैं। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/pakistan-defence-budget-2026-increase-india-tension-drone-warfare-imf-126062500002_1.html" target="_blank">क्षेत्रीय तनाव के बीच पकिस्तान बढ़ा सकता है रक्षा खर्च</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	वॉशिंगटन पहुंचे नाटो महासचिव मार्क रुटे से मुलाकात के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, "वह मेरे मित्र हैं, वह शानदार व्यक्ति है, महान नेता, महान महाचिव हैं, हर कोई उनका सम्मान करता है।" अपने ओवल ऑफिस में रुटे के बगल में बैठे ट्रंप ने इसके बाद नाटो के यूरोपीय साझेदारों पर तंज कसा, "ईमानदारी से कहूं तो मुझे लगता है कि उनकी जगह इस पद पर अगर कोई और होता तो आज हम मिल भी नहीं रहे होते, क्योंकि हमें शर्मिंदा किया गया।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ट्रंप के मुताबिक, ईरान के साथ युद्ध के दौरान यूरोपीय साझेदारों के रुख ने अमेरिका को "शर्मिंदा किया।" 32 देशों वाले सैन्य साझेदारी संगठन नाटो में तुर्की समेत 30 यूरोपीय देश हैं। ये सभी देश 7-8 जुलाई 2026 को तुर्की की राजधानी अंकारा में होने वाले नाटो सम्मेलन में शिरकत करने जा रहे हैं। &#39;अंकारा समिट&#39; में नाटो देश सैन्य खर्च, हथियार उत्पादन और यूक्रेन की मदद जैसे कई मुद्दों पर चर्चा करेंगे। लेकिन इस सम्मलेन से पहले अमेरिका और यूरोपीय साझेदारों के बीच उभरे गहरे मतभेदों को सुलझाने के लिए नाटो महासचिव रुटे, वॉशिंगटन गए थे। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/united-nations-secretary-general-antonio-guterres-appealed-to-artificial-intelligence-companies-126062400028_1.html" target="_blank">UN महासचिव ने AI कंपनियों से मांगा बिजली, पानी और जमीन का हिसाब</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	रुटे के सामने ही ट्रंप ने कहा, "मैं इटली से निराश हुआ। मैं ब्रिटेन से निराश हुआ... हम जर्मनी और फ्रांस भी निराश हुए।" इस दौरान स्पेन की उन्होंने अलग से आलोचना की। ईरान युद्ध के दौरान स्पेन ने अमेरिकी सेना को अपने सैन्य अड्डे देने से इनकार कर दिया था। ऐसा ही इनकार कुछ अन्य यूरोपीय देशों ने भी किया।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्या है नाटो</h3>
<p>
	1949 में स्थापित किए गए नाटो का मुख्य उद्देश्य अपने सदस्य देशों की स्वतंत्रता व सुरक्षा की रक्षा करना है। 14 अनुच्छेदों वाले नाटो के संविधान में, धारा 5 खासी अहम है। यह सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर टिकी है। इसके तहत यदि किसी एक या एक से अधिक सदस्य देशों पर कोई सशस्त्र हमला होता है, तो उसे पूरे गठबंधन (सभी सदस्य देशों) पर हमला माना जाएगा। इसके जवाब में, सभी सदस्य देश सामूहिक रूप से सैन्य बल का उपयोग कर सकते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से अमेरिका नाटो में सबसे बड़ी सैन्य ताकत है। वॉशिंगटन, नाटो पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च भी करता है। ट्रंप ने राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले कार्यकाल (जनवरी 2017- जनवरी 2021) के दौरान भी नाटो के अन्य देशों को सेना पर कम खर्च करने के लिए खरी खोटी सुनाई थी। वर्तमान में उनके दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान नाटो के यूरोपीय साझेदारों ने अपने बजट का पांच फीसदी हिस्सा सैन्य तैयारियों पर खर्च करने पर सहमति जताई है। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/brexit-10-years-later-impact-on-uk-economy-politics-and-immigration-126062200010_1.html" target="_blank">ब्रेक्जिट के 10 साल: ब्रिटेन को भारी पड़ा अलग होने का फैसला</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<h3>
	यूरोपीय साझेदारों से नाराज क्यों हैं ट्रंप</h3>
<p>
	अमेरिका ने इजराइल के साथ मिलकर फरवरी 2026 में ईरान पर हमले किए। यूरोपीय साझेदारों का कहना है कि इन हमलों से पहले ना तो उनके साथ कोई मशविरा किया गया और ना ही उनकी आपत्तियों पर ध्यान दिया गया। खाड़ी के देशों ने भी अमेरिका से ईरान पर हमले ना करने की अपीलें की थीं, लेकिन इन अपीलों को बावजूद अमेरिका और इजराइल ने ईरान से युद्ध छेड़ा। ईरान युद्ध का मकसद क्या था? युद्ध की व्यापक रणनीति क्या थी? ईरान पर हमले कर अमेरिका क्या हासिल करना चाहता था? ये सवाल अब भी अनसुलझे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि जून 2025 में भी अमेरिका और इस्राएल ने ईरान पर 12 दिन तक हवाई हमले किए थे। लेकिन इस बार शुरू किए गए हमलों में ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातोल्लाह अली खमेनेई की मौत हो गई। खमेनेई की मौत के बाद ईरान ने भी पूरी ताकत से पलटवार किया और मध्य पूर्व में भीषण जंग छिड़ गई। ईरान ने इजराइल के साथ साथ, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, बहरीन, कतर, ओमान और कुवैत के कई सैन्य व पेट्रोलियम प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। तेहरान ने मध्य पूर्व में अमेरिकी सेना के ठिकानों को खासा नुकसान पहुंचाया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ईरान युद्ध का असर खाड़ी ही बल्कि पूरी दुनिया ने महसूस किया। तेहरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने से पूरे विश्व में पेट्रोलियम और खाद की सप्लाई चरमरा गई। तेल सप्लाई को सुचारू व सस्ता बनाए रखने के लिए खुद अमेरिका को अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को 1980 के दशक के बाद सबसे नीचे ले जाना पड़ा। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़े दबाव की वजह से अमेरिकी राष्ट्रपति को तेहरान के साथ संघर्ष विराम करना पड़ा। हालांकि संघर्ष विराम की शर्तों को लेकर अब भी स्थिति साफ नहीं है।<br />
	 </p>
<h3>
	नाटो के सामने कैसी चुनौतियां हैं?</h3>
<p>
	करीब 35 साल पहले सोवियत संघ के पतन के साथ ही अमेरिका दुनिया की एक मात्र महाशक्ति बन गया। लेकिन बीते 10 साल में चीन ने अब उसे चुनौती देना शुरू कर दिया है। हाल ही में बीजिंग पहुंचे ट्रंप से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कह चुके हैं कि ताकत का केंद्र बदल रहा है और इसे विनम्रता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वॉशिंगटन को रूस और चीन की गहराती दोस्ती की भी चिंता है। लेकिन अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के क्वाड ग्रुप को ट्रंप करीबन मूर्छित कर चुके हैं। मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति बीच बीच में ब्रिक्स देशों को लेकर भी अपनी खीझ जाहिर करते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका अब रणनीतिक रूप से चीन पर ध्यान लगाए। वहीं यूरोपीय साझेदार यूक्रेन पर कब्जा कर रहे रूस को अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चिंता मानते हैं। नाटो के इतिहास में यह पहला मौका है जब साझेदार देशों के सामने अलग अलग किस्म के लक्ष्य हैं। मुश्किल यह है कि ट्रंप अपने हितों को पूरा करने के लिए साझेदारों को दंडित करने भी नहीं चूकते हैं। टैरिफ वॉर, कारोबारी समझौते के लिए दबाव और आए दिन विदेशी नेताओं को असहज करने वाले उनके बयान इसी का उदाहरण पेश करते हैं।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 08:09:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 26 Jun 2026 08:19:34 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्षेत्रीय तनाव के बीच पकिस्तान बढ़ा सकता है रक्षा खर्च]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/pakistan-defence-budget-2026-increase-india-tension-drone-warfare-imf-126062500002_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/pakistan-defence-budget-2026-increase-india-tension-drone-warfare-imf-126062500002_1.html</guid>
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      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/18/thumb/1_1/1779106464-2067.jpg</image>
      <description><![CDATA[जून 2026 में पाकिस्तान की सरकार ने सांसदों के सामने बजट का ड्राफ्ट पेश किया। बजट प्रस्ताव के अनुसार, पाकिस्तान रक्षा क्षेत्र पर अपना खर्च 18 प्रतिशत बढ़ाकर 3000 अरब रुपये (3 ट्रिलियन) करने जा रहा है।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="pakistan defence budget" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/18/full/1779106464-2067.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
	शकूर रहीम</p>
<p>
	जून 2026 में पाकिस्तान की सरकार ने सांसदों के सामने बजट का ड्राफ्ट पेश किया। बजट प्रस्ताव के अनुसार, पाकिस्तान रक्षा क्षेत्र पर अपना खर्च 18 प्रतिशत बढ़ाकर 3000 अरब रुपये (3 ट्रिलियन) करने जा रहा है। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/united-nations-secretary-general-antonio-guterres-appealed-to-artificial-intelligence-companies-126062400028_1.html" target="_blank">UN महासचिव ने AI कंपनियों से मांगा बिजली, पानी और जमीन का हिसाब</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	पाकिस्तान के वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब ने कहा कि यह बढ़ोतरी क्षेत्र में मौजूद अनिश्चितताओं के कारण देश को मजबूत बनाने के उद्देश्य से की गई है। विश्लेषक मानते हैं कि इस फैसले के पीछे दक्षिण एशिया में तेजी से बदलती सैन्य तकनीकें और उभरते सुरक्षा खतरे, प्रमुख कारण हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस्लामाबाद स्थित रक्षा विश्लेषक मारिया सुल्तान डीडब्ल्यू से कहती हैं, "भविष्य के संघर्ष अब केवल दो विरोधियों के बीच सीमित नहीं रहेंगे। ये कई देशों से आने वाले हथियारों और तकनीकों से तय होंगे, जो जमीन, हवा, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्रों में एक साथ लड़े जाएंगे।" <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/india-biggest-military-drone-deal-border-surveillance-defence-modernisation-126061900002_1.html" target="_blank">भविष्य की सैन्य ताकत के लिए भारत का स्वदेशी ड्रोन पर जोर</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<h3>
	कैसे बदल रहे हैं दक्षिण एशिया में सुरक्षा के समीकरण</h3>
<p>
	मारिया सुल्तान ने डीडब्ल्यू को बताया कि यूक्रेन और मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध के साथ ही पिछले साल परमाणु हथियार से लैस पड़ोसी देशों भारत-पाकिस्तान के बीच हुए टकराव ने सैन्य योजनाकारों के सोचने के तरीके में बदलाव किया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	नई दिल्ली ने भारत के नियंत्रण वाले कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों पर हुए जानलेवा हमले का जबाव, मई 2025 में &#39;ऑपरेशन सिंदूर&#39; से दिया। पहलगाम हमले में 26 लोग मारे गए थे, जिनमें से ज्यादातर भारतीय हिंदू पर्यटक थे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भारत ने दावा किया था कि पाकिस्तान स्थित संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने इस हमले को अंजाम दिया। संयुक्त राष्ट्र ने इसे आतंकवादी संगठन घोषित किया हुआ है। नई दिल्ली ने इस समूह को समर्थन देने का आरोप भी इस्लामाबाद पर लगाया। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इस आरोप से इनकार किया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भारत और पाकिस्तान दोनों ही पूरे कश्मीर पर अपना दावा करते हैं। हालांकि दोनों देशों का नियंत्रण इसके कुछ हिस्से पर ही है। इसी वजह से मुस्लिम-बहुल यह इलाका भारत और पाकिस्तान के बीच भू-राजनीतिक टकराव का संवेदनशील केंद्र बना हुआ है। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/brexit-10-years-later-impact-on-uk-economy-politics-and-immigration-126062200010_1.html" target="_blank">ब्रेक्जिट के 10 साल: ब्रिटेन को भारी पड़ा अलग होने का फैसला</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	पहलगाम हमले के बाद हुई झड़पों ने दक्षिण एशिया में रणनीतिक स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ा दीं और परमाणु हथियार रखने वाले विरोधी देशों के बीच परमाणु प्रतिरोध (न्यूक्लियर डेटरेंस) की सीमाओं पर बहस छेड़ दी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस्लामाबाद स्थित थिंक टैंक सनोबर इंस्टीट्यूट के कार्यकारी निदेशक कमर चीमा कहते हैं, "इस टकराव से यह साबित हो गया कि परमाणु हथियार जरूरी नहीं कि परमाणु युद्ध की नौबत आने से पहले होने वाले पारंपरिक संघर्ष को रोक सकें।"</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	कई मोर्चों पर युद्ध का जोखिम</h3>
<p>
	चीमा के अनुसार भारत के लगातार सैन्य आधुनिकीकरण और आधुनिक युद्ध में ड्रोन, साइबर क्षमताओं तथा सटीक निशाना साधने वाले हथियारों (प्रिसिजन-गाइडेड वेपंस) की क्षमता से पाकिस्तान के सैन्य योजनाकारों को अपनी सुरक्षा रणनीति और सैन्य तैयारियों पर नए सिरे से विचार करना पड़ रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यह चुनौती केवल भारत के साथ पाकिस्तान की पूर्वी सीमा तक ही सीमित नहीं है। इस्लामाबाद पड़ोसी अफगानिस्तान के साथ भी संघर्ष में उलझा हुआ है, खासकर उसके पश्चिमी प्रांतों खैबर पख्तूनख्वाह और बलोचिस्तान में।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	फरवरी में इस्लामाबाद ने काबुल के साथ ‘खुली जंग&#39; का एलान किया। यह घोषणा पाकिस्तान के भीतर आम नागरिकों और सुरक्षा बलों पर उग्रवादी हमलों में बढ़ोतरी के बाद की गई थी। पाकिस्तान ने कई बार काबुल पर आरोप लगाया है कि वह अफगानिस्तान की धरती से पाकिस्तान पर हमला करने वाले उग्रवादी समूहों को रोकने में नाकाम रहा है। हालांकि, काबुल इन आरोपों को खारिज करता आया है। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/sweden-considers-jailing-13-year-olds-to-tackle-gang-crime-126061100005_1.html" target="_blank">क्यों हो रहा है स्वीडन में किशोरों को जेल भेजने पर विचार?</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<h3>
	भारत की तुलना में पाकिस्तान का रक्षा बजट कितना कम</h3>
<p>
	खर्च में यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब पाकिस्तान, इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (आईएमएफ) के 7 अरब डॉलर के प्रोग्राम की शर्तों को पूरा करने की कोशिश कर रहा है। इस प्रोग्राम ने पाकिस्तान को 2022-23 के आर्थिक संकट के बाद डिफॉल्ट से बचने और मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिरता बहाल करने में मदद की थी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सरकार का मकसद टैक्स में सुधार, टैरिफ रेशनलाइजेशन और एक्सपोर्ट व निवेश को बढ़ावा देने वाले उपायों के जरिए पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को स्थिरता से विकास की ओर ले जाना है। आईएमएफ ने पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ परामर्श बैठकें की थीं। इन चर्चाओं में देश की राजकोषीय रूपरेखा (फिस्कल फ्रेमवर्क) और राजस्व संबंधी अनुमान (रेवेन्यू असम्प्शन्स) कार्यक्रम से संबंधित बातचीत केंद्र में रहीं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जून में खत्म हुए वित्तीय वर्ष में पाकिस्तान की इकोनॉमी बढ़कर लगभग 452 अरब डॉलर हो गई। वहीं, भारत की आबादी, पाकिस्तान की तुलना में लगभग 5.7 गुना अधिक है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था पाकिस्तान के नौ गुना से भी अधिक बड़ी है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) लगभग 4.15 ट्रिलियन डॉलर आंका गया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दोनों एटमी देशों के रक्षा बजट में भी इसी तरह का बड़ा अंतर देखा जा सकता है। भारत का सालाना रक्षा खर्च लगभग 86 अरब डॉलर है, जो पाकिस्तान के खर्च से लगभग आठ गुना अधिक है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	पाकिस्तान की सेना के प्रवक्ता अहमद शरीफ चौधरी इसे स्वीकार करते हैं। उन्होंने पिछले साल अमेरिकी मीडिया संस्थान ब्लूमबर्ग को दिए इंटरव्यू में कहा, "हमारे पास खर्च करने के लिए असीमित पैसा नहीं है। पाकिस्तान का रक्षा बजट उसके पड़ोसी देश के बजट का बहुत छोटा हिस्सा है।"</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	आर्थिक दबाव और सुरक्षा प्राथमिकताओं के बीच संतुलन चुनौती</h3>
<p>
	कॉलमनिस्ट और आर्थिक मामलों के जानकार खुर्रम हुसैन ने बताया कि पाकिस्तान ने हमेशा से ही रक्षा खर्च को प्राथमिकता दी है, यहां तक कि आर्थिक तंगी के समय में भी। वह कहते हैं, "मौजूदा आईएमएफ प्रोग्राम के तहत सरकार के लिए संतुलन बनाना एक नाजुक काम है। मगर आईएमएफ भी जमीनी हकीकत को समझता है। मुझे लगता है कि वे जानते हैं कि रक्षा खर्च पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता है इसलिए वे दूसरे सेक्टर में ज्यादा सुधारों पर जोर देते हैं।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कुछ अर्थशास्त्रियों और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर राज्यों से वित्तीय बोझ का ज्यादा हिस्सा उठाने की उम्मीद की जाती है, तो विकास से जुड़ी प्राथमिकताओं पर इसका दबाव पड़ सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस्लामाबाद स्थित अर्थशास्त्री फारूख सलीम कहते हैं, "पाकिस्तान ने हमेशा उन सुरक्षा जरूरतों के लिए धन का इंतजाम किया है जिन्हें वह बहुत जरूरी मानता है। ज्यादा मुश्किल सवाल यह है कि क्या उन फैसलों को बनाए रखने के लिए महत्तवपूर्ण राजनीतिक सहमति तब भी बनी रहेगी, जब प्रांतों को इसके नतीजों या &#39;ट्रेड-ऑफ&#39; का असर सीधे तौर पर महसूस होने लगेगा।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पाकिस्तान सांसदों को इस महीने के अंत तक रक्षा बजट में बढ़ोतरी के प्रस्ताव पर मतदान करना है।  एक जुलाई से नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत होनी है। सरकार चाहती है इसके पहले इस प्रस्ताव को संसद की मंजूरी मिल जाए।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 07:59:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 25 Jun 2026 08:07:06 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[UN महासचिव ने AI कंपनियों से मांगा बिजली, पानी और जमीन का हिसाब]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/united-nations-secretary-general-antonio-guterres-appealed-to-artificial-intelligence-companies-126062400028_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/united-nations-secretary-general-antonio-guterres-appealed-to-artificial-intelligence-companies-126062400028_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-04/03/thumb/1_1/1775200986-9943.jpg"/>
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      <description><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों से अपने कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की अपील की है। उन्होंने कंपनियों से बिजली, पानी और जमीन के इस्तेमाल का हिसाब भी मांगा। लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक को ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="United Nations Secretary General Antonio Guterres appealed to artificial intelligence companies" class="imgCont" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-04/03/full/1775200986-9943.jpg" style="border: 1px solid rgb(221, 221, 221); margin-right: 0px; z-index: 0; width: 1200px; height: 675px;" title="Antinio Guterres" /></p>
	<strong>- ओंकार सिंह जनौटी</strong><br />
	संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों से अपने कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की अपील की है। उन्होंने कंपनियों से बिजली, पानी और जमीन के इस्तेमाल का हिसाब भी मांगा। लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक को संबोधित करते हुए मंगलवार को यूएन महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने एआई एनवायरनमेंटल ट्रांसपेरेंसी इनिशिएटिव का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि एआई कंपनियों को अपनी तकनीक के पर्यावरण पर पड़ रहे असर को मापना और सार्वजनिक करना चाहिए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जलवायु परिवर्तन के भीषण होते असर के बीच एआई कंपनियों पर पर्यावरण को लेकर पारदर्शिता बढ़ाने का दबाव बढ़ रहा है। डाटा सेंटर वाले इलाकों में स्थानीय स्तर पर भी ऐसी मांगें उठने लगी हैं। उद्योग में एकसमान रिपोर्टिंग प्रणाली की जरूरत भी जताई जा रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आंकड़ें जमा करने वाली कुछ वेबसाइटों के मुताबिक, इस वक्त दुनियाभर में करीब 12000 से ज्यादा डाटा सेंटर हैं। ये सेंटर पूरी दुनिया उपलब्ध बिजली में से 2 से 3 फीसदी खर्च कर रहे हैं। 20 जून से 28 जून 2026 तक चलने वाले लंदन क्लामेट एक्शन वीक में गुटेरेश ने कहा कि कंपनियां 2030 तक अपने संचालन को स्वच्छ ऊर्जा से चलाने का लक्ष्य तय करें। उन्होंने कहा, अब लागत छिपाई नहीं चलेगी। बोझ उन लोगों पर नहीं डाला जाना चाहिए जो इसे उठाने में सक्षम नहीं हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	कितनी बिजली फूंक रहे हैं डाटा सेंटर?</h3>
<p>
	कई बड़ी टेक कंपनियों ने स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल का वादा कर चुकी है। कुछ कंपनियां इस दशक के अंत तक अपने संचालन को पूरी तरह से स्वच्छ ऊर्जा से चलाने की योजना बना रही हैं। एमेजॉन और गूगल जैसी कंपनियां इसके लिए सौर और परमाणु ऊर्जा पर भी जोर दे रही हैं लेकिन एआई की तीखी होड़ ने इन वादों को जटिल बना दिया है। कई छोटी कंपनियां ऐसे वादों से मीलों दूर रहती हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के मुताबिक, दुनियाभर के डाटा सेंटरों में खर्च होने वाली बिजली का करीब 30 प्रतिशत हिस्सा कोयले से आता है। करीब 27 फीसदी बिजली, हवा, सौर और पनबिजली संयंत्रों से आती है। प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत और परमाणु ऊर्जा की 15 परसेंट है। अगले पांच साल में स्वच्छ ऊर्जा से इन जरूरतों का केवल आधा हिस्सा ही पूरा किया जा सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि गुटेरेश समेत कई विशेषज्ञ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को जलवायु समाधान के लिए उपयोगी भी करार देते हैं। एआई, ऊर्जा से जुड़ी किफायत बढ़ाने और प्रदूषण व उत्सर्जन घटाने में मदद कर सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्या ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए भी जिम्मेदार है एआई?</h3>
<p>
	लेकिन दूसरी ओर, आईए सिस्टमों के लिए लगातार बनते और फैलते डाटा सेंटरों का पर्यावरण पर असरबड़ा होता जा रहा है। जून 2026 में ही जारी यूएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अब डाटा सेंटरों का असर, दुनिया के कुछ बड़े देशों के उत्सर्जन के बराबर हो चुका है। रिपोर्ट में यह भी कहा है कि अगले चार साल में सिर्फ एआई के कारण बिजली और पानी की खपत दोगुनी हो सकती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गुटेरेश ने कहा, इन चिंताओं के बावजूद, अक्सर स्थानीय समुदायों को यह नहीं बताया जाता कि उनके आसपास बन रहे ढांचों का पर्यावरण पर क्या असर पड़ रहा है। लंदन में अपने संबोधन में गुटेरेश ने एआई समेत कई जरूरी कदमों का जिक्र किया। यूएन महासचिव ने वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रखने के वादे की याद भी दिलाई।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यह लक्ष्य वर्ष 2015 के पेरिस समझौते में तय किया गया था। हालांकि 2025 में पहली बार तीन साल के औसत तापमान ने इस सीमा को पार कर लिया। गुटेरेश ने कहा, हर प्रमुख उत्सर्जक को तेजी से कार्रवाई करनी होगी। हर देश को अपने वादों से आगे बढ़कर काम करना होगा।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	किन मुश्किलों को हल कर रही है स्वच्छ ऊर्जा</h3>
<p>
	तमाम चिंताओं के बीच 2025 में स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में बड़ी छलांग देखने को भी मिली। पहली बार दुनिया के कुल बिजली उत्पादन में स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी एक तिहाई से अधिक पहुंच गई। वहीं कोयले की हिस्सेदारी घटकर एक तिहाई से नीचे आ गई। चीन स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में आगे बना हुआ है। यूरोप में भी जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा उत्पादन में गिरावट आ रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दूसरी तरफ अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के नेतृत्व में जीवाश्म ईंधन के उत्पादन व उसकी खपत को बढ़ावा मिला है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले अमेरिका में नवीकरणीय ऊर्जा और इको फ्रेंडली नीतियों के समर्थन में कटौती की जा रही है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 12:41:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 24 Jun 2026 12:52:18 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अब जवान लाशें ढोते-ढोते थक गया है देश, किस काम का ऐसा सिस्टम, जो हमारे बच्चों को बचा न सके?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/editorial-articles/nation-is-weary-of-carrying-the-bodies-of-its-young-what-use-is-a-system-like-this-126062300016_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/editorial-articles/nation-is-weary-of-carrying-the-bodies-of-its-young-what-use-is-a-system-like-this-126062300016_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/23/thumb/1_1/1782200131-8564.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/23/thumb/1_1/1782200131-8564.jpg</image>
      <description><![CDATA["पापा... प्लीज मुझे बचा लो..." यह सिर्फ एक बेटे की आखिरी पुकार नहीं थी। यह उस भारत की चीख थी, जो हर कुछ महीनों में अपने युवाओं को किसी न किसी लापरवाही, भ्रष्टाचार और सिस्टम की नाकामी की आग में खो देता है। लखनऊ के अग्निकांड में जब 23 वर्षीय गेम ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
	<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
		<img align="center" alt="Lakhnow fire news" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/23/full/1782200131-8564.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Lakhnow fire news" width="1200" /></p>
</p>
<br />
<strong>"</strong><strong>पापा... प्लीज मुझे बचा लो..."</strong> यह सिर्फ एक बेटे की आखिरी पुकार नहीं थी। यह उस भारत की चीख थी, जो हर कुछ महीनों में अपने युवाओं को किसी न किसी लापरवाही, भ्रष्टाचार और सिस्टम की नाकामी की आग में खो देता है।<br />
<br />
लखनऊ के अग्निकांड में जब 23 वर्षीय गेम डिजाइनर सुखमनी सिंह ने अपने पिता को फोन किया<strong>—"</strong><strong>पापा</strong><strong>, </strong><strong>मुझे बचा लो"</strong><strong>—</strong> तब वह सिर्फ अपने लिए मदद नहीं मांग रहा था। वह उस व्यवस्था से सवाल कर रहा था, जो इमारतों को मंजूरी तो देती है, लेकिन निकास द्वारों की जांच नहीं करती; जो फायर एनओसी जारी तो करती है, लेकिन यह नहीं देखती कि आपातकाल में लोग बाहर निकल भी पाएंगे या नहीं।<br />
<br />
<strong>उसके कुछ मिनट बाद फोन कट गया।</strong><br />
और फिर हमेशा की तरह शुरू हुआ वही राष्ट्रीय अनुष्ठान—मुआवजे की घोषणा, जांच समिति, अधिकारियों का निलंबन, टीवी डिबेट और सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि।<br />
<br />
लेकिन सवाल वही रह गया<strong>—</strong><strong>क्या हमारे बच्चों की जिंदगी की कीमत सिर्फ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस</strong><strong>, </strong><strong>जांच समिति और पांच लाख रुपये है</strong><strong>?</strong><br />
<br />
<strong>हर हादसे के बाद हम भूल क्यों जाते हैं</strong><strong>?</strong><br />
लखनऊ कोई पहली त्रासदी नहीं है। 2019 में सूरत के कोचिंग सेंटर में लगी आग में 22 छात्रों की मौत हुई थी। कुछ बच्चों ने जान बचाने के लिए चौथी मंजिल से छलांग लगा दी थी। पूरे देश ने वह भयावह दृश्य देखा था।<br />
2024 में राजकोट के गेमिंग जोन में आग लगी। 27 लोग जिंदा जल गए, जिनमें कई बच्चे शामिल थे। दिल्ली के उपहार सिनेमा कांड से लेकर मुंबई के कमला मिल्स अग्निकांड तक, अस्पतालों से लेकर कोचिंग सेंटरों तक, हम एक ही कहानी बार-बार पढ़ते हैं।<br />
<strong>•     </strong><strong>अवैध निर्माण।</strong><br />
<strong>•     </strong><strong>बंद आपातकालीन निकास।</strong><br />
<strong>•     </strong><strong>फर्जी या कागजी फायर एनओसी।</strong><br />
<strong>•     </strong><strong>और हादसे के बाद जिम्मेदारी का पिंग-पोंग।</strong><br />
<strong>•     </strong><strong>हर बार सरकारें कहती हैं</strong><strong>—"</strong><strong>दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।"</strong><br />
 <br />
लेकिन सच्चाई यह है कि दोषी अक्सर बच जाते हैं और मरने वाले हमेशा आम नागरिक होते हैं।<br />
<strong>भारत में मौतें प्राकृतिक नहीं</strong><strong>, </strong><strong>प्रशासनिक होती जा रही हैं</strong><br />
यह कहना कठोर लग सकता है, लेकिन आज भारत में होने वाली कई सामूहिक मौतें दुर्घटनाएं नहीं, बल्कि <strong>"प्रशासनिक हत्याएं"</strong> हैं।<br />
जब किसी इमारत में लोगों के निकलने का रास्ता नहीं होता, तो आग नहीं मारती—लापरवाही मारती है। जब फायर ऑडिट सिर्फ फाइलों में होता है,<strong> तो धुआं नहीं मारता—भ्रष्टाचार मारता है।</strong><br />
जब राहत और बचाव में हर मिनट कीमती होता है और फैसले लेने में घंटों लग जाते हैं, तो ऑक्सीजन की कमी नहीं, बल्कि अक्षमता जान लेती है। लखनऊ के पीड़ितों के परिजनों का आरोप है कि यदि दीवार पहले तोड़ी जाती, तो कई जानें बच सकती थीं।<br />
<br />
<strong>कल्पना कीजिए उस क्षण की।</strong><br />
एक तरफ परिजन फोन पर मौत से जूझ रहे अपने बच्चों से बात कर रहे थे। दूसरी तरफ प्रशासन निर्णय लेने में व्यस्त था। और बीच में समय खत्म हो रहा था।<br />
<br />
<strong>युवाओं का देश या युवाओं का कब्रिस्तान</strong><strong>?</strong><br />
<strong>•     </strong><strong>हम दुनिया को बताते हैं कि भारत सबसे युवा देशों में से एक है।</strong><br />
<strong>•     </strong><strong>हम "डेमोग्राफिक डिविडेंड" की बात करते हैं।</strong><br />
<strong>•     </strong><strong>हम स्टार्टअप</strong><strong>, </strong><strong>डिजिटल इंडिया</strong><strong>, </strong><strong>एआई और पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के सपने दिखाते हैं।</strong><br />
<strong>•     </strong><strong>लेकिन क्या हम यह सुनिश्चित कर पाए हैं कि हमारे युवा सुबह घर से निकलें और शाम को सुरक्षित लौट आएं</strong><strong>?</strong><br />
<strong>•     </strong><strong>अगर एक ग्राफिक्स ट्रेनिंग सेंटर</strong><strong>, </strong><strong>एक कोचिंग क्लास</strong><strong>, </strong><strong>एक गेमिंग जोन या एक अस्पताल तक सुरक्षित नहीं है</strong><strong>, </strong><strong>तो फिर विकास के इन दावों का अर्थ क्या है</strong><strong>?</strong><br />
किसी भी राष्ट्र की असली प्रगति उसके जीडीपी से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने नागरिकों की जान की कितनी रक्षा कर पाता है।<br />
<br />
<strong>जांच नहीं</strong><strong>, </strong><strong>जवाबदेही चाहिए</strong><br />
समस्या यह नहीं है कि हादसे क्यों हो रहे हैं। समस्या यह है कि हादसों के बाद भी कुछ नहीं बदलता। हर त्रासदी के बाद एक जांच समिति बनती है। रिपोर्ट आती है। फाइल बंद हो जाती है। फिर अगला हादसा हो जाता है। देश को अब जांच समितियों की नहीं, जवाबदेही की जरूरत है।<br />
ऐसी जवाबदेही जिसमें:<br />
<strong>•     </strong><strong>फर्जी एनओसी देने वाले अधिकारी जेल जाएं।</strong><br />
<strong>•     </strong><strong>अवैध निर्माण करने वाले मालिकों की संपत्ति जब्त हो।</strong><br />
<strong>•     </strong><strong>सुरक्षा नियमों की अनदेखी को गैर-इरादतन हत्या नहीं</strong><strong>, </strong><strong>गंभीर आपराधिक अपराध माना जाए।</strong><br />
<strong>•     </strong><strong>हर सार्वजनिक भवन का वार्षिक सुरक्षा ऑडिट सार्वजनिक किया जाए।</strong><br />
जब तक लापरवाही की कीमत मौत नहीं, बल्कि जेल और आर्थिक विनाश नहीं बनेगी, तब तक कुछ नहीं बदलेगा।<br />
<strong>मुआवजा न्याय नहीं होता</strong><br />
हर हादसे के बाद सरकारें मुआवजे की घोषणा करती हैं। लेकिन क्या किसी पिता के लिए उसके बेटे की कीमत पांच लाख, दस लाख या पच्चीस लाख रुपये हो सकती है?<br />
क्या किसी मां को यह सांत्वना मिल सकती है कि उसका बच्चा तो चला गया, लेकिन सरकार ने सहायता राशि दे दी?<br />
<strong>मुआवजा राहत हो सकता है। न्याय नहीं।<br />
•      न्याय तब होगा जब जिम्मेदार लोग व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह होंगे।<br />
•      न्याय तब होगा जब किसी अधिकारी को यह डर होगा कि उसकी एक लापरवाही उसे जेल पहुंचा सकती है।<br />
•      न्याय तब होगा जब सुरक्षा नियमों की अनदेखी आर्थिक अपराध नहीं, सामाजिक अपराध मानी जाएगी।<br />
युवा भारत की सबसे बड़ी पूंजी हैं, फिर भी सबसे असुरक्षित क्यों?</strong><br />
देश का हर राजनीतिक दल युवाओं की बात करता है। हर बजट में युवाओं का जिक्र होता है। हर चुनाव में युवाओं के सपने बेचे जाते हैं।<br />
लेकिन जब कोई युवा नौकरी सीखने, पढ़ने, ट्रेनिंग लेने या काम करने जाता है, तो क्या हम उसकी सुरक्षा की गारंटी दे सकते हैं?<br />
नहीं।<br />
यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। हम दुनिया को बताते हैं कि भारत का भविष्य उसके युवा हैं। लेकिन व्यवहार में हम उन्हें ऐसी इमारतों, संस्थानों और व्यवस्थाओं के हवाले कर देते हैं जो कभी भी उनकी कब्र बन सकती हैं।<br />
<strong>हमें जांच आयोग नहीं, राष्ट्रीय शर्म की जरूरत है</strong><br />
भारत में हर त्रासदी के बाद एक परिचित पटकथा चलती है—<br />
<strong>जांच समिति।<br />
निलंबन।<br />
मुआवजा।<br />
राजनीतिक बयान।<br />
और फिर विस्मृति।<br />
हम भूल जाते हैं।<br />
सिस्टम बच जाता है।</strong><br />
और अगली त्रासदी का इंतजार शुरू हो जाता है। शायद समस्या यह नहीं कि हादसे हो रहे हैं। समस्या यह है कि हमने हादसों को सामान्य मान लिया है।<br />
हमारे भीतर का आक्रोश कम हो गया है। हम अब मौतों की संख्या गिनते हैं, कारण नहीं। हम शोक मनाते हैं, परिवर्तन की मांग नहीं करते।<br />
<strong>आखिरी सवाल</strong><br />
कल्पना कीजिए उस पिता की, जिसने अपने बेटे की आखिरी आवाज सुनी—<br />
<strong>"पापा, मुझे बचा लो..."<br />
उस क्षण उस पिता को सरकार याद नहीं आई होगी।<br />
न कानून।<br />
न राजनीति।<br />
न विकास।</strong><br />
उसे सिर्फ यह उम्मीद रही होगी कि कोई व्यवस्था होगी जो उसके बच्चे को बचा लेगी।<br />
लेकिन वह व्यवस्था नहीं आई।<br />
और यही इस पूरे प्रकरण का सबसे भयावह सच है। किसी भी सभ्य राष्ट्र की पहचान उसके स्मारकों, एक्सप्रेसवे, जीडीपी या चुनावों से नहीं होती।<br />
<strong>उसकी पहचान इस बात से होती है कि संकट की घड़ी में वह अपने सबसे कमजोर नागरिक को बचा पाता है या नहीं।</strong> अगर हम अपने युवाओं को सुरक्षित नहीं रख सकते, तो हमें यह स्वीकार करने का साहस भी रखना चाहिए कि हम विकासशील अर्थव्यवस्था तो बन रहे हैं, लेकिन अभी तक एक जिम्मेदार समाज नहीं बन पाए हैं।<br />
और तब तक, हर अग्निकांड, हर भगदड़, हर ढही हुई इमारत और हर दम घुटती हुई मौत हमसे एक ही सवाल पूछती रहेगी— क्या भारत दुनिया की महाशक्ति बनने से पहले अपने बच्चों को बचाने वाला राष्ट्र बन पाएगा?<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 13:05:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 23 Jun 2026 13:05:53 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[editorial]]></category>
      <authorname>संदीप सिंह सिसोदिया</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[फिर से भारतीय छात्रों की पसंद क्यों बनी सिविल इंजीनियरिंग?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/iit-admission-2026-civil-engineering-demand-rises-ai-job-uncertainty-impact-126062300002_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/iit-admission-2026-civil-engineering-demand-rises-ai-job-uncertainty-impact-126062300002_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/23/thumb/1_1/1782183099-0547.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/23/thumb/1_1/1782183099-0547.jpg</image>
      <description><![CDATA[आईआईटी में दाखिले का मौजूदा दौर इस बदलाव की पुष्टि करता है। शिक्षाविदों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि कंप्यूटर साइंस के प्रति छात्रों की दिलचस्पी में गिरावट आई है। यह अब भी लोकप्रिय है। लेकिन स्थापित मानदंडों के विपरीत इस साल सिविल इंजीनियरिंग भी ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="IIT admission trends 2026" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/23/full/1782183099-0547.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="IIT admission trends 2026 Photo AI Generated" width="1200" /></p>
	</p>
	प्रभाकर मणि तिवारी</p>
<p>
	आईआईटी में दाखिले का मौजूदा दौर इस बदलाव की पुष्टि करता है। शिक्षाविदों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि कंप्यूटर साइंस के प्रति छात्रों की दिलचस्पी में गिरावट आई है। यह अब भी लोकप्रिय है। लेकिन स्थापित मानदंडों के विपरीत इस साल सिविल इंजीनियरिंग भी तेजी से मेधावी छात्रों की पसंद बन कर उभरी है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बीते साल तक इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। उनका कहना था कि बड़ी संख्या में पढ़ाई में तेज छात्र अब ऐसे फैसले ले रहे हैं जो पारंपरिक सोच की बजाय दूरदर्शिता पर आधारित है। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/brexit-10-years-later-impact-on-uk-economy-politics-and-immigration-126062200010_1.html" target="_blank">ब्रेक्जिट के 10 साल: ब्रिटेन को भारी पड़ा अलग होने का फैसला</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<h3>
	सिविल इंजीनियरिंग की बढ़ती अहमियत</h3>
<p>
	विशेषज्ञों के मुताबिक, भारतीय तकनीकी संस्थानों (आईआईटी) में कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसई) के बाद मैथमेटिक्स एंड कंप्यूटिंग (एमएनसी) छात्रों की दूसरी सबसे पसंदीदा ब्रांच रही है। एमएनसी छात्रों में काफी लोकप्रिय है और उनको क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग फर्म के अलावा डाटा साइंस और इन्वेस्टमेंट बैंक सेक्टर में मोटे पैकेज वाली बेहतरीन नौकरियां मिलती रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वर्ष 2018 में आईआईटी, हैदराबाद ने पहली बार एआई में बीटेक की पढ़ाई शुरू की थी। उसके बाद बीते तीन वर्षो के दौरान पटना, खड़गपुर, मद्रास और मंडी स्थित आईआईटी में एआई और डाटा एनालिटिक्स जैसे नए कोर्स शुरू किए गए हैं। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/india-biggest-military-drone-deal-border-surveillance-defence-modernisation-126061900002_1.html" target="_blank">भविष्य की सैन्य ताकत के लिए भारत का स्वदेशी ड्रोन पर जोर</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	खासकर आईआईटी की प्रवेश परीक्षा जेईई-एडवांस्ड में पहले सौ स्थानों पर रहने वाले छात्र तो आंख मूंद कर आईआईटी, मुंबई और दिल्ली में कंप्यूटर साइंस का कोर्स ही चुनते रहे हैं। कंप्यूटर साइंस और एआई आधारित दूसरे पाठ्यक्रमों का क्रेज अब भी कम नहीं हुआ है। इसकी वही अहमियत है जो अस्सी-नब्बे के दशक में सिविल इंजीनियरिंग की होती थी। इस साल बदलाव यह है कि सिविल इंजीनियरिंग एक बार फिर मेधावी छात्रों की प्राथमिकता सूची में तेजी से ऊपर चढ़ रही है। बीते दो दशकों के दौरान छात्र बेहद मजबूरी में या आईआईटी के ठप्पे के लिए ही इस शाखा को चुनते थे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस साल आईआईटी में दाखिले के पहले दौर से छात्रों की इस बदलती पसंद की पुष्टि होती है। आईआईटी में दाखिले के आंकड़ों को ध्यान में रखें तो बीते साल जहां प्रवेश परीक्षा में 2,666वीं रैंक वाले छात्र ने आईआईटी, बंबई में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई चुनी थी वहीं इस साल इसकी ओपनिंग रैंक 385 रही है। दिल्ली के मामले में तो यह बदलाव और स्पष्ट दिख रहा है। यहां बीते साल सिविल इंजीनियरिंग में दाखिले की ओपनिंग रैंक 3,030 थी जो इस साल तेजी से बढ़ कर 179 तक पहुंच गई है। आईआईटी, रुड़की और भुवनेश्वर समेत कई स्थानों पर यही ट्रेंड सामने आ रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्या है बदलती पसंद की वजह?</h3>
<p>
	शिक्षाविदों का कहना है कि बीते एक-डेढ़ दशक में कैंपस प्लेसमेंट के दौरान मिलने वाले वेतन का पैकेज ही इंजीनियररिंग की शाखाओं के चयन में सबसे अहम भूमिका निभाता रहा है। कंप्यूटर साइंस इस मामले में सबसे ऊपर रहा है। इसकी पढ़ाई करने वाले छात्रों को 20 से 50 लाख तक के पैकेज मिलते रहे हैं। इसके अलावा हर साल विभिन्न आईआईटी में एक करोड़ या उससे ऊपर के पैकेज भी सुर्खियां बटोरते रहे हैं। इसके उलट आईआईटी से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने वाले छात्रों को शुरुआत में सालाना औसतन आठ से 10 लाख तक के ही पैकेज मिलते हैं। लेकिन अब छात्र पैकेज से ऊपर उठकर करियर के स्थायित्व को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस साल जेईई-एडवांस में चुनी गई कोलकाता की एक छात्रा नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू से कहती है, "मैं आईआईटी मुंबई या दिल्ली में सिविल इंजीनियरिंग लेकर पढ़ना चाहती हूं। आमतौर पर कंप्यूटर साइंस या इलेक्ट्रानिक्स जैसे विषय ही मुफीद समझे जाते हैं। लेकिन भविष्य और करियर के स्थायित्व को ध्यान में रखते हुए मैंने यह फैसला किया है। इसे घरवालों का भी समर्थन है।" <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/bihar-healthcare-system-doctor-shortage-budget-challenges-126061700003_1.html" target="_blank">आखिर क्यों नहीं सुधर रही बिहार की चिकित्सा व्यवस्था</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोलकाता के एक निजी कालेज में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ गौतम सेन डीडब्ल्यू से कहते हैं, "पहले किसी बेहतर कालेज में कंप्यूटर साइंस की डिग्री मोटे पैकेज वाली नौकरी और बेहतर भविष्य की गारंटी मानी जाती थी। लेकिन बीते कुछ वर्षो से नौकरियों में अनिश्चितता के कारण अब छात्रों की सोच बदल रही है।"</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	एआई की बढ़ती क्षमताएं बनीं एक कारण   </h3>
<p>
	कलकत्ता विश्वविद्यालय के एक कालेज में सिविल इंजीनियरिंग विभाग की सहायक प्रोफेसर अंकिता नाथ डीडब्ल्यू से कहती हैं, "सॉफ्टवेयर कंपनियों में कोडिंग, डि-बगिंग और रूटीन प्रोग्रामिंग के लिए एआई के बढ़ते इस्तेमाल ने छात्रों के सामने ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है जो कुछ साल पहले तक कोई सोच भी नहीं सकता था। स्थायी करियर की उम्मीद में ही छात्र अब सिविल इंजीनियरिंग जैसे कोर विषयों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोलकाता के एक अन्य निजी इंजीनियरिंग कॉलेज में कंप्यूटर साइंस विभाग के प्रमुख डॉ। तीर्थंकर डीडब्ल्यू से कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई करने वाले छात्रों को अब बेहतर नौकरियां नहीं मिल रही हैं। दिक्कत यह है कि अब ऐसी नौकरियों पर अस्थिरता और छंटनी की तलवार लटक रही है। छात्रों की पसंद में बदलाव की यह भी एक बड़ी वजह है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आईआईटी, खड़गपुर के  एक पूर्व प्रोफेसर डॉ अरुणाभ भट्टाचार्य डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हाल के दिनों में भारत समेत दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों में बड़े पैमाने पर होने वाली छंटनियों ने छात्रों को अपनी सोच में बदलाव पर मजबूर कर दिया है। सॉफ्टवेयर उद्योग जहां एआई के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है वहीं देश में बड़े पैमाने पर आधारभूत परियोजनाएं शुरू होने के कारण सिविल इंजीनियरों की मांग तेजी से बढ़ने की उम्मीद है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विशेषज्ञों का कहना है कि कंप्यूटर साइंस की डिग्री वाले ज्यादातर छात्रों को कैंपस प्लेसमेंट में शुरुआती स्तर वाली कोडिंग की नौकरियां मिलती हैं। यह काम अब एआई के जरिए बेहद कम समय और खर्च में हो जाता है। ऐसे में एक दशक बाद पहली बार यह धारणा सवालों के घेरे में है कि कंप्यूटर साइंस की डिग्री सुरक्षित करियर की गारंटी है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डॉ सेन के मुताबिक, छात्रों के साथ ही उनके अभिभावकों को भी लग रहा है कि शुरुआती नौकरी तो मिल जाएगी। लेकिन आगे करियर का रास्ता उतना सुरक्षित नहीं रहा जितना पहले होता था। वो अब कैंपस प्लेसमेंट में नौकरी हासिल करने की बजाय करियर के स्थायित्व और भविष्य के बारे में सोच रहे हैं। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/rahul-gandhi-chhatron-ki-goonj-campaign-congress-cjp-youth-politics-paper-leak-126062000002_1.html" target="_blank">क्या सीजेपी की देखादेखी युवाओं के मुद्दे उठा रही है कांग्रेस</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<h3>
	बढ़ती आधारभूत परियोजनाएं</h3>
<p>
	विशेषज्ञों का कहना है कि देश में बड़े पैमाने पर हाईवे से लेकर मेट्रो रेल और तमाम कारिडोर, औद्योगिक हब और शहरी विकास परियोजनाओं का काम चल रहा है या फिर उनको अंतिम रूप दिया जा रहा है। ऐसे में इस सेक्टर में नौकरी का स्थायित्व सॉफ्टवेयर उद्योग के मुकाबले कई गुना ज्यादा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अंकिता नाथ कहती हैं, "देश में आधारभूत परियोजनाओं की बढ़ती संख्या और अहमियत के कारण कोर इंजीनियरिंग करियर का महत्व बढ़ रहा है। छात्रों को पता है कि इससे लंबे समय तक सिविल इंजीनियरिंग की मांग बनी रहेगी।" विशेषज्ञों का कहना है कि कई छात्र नए आईआईटी में कंप्यूटर साइंस लेने की बजाय बंबई, दिल्ली और मद्रास जैसी तीन शीर्ष पुरानी आईआईटी में सिविल इंजीनियरिंग जैसे कोर विषयों को तरजीह दे रहे हैं। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	डॉ सेन कहते हैं, "आईआईटी में इस साल करीब डेढ़ हजार सीटें बढ़ी हैं। इससे छात्रों के सामने करियर को ध्यान में रखते हुए अपना पसंदीदा विषय चुनने के मौके बढ़े हैं।" वह बताते हैं, "अब सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई अस्सी और नब्बे के दशक की तरह सिर्फ कांक्रीट, स्टील और कंस्ट्रक्शन साइट्स तक ही सीमित नहीं है। इसमें मशीन लर्निंग, रिमोट सेंसिंग, डेटा एनालिटिक्स, स्मार्ट मोबिलिटी और पर्यावरण-अनुकूल शहरीकरण जैसे पहलू भी शामिल हो गए हैं।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शिक्षाविदों का कहना है कि इस साल आईआईटी के दाखिलों के ट्रेंड से साफ है कि कंप्यूटर साइंस अब भी छात्रों की पहली पसंद बनी हुई है। लेकिन सिविल इंजीनियरिंग जैसी ब्रांच भी अब मेधावी छात्रों को आकर्षित कर रही है। इसकी एकमात्र वजह यह है कि सॉफ्टवेयर उद्योगों में एआई के बढ़ते इस्तेमाल को ध्यान में रखते हुए छात्र अब करियर के बारे में नए नजरिए से विचार कर रहे हैं। उनका कहना है कि फिलहाल इस साल के ट्रेंड से किसी ठोस नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह मुद्दा तो सामने उभर ही रहा है कि अब देश के सबसे मेधावी छात्रों में अपने करियर व भविष्य के लोकर सोच कैसे बदल रही है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 08:06:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 23 Jun 2026 08:26:36 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ब्रेक्जिट के 10 साल: ब्रिटेन को भारी पड़ा अलग होने का फैसला]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/brexit-10-years-later-impact-on-uk-economy-politics-and-immigration-126062200010_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/22/thumb/1_1/1782098213-6341.jpg"/>
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      <description><![CDATA[23 जून 2016 को हुए इस ऐतिहासिक फैसले को 'ब्रेक्जिट' नाम दिया गया। तब 52 प्रतिशत यानी करीब 1।7 करोड़ से ज्यादा लोगों ने यूरोपीय संघ से अलग होने के पक्ष में वोट किया था। भले ही जीत का अंतर मामूली था, लेकिन इस फैसले ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Brexit Impact on UK" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/22/full/1782098213-6341.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Brexit Impact on UK Photo : AI Generated" width="1200" /></p>
	</p>
	-आयुष यादव</p>
<p>
	 </p>
<p>
	23 जून 2016 को हुए इस ऐतिहासिक फैसले को &#39;ब्रेक्जिट&#39; नाम दिया गया। तब 52 प्रतिशत यानी करीब 1।7 करोड़ से ज्यादा लोगों ने यूरोपीय संघ से अलग होने के पक्ष में वोट किया था। भले ही जीत का अंतर मामूली था, लेकिन इस फैसले ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज को सबसे बड़ा झटका दिया। हालांकि, इस अलगाव की कागजी कार्रवाई को पूरा होने में भी करीब पांच साल का लंबा वक्त लग गया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ब्रेक्जिट की मुख्य वजह यूरोपीय संघ से नाराजगी और 2008 का वैश्विक आर्थिक संकट था। अलग होने के समर्थकों का दावा था कि अकेले रहने पर ब्रिटेन फिर से मजबूत होगा और अपने घरेलू मुद्दों पर ध्यान दे सकेगा। वहीं, विरोधियों ने चेतावनी दी थी कि इससे देश को भारी आर्थिक नुकसान होगा और दुनिया में उसकी साख कमजोर होगी। आज 10 साल बाद, ब्रिटेन वहीं खड़ा है जो विरोधियों ने आशंका जताई थी। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/india-biggest-military-drone-deal-border-surveillance-defence-modernisation-126061900002_1.html" target="_blank">भविष्य की सैन्य ताकत के लिए भारत का स्वदेशी ड्रोन पर जोर</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<h3>
	अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ा अलगाव</h3>
<p>
	ब्रेक्जिट समर्थकों ने सपना दिखाया था कि यूरोपीय संघ से बाहर निकलकर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था नए आयाम छुएगी। लेकिन कोरोना महामारी, यूक्रेन युद्ध और हाल ही में अमेरिका-इस्राएल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ब्रिटेन के कारोबारियों को अब यूरोपीय देशों के साथ व्यापार करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि 27 देशों का यह समूह आज भी ब्रिटेन का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। हालांकि, ब्रिटिश सामानों पर कोई टैक्स (टैरिफ) नहीं लगाया गया है, लेकिन कस्टम के कागजी काम, बॉर्डर सर्टिफिकेट और वीजा पाबंदियों जैसी गैर-टैरिफ अड़चनों ने व्यापार को बेहद मुश्किल बना दिया है। अमेरिका के साथ जिस बड़े व्यापार समझौते का वादा ब्रेक्जिट समर्थकों ने किया था, वह भी अब तक नहीं हो पाया है। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/west-bengal-pushback-policy-bangladesh-border-tension-bjp-government-action-126061200003_1.html" target="_blank">‘पुश‑इन’ के आरोपों पर भारत‑बांग्लादेश में बढ़ती कड़वाहट</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ब्रिटेन यूरोपीय संघ में रहता तो आज उसकी अर्थव्यवस्था 4 से 8 प्रतिशत बड़ी होती। इसका मतलब होता कि लोगों का जीवनस्तर बेहतर होता और पब्लिक सर्विसेज, खासकर नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) को अरबों पाउंड मिलते। ब्रेक्सिट के प्रचार के दौरान लाल रंग की बस पर यह वादा चमकाया गया था कि अलग होने से एनएचएस को हर हफ्ते 35 करोड़ पाउंड (करीब 46.8 करोड़ डॉलर) अतिरिक्त मिलेंगे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर जोनाथन पोर्ट्स कहते हैं, "ब्रेक्जिट ने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को पहले के मुकाबले छोटा कर दिया है। इसका असर किसी अचानक आए संकट की तरह नहीं, बल्कि व्यापार, निवेश और उत्पादकता पर धीरे-धीरे और लगातार पड़ने वाले बोझ के रूप में दिख रहा है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसके उलट, ब्रेक्जिट समर्थकों का कहना है कि इतने बड़े फैसले का नतीजा शॉर्ट-टर्म में नहीं देखा जा सकता और प्रवासियों पर नियंत्रण जैसे बड़े अधिकारों के बदले शुरुआती आर्थिक नुकसान के लिए देश तैयार था। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/sweden-considers-jailing-13-year-olds-to-tackle-gang-crime-126061100005_1.html" target="_blank">क्यों हो रहा है स्वीडन में किशोरों को जेल भेजने पर विचार?</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<h3>
	प्रवासियों के मुद्दे पर बढ़ता गुस्सा</h3>
<p>
	ब्रेक्जिट के जरिए ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के बीच &#39;फ्री मूवमेंट&#39; (बिना वीजा आवाजाही) तो खत्म हो गई, लेकिन सीमाओं को सुरक्षित करने के मोर्चे पर मिले जुले नतीजे रहे हैं। यूरोपीय देशों से आने वाले प्रवासियों की संख्या में तो भारी कमी आई है, लेकिन गैर-यूरोपीय देशों से आने वाले लोगों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। इसकी वजह पिछली कंजर्वेटिव सरकार द्वारा वीजा नियमों में किए गए बदलाव थे, ताकि बुजुर्गों की देखभाल जैसे क्षेत्रों के लिए जरूरी कामगारों की कमी को पूरा किया जा सके।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि, अब सरकार इस पर नियंत्रण पाती दिख रही है। नेट माइग्रेशन (आने और जाने वाले लोगों का अंतर) साल 2023 के 9 लाख से घटकर पिछले साल 1,71,000 पर आ गया है। इस गिरावट के बावजूद, देश में अवैध रूप से आने वाले प्रवासियों को लेकर गुस्सा चरम पर है। अफगानिस्तान और सूडान जैसे युद्धग्रस्त इलाकों से लोग इंग्लिश चैनल पार करके छोटी नावों के जरिए ब्रिटिश तटों पर पहुंच रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साल 2022 में इन नावों से 46,000 और पिछले साल 41,000 लोग ब्रिटेन आए। सरकारी खर्च पर इन्हें होटलों में ठहराए जाने को लेकर जनता में इतना गुस्सा है कि कुछ जगहों पर भीड़ ने हिंसक प्रदर्शन किए और होटलों में आग लगाने की कोशिश भी की।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	जनता को हो रहा है पछतावा</h3>
<p>
	ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटेन का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। 14 साल तक सत्ता में रहने के बाद कंजर्वेटिव पार्टी को 2024 में हार का सामना करना पड़ा। मौजूदा लेबर पार्टी की सरकार भी जनता को प्रभावित नहीं कर पाई है और प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर के जल्द ही इस्तीफे की खबरें आ रही हैं। इस बीच, धुर दक्षिणपंथी नाइजेल फारेज की अगुवाई वाली &#39;रिफॉर्म यूके&#39; पार्टी को लगातार जनसमर्थन मिल रहा है, जो पिछले एक साल से ओपिनियन पोल्स में सबसे आगे चल रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसके साथ ही, देश में यह भावना मजबूत हो रही है कि ब्रेक्जिट पूरी तरह फेल रहा है। इप्सोस के दो हालिया सर्वेक्षणों में शामिल 52 प्रतिशत लोग फिर से यूरोपीय संघ में शामिल होना चाहते हैं, जबकि सिर्फ 33 प्रतिशत इसके खिलाफ हैं। वहीं, 48 प्रतिशत लोगों का मानना है कि ब्रेक्जिट के नतीजे उम्मीद से बदतर रहे हैं और सिर्फ 9 प्रतिशत इसे उम्मीद से बेहतर मानते हैं। 48 प्रतिशत लोग आज ही यूरोपीय संघ में शामिल होने के लिए एक और जनमत संग्रह का समर्थन करते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	दोबारा जुड़ने की राह नहीं आसान</h3>
<p>
	इस माहौल के बीच, 2024 में चुनी गई लेबर सरकार फूंक फूंक कर कदम रख रही है। उसने साफ कर दिया है कि वह ब्रेक्जिट के फैसले को पलटने या यूरोपीय संघ के सिंगल मार्केट में वापस जाने का कोई इरादा नहीं रखती। प्रधानमंत्री स्टार्मर का पूरा ध्यान सिर्फ व्यापार को आसान बनाने और रिश्तों को सुधारने पर है, जिसके लिए वह अगले महीने यूरोपीय संघ के साथ एक समिट भी करने वाले हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वहीं, प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे एंडी बर्नहैम ने गुरुवार को एक विशेष चुनाव में जीत हासिल की है। उन्होंने उस सीट पर रिफॉर्म पार्टी को हराया है जिसने ब्रेक्जिट का भारी समर्थन किया था। चुनाव प्रचार के दौरान यूरोपीय संघ में दोबारा शामिल होने के मुद्दे पर एंडी बर्नहैम ने कहा, "मैं यूके के दोबारा यूरोपीय संघ में शामिल होने का प्रस्ताव नहीं दे रहा हूं। मैं जनमत संग्रह में किए गए फैसले का सम्मान करता हूं। अगर हम उस वोट का सम्मान नहीं करते हैं, तो लोकतंत्र को मजबूत करने के बारे में मेरी कही हर बात का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।"</p>
<p>
	 </p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 08:37:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Mon, 22 Jun 2026 14:29:59 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या सीजेपी की देखादेखी युवाओं के मुद्दे उठा रही है कांग्रेस]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/rahul-gandhi-chhatron-ki-goonj-campaign-congress-cjp-youth-politics-paper-leak-126062000002_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/rahul-gandhi-chhatron-ki-goonj-campaign-congress-cjp-youth-politics-paper-leak-126062000002_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/18/thumb/1_1/1781773840-6995.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/18/thumb/1_1/1781773840-6995.jpg</image>
      <description><![CDATA[कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक पिटीशन लॉन्च की है, जिसमें वे छात्र-छात्राओं से पूछ रहे हैं कि वे भारत की शिक्षा प्रणाली को 10 में से कितने नंबर देंगे। इसमें यह भी पूछा गया कि शिक्षा प्रणाली किस मामले में उनके लिए बेकार ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="Gen Z  and Rahul Gandhi" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/18/full/1781773840-6995.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Gen Z  and Rahul Gandhi" width="1200" /></p>
	आदर्श शर्मा</p>
<p>
	कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक पिटीशन लॉन्च की है, जिसमें वे छात्र-छात्राओं से पूछ रहे हैं कि वे भारत की शिक्षा प्रणाली को 10 में से कितने नंबर देंगे। इसमें यह भी पूछा गया कि शिक्षा प्रणाली किस मामले में उनके लिए बेकार साबित हुई है। इसके विकल्पों में बढ़ती फीस, परीक्षा का दबाव, पेपर लीक, बेकार पाठ्यक्रम और शिक्षा के कमजोर बुनियादी ढांचे जैसे विकल्प दिए गए हैं। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/cockroach-janata-party-cjp-youth-movement-politics-future-analysis-126061600003_1.html" target="_blank">&#39;कॉकरोच जनता पार्टी&#39;: सोशल मीडिया पर धमाल के बाद जमीनी हकीकत</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	यह पिटीशन कांग्रेस के नए ‘छात्रों की गूंज&#39; अभियान का हिस्सा है। कांग्रेस इसे एक "देशव्यापी छात्र आंदोलन” बता रही है, जिसकी मांग "भारत की शोषणकारी शिक्षा प्रणाली को समाप्त करना” है। राजस्थान के कोटा में रैली के साथ इस अभियान की शुरुआत हुई और अगले महीने 10, 11 और 14 जुलाई को इसके तहत इलाहाबाद, पटना और दिल्ली में रैलियों का आयोजन होगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कांग्रेस का यह नया अभियान दिखाता है कि भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी युवाओं के मुद्दों को कितनी गंभीरता से ले रही है। इस अभियान की घोषणा कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए पहले प्रदर्शन के करीब 12 दिनों बाद की गई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के एक बयान के विरोध में बनी सीजेपी भी युवाओं के मुद्दों पर ही विरोध-प्रदर्शन कर रही है।</p>
<h3>
	 </h3>
<h3>
	क्या सीजेपी के नक्शे-कदम पर चल रही है कांग्रेस</h3>
<p>
	वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार नीरजा चौधरी का मानना है कि यह कहना गलत होगा कि कांग्रेस, कॉकरोच जनता पार्टी को कॉपी कर रही है। उन्होंने डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में कहा कि सीजेपी युवाओं के मुद्दों को केंद्र में ले आयी है और अब कांग्रेस उन्हें आगे बढ़ा रही है। वे कहती हैं कि कांग्रेस के पास संगठन है, इसलिए वे हर जगह जाकर रैलियां कर सकते हैं लेकिन सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके के लिए ऐसा करना मुश्किल होगा क्योंकि अभी जमीन पर उनका संगठन नहीं है। हालांकि, वे सीजेपी को श्रेय देती हैं कि उसने बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही युवाओं की चिंताओं से रूबरू करवाया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक त्रिभुवन की भी यही राय है कि कांग्रेस, सीजेपी की देखादेखी युवाओं के मुद्दों को नहीं उठा रही है। उन्होंने डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में कहा कि कांग्रेस की छात्र इकाई भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) के अध्यक्ष विनोद जाखड़ शुरुआत से ही नीट परीक्षा का मुद्दा उठा रहे हैं और उनके प्रदर्शनों में खूब भीड़ भी जुट रही है। वे कहते हैं कि विनोद जाखड़ खुद युवा हैं और युवाओं के मुद्दों को समझ भी रहे हैं। उनके मुताबिक, कॉकरोच जनता पार्टी के बनने से पहले से ही एनएसयूआई के बैनर तले कांग्रेस के प्रदर्शन जारी थे, लेकिन अब कांग्रेस ने इस मामले में अपनी आक्रामकता बढ़ाई है। <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/india-biggest-military-drone-deal-border-surveillance-defence-modernisation-126061900002_1.html" target="_blank">भविष्य की सैन्य ताकत के लिए भारत का स्वदेशी ड्रोन पर जोर</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्या सीजेपी को खतरे के रूप में देख रही है कांग्रेस</h3>
<p>
	वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन का मानना है कि कॉकरोच जनता पार्टी के उदय से कांग्रेस को चिंता जरूर हुई है। वे कहते हैं कि कांग्रेस ने युवाओं के मुद्दों पर आक्रामकता इसलिए दिखाई क्योंकि उन्हें लगा कि कहीं उनके वोट या लोग टूटकर उधर न चले जाएं। उनके मुताबिक, कांग्रेस को लगा कि कहीं ऐसा न हो कि वे इस मामले में कुछ न करें और उनके समर्थक सीजेपी के पाले में चले जाएं, इसलिए उन्होंने भी देशव्यापी अभियान की योजना बनाई।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि, कॉकरोच जनता पार्टी खुद को कांग्रेस के प्रतिस्पर्धी के रूप में नहीं देखती है। सीजेपी के प्रवक्ता विजेता दहिया ने डीडब्ल्यू से कहा कि युवाओं के मुद्दों पर कांग्रेस के अभियान को कॉकरोच जनता पार्टी का पूरा समर्थन है। उन्होंने कहा कि यह हर इंसान का लोकतांत्रिक अधिकार है कि देश अच्छे से चले और इसके लिए अगर कांग्रेस अलग से प्रदर्शन कर रही है तो यह बहुत अच्छी बात है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	राजनीतिक टिप्पणीकार नीरजा चौधरी सीजेपी को कांग्रेस के लिए खतरे के रूप में नहीं देखती हैं। वे कहती हैं, "सीजेपी एक ऑनलाइन मूवमेंट की तरह है और वे अब एक पार्टी के तौर पर ऑफलाइन होने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन पार्टी बनाना बहुत आसान चीज नहीं होती है।” वे इस मामले में कांग्रेस की तारीफ करते हुए कहती हैं कि कांग्रेस ने इस बार यह अच्छी चीज की है कि उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी का पल्ला नहीं पकड़ा है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्या कांग्रेस को इन प्रदर्शनों से फायदा होगा</h3>
<p>
	कोटा में हुई राहुल गांधी की रैली को भारत के पारंपरिक मीडिया खासकर न्यूज चैनलों पर तो बहुत ज्यादा कवरेज नहीं मिली, लेकिन सोशल मीडिया पर इस आयोजन से जुड़ी कई पोस्ट पर खूब प्रतिक्रियाएं आयीं। कांग्रेस ने जुलाई में इलाहाबाद, पटना और दिल्ली में भी ऐसी रैलियां आयोजित करने की योजना बनाई है तो ऐसे में सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या कांग्रेस को बड़े स्तर पर युवाओं के मुद्दे उठाने का राजनीतिक फायदा मिलेगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	नीरजा चौधरी कहती हैं कि इस समय यह कहना मुश्किल है कि फायदा मिलेगा या नहीं मिलेगा लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस का संगठन कितना मजबूत है, वह कितने उत्साह से सामने आता है और कौन लोग उसका नेतृत्व करते हैं। वे कहती हैं कि यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि कांग्रेस क्या संदेश देती है और युवाओं के सामने क्या विजन पेश करती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस सवाल पर त्रिभुवन कहते हैं कि अगर जनता का कोई भी वर्ग सरकार से नाराज होता है, तो विपक्ष को इसका फायदा मिलता ही है। लेकिन वे यह चेतावनी भी देते हैं कि इस तरह के अभियानों का पूरा फायदा उठाने के लिए कांग्रेस को पहले अपनी अंदरूनी गुटबाजी से निपटना होगा। इसके लिए वे राजस्थान का उदाहरण देते हैं, जहां करीब 10 साल गुजरने के बाद भी अशोक गहलोत और सचिन पायलट का झगड़ा पूरी तरह सुलझा नहीं है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 08:02:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 20 Jun 2026 08:09:21 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भविष्य की सैन्य ताकत के लिए भारत का स्वदेशी ड्रोन पर जोर]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/india-biggest-military-drone-deal-border-surveillance-defence-modernisation-126061900002_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/india-biggest-military-drone-deal-border-surveillance-defence-modernisation-126061900002_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/19/thumb/1_1/1781837047-3618.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/19/thumb/1_1/1781837047-3618.jpg</image>
      <description><![CDATA[कई दशकों तक भारत की सेना अपनी सीमाओं की निगरानी के लिए मुख्य रूप से सैनिकों, लड़ाकू विमानों, सेटेलाइट और पारंपरिक निगरानी तंत्र पर निर्भर रही। 2020 में लद्दाख में चीन के साथ तनाव के दौरान पता चला कि ऊंचे पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में फैली लंबी सीमाओं ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="MQ-9B drones" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/19/full/1781837047-3618.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="MQ-9B drones" width="1200" /></p>
	</p>
	मुरली कृष्णन अनुवादः शिवांगी सक्सेना</p>
<p>
	कई दशकों तक भारत की सेना अपनी सीमाओं की निगरानी के लिए मुख्य रूप से सैनिकों, लड़ाकू विमानों, सेटेलाइट और पारंपरिक निगरानी तंत्र पर निर्भर रही। 2020 में लद्दाख में चीन के साथ तनाव के दौरान पता चला कि ऊंचे पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में फैली लंबी सीमाओं पर हर समय नजर रखना कितना चुनौतीपूर्ण है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अब भारत अपनी सेना के लिए बड़ी लागत में सैन्य ड्रोन खरीदने की तैयारी कर रहा है। ये ड्रोन भारतीय कंपनियों जैसे अडानी ग्रुप, टाटा एडवांस सिस्टम्स, लार्सन एंड टूब्रो और साथ में स्टार्टअप आइडियाफोर्ज और एसटेरिया एयरोस्पेस से खरीदे जाएंगे। यह भारत की अब तक की सबसे बड़ी ड्रोन खरीद होगी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ड्रोन को अब युद्ध के मैदान की आंख और कान माना जाता है। वे दुश्मन की गतिविधियों की जानकारी जुटा सकते हैं और सैनिकों की आवाजाही पर नजर रख सकते हैं। जरूरी सामान पहुंचने और सटीक हमले के लिए भी ड्रोन का इस्तेमाल होने लगा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इन ड्रोन को भारत की सबसे संवेदनशील सीमाओं पर तैनात किए जाने की उम्मीद है। इनमें चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी), पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमाएं, और हिंद महासागर शामिल हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ऊपरी तौर पर यह सिर्फ एक बड़ा रक्षा सौदा लगता है। हालांकि असल में यह दिखाता है कि भारत भविष्य के युद्ध को किस तरह से देख रहा है और ड्रोन तेजी से सैन्य योजनाओं के छोटे हिस्से से निकलकर उनकी सबसे महत्वपूर्ण जरूरत बन गए हैं। इस बदलाव के पीछे कई घटनाओं का प्रभाव रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जंग के मैदान से मिला चेतावनी का संकेत</p>
<p>
	मई 2025 में, भारत- शासित कश्मीर के पहलगाम में हुए हमले के बाद भारत और पकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया था। दोनों देशों ने ड्रोन और आधुनिक लड़ाकू विमानों की ताकत का इस्तेमाल किया। बाद में अमेरिका की मध्यस्थता से दोनों पक्ष लड़ाई रोकने पर राजी हुए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसके बाद भारत ने अपने इतिहास का सबसे बड़ा ड्रोन युद्ध अभ्यास &#39;कोल्ड स्टार्ट&#39; शुरू किया, जिसमें थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों ने भाग लिया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय की पूर्व सदस्य तारा कार्था ने डीडब्ल्यू से बातचीत में बताया कि भारत को ड्रोन के खतरे का पहला बड़ा एहसास साल 2021 में हुआ, जब जम्मू के एयरफोर्स  स्टेशन पर ड्रोन से हमला हुआ था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कार्था कहती हैं, "इस घटना ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था की उन कमजोरियों को उजागर किया, जो ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल के साथ और बढ़ गई हैं। ड्रोन का उपयोग निगरानी, तस्करी और हमलों के लिए किया जा रहा है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वह आगे बताती हैं, "अब सिर्फ तकनीक होना ही काफी नहीं है। बल्कि यह भी अहम है कि सेना कितनी जल्दी बदलते हालात के हिसाब से इसे अपनाती है, खुद को ढालती है और नई रणनीति बनाती है। जो देश कम ऊंचाई पर होने वाले ड्रोन युद्ध में आगे रहेगा, वही बड़े युद्ध में भी मजबूत स्थिति में होगा।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भारत अकेला देश नहीं है जो हाल के संघर्षों से सीख ले रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया भर की सेनाओं के सोचने के तरीके को बदला है। सस्ते ड्रोन ने करोड़ों डॉलर के टैंकों को नष्ट कर दिया, तोपों को सही निशाना लगाने में मदद दी और दुश्मन की सीमाओं के बहुत पीछे तक हमले भी किए हैं। जिसे पहले केवल सहायक तकनीक माना जाता था, वह अब आधुनिक युद्ध का मुख्य हिस्सा बन गया है। नई दिल्ली में सेना के योजनाकार इन बदलावों को बहुत ध्यान से देख रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भारत की खरीद में लॉजिस्टिक्स ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन और स्ट्राइक सिस्टम शामिल हैं।  इन सबकी मदद से सेना को लंबे समय तक अलग-अलग क्षेत्रों में निगरानी रखने और जल्दी प्रतिक्रिया देने की क्षमता मिलेगी। कार्था इस पर कहती हैं, "यूक्रेन में युद्ध ने यह बात और पक्की कर दी है कि ड्रोन अब केवल  सहायक उपकरण नहीं रह गए हैं, बल्कि आधुनिक युद्ध में उनकी भूमिका अहम हो गई है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भारत क्यों स्वदेशी ड्रोन चाहता है</p>
<p>
	यह कहानी सिर्फ सुरक्षा से नहीं, बल्कि उद्योग नीति से भी जुड़ी है। पहले की तरह ना होकर, इस बार यह ऑर्डर ज्यादातर घरेलू निर्माताओं से ही पूरा करने की उम्मीद है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यह खरीदारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के प्रयासों के अनुरूप है और ऐसे समय में हुई है जब भारत घरेलू ड्रोन उद्योग विकसित करने का प्रयास कर रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हो।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सरकार का कहना है कि लंबे समय तक अपनी सुरक्षा और रक्षा जरूरतों के लिए अन्य देशों पर निर्भर रहना ठीक नहीं है। भारत ड्रोन सेक्टर में अपनी तकनीक और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है क्योंकि उसका मानना है कि इस क्षेत्र में देश जल्दी प्रगति कर सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विंग कमांडर राजीव कुमार नारंग ने बताया कि यूक्रेन और ईरान में हालिया संघर्षों और साथ ही पहलगाम हमले के बाद शुरू हुए &#39;ऑपरेशन सिंदूर&#39; ने ड्रोन टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता के महत्व को और मजबूत किया है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	‘इंडियाज क्वेस्ट फॉर यूएवी एंड चैलेंजेज&#39; के लेखक नारंग के अनुसार ईरान ने यह करके दिखाया कि कैसे स्वदेशी सिस्टम, टेक्नोलॉजी पर अपना अधिकार और स्मार्ट तरीके अपनाकर दुश्मन की तकनीकी बढ़त का मुकाबला किया जा सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	नारंग डीडब्ल्यू से कहते हैं, "वे देश जिनके पास खुद का विकसित ड्रोन तकनीकी सिस्टम होगा और तेजी से इनोवेशन कर सकते हैं, उन्हें भविष्य की लड़ाइयों में बढ़त मिलेगी। भारत के लिए चुनौती अब सिर्फ ड्रोन बनाना नहीं रह गया। उनके पीछे की तकनीक में महारत हासिल करना और उन्हें जल्द सेना में शामिल करना है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भारत अमेरिका से 31 एमक्यू -9B प्रीडेटर ड्रोन भी खरीद रहा है। यह नई घरेलू ड्रोन की खरीदारी उस योजना को और मजबूत करेगी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जहां अमेरिकी प्लेटफॉर्म लंबी दूरी तक निगरानी और हमला करने की क्षमता देते हैं, वहीं भारत में बने ड्रोन संघर्ष क्षेत्रों में बड़ी संख्या में तैनात किए जा सकेंगे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ये सभी मिलकर हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक फैले बहु-स्तरीय निगरानी और युद्ध नेटवर्क के निर्माण की ओर इशारा करते हैं।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 08:06:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 19 Jun 2026 08:25:38 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ईरान युद्ध के लक्ष्यों में डोनाल्ड ट्रंप को क्या हासिल हुआ]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/iran-war-impact-what-did-trump-achieve-126061800003_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/iran-war-impact-what-did-trump-achieve-126061800003_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-02/20/thumb/1_1/1771607947-3214.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-02/20/thumb/1_1/1771607947-3214.jpg</image>
      <description><![CDATA[ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमला शुरू करने के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसके कुछ उद्देश्य तय किए थे। इनमें ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं को ध्वस्त करना और यह सुनिश्चित करना शामिल था कि यह देश कभी परमाणु हथियार ना बना सके। ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="doanld trump" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-02/20/full/1771607947-3214.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="doanld trump" width="1200" /></p>
	निखिल रंजन</p>
<p>
	ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमला शुरू करने के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसके कुछ उद्देश्य तय किए थे। इनमें ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं को ध्वस्त करना और यह सुनिश्चित करना शामिल था कि यह देश कभी परमाणु हथियार ना बना सके। तीन महीने के बाद जब दोनों पक्षों मेंएक प्राथमिक शांति समझौता हो चुका है, डोनाल्ड ट्रंप को क्या हासिल हुआ?</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	मिसाइल और ड्रोन</h3>
<p>
	ईरान युद्ध से पहले ईरान के पास मध्य पूर्व में बैलिस्टिक मिसाइलों का सबसे बड़ा जखीरा था। इसमें अलग अलग तरह की 2,500 से 6,000 मिसाइलें शामिल थीं। इनमें से कुछ की रेंज 2,000 किलोमीटर तक है और वो इजराइल तक मार करने की क्षमता रखती हैं। इतना ही नहीं इनमें कुछ ऐसी मिसाइलें भी शामिल हैं जो क्लस्टर बम ले जाने में सक्षम हैं और जिन्हें रोक पाना काफी मुश्किल है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ईरान सबसे ज्यादा लंबी दूरी के ड्रोन बनाने वाले देशों में एक है। खास तौर से शाहिद ड्रोन जिसे ईरान के अलावा रूस भी यूक्रेन की लड़ाई में इस्तेमाल कर रहा है। तकरीबन एक महीने के युद्ध के बाद एक अमेरिकी सूत्र ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को खबर दी कि ईरान के हथियारों का करीब एक तिहाई हिस्सा खत्म हो चुका है। इसके साथ ही करीब एक तिहाई और हथियारों को नुकसान पहुंचने, ध्वस्त होने या फिर जमीन में दफन होने के आसार हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अमेरिकी सेना के एडमिरल ब्रैड कूपर ने 14 मई को अमेरिकी संसद को बताया कि ईरान की मिसाइल और लंबी दूरी के ड्रोन बनाने की क्षमता कई साल पीछे चली गई है। उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध के दौरान अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने 1,500 मिसाइलें और 6,000 ड्रोन बीच रास्ते में रोक कर खत्म कर दिए गए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	फिलहाल यह साफ नहीं है कि ईरान के पास कितनी मिसाइलें बची हैं। हालांकि यह देश अब भी अपने आसपास के इलाके में अमेरिका के सहयोगी देशों के खिलाफ हमले कर रहा है। हाल ही में 6 जून को कुवैत और बहरीन के खिलाफ हमले हुए। 7 जून को ईरान ने इजराइल के खिलाफ भी मिसाइल दागे। इन देशों का कहना है इन हमलों में कोई खास नुकसान नहीं हुआ।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	पारंपरिक सेना</h3>
<p>
	अमेरिकी सेना का कहना है कि उसने ईरान की पारंपरिक सेना की क्षमता को सीमित कर दिया है और वह इलाके में ना तो अपनी ताकत दिखा सकेगी, ना ही वह अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचा सकेगी। कूपर ने संसद को बताया कि अमेरिकी सेना ने ईरान के 161 जहाजों और एयर डिफेंस सिस्टम को 82 फीसदी तक ध्वस्त कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की वायु सेना के विमान जो युद्ध से पहले हर दिन 100 उड़ान भरते थी, अब कोई उड़ान नहीं भर रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि इसके बावजूद ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को युद्ध के दौर में प्रभावी रूप से बंद करने में सफल रहा। उसने दुनिया के 20 फीसदी तेल और गैस की सप्लाई करने वाले रास्ते में कारोबारी जहाजों को फंसाए रखा। ईरान ने इसके लिए स्पीडबोट, माइंस, ड्रोन और मिसाइल बोट का इस्तेमाल किया।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	परमाणु कार्यक्रम</h3>
<p>
	डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार कहा है कि उनका मुख्य उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना है। ईरान ने भी लगातार कहा है कि उसका इरादा परमाणु बम बनाने का नहीं है, उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि इस युद्ध से ईरान की परमाणु क्षमता पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। अमेरिकी खुफिया अधिकारियों ने पिछले महीने यह जानकारी दी थी कि ईरान अब भी इस हालत में है कि एक साल से कम समय के भीतर परमाणु हथियार बना ले। जून 2025 में ईरान के परमाणु केंद्र पर हमलों के बाद भी खुफिया विभाग ने यही बात कही थी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शुक्रवार को समझौते के प्रारूप पर दस्तखत हो जाने बाद ईरान का परमाणु कार्यक्रम वार्ताकारों के लिए  बातचीत का प्रमुख मुद्दा होगा। डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि संवर्धित यूरेनियम को ईरान से बाहर जरूर ले जाया जाना चाहिए। उधर ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह मोजतबा खमेनेई ने कहा है कि संवर्धित यूरेनियम को देश के बाहर नहीं भेजा जाएगा।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	ईरान के प्रॉक्सी</h3>
<p>
	इसी साल 2 मार्च को डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में कहा कि ईरान का इराक, लेबनान, गाजा और यमन के प्रॉक्सी गुटों को हथियार और धन देते रहना जारी नहीं रहने दिया जा सकता। ईरान कई दशकों से इलाके में अपनी ताकत दिखाने और अपने दुश्मनों को परेशान करने के लिए इन गुटों पर भरोसा करता आया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ईरान ने युद्ध की शुरुआत से ही इन गुटों को समर्थन देना बंद करने की कोई इच्छा नहीं दिखाई है। हालांकि अमेरिकी सेना और स्वतंत्र आकलनों के आधार पर कहा जा रहा है कि ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क का प्रभाव अब पहले की तुलना में कम हो गया है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	इनका प्रभाव घटने की शुरुआत तो युद्ध शुरू होने के पहले ही हो गई थी। 7 अक्टूबर, 2023 को इजराइल के इलाके में हमला होने के बाद इजराइल ने हमास के शीर्ष नेताओं और हजारों लड़ाकों को गाजा में मार दिया। लेबनान में हिज्बुल्ला के सैन्य कमांडरों का भी यही हाल हुआ। 2024 में सीरिया से बशर अल-असद का शासन खत्म होने के बाद ईरान ने हिज्बुल्ला को आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग भी खो दिया। प्रतिबंधों और आर्थिक मुश्किलों ने भी इन गुटों की मदद करने की उसकी क्षमता पर असर डाला है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इन गुटों ने इस युद्ध में कोई प्रमुख भूमिका नहीं निभाई है। हमास ने गाजा से इजराइल पर कोई हमला नहीं किया है, ना ही हूथी विद्रोही यमन से लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों को रोक सके। हिज्बुल्लाह इजराइल पर 2 मार्च को मिसाइल और ड्रोन दाग कर युद्ध में शामिल हो गया। इसके बाद इजराइल ने लेबनान में हवाई हमलों और जमीनी अभियान शुरू किए जिनमें 3,700 लोगों की मौत हुई और करीब 12 लाख लोग विस्थापित हो गए। इस युद्ध में 28 इजराइली सैनिकों और 4 आम लोगों की भी मौत हुई है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कूपर ने मई में अमेरिकी संसद में कहा कि ईरान के पास अब इन गुटों को उन्नत हथियार देने की क्षमता नहीं बची है। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि उनका आशय क्या था।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	सत्ता परिवर्तन</h3>
<p>
	डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध शुरू होने से पहले ईरान में प्रदर्शन कर रहे लोगों को उकसाया कि वे अपने शासकों की सत्ता उखाड़ फेंके। 28 फरवरी को जब सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह अली खमेनेई की मौत हुई तो उन्होंने इसे सरकार पर नियंत्रण का "इकलौता सबसे बड़ा मौका" कहा। 6 मार्च को डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि युद्ध तभी बंद होगा जब ईरान बिना "शर्त समर्पण" करेगा और उसके साथ एक नया "स्वीकार्य" नेता लाएगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि यह जंग ईरान की सत्ता को हटाने में नाकाम रही। ट्रंप का कहना है कि उन्होंने यह लक्ष्य हासिल कर लिया क्योंकि खमेनेई की जगह अब उनके बेटे अयातोल्लाह मोजतबा खमेनेई आ गए हैं। 29 मार्च को ट्रंप ने नए नेतृत्व को "एक नया और ज्यादा उचित शासन" कहा। हाल के हफ्तों में ट्रंप ईरानी नेताओं को हटाने की मांग करने से बचते रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 08:23:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 18 Jun 2026 08:30:14 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर क्यों नहीं सुधर रही बिहार की चिकित्सा व्यवस्था]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/bihar-healthcare-system-doctor-shortage-budget-challenges-126061700003_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/17/thumb/1_1/1781664493-1053.jpg"/>
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      <description><![CDATA[भारत सरकार की एसआरएस-2026 (सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम-2026) की रिपोर्ट से एक बार फिर बिहार की चिकित्सा व्यवस्था सवालों के घेरे में है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 67.8 प्रतिशत मौत की वजह चिकित्सा का अभाव या गलत इलाज है।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="bihar hospital" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/17/full/1781664493-1053.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="bihar hospital Photo : Manish Kumar/DW" width="1200" /></p>
	</p>
	मनीष कुमार</p>
<p>
	राज्य में डॉक्टरों और प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ की भी भारी कमी है। नीति आयोग के हेल्थ इंडेक्स में भी बड़े राज्यों की सूची में बिहार अमूमन निचले पायदान पर ही है। राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी भयावह है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानक प्रति एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर के मुकाबले राज्य में 17-28 हजार की आबादी पर एक डॉक्टर है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	राज्य में डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी है। नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, ‘‘केवल इमारत बना देने और नियम सख्त करने से व्यवस्था में सुधार नहीं होगा। अभी भी ढांचागत बुनियादी सुविधाओं को मुहैया कराने की दिशा बहुत कुछ किया जाना शेष है। इसके बाद ही सुधार की अपेक्षा की जा सकती है।&#39;&#39;</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्वैक पर निर्भरता बरकरार</h3>
<p>
	बिहार में आज भी ग्रामीण इलाके में बड़ी आबादी उन अप्रशिक्षित चिकित्सकों के भरोसे है, जिन्हें झोलाछाप (क्वैक) कहा जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता अमरेश कुमार तिवारी कहते हैं, ‘‘यह कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि ये क्वैक अगर नहीं होते तो ग्रामीण इलाकों में ज्यादा लोगों की जानें जातीं। ये प्राथमिक उपचार कर कई मामलों में स्थिति संभाल तो लेते ही है। हां, यह कमी जरूर है कि इनमें से कुछ मरीज की स्थिति बिगड़ने तक उन्हें विशेषज्ञ चिकित्सक के पास जाने की सलाह नहीं देते। जब वे कहते हैं तब तक स्थिति अनियंत्रित हो चुकी होती है।&#39;&#39;</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	स्वास्थ्य केंद्र के बाहर बैठे लोग </h3>
<p>
	स्थिति अधिक बिगड़ जाने के कारण मरीज की जान चली जाती है। अगर, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में डॉक्टर रहते तो तो लोग क्वैक के पास क्यों जाते। फिर शहरों में चिकित्सा के साथ दूसरे खर्चे इतने अधिक हैं कि लोग गांव में ही किसी तरह इलाज करा लेना बेहतर समझते हैं। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	ग्रामीण इलाके के अस्पतालों में डॉक्टरों की नियुक्ति तो की गई है, किंतु डॉक्टर वहां जाना नहीं चाहते। प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाले डॉ। गौरव कहते हैं, ‘‘ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं, खासकर बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा के अभाव में चिकित्सक वहां रह कर ड्यूटी नहीं करना चाहते हैं। मरीज की स्थिति चाहे किसी भी वजह से ऊपर-नीचे हुई, निशाने पर डॉक्टर ही आ जाते हैं। जब पीएमसीएच जैसे बड़े अस्पताल में मारपीट की घटना हो जाती तो गांवों की स्थिति की कल्पना आप कर सकते हैं।&#39;&#39;</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	संतुलित संसाधनों का है अभाव</h3>
<p>
	राज्य सरकार स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारने की कोशिश कर रही है। डॉक्टर और स्टाफ की नियुक्तियां भी हुई हैं किंतु इन संसाधनों की वास्तविक स्थिति में संतुलन का अभाव है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अमरेश कहते हैं, ‘‘सरकारी अस्पतालों के भवन बना दिए गए, एक्स-रे व अल्ट्रासाउंड जैसी मशीनें भी लग गईं, लेकिन टेक्नीशियन ही नहीं हैं या उनकी कमी है। जांच (डायग्नॉस्टिक) संबंधी सुविधाओं की स्थिति भी ठीक नहीं है।&#39;&#39; कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (सीएजी) की 2024 की रिपोर्ट भी इस बात की ओर इशारा करती है। इन सबके अलवा दवाओं की मुश्किल भी एक बड़ी समस्या है। पहले की अपेक्षा सरकारी अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता बढ़ी है। सभी तरह की दवाएं जब मिलने लगेंगी, तो निश्चय ही लोगों का भरोसा बढ़ेगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अमरेश कहते हैं, ‘‘अच्छी बात है कि हर जिले में मेडिकल कॉलेज व अस्पताल खोलने की दिशा में काम हो रहा है। सभी श्रेणी के चिकित्सकों, नर्स व पैरामेडिकल स्टाफ की नियुक्ति की जा रही है। आशा कार्यकर्ताओं के प्रयासों से संस्थागत प्रसव और टीकाकरण से मातृ व शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आई है।&#39;&#39;</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	पीएचसी का सशक्त होना जरूरी</h3>
<p>
	गांवों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधा से जुड़े सवाल पर प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाली डॉ। सुरभि ठाकुर कहती हैं, ‘‘पीएचसी को सशक्त-सुदृढ़ किए बिना स्थिति में अपेक्षित सुधार की कल्पना बेमानी है। राज्यभर में इन स्वास्थ्य केंद्रों पर एक्सीडेंट, हार्ट अटैक या जटिल प्रसव जैसे गंभीर मामलों में इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। नर्सों और पॅरामेडिकल स्टाफ को एडवांस्ड ट्रेनिंग देकर इमरजेंसी की स्थिति में बेहतर फर्स्ट रिस्पांस के लिए तैयार किया जा सकता है।&#39;&#39;</p>
<p>
	 </p>
<p>
	केवल गंभीर मरीजों को ही बड़े अस्पतालों में रेफर करने का सिस्टम बनाना होगा। कई जगह पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड में एमआरआई व सीटी स्कैन की सुविधा शुरू की गई है। इस व्यवस्था से आम लोगों की जेब पर बोझ कम हुआ है। इसका विस्तार होना चाहिए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर बिहार सरकार ने कई स्तरों पर बड़े फैसले लिए हैं। 2026-27 के लिए राज्य का स्वास्थ्य बजट 21,270 करोड़ कर दिया गया है। साथ ही, इस साल के अंत तक 3200 नए हेल्थ सेंटर खोलने का लक्ष्य रखा गया है। चिकित्सकों सहित सभी स्वास्थ्य कर्मियों की सौ प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए बायोमीट्रिक अटेंडेंस की व्यवस्था की गई है। साथ ही, सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगा दी गई है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सरकार की सख्ती पर डॉक्टरों से जुड़े संगठनों का कहना है कि डॉक्टरों को बलि का बकरा बनाने से स्थिति नहीं सुधरेगी। सरकार को डॉक्टरों की व्यावहारिक परेशानियों को ध्यान में रख कर नीतिगत निर्णय लेना चाहिए। बिहार मेडिकल सर्विसेज इंफ्रास्ट्रक्चर कारपोरेशन लिमिटेड को सप्लाई चेन को दुरुस्त करने के साथ समय पर दवाएं व दूसरी मशीनें उपलब्ध कराना होगा, इसके लिए सिस्टम को पारदर्शी बनाना होगा।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 08:14:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 17 Jun 2026 08:22:54 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अजेय प्रताप : क्यों 'हल्दीघाटी और घास की रोटी' से कहीं बड़ा है महाराणा प्रताप का इतिहास?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/indian-history-and-culture/maharana-pratap-history-beyond-haldighati-war-126061600063_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/16/thumb/1_1/1781618913-885.jpg"/>
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      <description><![CDATA[भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो किसी साम्राज्य, किसी युद्ध या किसी राजवंश से बड़े हो जाते हैं। महाराणा प्रताप ऐसा ही एक नाम हैं। 
आज भी जब उनका उल्लेख होता है तो सबसे पहले हल्दीघाटी का युद्ध, चेतक की वीरता और जंगलों में घास की रोटी खाने की कथा ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
	<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
		<img align="center" alt="Maharana Pratap Biography" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/16/full/1781618913-885.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
</p>
<br />
<strong>भारतीय इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो किसी साम्राज्य, किसी युद्ध या किसी राजवंश से बड़े हो जाते हैं। महाराणा प्रताप ऐसा ही एक नाम हैं।</strong><br />
<br />
<p>
	आज भी जब उनका उल्लेख होता है तो सबसे पहले हल्दीघाटी का युद्ध, चेतक की वीरता और जंगलों में घास की रोटी खाने की कथा याद की जाती है। लेकिन क्या सचमुच महाराणा प्रताप का इतिहास केवल इतना ही है?</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यदि ऐसा होता तो वे इतिहास की एक वीर गाथा बनकर रह जाते। लेकिन चार सौ साल बाद भी उनका नाम भारतीय जनमानस में जीवित है। इसका कारण कोई एक युद्ध नहीं, बल्कि वह अदम्य संघर्ष है जो हल्दीघाटी के बाद शुरू हुआ और जीवन के अंतिम क्षण तक चलता रहा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>महाराणा प्रताप की सबसे बड़ी उपलब्धि हल्दीघाटी में लड़ना नहीं थी। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि हल्दीघाटी के बाद भी उन्होंने लड़ना नहीं छोड़ा।</strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	इतिहास में ऐसे अनेक राजा हुए जिन्होंने बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ीं। कुछ जीते, कुछ हारे और धीरे-धीरे इतिहास के धुंधले पन्नों में खो गए। लेकिन महाराणा प्रताप की कहानी अलग है। उन्होंने उस समय के सबसे शक्तिशाली सम्राट अकबर के सामने झुकने से इनकार किया, वर्षों तक जंगलों और पहाड़ों में संघर्ष किया, अपने राज्य का पुनर्गठन किया और अंततः मेवाड़ के बड़े हिस्से को वापस हासिल किया। यही कारण है कि उन्हें केवल मेवाड़ का शासक नहीं, बल्कि प्रतिरोध, स्वाभिमान और स्वतंत्र चेतना का प्रतीक माना जाता है।</p>
<h3>
	क्या वास्तव में हल्दीघाटी में अकबर जीत गया था?</h3>
<p>
	18 जून 1576 को हल्दीघाटी की संकरी घाटी में एक ऐसा युद्ध हुआ जिसने भारतीय इतिहास में स्थायी स्थान बना लिया। एक ओर मेवाड़ के महाराणा प्रताप थे, तो दूसरी ओर मुगल सम्राट अकबर की ओर से भेजी गई विशाल सेना, जिसका नेतृत्व आमेर के राजा मानसिंह कर रहे थे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	फारसी और मुगल इतिहासकारों ने इस युद्ध को मुगल विजय के रूप में दर्ज किया। यह भी सच है कि युद्ध के अंत में मैदान पर नियंत्रण मुगल सेना के पास रहा। लेकिन इतिहास केवल युद्धभूमि पर सूर्यास्त तक की स्थिति का नाम नहीं होता। इतिहास इस बात से भी तय होता है कि युद्ध के बाद क्या हुआ।<br />
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Maharana Pratap Biography" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/16/full/1781619049-9371.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
	</p>
</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>“यदि हल्दीघाटी वास्तव में अकबर की निर्णायक विजय थी, तो फिर महाराणा प्रताप अगले बीस वर्षों तक संघर्ष कैसे करते रहे? यदि मेवाड़ पूरी तरह जीत लिया गया था, तो फिर मुगल साम्राज्य को बार-बार सैन्य अभियान चलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?”</strong><br />
	 </p>
<p>
	युद्ध के दौरान प्रताप की सेना संख्या में कम थी, लेकिन भूगोल की समझ, स्थानीय समर्थन और अद्भुत मनोबल उसके साथ था। स्वयं महाराणा प्रताप अग्रिम मोर्चे पर लड़े। उनके प्रिय अश्व चेतक की वीरता आज भी लोकस्मृति का हिस्सा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इतिहासकारों में युद्ध के सामरिक परिणाम को लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है—मुगल सेना न तो महाराणा प्रताप को बंदी बना सकी और न ही मेवाड़ के प्रतिरोध को समाप्त कर सकी। यही कारण है कि अनेक आधुनिक इतिहासकार हल्दीघाटी को "निर्णायक मुगल विजय" के बजाय एक ऐसे युद्ध के रूप में देखते हैं जिसने संघर्ष को और लंबा कर दिया।<br />
	 </p>
<p>
	राजस्थान की इतिहासकार <strong>डॉ. रीमा हूजा</strong> भी संकेत करती हैं कि हल्दीघाटी किसी पक्ष को पूर्ण सफलता नहीं दिला सका। युद्ध समाप्त हुआ, लेकिन संघर्ष नहीं।</p>
<h3>
	जब मुगल इतिहासकार ने भी प्रताप की वीरता स्वीकार की</h3>
<p>
	हल्दीघाटी युद्ध का एक दिलचस्प विवरण स्वयं मुगल इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूनी के लेखन में मिलता है, जो युद्ध में मौजूद थे। अपने ग्रंथ <strong>मुन्तख़ब-उत-तवारीख़ </strong>में बदायूनी लिखते हैं कि राजपूतों के शुरुआती हमलों ने मुगल सेना की पंक्तियों में भारी अव्यवस्था पैदा कर दी थी। कई स्थानों पर मुगल सैनिकों को पीछे हटना पड़ा और युद्ध अत्यंत भीषण रूप ले चुका था। यह उल्लेख महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह प्रताप की वीरता का वर्णन किसी राजस्थानी कवि ने नहीं, बल्कि विरोधी पक्ष के इतिहासकार ने किया था।</p>
<h3>
	अकबर बनाम प्रताप : आखिर दांव पर क्या था?</h3>
<p>
	महाराणा प्रताप और अकबर के संघर्ष को अक्सर दो राजाओं की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल थी।<br />
	 </p>
<p>
	1568 में चित्तौड़गढ़ के पतन के बाद अकबर ने राजपूताना के अधिकांश प्रमुख राज्यों को अपने प्रभाव क्षेत्र में शामिल कर लिया था। आमेर, बीकानेर, जोधपुर और अन्य कई राजवंश किसी न किसी रूप में मुगल व्यवस्था का हिस्सा बन चुके थे, <strong>लेकिन मेवाड़ अलग था।</strong><br />
	 </p>
<p>
	मेवाड़ केवल एक राज्य नहीं था; वह राजपूती स्वाधीनता और सिसोदिया प्रतिष्ठा का केंद्र माना जाता था। चित्तौड़ का नाम केवल एक दुर्ग का नाम नहीं था, बल्कि वह राजपूत अस्मिता का प्रतीक बन चुका था। इतिहासकार <strong>जदुनाथ सरकार</strong> लिखते हैं कि मेवाड़ का प्रश्न अकबर के लिए केवल क्षेत्रीय विस्तार का विषय नहीं था, बल्कि साम्राज्य की सार्वभौमिकता का प्रश्न बन चुका था। <br />
	 </p>
<p>
	अकबर जानता था कि यदि महाराणा प्रताप भी अन्य राजपूत शासकों की तरह दरबार में उपस्थित होकर अधीनता स्वीकार कर लेते हैं, तो यह केवल एक राजनीतिक सफलता नहीं होती; यह एक प्रतीकात्मक विजय भी होती।</p>
<p>
	<br />
	दूसरी ओर प्रताप के लिए यह संघर्ष केवल भू-भाग का नहीं था। उनके सामने प्रश्न था कि क्या मेवाड़ अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखेगा या मुगल साम्राज्य का हिस्सा बन जाएगा। यही कारण है कि हल्दीघाटी का युद्ध केवल तलवारों का टकराव नहीं था; वह दो अलग राजनीतिक दृष्टिकोणों का संघर्ष भी था।</p>
<h3>
	अकबर की सबसे बड़ी विफलता : प्रताप को झुका न पाना</h3>
<p>
	अकबर के शासनकाल में अधिकांश राजपूत रियासतें किसी न किसी रूप में मुगल सत्ता से जुड़ गई थीं। कई शक्तिशाली राजवंशों ने सैन्य और राजनीतिक समझौते स्वीकार कर लिए थे। <strong>लेकिन, महाराणा प्रताप ने अलग रास्ता चुना।</strong><br />
	 </p>
<p>
	उनके लिए यह केवल एक राज्य की लड़ाई नहीं थी। यह स्वाधीनता, प्रतिष्ठा और राजनीतिक आत्मनिर्णय का प्रश्न था। कई बार संधि के प्रस्ताव आए, लेकिन प्रताप ने मुगल दरबार में जाकर अधीनता स्वीकार नहीं की।<br />
	 </p>
<p>
	अकबर के लिए मेवाड़ केवल एक राज्य नहीं था; वह उसकी सार्वभौमिक सत्ता की परीक्षा बन चुका था। यही कारण है कि विशाल मुगल साम्राज्य को एक अपेक्षाकृत छोटे पहाड़ी राज्य के पीछे वर्षों तक अपनी ऊर्जा और संसाधन लगाने पड़े।</p>
<h3>
	<strong>दिवेर : जहां संघर्ष ने करवट बदली</strong></h3>
<p>
	<strong>यदि हल्दीघाटी प्रतिरोध का प्रतीक है, तो 1582 का दिवेर युद्ध प्रताप की वापसी का प्रतीक है।</strong><br />
	 </p>
<p>
	इतिहासकार <strong>गौरीशंकर हीराचंद ओझा </strong>ने दिवेर को मेवाड़ के इतिहास का निर्णायक मोड़ माना है। उनके अनुसार हल्दीघाटी की तुलना में दिवेर का महत्व अधिक दूरगामी था, क्योंकि यहीं से मेवाड़ की पुनर्प्राप्ति का अभियान निर्णायक रूप से सफल होने लगा।<br />
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Maharana Pratap Biography" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/16/full/1781619171-4844.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
	</p>
</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगल चौकियों पर व्यापक आक्रमण किया और मेवाड़ के बड़े हिस्से पर पुनः अधिकार स्थापित किया। कई इतिहासकारों ने दिवेर को "मेवाड़ का मैराथन" कहा है। जिस प्रकार यूनान का मैराथन युद्ध विदेशी प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक बन गया, उसी प्रकार दिवेर मेवाड़ के पुनरुत्थान का प्रतीक बना। यही वह क्षण था जब यह स्पष्ट होने लगा कि हल्दीघाटी युद्ध ने प्रताप को समाप्त नहीं किया था; बल्कि संघर्ष को और अधिक दृढ़ बना दिया था।</p>
<h3>
	गोगुंदा से अरावली तक : गुरिल्ला युद्ध का अद्भुत अध्याय</h3>
<p>
	महाराणा प्रताप की सबसे बड़ी सैन्य प्रतिभाओं में से एक थी परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता। हल्दीघाटी के बाद उन्होंने प्रत्यक्ष युद्धों के साथ-साथ गुरिल्ला रणनीति अपनाई। अरावली की पर्वतमालाएं उनकी सबसे बड़ी सहयोगी बन गईं। छोटे-छोटे सैन्य दल मुगल चौकियों पर लगातार दबाव बनाते रहे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गोगुंदा, कुंभलगढ़ और अरावली का विस्तृत क्षेत्र प्रतिरोध का केंद्र बना रहा। भील समुदाय ने इस संघर्ष में असाधारण भूमिका निभाई। स्थानीय भूगोल, जनसमर्थन और गतिशील युद्धनीति ने प्रताप को वह बढ़त दी जो किसी भी बड़ी सेना के लिए चुनौतीपूर्ण थी।<br />
	 </p>
<h3>
	क्या अकबर मेवाड़ को पूरी तरह जीत पाया था?</h3>
<p>
	अकबर ने चित्तौड़गढ़ पर अधिकार किया था। उसने गुजरात, बंगाल, मालवा और काबुल तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। लेकिन मेवाड़ उसके जीवनकाल की उन चुनौतियों में शामिल रहा जिसे वह पूरी तरह समाप्त नहीं कर सका।<br />
	 </p>
<p>
	महाराणा प्रताप के अंतिम वर्षों तक चित्तौड़ और मांडलगढ़ को छोड़कर मेवाड़ का अधिकांश पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्र पुनः उनके नियंत्रण में आ चुका था। उदयपुर सहित अनेक क्षेत्रों में सिसोदिया सत्ता पुनर्स्थापित हो चुकी थी।</p>
<p>
	यही कारण है कि हल्दीघाटी के परिणाम को केवल एक दिन के युद्ध से नहीं, बल्कि उसके बाद के दो दशकों के घटनाक्रम से समझना चाहिए।</p>
<h3>
	"घास की रोटी" से कहीं बड़ा है प्रताप का इतिहास</h3>
<p>
	लोककथाओं में घास की रोटी की कथा अत्यंत लोकप्रिय है। लेकिन यदि महाराणा प्रताप की पूरी कहानी को केवल इसी प्रतीक तक सीमित कर दिया जाए, तो उनके वास्तविक योगदान के साथ अन्याय होगा। प्रताप केवल एक योद्धा नहीं थे। वे एक कुशल प्रशासक, रणनीतिकार और संगठनकर्ता भी थे।<br />
	 </p>
<p>
	उन्होंने सीमित संसाधनों में राज्य का पुनर्गठन किया, प्रशासन को जीवित रखा, सेना का पुनर्निर्माण किया और जनता का विश्वास बनाए रखा। भामाशाह ने आर्थिक आधार प्रदान किया, जबकि भीलों और स्थानीय समुदायों ने संघर्ष की रीढ़ बनकर साथ दिया।<br />
	 </p>
<p>
	महाराणा प्रताप की सफलता केवल व्यक्तिगत वीरता की कहानी नहीं है; यह नेतृत्व, संगठन और सामूहिक प्रतिरोध की कहानी भी है।<br />
	 </p>
<h3>
	महाराणा प्रताप की सबसे बड़ी जीत : एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना जो झुकी नहीं</h3>
<p>
	यदि प्रताप की सबसे बड़ी उपलब्धि खोजनी हो, तो वह शायद कोई युद्ध नहीं, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना थी जिसने उनके बाद भी संघर्ष को जीवित रखा। <strong>उस पीढ़ी का नाम था—कुंवर अमर सिंह।</strong><br />
	 </p>
<p>
	अमर सिंह ने बचपन से ही महलों का वैभव नहीं, बल्कि अरावली के जंगल, युद्ध शिविर और लगातार संघर्ष का जीवन देखा था। दिवेर और उसके बाद के अभियानों में वे केवल उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि प्रताप के सबसे भरोसेमंद सेनापतियों में से एक बनकर उभरे।<br />
	 </p>
<p>
	राजस्थानी परंपराओं में दिवेर के युद्ध के दौरान मुगल सरदार सुल्तान खान के विरुद्ध उनके पराक्रम का विशेष उल्लेख मिलता है। कई स्थानीय इतिहासकारों ने लिखा है कि जिस साहस से अमर सिंह ने युद्धक्षेत्र में नेतृत्व किया, उसने यह स्पष्ट कर दिया था कि मेवाड़ का प्रतिरोध महाराणा प्रताप के साथ समाप्त नहीं होगा।<br />
	 </p>
<p>
	<strong>यही वह पक्ष है जिसे लोकप्रिय इतिहास अक्सर नजरअंदाज कर देता है। महाराणा प्रताप की मृत्यु 1597 में हुई, लेकिन मेवाड़ का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। अमर सिंह ने उसे आगे बढ़ाया।</strong><br />
	 </p>
<p>
	जहांगीर ने अपनी आत्मकथा <strong>तुज़ुक-ए-जहांगीरी</strong>  में स्वीकार किया है कि मेवाड़ को अधीन करना मुगल साम्राज्य के लिए आसान नहीं था। अकबर का अधूरा लक्ष्य जहांगीर के शासनकाल तक चुनौती बना रहा। 1613-15 के अभियानों में स्वयं जहांगीर को मेवाड़ प्रश्न पर विशेष ध्यान देना पड़ा।<br />
	 </p>
<p>
	<strong>यदि प्रताप प्रतिरोध के प्रतीक थे, तो अमर सिंह उस प्रतिरोध की निरंतरता थे।</strong></p>
<h3>
	इतिहासकारों की नजर में महाराणा प्रताप</h3>
<p>
	महाराणा प्रताप की विरासत का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि उनकी प्रशंसा केवल लोककथाओं या राजस्थानी परंपराओं तक सीमित नहीं है। विभिन्न कालखंडों के इतिहासकारों ने भी उन्हें अलग-अलग दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण माना है।<br />
	 </p>
<p>
	ब्रिटिश इतिहासकार <strong>कर्नल जेम्स टॉड</strong> ने अपनी प्रसिद्ध कृति Annals and Antiquities of Rajasthan में हल्दीघाटी को "राजस्थान का थर्मोपाइली" कहा था।<strong> "Haldighati is the Thermopylae of Rajasthan."</strong></p>
<p>
	थर्मोपाइली वह ऐतिहासिक युद्ध था जहां यूनानियों ने एक विशाल साम्राज्य के विरुद्ध असाधारण प्रतिरोध का प्रदर्शन किया था। टॉड के लिए महाराणा प्रताप उसी प्रतिरोध की भावना के प्रतीक थे। यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि उन्होंने महाराणा प्रताप को वैश्विक ऐतिहासिक विमर्श का हिस्सा बनाया।<br />
	 </p>
<p>
	कविराज <strong>श्यामलदास</strong> ने वीर विनोद  में प्रताप को केवल योद्धा नहीं, बल्कि मेवाड़ की स्वतंत्र सत्ता के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया। <strong>गौरीशंकर हीराचंद ओझा</strong> ने अपने शोध में विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि प्रताप की वास्तविक उपलब्धि हल्दीघाटी नहीं, बल्कि उसके बाद मेवाड़ के बड़े हिस्से की पुनर्प्राप्ति थी।<br />
	 </p>
<p>
	मुगल इतिहास के महान अध्येता <strong>सर जदुनाथ सरकार </strong>ने प्रताप को एक दृढ़ निश्चयी शासक और कुशल सैन्य रणनीतिकार माना। उनके अनुसार प्रताप की सबसे बड़ी शक्ति यह थी कि उन्होंने परिस्थितियों के अनुरूप अपनी युद्धनीति बदली और दीर्घकालिक प्रतिरोध को संभव बनाया।<br />
	 </p>
<p>
	आधुनिक इतिहासकार <strong>डॉ. रीमा हूजा </strong>भी इस बात पर जोर देती हैं कि महाराणा प्रताप को केवल हल्दीघाटी के संदर्भ में देखना उनके ऐतिहासिक महत्व को सीमित कर देता है। उनके अनुसार प्रताप का वास्तविक महत्व मेवाड़ की राजनीतिक पहचान और स्वायत्तता को जीवित रखने में था।<br />
	 </p>
<p>
	दिलचस्प बात यह है कि प्रताप की वीरता का उल्लेख केवल उनके समर्थकों ने ही नहीं किया। मुगल इतिहासकार <strong>अब्दुल कादिर बदायूनी</strong> ने भी हल्दीघाटी में राजपूतों के शुरुआती आक्रमणों की तीव्रता और युद्ध की भीषणता को स्वीकार किया है।<br />
	 </p>
<p>
	शायद यही कारण है कि विभिन्न विचारधाराओं और अलग-अलग कालखंडों के इतिहासकारों में मतभेद होने के बावजूद एक बात पर व्यापक सहमति दिखाई देती है—महाराणा प्रताप का महत्व किसी एक युद्ध के परिणाम में नहीं, बल्कि उस संघर्ष में है जिसने मेवाड़ की स्वतंत्र पहचान को जीवित रखा।</p>
<h3>
	इतिहास का अंतिम फैसला</h3>
<p>
	लोककथाएँ हमें <strong>घास की रोटी </strong>की कहानी सुनाती हैं। इतिहास हमें उससे कहीं बड़ी कहानी बताता है।</p>
<ul>
	<li>
		वह कहानी एक ऐसे शासक की है जिसने साम्राज्य की शक्ति से अधिक स्वाभिमान की शक्ति पर विश्वास किया।</li>
	<li>
		वह कहानी एक ऐसे योद्धा की है जिसने युद्धक्षेत्र छोड़ने के बाद भी संघर्ष नहीं छोड़ा।</li>
	<li>
		वह कहानी एक ऐसे नेता की है जिसने केवल स्वयं नहीं लड़ा, बल्कि अपने पुत्र अमर सिंह सहित एक पूरी पीढ़ी को प्रतिरोध का अर्थ सिखाया।</li>
</ul>
<p>
	महाराणा प्रताप की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं थी कि उन्होंने हल्दीघाटी में तलवार चलाई। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने मेवाड़ को हार नहीं मानने दी। <br />
	 </p>
<p>
	अकबर अपने समय के सबसे शक्तिशाली शासक थे। उन्होंने उत्तर भारत से लेकर गुजरात, बंगाल और काबुल तक विशाल साम्राज्य स्थापित किया। लेकिन मेवाड़ का प्रश्न उनके जीवनकाल में पूरी तरह हल नहीं हो सका। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	शायद इसी कारण भारतीय इतिहास में अकबर एक महान सम्राट के रूप में याद किए जाते हैं, लेकिन महाराणा प्रताप एक आदर्श के रूप में। और इतिहास में आदर्शों की आयु अक्सर साम्राज्यों से अधिक लंबी होती है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 07:03:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 17 Jun 2026 07:26:48 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Indian History and Culture]]></category>
      <authorname>संदीप सिंह सिसोदिया</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA['कॉकरोच जनता पार्टी': सोशल मीडिया पर धमाल के बाद जमीनी हकीकत]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/cockroach-janata-party-cjp-youth-movement-politics-future-analysis-126061600003_1.html</link>
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      <description><![CDATA[देश के बेरोजगारों की कॉकरोच से तुलना के बाद इसी नाम से बनी कॉकरोच जनता पार्टी ने बनते ही युवाओं और देश की मीडिया में सनसनी पैदा कर दी। कुछ ही दिन के भीतर सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोवर बना लेने वाली पार्टी पहली बार जब आंदोलन के मैदान में उतरी तो वो ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="abhijeet dipke cockroach janta party" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/06/full/1780721004-754.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="abhijeet dipke cockroach janta party" width="1200" /></p>
	समीरात्मज मिश्र</p>
<p>
	देश के बेरोजगारों की कॉकरोच से तुलना के बाद इसी नाम से बनी कॉकरोच जनता पार्टी ने बनते ही युवाओं और देश की मीडिया में सनसनी पैदा कर दी। कुछ ही दिन के भीतर सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोवर बना लेने वाली पार्टी पहली बार जब आंदोलन के मैदान में उतरी तो वो लगभग फ्लॉप रही लेकिन पहले कार्यक्रम की परिस्थितियों और इसके फ्लॉप होने के बावजूद वो आंदोलन के मकसद को लेकर जिस तरह से सक्रिय है, उससे कई चर्चाएं जन्म ले रही हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने पिछले हफ्ते ही दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था। पार्टी अभी कुछ दिन पहले ही सोशल मीडिया पर बनी थी और कुछ ही दिनों के भीतर दो करोड़ से ज्यादा फॉलोवर बना लेने के बावजूद जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में महज कुछ सौ लोग ही पहुंचे। उनमें भी ज्यादा संख्या उन प्रतियोगी छात्रों और उनके परिजनों की थी जो ऐसे किसी भी मंच की तलाश में थे जहां उनकी भावनाओं को व्यक्त करने का मौका मिले। प्रदर्शन में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की भी मांग हुई और एक हफ्ते का अल्टीमेटम दिया गया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रविवार को बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में भी सीजेपी ने विरोध प्रदर्शन किया जिसमें साउथ की फिल्मों के स्टार अभिनेता प्रकाश राज और सोनम वांगचुक भी शामिल हुए। यहां भी धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग हुई। प्रकाश राज ने सीजेपी के समर्थन में कहा, "यदि आप इन युवाओं को &#39;अर्बन नक्सल&#39;, &#39;पाकिस्तानी&#39; या &#39;कॉकरोच&#39; कह रहे हैं, तो भी वे डरते नहीं हैं। वे अपने सपनों के लिए लड़ रहे हैं- चुप हो जाइए और उनकी बात सुनिए।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इससे पहले सीजेपी ने महाराष्ट्र के पुणे, उत्तर प्रदेश के लखनऊ और पंजाब के अमृतसर में भी विरोध प्रदर्शन किए जिसमें NEET पेपर लीक मामले, CBSE के ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम में कथित गड़बड़ियों और परीक्षा से जुड़ी अन्य कथित खामियों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की गई। हालांकि लखनऊ में सीजेपी के प्रमुख अभिजीत दीपके का विरोध भी हुआ और छात्रों ने उनके आंदोलन में जबरन घुसपैठ करने के आरोप लगाए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अल्टीमेटम की अवधि बीत गई, लेकिन धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं हुआ और न ही होने की कोई संभावना है। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि सीजेपी की आगे की राह क्या है। क्या यह युवाओं के छिट-पुट आंदोलन को एक व्यापक और राष्ट्रीय नेतृत्व दे पाएगी या फिर सनसनी की तरह प्रकट होने के बाद वैसे ही विलुप्त भी हो जाएगी।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	जंतर-मंतर के प्रदर्शन से उठ रहे सवाल</h3>
<p>
	राजनीतिक विश्लेषक छात्रों के आंदोलन और सीजेपी के साथ युवाओं के जुड़ने के पीछे व्यवस्था के प्रति असंतोष और उनके आक्रोश को देख रहे हैं। लेकिन एक थ्योरी यह भी है कि सीजेपी को इस वजह से खड़ा किया गया और फिर पर्दे के पीछे से इसे समर्थन दिया जा रहा है ताकि इस असंतोष और आक्रोश को कमजोर और दिग्भ्रमित किया जा सके।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार झा कहते हैं, "युवाओं में असंतोष और नाराजगी तो है ही। और यह नाराजगी सड़कों पर उनके होने वाले बार-बार के प्रदर्शनों में दिख भी रही है। लेकिन अब जब नीट पेपर लीक और सीबीएसई की धांधली के बाद कांग्रेस पार्टी के छात्र और युवा विंग भी इस आंदोलन में उतर आए, ऐसे में अचानक कॉकरोच पार्टी का बनना, आंदोलन में उतरना, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगना ऊपर से तो दिखाता है कि छात्रों-युवाओं के समर्थन में है लेकिन जंतर-मंतर पर जिस तरह उसे प्रदर्शन की अनुमति मिली और सीजेपी ने भी जिस तरह पुलिस की इच्छानुसार प्रदर्शन किया, उससे ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये सत्तारूढ़ पार्टी की मुश्किलों को बढ़ाने नहीं बल्कि उसे कम करने का काम कर रही है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि कॉकरोच जनता पार्टी ने जिस तरह से युवाओं के मुद्दों और छात्रों की समस्याओं को उठाया है, उसे देखते हुए उनकी गतिविधियों को सीधे तौर पर बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक टूल्स को चुनौती के तौर पर भी देखा जा रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	चूंकि प्रधानमंत्री अक्सर युवाओं की बात करते हैं, युवा आबादी का जिक्र करते हैं, देश को युवा देश बताते हैं, परीक्षा पर चर्चा करते हैं, ऐसे में परीक्षा में होने वाली धांधली और युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को लोगों को सामने लाने का काम यदि सीजेपी कर रही है तो कहीं न कहीं, यह सरकार के सामने मुश्किलें खड़ी करती दिख रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बावजूद इसके, सीजेपी को इस तरह तो इसके प्रशंसक भी नहीं देख रहे हैं कि यह जेपी आंदोलन, वीपी सिंह, अन्ना हजारे जैसा कोई आंदोलन खड़ा कर पाएगा। जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान असम की एक युवती रूपम गोस्वामी का कहना था, "पूरा सिस्टम खराब हो गया है। युवाओं-छात्रों की बात सुनी नहीं जा रही है। सिस्टम का विरोध करने पर डंडे बरसाए जाते हैं। ऐसे में हम क्या करें। हमारी समस्या को कोई भी उठा रहे हैं तो हम उसके साथ खड़े हैं।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वहीं, वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं कि सीजेपी के नेताओं को कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है और वो इतने परिपक्व दिखते भी नहीं हैं लेकिन युवाओं के आक्रोश को अभिव्यक्ति और मंच तो दिया ही है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्या यह &#39;अन्ना&#39; जैसा आंदोलन है?</h3>
<p>
	डीडब्ल्यू से बातचीत में शरद गुप्ता कहते हैं, "सोशल मीडिया पर आंदोलन शुरू करने वाले इन युवाओं के पास कोई सोची-समझी रणनीति तो है नहीं। हां, ये जरूर है कि वे युवाओं के भीतर दबे हुए आक्रोश को हवा दे रहे हैं। युवाओं का यह आक्रोश अभी धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहा है। लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए बिना किसी लाइन-लेंथ के ये युवा आज सीजेपी के साथ दिख रहे हैं तो हो सकता है कल को किसी और के साथ दिखें।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वहीं, राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव कहते हैं कि सीजेपी को नजरअंदाज करना या पारंपरिक राजनीति के पैमाने से इसका आकलन करना ठीक नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने लिखा है, "कॉकरोच जनता पार्टी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है। यह न इससे ज्यादा है और न कम। यह बस आम जनता ही है। यह कोई आंदोलन नहीं, बल्कि एक क्षण है। और यही वजह है कि यह महत्वपूर्ण है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यह ठीक है कि सीजेपी को किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। फिर भी तमाम विश्लेषकों को इसमें संभावनाएं भी दिख रही हैं। इसके पीछे बड़ा तर्क यह है कि सीजेपी का आंदोलन आम लोगों, खासकर युवाओं को सीधे उनके मुद्दों से जोड़ता है। लेकिन आंदोलन के कर्ता-धर्ता आंदोलन के आगे बढ़ने से पहले ही जिस तरह राजनीति में आने को उत्सुक दिख रहे हैं, उससे इसे सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी और उनके नेताओं से जोड़कर देखा जा रहा है। अभिजीत दीपके समेत सीजेपी के कई नेताओं का अन्ना आंदोलन और आम आदमी पार्टी की ही उपज होना इसकी पुष्टि भी करता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष भी &#39;अन्ना आंदोलन&#39; के समय आम आदमी पार्टी से जुड़े थे लेकिन कुछ समय बाद ही उनका राजनीति से मोहभंग हो गया। सत्यहिन्दी वेबसाइट पर एक लेख में सीजेपी को लेकर आशुतोष लिखते हैं कि किसी भी आंदोलन को शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने वालों को ये सोचना होगा कि उनका आंदोलन किस सरकार के खिलाफ है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आशुतोष लिखते हैं, "मोदी सरकार भारतीय इतिहास की पहली सरकार है जो गलती मानने को अपनी तौहीन मानती है। जिसे लगता है कि गलती मानना सरकार को कमजोर करता है, विपक्ष की मांग को उचित ठहराता है। मोदी सरकार वो गलती नहीं करेगी जो मनमोहन सिंह ने की थी जब विपक्ष और मीडिया के दबाव में मंत्रियों के त्यागपत्र ले लिए जाते थे। मंत्रियों का पद छोड़ना एक तरह से जवाबदेह सरकार की निशानी है, लेकिन जो सरकार चुनाव जीतने को ही लोकतंत्र मानती हो, वो सरकार जवाबदेही को उचित नहीं मानती। ऐसे में कॉकरोच किसी गलतफहमी में न रहें। वो शोर मचा कर ठंडे हो जाएंगे और सरकार वही करेगी जो वो चाहेगी।”</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 08:41:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 16 Jun 2026 08:47:36 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[त्रिपुरा चुनाव में कुल 822 वोट पाने वाली पार्टी (NCPI) लोकसभा में बनी NDA की नई 'पॉवर प्लेयर'!]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/my-blog/ncpi-a-party-that-secured-a-total-of-822-votes-in-the-tripura-elections-126061500034_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/15/thumb/1_1/1781514654-0408.jpg"/>
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      <description><![CDATA[तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसद, जो कल तक दीदी के "माँ, माटी, मानुष" के सुर में सुर मिला रहे थे, अचानक एक रात में 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) के रंग में रंग गए। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंप दिया गया और देखते ही देखते दिल्ली के ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
	<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
		<img align="center" alt="NCPI" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/15/full/1781514654-0408.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="NCPI" width="1200" /></p>
</p>
<br />
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसद, जो कल तक दीदी के "माँ, माटी, मानुष" के सुर में सुर मिला रहे थे, अचानक एक रात में &#39;नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया&#39; (NCPI) के रंग में रंग गए। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंप दिया गया और देखते ही देखते दिल्ली के सियासी गलियारों में एक नया &#39;मर्जर&#39; (विलेय) इतिहास रच दिया गया।<br />
<br />
सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि आपने आज से पहले इस पार्टी का नाम कब सुना था? कोई लिख रहा है कि &#39;मुझे तो लगा शायद यह कोई नया कॉर्पोरेट स्टार्टअप है जो "राष्ट्रवाद + सिटीजनशिप" का कॉम्बो पैक बेच रहा है"।<br />
<br />
लेकिन रिकॉर्ड खंगाले तो पता चला कि इस पार्टी ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में कुल 822 वोट हासिल किए थे। जी हां, सिर्फ 822! इतने वोट तो हमारे देश में किसी बड़े गांव की पंचायत के चुनाव में नोटा (NOTA) को मिल जाते हैं। इनका चुनाव चिन्ह था— &#39;पेन की निब&#39;। शायद इसीलिए सांसदों को इस पार्टी से इतना लगाव हुआ, क्योंकि आखिरकार &#39;इस्तीफा&#39; और &#39;विलय&#39; की एप्लीकेशन लिखने के लिए पेन की जरूरत तो पड़ती ही है।<br />
<br />
<strong>सियासी विरोधाभास का चरम देखिए: </strong>इस छोटी सी पार्टी का कभी पुराना नारा हुआ करता था— "दलबदलू नेताओं को खारिज करो!" आज उसी पार्टी के जहाज पर 20 बड़े बागी नेता सवार हो चुके हैं।<br />
<br />
<strong>कानूनी खेल और दीदी का </strong><strong>&#39;</strong><strong>माइग्रेशन</strong><strong>&#39;</strong><br />
बागी सांसद कह रहे हैं— "चूंकि हम कुल संख्या के दो-तिहाई (2/3) हैं, इसलिए कानूनन हमारा विलय पक्का है। बाकी की लड़ाई कोर्ट और चुनाव आयोग में देख लेंगे।" यानी फॉर्मूला सीधा है— पहले किसी छोटे से घर में घुस जाओ, फिर दावा करो कि असली महल के मालिक भी हमीं हैं!<br />
<br />
<strong>ममता दीदी इस समय क्या सोच रही होंगी</strong><strong>? </strong>शायद "माँ, माटी, मानुष" के नारे को बदलकर "माँ, माटी, माइग्रेशन" करने का वक्त आ गया है। अभिषेक बनर्जी स्पीकर साहब को चिट्ठी लिख रहे हैं कि "यह सब फर्जीवाड़ा है, पार्टी एक है।" दूसरी तरफ, ये 20 सांसद कोरस में गा रहे हैं— "हम तो कब के &#39;नेशनलिस्ट सिटीजन&#39; हो गए, जो पीछे छूट गए वो गुजरे जमाने के हैं।"<br />
<br />
<strong>राजनीति का नया </strong><strong>&#39;</strong><strong>यूनिकॉर्न</strong><strong>&#39;</strong><br />
<strong>यह भारतीय राजनीति का आधुनिक बिजनेस मॉडल है:</strong>
<ul>
	<li>
		<strong>अगर अपनी मूल पार्टी में मन न लगे, तो एक गुमनाम पार्टी ढूंढो।</strong></li>
	<li>
		<strong>उसमें सामूहिक रूप से (2/3 बहुमत के साथ) मर्ज हो जाओ ताकि दलबदल कानून की तलवार न चले।</strong></li>
	<li>
		<strong>सत्ताधारी गठबंधन (NDA) को समर्थन देकर रातों-रात वीआईपी बन जाओ।</strong></li>
</ul>
आज टीडीपी (TDP) और जेडीयू (JD-U) जैसी क्षेत्रीय पार्टियां भी सोच रही होंगी कि हम सालों से जमीन पर पसीना बहा रहे हैं, और ये लोग एक रात के &#39;मर्जर&#39; से एनडीए में सीधे वीआईपी लाउंज में एंट्री पा गए! साफ है कि भारतीय राजनीति अब विचारधाराओं का अखाड़ा नहीं, बल्कि &#39;कॉर्पोरेट मर्जर और एक्विजिशन&#39; (M&A) की बड़ी मंडी बन चुकी है। यहाँ नेता अब जनप्रतिनिधि नहीं बल्कि &#39;प्रॉडक्ट&#39; हैं, और 822 वोट वाली छोटी पार्टियां रातों-रात राजनीति की &#39;यूनिकॉर्न&#39; बन रही हैं।<br />
Edited By: Naveen R Rangiyal<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 14:45:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Mon, 15 Jun 2026 15:13:49 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[My Blog]]></category>
      <authorname>WD News Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoK/PoJK): कब बनेगा भारत का हिस्सा, जानिए इतिहास]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/current-affairs/history-of-pojk-pakistan-occupied-jammu-and-kashmir-126061300030_1.html</link>
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      <description><![CDATA[वर्तमान में POK में पाकिस्तान विरोधी प्रदर्शन चल रहे हैं। भारत की पश्चिमी सीमा पर स्थित पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) दशकों से भू-राजनीतिक विवाद और संघर्ष का विषय बना हुआ है। भारत सरकार ने अब इसका आधिकारिक नाम बदलकर 'पाक अधिकृत जम्मू और कश्मीर' ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Protests in PoK" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/13/full/1781341760-4485.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Pok" width="1200" /></p>
	</p>
	वर्तमान में POK में पाकिस्तान विरोधी प्रदर्शन चल रहे हैं। भारत की पश्चिमी सीमा पर स्थित पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) दशकों से भू-राजनीतिक विवाद और संघर्ष का विषय बना हुआ है। भारत सरकार ने अब इसका आधिकारिक नाम बदलकर &#39;पाक अधिकृत जम्मू और कश्मीर&#39; (PoJK) कर दिया है। यह क्षेत्र सामरिक और कूटनीतिक दृष्टि से भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।</p>
<p>
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/current-affairs/india-border-dispute-pok-jk-ib-loc-lac-history-geography-126061300015_1.html" target="_blank">भारत के सीमा विवाद: POK, J&K, IB, LOC और LAC का पूरा इतिहास और भूगोल</a></strong></p>
</p>
<h3>
	1. PoK का निर्माण और नियंत्रण रेखा (LOC) का इतिहास</h3>
<p>
	<strong>इतिहास और निर्माण: </strong>1947 में भारत विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। लेकिन उनके निर्णय में हुई देरी का फायदा उठाकर 1947-48 में पाकिस्तानी सेना ने कबाइलियों के साथ मिलकर कश्मीर पर हमला कर दिया और वे काफी भीतर तक घुस आए। भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए श्रीनगर को बचाया और दुश्मनों को पीछे धकेला।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>सीजफायर लाइन: </strong>सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण दोनों सेनाएं जहां थीं, वहीं रुक गईं। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के संयुक्त राष्ट्र (UN) जाने और वहां से युद्ध विराम की घोषणा होने के कारण इस मोर्चे को &#39;सीजफायर लाइन&#39; कहा गया। इसके चलते मूल जम्मू-कश्मीर दो भागों में बंट गया और एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्जे में चला गया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>नियंत्रण रेखा (LOC) नामकरण: </strong>साल 1972 के शिमला समझौते के तहत इसी सीजफायर लाइन को &#39;लाइन ऑफ कंट्रोल&#39; (LOC) का नाम दिया गया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>भौगोलिक स्थिति: </strong>LOC की लंबाई लगभग 814 किलोमीटर है। यह कोई आधिकारिक अंतर्राष्ट्रीय सीमा नहीं बल्कि एक युद्ध विराम रेखा है। यह जम्मू के अखनूर सेक्टर से शुरू होकर पॉइंट NJ 9842 तक फैली हुई है। इसके पार का पूरा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (PoK) कहलाता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	2. PoK का प्रशासनिक और भौगोलिक विभाजन</h3>
<p>
	पाकिस्तान ने इस पूरे अवैध कब्जे वाले क्षेत्र को दो मुख्य प्रशासनिक हिस्सों में बांट रखा है:</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	<span style="color:#000080;">अ. आजाद कश्मीर (तथाकथित)</span></h3>
<p>
	<strong>क्षेत्रफल और जिले:</strong> इसका क्षेत्रफल लगभग 5,134 वर्ग मील (करीब 13,297 वर्ग किलोमीटर) है। इसमें कुल 10 जिले शामिल हैं।</p>
<p>
	<strong>राजधानी:</strong> इसकी राजधानी मुजफ्फराबाद है।</p>
<p>
	<strong>वास्तविक स्थिति: </strong>यह क्षेत्र वास्तव में जम्मू संभाग का ही हिस्सा है। जम्मू के भिम्बर, कोटली, मीरपुर, पुंछ हवेली, बाग, सुधान्ती, मुजफ्फराबाद, हट्टियां और हवेली जिले इसके अंतर्गत आते हैं। जम्मू संभाग के कुल 36,315 वर्ग किमी क्षेत्रफल में से लगभग 13,297 वर्ग किमी पर पाकिस्तान का कब्जा है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	<span style="color:#000080;">ब. गिलगित-बाल्टिस्तान</span></h3>
<p>
	<strong>क्षेत्रफल और जिले: </strong>इसका क्षेत्रफल लगभग 28,174 वर्ग मील (करीब 72,970 वर्ग किलोमीटर) है। इसमें भी 10 जिले हैं।</p>
<p>
	<strong>राजधानी: </strong>इसकी राजधानी गिलगित है।</p>
<p>
	प्रशासनिक स्थिति: यह पूरे पाक अधिकृत क्षेत्र का 85 प्रतिशत हिस्सा है। पहले इसे पाकिस्तान में &#39;नॉर्दर्न एरिया&#39; कहा जाता था। 2009 में पाकिस्तान सरकार ने यहाँ एक स्वायत्त प्रांतीय व्यवस्था बनाकर मुख्यमंत्री और 24 सदस्यीय असेंबली का गठन किया, लेकिन इस असेंबली के पास अधिकार न के बराबर हैं।</p>
<p>
	<strong>सामरिक महत्व: </strong>यह इलाका बेहद खूबसूरत ऊंची पर्वत चोटियों (हिन्दूकुश और तिरिच मीर) और सिंधु नदी से घिरा है। इसके उत्तर में चीन-अफगानिस्तान और पूर्व में भारत का सियाचिन ग्लेशियर स्थित होने के कारण यह बेहद रणनीतिक क्षेत्र है।</p>
<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="PAK POK Pak Map" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/13/full/1781336160-9082.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="PAK POK Pak Map" width="1200" /></p>
</p>
<h3>
	<span style="color:#000080;">कुल क्षेत्रफल, आबादी और सीमाएं</span></h3>
<p>
	<strong>आंकड़े: </strong>गिलगित-बाल्टिस्तान और तथाकथित आजाद कश्मीर को मिलाकर इस पूरे क्षेत्र का कुल क्षेत्रफल भारतीय कश्मीर के वर्तमान हिस्से से लगभग 3 गुना बड़ा है। यहाँ की कुल आबादी करीब 30 से 60 लाख के बीच अनुमानित है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>भौगोलिक सीमाएं: </strong>इसकी सीमाएं पश्चिम में पाकिस्तान के पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा से, उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान के वखान कॉरिडोर से, उत्तर में चीन के शिनजियांग प्रांत से और पूर्व में भारतीय जम्मू-कश्मीर व लद्दाख से मिलती हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	3. शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley): चीन को अवैध हस्तांतरण</h3>
<p>
	काराकोरम पर्वत श्रृंखला का हिस्सा रही शक्सगाम घाटी ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से मूल जम्मू-कश्मीर-लद्दाख का अंग थी। लेकिन मार्च 1963 में पाकिस्तान ने एक अवैध सीमा समझौते के तहत पीओके के गिलगित-बाल्टिस्तान वाले हिस्से में से लगभग 1,900 वर्ग मील (करीब 5,180 वर्ग किलोमीटर) का यह रणनीतिक इलाका चीन को उपहार में दे दिया। भारत इस हस्तांतरण को कभी स्वीकार नहीं करता और इसे अपनी संप्रभुता का सीधा उल्लंघन मानता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	4. PoK की वर्तमान स्थिति और मुख्य चुनौतियाँ</h3>
<p>
	<strong>अ. पाकिस्तान की दोहरी नीति और जनसांख्यिकीय बदलाव (Demography)</strong></p>
<p>
	पाकिस्तान विश्व मंच पर इसे &#39;आजाद कश्मीर&#39; के रूप में पेश करता है, लेकिन यहाँ का पूरा शासन सीधे इस्लामाबाद से संचालित होता है। यहाँ 1974 से एक प्रधानमंत्री और 49 सीटों वाली विधानसभा तो है, लेकिन उसे कोई वैश्विक मान्यता नहीं है।</p>
<p>
	पाकिस्तान ने यहाँ जानबूझकर बाहरी लोगों को बसाकर इसकी डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) बदल दी है। 1947 में यहाँ बहुसंख्यक आबादी कश्मीरी शिया और सूफियों की थी, जिन्हें अब प्रताड़ित करके अल्पसंख्यक बना दिया गया है। अधिकारों के हनन के कारण ये शिया मुस्लिम समय-समय पर भागकर भारतीय कश्मीर में शरण लेते रहते हैं। पाकिस्तान ने यहाँ विकास के नाम पर कुछ नहीं किया, जिससे स्थानीय लोगों की जिंदगी बदहाल है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>ब. आतंकवाद का ट्रेनिंग सेंटर</strong></p>
<p>
	यह तथ्य पूरी दुनिया के सामने आ चुका है कि पाकिस्तान ने इस क्षेत्र का उपयोग भारतीय कश्मीर में अशांति और आतंकवाद फैलाने के लिए एक ट्रेनिंग सेंटर के रूप में किया है। 1988 से ही यहाँ कश्मीरी और अन्य युवाओं को हथियारों की ट्रेनिंग देकर भारतीय सीमा में घुसपैठ के लिए तैयार किया जाता है। एक आधिकारिक आंकड़े के अनुसार, विभिन्न समय पर यहाँ लगभग 4,000 आतंकवादी घुसपैठ की फिराक में कैंपों में सक्रिय रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>स. चीन की बढ़ती पैठ और सीपेक (CPEC) का जाल</strong></p>
<p>
	स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद पाकिस्तान ने विकास के बहाने पूरे क्षेत्र को चीन के हाथों गिरवी रख दिया है। यहाँ से &#39;चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर&#39; (CPEC) गुजरता है, जो पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को चीन के काशघर से जोड़ता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>चीन की सुरंग: </strong>इस कॉरिडोर के तहत भारत पर दबाव बनाने के लिए पीओके से गुजरने वाली 200 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाने का समझौता हुआ है, जिस पर 18 अरब डॉलर खर्च किए जा रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	चीनी सेना की मौजूदगी: चीनी प्रोजेक्ट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा के बहाने इस इलाके में चीन के लगभग 24 हजार सैनिकों की तैनाती हो चुकी है। भारतीय खुफिया एजेंसियों (BSF) के अनुसार, चीनी सेना पीओके के राजौरी और श्रीगंगानगर सेक्टर के ठीक उस पार अग्रिम रक्षा ठिकानों पर पाकिस्तानी सैनिकों को आधुनिक हथियारों की ट्रेनिंग दे रही है और अचूक निशानेबाज (Snipers) तैनात करने की योजना पर काम कर रही है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	5. भारत सरकार की नीति और भावी कदम</h3>
<p>
	भारत सरकार PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान के पूरे क्षेत्र को अपना अभिन्न हिस्सा और पाकिस्तान का अवैध कब्जा मानती है। संयुक्त राष्ट्र के 1948-49 के प्रस्तावों के अनुसार भी इस क्षेत्र से पाकिस्तानी सेना का हटना अनिवार्य था, जिसका पाकिस्तान ने हमेशा उल्लंघन किया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भारत ने अपनी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता दर्शाने के लिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पीओके के क्षेत्रों के लिए 24 सीटें और भारतीय संसद में 7 सीटें हमेशा से आरक्षित रखी हैं। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने और लद्दाख को स्वतंत्र केंद्रशासित प्रदेश बनाए जाने के बाद, भारत सरकार का अगला रणनीतिक लक्ष्य पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) को वापस भारत के नक्शे में शामिल करना है, और वर्तमान में इस दिशा में कूटनीतिक प्रयास तेज हो चुके हैं।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 14:28:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 13 Jun 2026 17:22:57 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Current Affairs]]></category>
      <authorname>वेबदुनिया फीचर टीम</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भारत के सीमा विवाद: POK, J&K, IB, LOC और LAC का पूरा इतिहास और भूगोल]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/current-affairs/india-border-dispute-pok-jk-ib-loc-lac-history-geography-126061300015_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/current-affairs/india-border-dispute-pok-jk-ib-loc-lac-history-geography-126061300015_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/13/thumb/1_1/1781336160-9082.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/13/thumb/1_1/1781336160-9082.jpg</image>
      <description><![CDATA[भारत की पश्‍चिम और पूर्वोत्तर सीमाओं पर चीन का कब्जा वर्षों से विवाद, संघर्ष और युद्ध का विषय बना हुआ है। चीन और पाकिस्तान लगातर भारत को चुनौती देते आ रहे हैं जिसका भारत अपने तरीके से जवाब भी देते आया है। दोनों देशों ने वर्तमान में, भूटान, नेपाल और ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="PAK POK Pak Map" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/13/full/1781336160-9082.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="PAK POK Pak Map" width="1200" /></p>
	</p>
	estimated<br />
	भारत की पश्‍चिम और पूर्वोत्तर सीमाओं पर चीन का कब्जा वर्षों से विवाद, संघर्ष और युद्ध का विषय बना हुआ है। चीन और पाकिस्तान लगातर भारत को चुनौती देते आ रहे हैं जिसका भारत अपने तरीके से जवाब भी देते आया है। दोनों देशों ने वर्तमान में, भूटान, नेपाल और बांग्लादेश को भड़काने का भरपूर प्रयास किया है जिसमें वे कुछ हद तक सफल भी हुए हैं। चलिए जानते हैं भारत का चीन और पाकिस्तान से लगी सीमाओं का एक विश्लेषण।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	<span style="color:#000080;">सीमा रेखाओं की परिभाषा और उनका निर्माण</span></h3>
<h3>
	1. अंतर्राष्ट्रीय सीमा (International Border - IB)</h3>
<p>
	<strong>परिभाषा: </strong>यह दो देशों के बीच की वास्तविक, आधिकारिक और स्थायी सीमा रेखा होती है जिस पर कोई विवाद नहीं होता है। इसे दोनों देशों के साथ-साथ दुनिया के सभी देश मान्यता देते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>भारत की स्थिति: </strong>भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पाकिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, मर्मा (म्यांमार), अफगानिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका से लगती है। यदि सीमा पर कोई संघर्ष न हो, तो मामले सीधे बॉर्डर पर ही सुलझ जाते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>विवाद की स्थिति: </strong>भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमा वर्तमान में पाकिस्तान और चीन के कब्जे वाले इलाकों के अंदर कहीं स्थित है, क्योंकि इन दोनों देशों ने भारत की भूमि को हड़प रखा है। भारतीय सेना वर्तमान में उन जगहों पर तैनात है जहां युद्ध विराम की घोषणा की गई थी।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	2. नियंत्रण रेखा (Line of Control - LOC)</h3>
<p>
	<strong><span style="color:#b22222;">इतिहास और निर्माण: </span></strong>भारत विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। लेकिन उनके निर्णय में हुई देरी का फायदा उठाकर 1947-48 में पाकिस्तानी सेना ने कबाइलियों के साथ मिलकर कश्मीर पर हमला कर दिया और वे काफी भीतर तक घुस आए। भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए श्रीनगर को बचाया और दुश्मनों को पीछे धकेला।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong><span style="color:#b22222;">सीजफायर लाइन: </span></strong>सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण दोनों सेनाएं जहां थीं, वहीं रुक गईं। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के संयुक्त राष्ट्र (UN) जाने और वहां से युद्ध विराम की घोषणा होने के कारण इस मोर्चे को &#39;सीजफायर लाइन&#39; कहा गया। इसके चलते जम्मू-कश्मीर दो भागों में बंट गया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong><span style="color:#b22222;">LOC नामकरण: </span></strong>साल 1972 के शिमला समझौते के तहत इसी सीजफायर लाइन को &#39;लाइन ऑफ कंट्रोल&#39; (LOC) का नाम दिया गया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong><span style="color:#b22222;">भौगोलिक स्थिति: </span></strong>LOC की लंबाई लगभग 814 किलोमीटर बताई जाती है। यह कोई आधिकारिक अंतर्राष्ट्रीय सीमा नहीं बल्कि एक युद्ध विराम रेखा है। यह जम्मू के अखनूर सेक्टर से शुरू होकर पॉइंट NJ 9842 तक फैली हुई है। इसका भारतीय भाग (दक्षिणी और पूर्वी हिस्सा) जम्मू-कश्मीर राज्य के रूप में जाना जाता है, जो मूल कश्मीर का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा है। बाकी हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	3. चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual Control - LAC)</h3>
<p>
	<strong><span style="color:#000080;">इतिहास और निर्माण: </span></strong>साल 1914 में ब्रिटिश काल के दौरान भारत और तिब्बत के बीच सीमा निर्धारण के लिए &#39;मैकमोहन लाइन&#39; (McMahon Line) खींची गई थी। लेकिन चीन इस समझौते को नहीं मानता। ब्रिटिश शासन के बाद जो क्षेत्र उनके पास था, वह भारत का कहलाया, लेकिन भारत और चीन के बीच सीमा को कभी भी जमीन पर बाड़ या पत्थरों से सही तरह से चिन्हित नहीं किया गया। चीन में माओवादी क्रांति के बाद उसने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने "हिंदी-चीनी भाई-भाई" का नारा दिया, लेकिन चीन ने धोखा दिया और 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया। चीन की सेना मैकमोहन लाइन को पार कर भारतीय क्षेत्रों में घुस आई। युद्ध विराम के बाद जो सेना जहां रुकी, उसे ही &#39;लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल&#39; (LAC) कहा गया और मैकमोहन लाइन पीछे छूट गई।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong><span style="color:#000080;">भौगोलिक स्थिति और लंबाई:</span></strong> LAC लद्दाख, कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश से होकर गुजरती है। यह भारत को चीन के कब्जे वाले &#39;अक्साई चीन&#39; से अलग करती है। भारत के अनुसार इसकी कुल लंबाई 3,488 किलोमीटर से अधिक है, जबकि चीन इसे नहीं मानता और इसकी लंबाई केवल 2,000 किलोमीटर बताता है। इसी मतभेद के कारण दोनों देशों में विवाद है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong><span style="color:#000080;">प्रबंधन: </span></strong>काराकोरम से अरुणाचल प्रदेश तक LAC तीन हिस्सों में बंटी है: पश्चिमी सेक्टर (लद्दाख, हिमाचल, उत्तराखंड), मिडिल सेक्टर (सिक्किम) और पूर्वी सेक्टर (अरुणाचल प्रदेश)। 1993 में हुए एक समझौते के तहत दोनों देशों के सैनिक इस रेखा से लगभग 50 से 100 किलोमीटर की दूरी बनाकर निगरानी करते हैं। गलवां जैसी कुछ घटनाओं को छोड़कर LAC पर आमतौर पर शांति रहती है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	<span style="color:#0000cd;">पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) और गिलगित-बाल्टिस्तान</span></h3>
<p>
	<strong>1. प्रशासनिक विभाजन:</strong> भारत सरकार ने अब इसका नाम बदलकर &#39;पाक अधिकृत जम्मू और कश्मीर&#39; (PoJK) कर दिया है। पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को दो प्रशासनिक हिस्सों में बांटा हुआ है:</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>2. आजाद कश्मीर: </strong>इसका क्षेत्रफल लगभग 5,134 वर्ग मील (करीब 13,297 वर्ग किलोमीटर) है। इसकी राजधानी मुजफ्फराबाद है और इसमें 10 जिले हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>3. गिलगित-बाल्टिस्तान: </strong>इसका क्षेत्रफल लगभग 28,174 वर्ग मील (करीब 72,970 वर्ग किलोमीटर) है। इसकी राजधानी गिलगित है और इसमें भी 10 जिले हैं। यह पूरे पाक अधिकृत क्षेत्र का 85 प्रतिशत हिस्सा है। पहले इसे पाकिस्तान में &#39;नॉर्न एरिया&#39; कहा जाता था, लेकिन 2009 में वहां एक स्वायत्त प्रांतीय व्यवस्था बनाकर मुख्यमंत्री और असेंबली (24 सदस्य) का गठन किया गया, जिसके पास अधिकार न के बराबर हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>4. कुल क्षेत्रफल और आबादी: </strong>इस पूरे क्षेत्र का कुल अनुमानित क्षेत्रफल लगभग 13,297 वर्ग किलोमीटर (गिलगित-बाल्टिस्तान को मिलाकर कुल क्षेत्र भारतीय कश्मीर से लगभग 3 गुना बड़ा है) से ज्यादा है। यहाँ की कुल आबादी करीब 30 से 60 लाख के बीच बताई जाती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>5. भौगोलिक सीमाएं: </strong>इसकी सीमा पश्चिम में पाकिस्तान के पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा से, उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान के वखान कॉरिडोर से, उत्तर में चीन के शिनजियांग प्रांत से और पूर्व में भारतीय जम्मू-कश्मीर व लद्दाख से मिलती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>6. भारत की नीति: </strong>भारत इसे अवैध कब्जे वाला क्षेत्र मानता है। संयुक्त राष्ट्र के 1948 और 1949 के प्रस्तावों के अनुसार, यहाँ से पाकिस्तानी सेना के हटने के बाद ही जनमत संग्रह होना था, जो पाकिस्तान ने कभी नहीं किया। भारत ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पीओके के लिए 24 सीटें और भारतीय संसद में 7 सीटें आरक्षित रखी हैं। अनुच्छेद 370 हटने के बाद भारत अब इस हिस्से को भी वापस मिलाने की दिशा में अग्रसर है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	1. शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley)</h3>
<p>
	काराकोरम पर्वत श्रृंखला का हिस्सा रही यह घाटी ऐतिहासिक रूप से जम्मू-कश्मीर-लद्दाख का अंग थी। मार्च 1963 में पाकिस्तान ने एक अवैध सीमा समझौते के तहत पीओके के गिलगित-बाल्टिस्तान वाले हिस्से में से लगभग 1,900 वर्ग मील (कुछ स्रोतों के अनुसार 5,180 वर्ग किलोमीटर) का यह इलाका चीन को उपहार में दे दिया। भारत इस हस्तांतरण को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	<strong>2. सियाचिन ग्लेशियर (Siachen Glacier)</strong></h3>
<p>
	<strong>स्थिति:</strong> यह काराकोरम पर्वतमाला में स्थित दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र है। यह चीन को दिए गए शक्सगाम, अक्साई चीन, गिलगित-बाल्टिस्तान और भारतीय कश्मीर के बीच स्थित एक बेहद रणनीतिक बिंदु है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>सैन्य नियंत्रण: </strong>1984 में भारत ने "ऑपरेशन मेघदूत" चलाकर इस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ग्लेशियर पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया। यह सैन्य रूप से और सिंधु नदी के जल स्रोतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	3. अक्साई चीन (Aksai Chin)</h3>
<p>
	यह लद्दाख का पूर्वी हिस्सा है जो महाराजा हरि सिंह के समय कश्मीर का हिस्सा था। 1962 के युद्ध में भारत की हार के बाद चीन ने लद्दाख के इस पठारी और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्से पर कब्जा कर लिया, जो लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र है। पाकिस्तान ने चीन के इस कब्जे को आधिकारिक मान्यता दे रखी है। यह क्षेत्र चीन के तिब्बत और शिनजियांग प्रांतों को आपस में जोड़ता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	<span style="color:#0000cd;">पाक अधिकृत क्षेत्र (PoK) की वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ</span></h3>
<p>
	<strong>1. पाकिस्तान की दोहरी नीति और सामाजिक दमन: </strong>पाकिस्तान विश्व मंच पर इसे &#39;आजाद कश्मीर&#39; कहता है, लेकिन यहाँ का प्रशासन सीधे इस्लामाबाद से संचालित होता है। यहाँ एक कठपुतली प्रधानमंत्री और 49 सीटों वाली विधानसभा (1974 से क्रियाशील) है, जिसे वैश्विक मान्यता प्राप्त नहीं है। पाकिस्तान ने यहाँ बाहरी लोगों को बसाकर इसकी डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) बदल दी है। 1947 में यहाँ बहुसंख्यक आबादी कश्मीरी शिया थी, जिन्हें अब अल्पसंख्यक बना दिया गया है। विशेषकर सूफी और शिया समुदाय के अधिकारों का हनन हो रहा है, जिसके कारण वे समय-समय पर भागकर भारतीय कश्मीर में शरण लेते रहे हैं। विकास के नाम पर यहाँ कुछ नहीं किया गया, जिससे स्थानीय कश्मीरियों की जिंदगी बदहाल है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>2. आतंकवाद का केंद्र: </strong>पाकिस्तान ने 1988 से ही इस क्षेत्र का उपयोग भारतीय कश्मीर में अशांति फैलाने के लिए आतंकवादी ट्रेनिंग सेंटर के रूप में किया है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में दी गई जानकारियों के अनुसार, हजारों कश्मीरी और अन्य आतंकवादी इस क्षेत्र में घुसपैठ की तैयारी के लिए कैंपों में ट्रेनिंग लेते रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>3. चीन की पैठ और सीपेक (CPEC): </strong>विकास के बहाने पाकिस्तान ने इस क्षेत्र में चीन को प्रवेश दे दिया है। यहाँ से &#39;चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर&#39; (CPEC) गुजरता है, जो अरब सागर में पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को चीन के काशघर से जोड़ता है। इस रणनीतिक गलियारे के तहत चीन और पाकिस्तान के बीच 200 किमी लंबी सुरंग बनाने का भी समझौता हुआ है, जिस पर 18 अरब डॉलर का खर्च अनुमानित है। स्थानीय लोग इसका विरोध करते हैं क्योंकि चीनी कंपनियां यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रही हैं। चीनी प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा के लिए यहाँ लगभग 24 हजार चीनी सैनिकों की तैनाती है और चीनी सेना इस क्षेत्र में पाकिस्तानी सैनिकों को राजौरी व श्रीगंगानगर सेक्टर के पार अग्रिम चौकियों पर हथियार संबंधी ट्रेनिंग और स्नाइपर्स की तैनाती में मदद कर रही है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	<span style="color:#0000cd;">जम्मू, कश्मीर और लद्दाख का ऐतिहासिक और भौगोलिक परिचय</span></h3>
<p>
	ऐतिहासिक रूप से यह संपूर्ण भू-भाग विभिन्न समय में हिंदू राजाओं, मुस्लिम सुल्तानों, मुगलों (अकबर के काल में), अफगानों (1756) और सिखों (1819) के अधीन रहा। 1846 में सिख साम्राज्य के राजा रंजीत सिंह ने जम्मू का क्षेत्र महाराजा गुलाब सिंह को सौंप दिया, जिसके बाद डोगरा राजवंश का शासन शुरू हुआ। भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से इसके तीन मुख्य भाग हैं:</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	1. जम्मू संभाग (Jammu Division)</h3>
<p>
	<strong>परिचय: </strong>भारतीय ग्रंथों में इसे &#39;डुग्गर प्रदेश&#39; कहा गया है। इसका कुल क्षेत्रफल 36,315 वर्ग किलोमीटर है।</p>
<p>
	जिले: इसमें कुल 10 जिले हैं- जम्मू, सांबा, कठुआ, उधमपुर, डोडा, पुंछ, राजौरी, रियासी, RAMBAN (रामबन) और किश्तवाड़।</p>
<p>
	<strong>विवादित हिस्सा: </strong>इसके लगभग 13,297 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र (भिम्बर, कोटली, मीरपुर, पुंछ हवेली, बाग, सुधान्ती, मुजफ्फराबाद, हट्टियां आदि जिलों) पर पाकिस्तान का कब्जा है, जिसे पाकिस्तान &#39;आजाद कश्मीर&#39; कहता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	2. कश्मीर संभाग (Kashmir Division)</h3>
<p>
	<strong>परिचय: </strong>पीर पंजाल पहाड़ी श्रृंखला के दूसरी ओर कश्मीर घाटी स्थित है। इसका क्षेत्रफल लगभग 16,000 वर्ग किलोमीटर है।</p>
<p>
	<strong>जिले: </strong>इसमें भी 10 जिले हैं- श्रीनगर, बड़गाम, कुलगाम, पुलवामा, अनंतनाग, कुपवाड़ा, बारामूला, शोपियां, गन्दरबल और बांडीपुरा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>जनसांख्यिकी और विस्थापन: </strong>यहाँ मुख्य रूप से सुन्नी, शिया, वहाबी और अहमदिया मुसलमानों के साथ सिख और हिंदू (गुर्जर, राजपूत, ब्राह्मण) रहते थे। लेकिन 1989 से शुरू हुए पाकिस्तानी छद्म युद्ध और सुन्नी आतंकवादी हिंसा में 20,000 से अधिक निर्दोष लोग मारे गए। इसके चलते घाटी के लगभग 7 लाख हिंदू और सिख अल्पसंख्यक विस्थापित हो गए, जो आज जम्मू और दिल्ली के शिविरों में शरणार्थियों का जीवन जी रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	3. लद्दाख संभाग (Ladakh Division)</h3>
<p>
	<strong>परिचय: </strong>यह एक ऊंचा पठार है जिसकी औसत ऊंचाई 3,500 मीटर (9,800 फीट) से अधिक है। यह हिमालय, काराकोरम पर्वत श्रृंखला और सिंधु नदी की ऊपरी घाटी में फैला है। भौगोलिक साक्ष्यों के अनुसार यह क्षेत्र प्राचीन काल में किसी बड़ी झील का हिस्सा था जो समय के साथ घाटी में बदल गया। ऐतिहासिक रूप से यह सिल्क रूट का हिस्सा था और मध्य एशिया से व्यापार (रेशम, कालीन, मसाले, पश्मीना ऊन) का एक बड़ा गढ़ था। लद्दाख कभी भी तिब्बत का हिस्सा नहीं रहा, हालांकि चीन इस पर अपना दावा करता है।</p>
<p>
	<strong>जिले और क्षेत्रफल: </strong>भारत के नियंत्रण वाले लद्दाख में लेह और कारगिल (जंस्कार घाटी सहित) दो हिस्से हैं। इसका कुल क्षेत्रफल काफी बड़ा है, लेकिन इसके करीब 38,000 वर्ग मील (या किलोमीटर) के हिस्से &#39;अक्साई चीन&#39; पर चीन का अवैध कब्जा है।</p>
<p>
	<strong>जनसंख्या और संस्कृति: </strong>यहाँ की आबादी बेहद कम (लगभग 2,36,539) है। पूर्वी हिस्से (लेह) में मुख्य रूप से तिब्बती बौद्ध और हिंदू रहते हैं, जबकि पश्चिमी हिस्से (कारगिल) में भारतीय शिया मुसलमानों की संख्या अधिक है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	5. समेकित भौगोलिक एवं जनसांख्यिकीय आंकड़े</h3>
<p>
	<strong>कुल क्षेत्रफल और राजधानियां: </strong>अविभाजित जम्मू-कश्मीर का कुल क्षेत्रफल 2,22,236 वर्ग किलोमीटर है। इसकी दो राजधानियां हैं- श्रीनगर (ग्रीष्मकालीन) और जम्मू (शीतकालीन)। क्षेत्रफल के आधार पर वर्तमान भारतीय नियंत्रण वाले हिस्से में लद्दाख 58 प्रतिशत, जम्मू 26 प्रतिशत और कश्मीर 16 प्रतिशत है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>जनसंख्या वितरण (2011 की जनगणना): </strong>संपूर्ण राज्य की कुल जनसंख्या 1,25,41,302 है। इसमें कुल आबादी का लगभग 64% मुस्लिम, 33% हिंदू और 3% में बौद्ध, सिख व ईसाई शामिल हैं। कश्मीर घाटी मुस्लिम बहुल (जिसमें शियाओं की संख्या घटकर 13% रह गई है) है, जम्मू हिंदू व सिख बहुल है, और लद्दाख में बौद्धों तथा शिया मुसलमानों की संख्या अधिक है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>नोट: उपरोक्त बताएं गए आंकड़े अनुमानित और इंटरनेट से प्राप्त हैं। पाठक अपने विवेक का उपयोग करके समझें।</strong></p>
<p>
	 </p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 12:25:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 13 Jun 2026 13:06:42 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Current Affairs]]></category>
      <authorname>वेबदुनिया फीचर टीम</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[तेजी से बदल रहा है बंगाल]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/my-blog/bengal-is-changing-rapidly-126061200048_1.html</link>
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      <description><![CDATA[शुभेंदु सरकार ने कुछ फैसले किए तथा कुछ प्रभाव में ही परिवर्तन आ गया। इनमें केवल केंद्रीय योजनाओं को लागू करना ही नहीं है। आप चाहे भाजपा के जितने आलोचक हों क्या किसी ने कल्पना की थी कि सरकार आने के हफ्ते भर के अंदर ही राज्य से टीएमसी द्वारा लगाए अवैध ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt=" West Bengal Chief Minister Suvendu Adhikari" class="imgCont" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/09/full/1778297981-0491.jpg" style="border: 1px solid rgb(221, 221, 221); margin-right: 0px; z-index: 0; width: 1200px; height: 675px;" title="suvendu adhikari" /></p>
</p>
<p>
	पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी सरकार द्वारा सत्ता संभालने के अल्पकाल में ही स्पष्ट बदलाव दिख रहा है। ऐसा लगता है कि केवल ममता सरकार की विचारधारा और दिशा के बिल्कुल उलट शुभेंदु सरकार ने यू टर्न ही नहीं किया बल्कि सारे कील कांटों को उखाड़ते, ध्वस्त करते तीव्र गति से शासन की गाड़ी वहां पहुंच रही है जहां से  बंगाल शांत और स्थिर हो सामान्य राज्य के रूप में गतिविधियों का निर्धारण करे। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	शुभेंदु सरकार ने कुछ फैसले किए तथा कुछ प्रभाव में ही परिवर्तन आ गया। इनमें केवल केंद्रीय योजनाओं को लागू करना ही नहीं है। आप चाहे भाजपा के जितने आलोचक हों क्या किसी ने कल्पना की थी कि सरकार आने के हफ्ते भर के अंदर ही राज्य से टीएमसी द्वारा लगाए अवैध टोल बूथ हट जाएंगे, बैरिकेड समाप्त हो जाएंगे, हफ्ते वसूली का धंधा खत्म हो जाएगा…? यह हो गया। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	ममता ने स्वयं महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिंता प्रकट करते हुए रात में न निकलने का आग्रह किया था। सरकार बदलते ही बंगाल अपने स्वभाव, संस्कृति और चहल-पहल में वापस दिख रहा है। महिलाएं देर रात आती-जाती दिखाई दे सकती है। सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।<br />
	<br />
	कोलकाता समेत कई जिलों में रात की पुलिस पेट्रोलिंग काफी बढ़ा दी गई है। आम प्रतिक्रिया देख लीजिए सोशल मीडिया से लेकर मुख्य मीडिया में लोग लिख रहे हैं कि अब सरकार बदली है ऐसा महसूस हो रहा है। बकरीद के दिन वर्षों बाद सड़कों की बजाय मैदानों और मस्जिदों में नमाज पढ़े गए। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	किसी सरकार की दिशा का संकेत होता है और अगर वैचारिक और प्रशासनिक दिशा स्पष्ट हो, उनके प्रति प्रतिबद्धता और व्यवहार में प्रखरता हो तो उसका इकबाल  कायम होता है। चुनाव परिणाम के तुरंत बाद ऐसा लग रहा था मानो बंगाल को संभालना कठिन होगा। कुछ ही दिनों में ऐसा लगने लगा मानो यह वो बंगाल है ही नहीं जिसे हम 4 मई के चुनाव परिणाम के पूर्व या उसके दो चार दिनों बाद तक देख रहे थे। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोलकाता से आसनसोल तक अवैध निर्माण के विरुद्ध बुलडोजर कार्रवाई का आक्रामक हिंसक विरोध पूर्व सरकार की तस्वीर पेश कर रहा था। पत्थरबाजी भी हुई। उसके बाद क्या हुआ यह महत्वपूर्ण है। फुटेज से पत्थरबाजों और दंगाइयों के चेहरे पहचान कर कार्रवाई हो रही है तथा पुलिस ने लाउडस्पीकर में ऐलान कर दिया कि जिन लोगों ने हिंसा और तोड़फोड़ की है उनकी संपत्ति से इसकी वसूली की जाएगी।<br />
	<br />
	उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने हिंसक प्रदर्शनकारियों और दंगाइयों के विरुद्ध यही नियम अपनाया और उसके परिणाम काफी हद तक आए। बंगाल में इसकी कल्पना ही नहीं थी जो सामने है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	भाजपा ने चुनाव अभियान में कानून और व्यवस्था कायम करने, महिला सुरक्षा, अवैध घुसपैठ रोकने, घुसपैठियों को बाहर निकालने, सीमा सुरक्षा एवं अंतरिक्ष सुरक्षा दोनों सुनिश्चित करने, तुष्टिकरण की समाप्ति एवं हिंदुओं के साथ हुए अन्याय का परिमार्जन, भ्रष्टाचार का अंत, प्रदेश को विकास एवं सांस्कृतिक गरिमा की पटरी पर वापस लाने आदि वायदे किए थे। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	मुख्यमंत्री का पदभार संभालते ही शुभेन्दु ने बांग्लादेश की सीमा पर घेराबंदी के लिए सीमा सुरक्षा बल को भूमि सौंपने का आदेश दिया जिसे 45 दिनों में पूरा हो जाना है। 450 किलोमीटर ऐसे क्षेत्र हैं जहां घेरा लगाना बाकी है उसकी जमीन मिली नहीं। मिनट में यह काम हो गया। इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला नेशनल हाईवे 10 और नेशनल हाईवे 110 के सात हिस्से केंद्र सरकार को सौंपना है। इनमें से पांच चिकन नेक या सिलीगुड़ी गलियारा से गुजरते हैं। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	चिकन नेक का 120 किलोमीटर इलाका पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को भारत के साथ जमीन से जोड़ता है। यह बांग्लादेश, नेपाल, भूटान तीन देशों से लगता है और चीन भी यहां से निकट है। चिकन नेक कट जाए तो पूर्वोत्तर से भारत का सीधा जमीनी संपर्क खत्म हो जाएगा।<br />
	<br />
	दिल्ली दंगों के आरोपी सरजिल इमाम को उच्चतम न्यायालय ने आज तक जमानत इसीलिए नहीं दी कि उसने मुसलमानों के द्वारा चिकन नेट काट कर भारत को खंडित करने की बात की थी। संयोग से उस पूरे क्षेत्र में भारत के अंदर बंगाल और बिहार दोनों और मुसलमानों की आबादी राष्ट्रीय औसत से अधिक है तथा दूसरी और बांग्लादेश है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	मुस्लिम आबादी को भड़का कर चिकन नेक काट कर शेष पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने का विचार बांग्लादेश के पूर्व शासक मोहम्मद यूनुस से लेकर वहां जेन जी आंदोलन तथा जमात ए इस्लामी के नेताओं के सामने आए । ममता सरकार ने केंद्र के आग्रह को स्वीकार नहीं किया और इस कारण वहां रक्षा और नागरिक दोनों प्रकार के आधारभूत संरचनाओं की कमी रही। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	अवैध घुसपैठ के साथ अनेक भारत विरोधी गतिविधियां, अवैध पशुओं एवं सामग्रियों की तस्करी आदि को पूरी तरह रोक पाना कठिन था।  नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया तथा नेशनल हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड मिलकर इसका विकास करेगा। यानी आंतरिक और सीमा सुरक्षा और दूसरे रूप में कहें तो घुसपैठियों को रोकने के लिए सरकार ने पूर्ण प्रतिबद्धता दिखाई है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	कट मनी और भ्रष्टाचार तथा महिलाओं के विरुद्ध अपराध की व्यापक छानबीन और कार्रवाई के लिए दो उच्च स्तरीय अधिकार प्राप्त आयोगों का गठन किया जा चुका है। सरकार ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज के पूर्व सुपरिटेंडेंट संदीप घोष के खिलाफ वित्तीय धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में ईडी को मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी है।<br />
	<br />
	ऐसे ही आदेश अन्य मामलों में दिए जा रहे हैं जिन्हें पूर्व सरकार ने रोक कर रखा था। आप जानते हैं कि संदेशखाली से लेकर आईजी कर और यहां तक कि मुर्शिदाबाद के दंगों में महिलाओं के साथ व्यवहार बंगाल में प्रमुख मुद्दा रहा है। कट मानी और भ्रष्टाचार का अनुभव ऐसा था मानो यह सरकारी प्रक्रिया का ही अंग हो। आप देख लीजिए वही पुलिस प्रशासन और माहौल कितना बदला है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	अवैध कब्जों से मुक्ति बंगाल की ऐसी चुनौती है जिससे निपटना यानी इतिहास की धारा बदल देना होगा। एक पार्टी के लोगों का ही पूरे प्रदेश में कब्जा है। तृणमूल ने सत्ता में आते ही कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के दफ्तरों व अन्य स्थान कब्जाये, इसके साथ नेताओं ने प्रशासन की मिली भगत से सरकारी व निजी जमीन, मकान सब पर भयानक रूप से कब्जे किए।<br />
	<br />
	माफिया तंत्र भूमि का उत्पन्न हुआ जिसने न जाने कितने लोगों को स्थान छोड़ने को विवश कर दिया। इसी तरह धर्म स्थलों पर कब्जे हुए या उन्हें जबरन बंद रखने को भी विवश किया गया।  लगातार उन अवैध कब्जों के विरुद्ध कार्रवाई हो रही है। कांग्रेस और वामपंथी दलों तक के दफ्तर मुक्त कर भाजपा के लोगों ने कई जगह सौंप दिया। कुछ डर से ही छोड़ कर भाग गए। कई धर्मस्थल तो जनता ने हीं मुक्त करा लिए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वास्तव में शुभेंदु सरकार ने भाजपा की विचारधारा को सत्ता नीति में अपनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है। सड़कों पर नमाज पढ़ने का अंत करने के लिए लगातार कार्रवाई हो रही है। वंदे मातरम गायन अनिवार्य कर दिया गया। राज्य के इमामों, मुअज्जिनों और पुजारियों को दिया जाने वाला सरकारी भत्ता (मानदेय) 1 जून से समाप्त करने का आदेश जारी किया गया है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	सरकार का एक बड़ा‌ फैसला अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण को 17% से घटाकर 7% करना तथा इसे केवल 66 हिंदू जातियों तक ही सीमित रखना है। पिछड़ी जाति की सूची में से मुसलमान की जातियों को पूरी तरह हटा दिया। ममता बनर्जी ने 2024 में 71 जातियों को पिछड़ी जाति में शामिल किया था जिनमें 65 मुस्लिम समुदाय के थे। ममता बनर्जी ने मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा पिछड़ी जाति का आरक्षण देने के लिए ही श्रेणी ए बनाकर 10% आरक्षण घोषित किया था। इसके पहले  पिछड़े वर्ग के लिए 7% आरक्षण था। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	साफ था कि केवल वोट बैंक की दृष्टि से मुसलमानों को पिछड़ी जाति में शामिल कर अतिरिक्त आरक्षण का अनुपात लाया गया। इस तरह शुभेंदु सरकार ने कम समय में ही त्वरित गति से अपने कदमों द्वारा यह स्थापित कर दिया कि राज्य किसी मजहब या पंथ विशेष या पार्टी नेताओं या समर्थकों लिए नहीं बल्कि सबके हित में काम करेगा। <br />
	<br />
	खजाने का धन किसी पंथ के तुष्टिकरण के लिए नहीं बल्कि उपयुक्त पात्रों के कल्याण पर खर्च होगा, शासन कानून और विधान के अनुसार चलेगा,  प्राथमिकता आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा तथा विकास होगा एवं पहले जो निहित स्वार्थी तत्व इसके रास्ते में आए, सत्ता का दुरुपयोग किया उन सबके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होगी।</p>
<p>
	<br />
	(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। &#39;वेबदुनिया&#39; इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 16:12:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 12 Jun 2026 16:08:46 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[My Blog]]></category>
      <authorname>अवधेश कुमार</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[‘पुश‑इन’ के आरोपों पर भारत‑बांग्लादेश में बढ़ती कड़वाहट]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/west-bengal-pushback-policy-bangladesh-border-tension-bjp-government-action-126061200003_1.html</link>
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      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/12/thumb/1_1/1781246079-94.jpg</image>
      <description><![CDATA[मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने शपथ लेने के बाद ही बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर 'डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट ' का फार्मूला अपनाने की बात कही थी। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा है कि सरकार केंद्र के एक पुराने कानून के सहारे ही घुसपैठियों ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="suvendu adhikar, bsf and bangladesh border" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/12/full/1781246079-94.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="suvendu adhikar, bsf and bangladesh border Photo : AI Generated" width="1200" /></p>
	</p>
	प्रभाकर मणि तिवारी</p>
<p>
	मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने शपथ लेने के बाद ही बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर &#39;डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट &#39; का फार्मूला अपनाने की बात कही थी। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा है कि सरकार केंद्र के एक पुराने कानून के सहारे ही घुसपैठियों को बीएसएफ के जरिए सीधे डिपोर्ट करने की कार्रवाई कर रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	असम और पश्चिम बंगाल में सीमा पार से घुसपैठ दशकों पुरानी समस्या रही है और इस पर अक्सर विवाद होता रहा है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी कथित घुसपैठियों के पुश बैक के समर्थक रहे हैं। लेकिन इस दौरान कई भारतीयों को भी सीमा पार भेजने के कारण सरकार की किरकिरी हो चुकी है। अब पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार आने के बाद यहां भी वही कवायद दोहराई जा रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पश्चिम बंगाल की 2,216.7 किलोमीटर लंबी सीमा बांग्लादेश के साथ लगी है। इसमें से 1,647.7 किलोमीटर के इलाके में कंटीले तारों की बाड़ लगा दी जा चुकी है। अब सत्ता में आने के बाद बीजपी ने बाकी इलाकों में बाड़ लगाने के लिए बीएसएफ को जमीन सौंपने की कवायद शुरू कर दी है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	भारत-बांग्लादेश सीमा पर चिंता और आतंक</h3>
<p>
	बीजेपी सरकार के सत्ता संभालते ही जबरन पुशबैक के आतंक के कारण सैकड़ों की तादाद में लोग सीमावर्ती इलाकों में पहुंच रहे हैं। लेकिन बार्डर गार्ड्स बांग्लादेश (बीजीबी) की ओर से सीमा पार करने की अनुमति नहीं मिलने के कारण सैकड़ों लोग कड़ी धूप और गर्मी में खुले आसमान के नीचे दिन गुजारने पर मजबूर हैं। इनमें बच्चे, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल हैं। मानवाधिकार संगठनों ने इस स्थिति पर भारी चिंता जताते हुए सरकार से जबरन सीमा पार धकेलने की कवायद पर अंकुश लगाने की मांग की है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की कवायद के दौरान लाखों लोगों के नाम सूची से कट गए थे। इस साल अप्रैल में हुए चुनाव में बीजेपी ने सत्ता में आने पर राज्य से घुसपैठियों को खदेड़ने का वादा किया था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का दावा है कि नई सरकार के सत्ता संभालने के बाद अब तक 4,800 से ज्यादा लोगों को सीमा पार भेजा जा चुका है। लेकिन बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड्स ने इस दावे का खंडन किया है। शुभेंदु अधिकारी ने शपथ लेने के कुछ समय बाद ही अवैध तरीके से बंगाल पहुंचने वाले घुसपैठियों की शिनाख्त कर उनको जबरन सीमा पार भेजने से पहले रखने के लिए सीमावर्ती इलाकों में होल्डिंग सेंटर बनाने का निर्देश दिया था। फिलहाल उत्तर 24-परगना जिले की हकीमपुर के अलावा मालदा और मुर्शिदाबाद में बने ऐसे कुछ अस्थायी होल्डिंग सेंटर में 863 घुसपैठियों को रखा गया है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	दोनों देशों के बीच संबंधों पर असर </h3>
<p>
	पुशबैक के मुद्दे का असर अब दोनों देशों के आपसी संबंधों पर भी नजर आने लगा है। बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के सत्ता से बाहर जाने के बाद दोनों देशों के आपसी संबंध सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे। वहां तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी गठजोड़ की सरकार के सत्ता संभालने के बाद इन संबंधों में बेहतरी की उम्मीद जगी थी। लेकिन अब पुशबैक के मुद्दे से इसमें तनाव साफ दिख रहा है। नई दिल्ली में आठ से 11 जून के बीच बीजीबी और बीएसएफ के बीच महानिदेशक स्तर की सालाना बैठक में भी इस मुद्दे की गूंज सुनाई दी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भारत-बांग्लादेश सीमा पर हिंसक झड़पें तो अक्सर होती रही हैं। लेकिन बंगाल से इतनी बड़ी तादाद में लोगों को जबरन सीमा पार भेजने की घटनाएं पहले कभी नहीं हुई हैं। बीजेपी ममता बनर्जी सरकार पर घुसपैठियों को प्रश्रय देने के आरोप लगाती रही है। इसी वजह से सत्ता में आने के बाद अपने चुनावी वादे के मुताबिक वो कथित घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई करती नजर आ रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सरकारी अधिकारियों को कहना है कि बीएसएफ की ओर से पुशबैक के प्रयासों का बांग्लादेश सीमा सुरक्षा बल बीजीबी लगातार कड़ा विरोध करता रहा है। इसी वजह से कुछ इलाकों में तनाव भी बढ़ा है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	मानवाधिकार संगठनों को किस बात पर है गंभीर चिंता</h3>
<p>
	मानवाधिकार संगठनों ने सरकार की इस कार्रवाई पर गहरी चिंता जताई है। इन संगठनों और कार्यकर्ताओं ने पुशबैक की नीति को मानवता के खिलाफ अपराध बताते हुए सरकार से इसे तुरंत खत्म करने की अपील की है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि सरकार की इस कवायद के कारण कई सीमावर्ती इलाकों में दर्जनों लोग &#39;नो मेंस लैंड&#39; में दिन गुजारने पर मजबूर है। उनको न तो भारत में लौटने की अनुमति मिल रही है और न ही बांग्लादेश में प्रवेश की अनुमति मिल रही है। उधर, बांग्लादेश के अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि अगर कोई सचमुच बांग्लादेशी नागरिक है तो उसकी पहचान और संबंधित दस्तावेजों की जांच के बाद उसे वापस ले लिया जाएगा लेकिन जबरन पुशबैक मंजूर नहीं है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मानवाधिकार संगठन एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन आफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एपीडीआर) के उपाध्यक्ष रंजीत सुर डीडब्ल्यू से बातचीत में कहते हैं, "जिन 4,800 लोगों को पुश बैक किया गया है या आठ सौ से ज्यादा जो लोग होल्डिंग सेंटरों में रह रहे हैं, सरकार को उनका परिचय स्पष्ट करना चाहिए। सरकार की यह कवायद लोगों को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उसे इस मुद्दे पर एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए। महज संदेह के आधार पर किसी को विदेशी नागरिक घोषित नहीं किया जा सकता।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साहा बताते हैं, "एपीडीआर ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से भी इस मामले में हस्तक्षेप की अपील की है।" संगठन ने पुशबैक के विरोध में बृहस्पतिवार को मालदा में एक विरोध रैली का भी आयोजन किया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बंगाल के मानवाधिकार कार्यकर्ता लिटन दास डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हमने इससे पहले इस पैमाने पर पुशबैक की घटनाएं नहीं देखी हैं। यह कानूनी तौर पर सही हो सकता है लेकिन मानवीय आधार पर उचित नहीं है। बांग्लादेशी नागरिकों को उनके देश वापस भेजने से पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। शायद बीजेपी अपने चुनावी वादे को पूरा करने के मकसद से ही इस राह पर चल रही है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उनका कहना था कि इसी वजह से बीजेपी सरकार ने सीमावर्ती इलाकों में होल्डिंग सेंटर बनाने के साथ ही सीमा के बाकी इलाकों में कंटीले तारों की बाड़ लगाने के लिए बीएसएफ को जमीन सौंपने का काम भी शुरू कर दिया है। दास कहते हैं, "दोनों देशों के सुरक्षा बलों के इस रवैए के कारण बेकसूर लोगों को भारी मुसीबत उठानी पड़ रही है। फिलहाल उनके पास अपना कहने को कोई देश नहीं है। बीएसएफ को ऐसे लोगों को भारतीय सीमा में वापस बुला लेना चाहिए।"</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	बंगाल को घुसपैठिया-मुक्त बनाना था एक चुनावी वादा</h3>
<p>
	लेकिन लंबे अरसे बाद अब जब दोनों देशों के आपसी संबंधों में बेहतरी के आसार नजर आ रहे हैं, बंगाल की बीजेपी सरकार आक्रामक तरीके से यह कवायद क्यों कर रही है? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शायद बांग्लादेश पर दबाव पैदा करने के लिए केंद्र की शह पर बंगाल सरकार ने ऐसी कार्रवाई शुरू की है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोलकाता में राजनीतिक विश्लेषक और रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर विश्वनाथ चक्रवर्ती डीडब्ल्यू से कहते हैं, "घुसपैठ बीजेपी का बहुत पुराना मुद्दा रहा है। अब सत्ता में आने के बाद उसे कुछ न कुछ तो करना है। वह यह दिखाने का प्रयास कर रही है कि पार्टी बंगाल को घुसपैठिया-मुक्त करने अपने चुनावी वादे को पूरा करने के लिए कृतसंकल्प है। यह बांग्लादेश पर दबाव बढ़ाने की रणनीति का भी हिस्सा हो सकता है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोलकाता की एक महिला अधिकार कार्यकर्ता अपराजिता तालुकदार डीडब्ल्यू से कहती हैं, "सरकार की ओर से जबरन सीमा पार भेजे जाने वालों में महिलाओं और बच्चों की भी बड़ी तादाद है। सरकार भले कानूनी तौर पर इसके सही होने का दावा करे, मानवता के लिहाज से यह गंभीर अपराध है। दर्जनों लोग खुले में दिन गुजारने पर मजबूर हैं।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उनका कहना था कि अगर सरकार सचमुच घुसपैठियों को निकालने के प्रति गंभीर है तो उसे समुचित कानून प्रक्रिया अपनानी चाहिए। मौजूदा कार्रवाई तो पूरी तरह राजनीतिक है। बीजेपी बंगाल में घुसपैठ के अपने आरोपों को सही साबित करने के लिए ही हड़बड़ी में तमाम लोगों को बिना किसी जांच के सीमा पार खदेड़ने पर आमादा नजर आ रही है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 08:49:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 12 Jun 2026 12:04:58 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्यों हो रहा है स्वीडन में किशोरों को जेल भेजने पर विचार?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/sweden-considers-jailing-13-year-olds-to-tackle-gang-crime-126061100005_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/11/thumb/1_1/1781152474-9594.jpg"/>
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      <description><![CDATA[आमतौर पर 13 से 14 साल के बच्चों को स्कूल में होना चाहिए लेकिन स्वीडन में आपराधिक गुट दिनदहाड़े लोगों पर हमले करने और कॉन्ट्रैक्ट किलिंग जैसे अपराधों को अंजाम देने के लिए किशोरों का इस्तेमाल कर रहे हैं। स्वीडिश कानून के तहत 15 साल से कम उम्र के ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="jail" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/11/full/1781152474-9594.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="jail" width="1200" /></p>
	</p>
	आंद्रेयास नॉल</p>
<p>
	स्वीडन में बढ़ते गिरोह अपराधों के बीच सरकार 13 साल के बच्चों को भी गंभीर आपराधिक मामलों में जेल भेजने के एक नए प्रस्ताव पर विचार कर रही है। यूरोप के कुछ अन्य देश भी ऐसा सोच रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आमतौर पर 13 से 14 साल के बच्चों को स्कूल में होना चाहिए लेकिन स्वीडन में आपराधिक गुट दिनदहाड़े लोगों पर हमले करने और कॉन्ट्रैक्ट किलिंग जैसे अपराधों को अंजाम देने के लिए किशोरों का इस्तेमाल कर रहे हैं। स्वीडिश कानून के तहत 15 साल से कम उम्र के किशोरों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। संगठित आपराधिक गिरोह इस बात का फायदा उठाते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अब बढ़ती गैंग हिंसा और संगठित अपराध से निपटने के लिए स्वीडन अपनी कानूनी व्यवस्था को सख्त करने पर विचार कर रहा है। संसद पहले ही ऐसे एक प्रस्ताव को मंजूरी दे चुकी है। इसके तहत अगर 15 से 17 वर्ष के किशोरों को गंभीर अपराधों में दोषी पाया जाता है तो उन्हें विशेष किशोर कारागारों में जेल की सजा दी जा सकती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसके अलावा स्वीडिश सरकार गंभीर अपराधों के मामले में अपराध की न्यूनतम आयु को अस्थायी तौर पर 13 वर्ष तक घटाने की योजना बना रही है। यह प्रावधान हत्या, गैर-इरादतन हत्या, बम विस्फोट और कई अन्य गंभीर अपराधों पर लागू किया जा सकता है। इस प्रावधान पर संसद जून के मध्य में मतदान करेगी और पांच वर्षों बाद इसके परिणाम की समीक्षा की जाएगी।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	डेनमार्क की कोशिश हुई नाकाम</h3>
<p>
	अपराध के लिए न्यूनतम उम्र को घटाने की बहस सिर्फ स्वीडन तक ही सीमित नहीं है। 2010 में डेनमार्क ने अपनी रूढ़िवादी सरकार के नेतृत्व में अपराध की न्यूनतम उम्र को 15 से घटाकर 14 साल कर दिया था। इसके दो साल बाद ही इस सुधार को वापस ले लिया गया। इस सुधार के परिणाम पर हुए शोध में सामने आया था कि अपराध की न्यूनतम उम्र घटाने से कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है। इसके उलट प्रभावित युवाओं में दोबारा अपराध करने की संभावना बढ़ गई और स्कूल में उनका प्रदर्शन भी खराब हुआ।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डेनमार्क के इस कदम को अब कई विशेषज्ञ एक असफलता के तौर पर देखते हैं। उनका मानना है कि बच्चों को कम उम्र में अपराधी घोषित कर देना असल में युवा हिंसा की समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि कम उम्र में अपराधियों के संपर्क में आने से किशोर और ज्यादा आपराधिक माहौल में खिंच सकते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	नीदरलैंड्स में 12 साल की उम्र से सजा का प्रावधान लेकिन जेल का नहीं</h3>
<p>
	अन्य यूरोपीय संघ देशों से तुलना में नीदरलैंड्स और आयरलैंड ऐसे देश हैं जहां अपराधी ठहराए जाने की न्यूनतम उम्र काफी कम है। नीदरलैंड्स में तो 12 वर्ष की आयु से ही किशोरों पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है। आयरलैंड में भी आपराधिक जिम्मेदारी की न्यूनतम उम्र 12 वर्ष ही है। हालांकि कुछ गंभीर अपराधों में जैसे हत्या, गैर-इरादतन हत्या, बलात्कार और गंभीर यौन अपराधों के लिए 10 या 11 वर्ष की आयु के बच्चों को भी आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इन देशों में कम आपराधिक उम्र का यह मतलब नहीं है कि बच्चों को भी वयस्कों की तरह कठोर जेल की सजा दी जाती है। नीदरलैंड्स में 12 से 15 वर्ष के किशोरों के लिए हिरासत में लिए जाने की अधिकतम अवधि एक वर्ष है और गंभीर अपराधों में दोषी पाए गए 16 और 17 वर्ष के किशोरों के लिए अधिकतम सजा आमतौर पर दो वर्ष होती है। हालांकि, इन देशों में बच्चों को हिरासत में लेने का मकसद केवल बच्चों को सजा देना ही नहीं है, बल्कि उनकी शिक्षा और सुधार पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जर्मनी और स्पेन में यदि 12 साल का किशोर कोई गंभीर अपराध करता है, तो उसे कानूनी रूप से अपराधी नहीं माना जाता है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि सरकार कुछ नहीं कर सकती है। इन देशों में भी युवाओं के लिए सामाजिक सेवाएं, पारिवारिक अदालतें और सुरक्षा संबंधी संस्थाएं हस्तक्षेप कर सकती हैं। कुछ मामलों में बच्चे को निगरानी केंद्रों में रखा जा सकता है, लेकिन इसे कानूनी रूप से आपराधिक सजा नहीं माना जाता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उन्हें अक्सर अपराधी के तौर पर नहीं बल्कि ऐसे नाबालिग के रूप में देखा जाता है, जिन्हें मदद की जरूरत है। स्पेन के कानून में यह बात विशेष रूप से स्पष्ट है। 14 साल से कम उम्र के किशोर आपराधिक कानून में नहीं, बल्कि देखभाल और बाल संरक्षण व्यवस्था की श्रेणी में आते हैं।</p>
<h3>
	 </h3>
<h3>
	इटली में बढ़ी जेल जाने वालों किशोरों की संख्या</h3>
<p>
	इससे निपटने के लिए इटली में एक खास तरीका है। जिसके तहत सजा या जेल से ज्यादा बच्चे के आसपास के माहौल पर अधिक ध्यान दिया जाता है। इटली का तथाकथित काईवानो डीकरी उन माता-पिता पर सख्ती बढ़ाता है, जो बच्चों की देखरेख और उनकी स्कूल में उपस्थिति की जिम्मेदारी पूरी नहीं करते हैं। यदि कोई बच्चा लंबे समय तक स्कूल नहीं जाता है, तो उसके माता-पिता को भी कानूनी या आपराधिक सजा का सामना करना पड़ सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इटली का मॉडल पूरी तरह से स्वीडन से अलग नहीं है। इस कानून ने भी किशोर न्याय व्यवस्था को अधिक सख्त बनाया है। आलोचकों का कहना है कि इस कानून के लागू होने के बाद से किशोर हिरासत में रखे जाने वाले युवाओं की संख्या काफी बढ़ गई है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कई यूरोपीय संघ देशों में 14 वर्ष की उम्र अभी भी एक महत्वपूर्ण मानक मानी जाती है। ऑस्ट्रिया भी इस नियम का पालन करता है। वहां भी 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं माना जाता लेकिन अगर वह कोई गलत काम करते हैं, तो उसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं जैसे पुलिस और माता-पिता के साथ बैठक, चेतावनी मिलना, युवा सेवा विभाग में भागीदारी और शैक्षणिक सुधार जैसे कार्यक्रम। यूरोप में अपराध के लिए जिम्मेदार होने की कम उम्र का मतलब यह नहीं है कि बच्चों को वयस्कों जैसी सजा दी जाती है, बल्कि आम तौर पर उनके लिए विशेष किशोर अदालतें होती हैं। यह उनके सुधार, शिक्षा और विशेष सुरक्षा को प्राथमिकता देती हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	विज्ञान किसकी तरफ?</h3>
<p>
	कम उम्र में बच्चों को सजा देने से यूरोप का बचना, बाल एवं किशोर मनोविज्ञान के शोधों से मेल खाता है। बच्चे और कम उम्र के किशोर सजा मिलने के डर के बजाय तुरंत मिलने वाले लाभ, दोस्तों के दबाव और भावनात्मक स्वीकार्यता से अधिक प्रभावित होते हैं। इसके अलावा अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना, भविष्य के परिणामों के बारे में सोचना और आगे की योजना बनाना जैसी क्षमताएं भी उनमें धीरे-धीरे ही विकसित होती हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस कारण 13 साल के बच्चों पर सजा का डर अक्सर कुछ खास प्रभावी नहीं होता है। भविष्य में जेल जाने का डर उनके लिए तुरंत मिलने वाले फायदे, जैसे पैसा, पहचान, किसी समूह का हिस्सा बनने की भावना के सामने कमजोर पड़ सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि केवल आपराधिक जिम्मेदारी की उम्र घटाकर और सजा को कठोर बनाकर ही किशोर अपराध की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	आपराधिक गुट सरकार की सोच से भी आगे</h3>
<p>
	एक चिंता यह भी है कि आपराधिक गिरोह बहुत जल्दी अपने तरीके बदल लेते हैं। अगर स्वीडन गंभीर अपराधों के लिए जिम्मेदारी की उम्र 13 साल कर देता है, तो गैंग इससे भी छोटे बच्चों को अपराधों के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर सकते हैं। ऐसे में समस्या खत्म होने के बजाय और बढ़ सकती है। अब सिर्फ यह नहीं है कि बच्चों को किस उम्र से सजा दी जा सकती है। इससे भी बड़ा सवाल यह भी है कि क्या सरकार उन अपराधियों पर कार्रवाई कर पा रही है, जो बच्चों को अपराध करने के लिए उकसाते हैं और उनका इस्तेमाल करते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कई विशेषज्ञों का मानना है कि स्वीडन सरकार की यह योजना शायद अपराध कम करने में ज्यादा सफल नहीं होगी। इस कारण न्याय विशेषज्ञों, वकीलों के संगठनों और कई सामाजिक संस्थाओं ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है। ऐसे में यदि संसद इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देती है, तो 13 साल के बच्चों को भी गंभीर अपराधों के मामलों में जेल भेजा जा सकता है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 10:00:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 11 Jun 2026 10:08:29 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विकास और विरासत: मोदी युग में नए भारत का नव-उदय]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/my-blog/narendra-modi-12-years-historic-record-126061000052_1.html</link>
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      <description><![CDATA[भारतीय राजनीति में 10 जून 2026 का दिन एक ऐतिहासिक तिथि के रूप में दर्ज होगा। लगातार तीसरे कार्यकाल के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पंडित जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी करते हुए देश में सबसे लंबे समय तक चुने जाने वाले राष्ट्रप्रमुख बन जाएंगे।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="PM Narendra Modi" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/16/full/1778932287-8189.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="PM Narendra Modi" width="1200" />
		<p style="float: left; clear: both; font-style:italic; padding: 10px 10px 10px 0px; width:1200px;">
			PM Narendra Modi</p>
	</p>
	भारतीय राजनीति में 10 जून 2026 का दिन एक ऐतिहासिक तिथि के रूप में दर्ज होगा। लगातार तीसरे कार्यकाल के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पंडित जवाहरलाल नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी करते हुए देश में सबसे लंबे समय तक चुने जाने वाले राष्ट्रप्रमुख बन जाएंगे। पीएम मोदी का यह कार्यकाल केवल एक संख्यात्मक उपलब्धि नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के उस अटूट विश्वास का प्रमाण है, जिसने भारत को प्रगति और वैश्विक नेतृत्व के शिखर पर पहुंचाया है। इस शासन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि नरेंद्र मोदी ने स्वयं को हमेशा &#39;प्रधान सेवक&#39; के रूप में प्रस्तुत किया और स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, नारी शक्ति वंदन अधिनियम (33% महिला आरक्षण) तथा &#39;मन की बात&#39; जैसे अभियानों के माध्यम से शासन को सीधे जन-भागीदारी से जोड़ दिया।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	तकनीक से सामाजिक न्याय और अंत्योदय</h3>
<p>
	आर्थिक और सामाजिक न्याय के मोर्चे पर, सरकार ने जनधन-आधार-मोबाइल यानी &#39;जैम ट्रिनिटी&#39; की त्रिशक्ति से बिचौलियों और भ्रष्टाचार के पुराने तंत्र को समूल नष्ट कर दिया। डिजिटल तकनीक और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के सीधे जरूरतमंदों के खातों में पहुंच रहा है। इसके फलस्वरूप पिछले एक दशक में लगभग 25 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी के चक्रव्यूह से बाहर आए हैं।</p>
<p>
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/national-hindi-news/pm-modi-breaks-nehru-record-longest-serving-elected-prime-minister-india-126061000003_1.html" target="_blank">नरेंद्र मोदी ने तोड़ा नेहरू का 77 साल पुराना रिकॉर्ड, बने भारत के सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री</a></strong></p>
</p>
<p>
	वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर हर नागरिक को सम्मानित जीवन देने के लिए सरकार की लोक-कल्याणकारी योजनाओं ने धरातल पर करोड़ों जीवन बदले हैं। मुख्य योजनाओं की पहुंच को हम इन सीधे आंकड़ों से समझ सकते हैं: प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (80 करोड़ मुफ्त राशन लाभार्थी), आयुष्मान भारत योजना (55 करोड़ लोगों को 5 लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य कवच), प्रधानमंत्री आवास योजना (4 करोड़ से अधिक पक्के मकान), पीएम-किसान निधि (11 करोड़ किसानों को सालाना 6,000 की सीधी मदद), जल जीवन मिशन (14 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल से जल), उज्ज्वला योजना (10 करोड़ से अधिक महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन), पीएम सूर्य घर योजना (1 करोड़ घरों को मुफ्त सौर बिजली) और जनधन योजना (50 करोड़ से अधिक बैंक खाते) आदि हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता</h3>
<p>
	दूसरी ओर, बुनियादी ढांचे के निर्माण में वर्तमान भारत ने जो गति पकड़ी है, वह पूरी दुनिया के लिए शोध का विषय है। आज देश में प्रतिदिन लगभग 28 से 30 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण हो रहा है; रेल नेटवर्क के आधुनिकीकरण के साथ &#39;वंदे भारत&#39; जैसी स्वदेशी ट्रेनें दौड़ रही हैं और हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। यूपीआई (UPI) के माध्यम से आज भारत वैश्विक डिजिटल भुगतान में सबसे आगे है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	स्वास्थ्य क्षेत्र में पहले जहां केवल 7 एम्स (AIIMS) थे, वहीं अब 20 एम्स चालू हो चुके हैं। &#39;मेक इन इंडिया&#39; की दूरदर्शी नीतियों के चलते भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है और देश अब सेमीकंडक्टर (चिप) निर्माण के क्षेत्र में उतरकर वैश्विक स्तर पर आत्मनिर्भर बन रहा है।</p>
<p>
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/national-hindi-news/modi-government-12-years-bjp-nationwide-outreach-campaign-june-2026-126053100006_1.html" target="_blank">मोदी सरकार के 12 साल पूरे, 5 जून से 21 जून तक देशभर में चलेगा भाजपा का मेगा जनसंपर्क अभियान</a></strong></p>
</p>
<h3>
	विदेश नीति और वैश्विक नेतृत्व</h3>
<p>
	वैश्विक मंच पर भारत की विदेश नीति &#39;राष्ट्र प्रथम&#39; के महामंत्र पर आधारित है, जहां देश बिना किसी महाशक्ति के दबाव में आए स्वतंत्र निर्णय लेता है। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व के संघर्षों और वैश्विक मंदी के बीच भी भारत ने पश्चिमी प्रतिबंधों की परवाह न करते हुए कच्चे तेल का आयात जारी रखा और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक महाशक्ति बना रहा। जी-20 की सफल अध्यक्षता करके भारत &#39;ग्लोबल साउथ&#39; की सशक्त आवाज और &#39;विश्वमित्र&#39; के रूप में उभरा है। यही कारण है कि पीएम मोदी को अब तक 24 से अधिक देशों द्वारा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार दिए जा चुके हैं। हाल ही में, मई 2026 में उन्हें मिला नॉर्वे का सर्वोच्च सम्मान (ग्रैंड क्रॉस ऑफ द रॉयल नॉर्वेजियन ऑर्डर ऑफ मेरिट) उनके अंतरराष्ट्रीय सम्मानों की श्रृंखला में 32वां सम्मान है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	एक ऐतिहासिक नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा विपरीत परिस्थितियों में होती है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने रिकॉर्ड समय में दो प्रमुख टीकों- पूर्णतः स्वदेशी &#39;कोवैक्सीन&#39; और भारत में निर्मित &#39;कोविशील्ड- का उत्पादन किया और &#39;वैक्सीन मैत्री&#39; के तहत दुनिया के दर्जनों देशों को टीके भेजकर &#39;वसुधैव कुटुंबकम&#39; की भावना को चरितार्थ किया।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	विकास भी, विरासत भी</h3>
<p>
	यह नेतृत्व &#39;विकास भी, विरासत भी&#39; के संतुलित मंत्र पर चलता है। एक तरफ इसरो (ISRO) ने चंद्रयान, सूर्ययान और गगनयान जैसे ऐतिहासिक अभियानों से अंतरिक्ष में अपना परचम लहराया, तो दूसरी तरफ अयोध्या में भव्य प्रभु श्री राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम व महाकाल लोक का पुनरुद्धार और योग-आयुर्वेद को वैश्विक मान्यता दिलाकर देश के सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित किया गया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसी तरह, रक्षा क्षेत्र भी आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा है। &#39;मेक इन इंडिया&#39; के तहत आईएनएस विक्रांत और तेजस जैसे हथियारों के निर्माण से जहां रक्षा आयात कम हुआ है, वहीं रक्षा निर्यात 21,000 करोड़ के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को पार कर चुका है। सीडीएस (CDS) पद का गठन, अटल व सेला टनल का निर्माण और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति ने देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को अभेद्य बनाया है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	निष्कर्ष</h3>
<p>
	अंततः, आज की यह ऐतिहासिक तिथि कोई ठहराव नहीं, बल्कि &#39;विकसित भारत @2047&#39; के विराट संकल्प की ओर बढ़ने वाले एक अनंत रथ का नव-प्रस्थान है। आज का न्यू इंडिया एक हाथ में इसरो की आधुनिकतम तकनीक और दूसरे हाथ में अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का गौरव थामे हुए वैश्विक मंच पर एक महाशक्ति के रूप में खड़ा है। आगामी पीढ़ियां मोदी युग को इतिहास के पन्नों में राष्ट्र के सांस्कृतिक अरुणोदय और वैश्विक महाशक्ति के रूप में उसके सिंहनाद के रूप में याद रखेंगी।</p>
<p>
	 </p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 16:38:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 10 Jun 2026 16:58:23 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[My Blog]]></category>
      <authorname>सपना सीपी साहू 'स्वप्निल'</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बिहार-बंगाल का प्रदूषण हिमालय तक पहुंचा, काले पड़ रहे ग्लेशियर]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/nasa-study-bihar-bengal-pollution-reaching-himalaya-glaciers-melting-fast-126061000004_1.html</link>
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      <description><![CDATA[नासा द्वारा किए गए बीते 25 साल के सैटेलाइट आंकड़ों के गहन विश्लेषण (ब्लैक सूट एंड सर्वाइवल ऑफ तिब्बतन ग्लेशियर) से पता चला है कि बिहार समेत देश के मैदानी इलाकों में तेजी से फैल रहा प्रदूषण हिमालयी परिक्षेत्र तक पहुंच गया है। प्रसिद्ध जर्नल ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="glacier" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-02/17/full/1771310167-9218.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="glacier file photo" width="1200" /></p>
	मनीष कुमार</p>
<p>
	नासा द्वारा किए गए बीते 25 साल के सैटेलाइट आंकड़ों के गहन विश्लेषण (ब्लैक सूट एंड सर्वाइवल ऑफ तिब्बतन ग्लेशियर) से पता चला है कि बिहार समेत देश के मैदानी इलाकों में तेजी से फैल रहा प्रदूषण हिमालयी परिक्षेत्र तक पहुंच गया है। प्रसिद्ध जर्नल &#39;एटमॉस्फेरिक एनवायर्नमेंट&#39; में प्रकाशित रिसर्च रिपोर्ट में बताया गया है कि इससे सफेद बर्फ की चादर से आच्छादित रहने वाले ग्लेशियर तेजी से काले पड़ रहे हैं और वे तेजी से पिघल रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वर्ष 2000 से 2024 के बीच के डाटा के अध्ययन से पता चला है कि सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों, हिमालयी क्षेत्रों और उत्तर-पूर्व भारत में हो रहे प्रदूषण में पीएम में 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है, जबकि वाहनों के धुएं और बायोमास के जलने से हवा में ऑर्गेनिक कार्बन और सल्फेट की मात्रा में 50 फीसद से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस वजह से ब्लैक कार्बन उड़कर पहाड़ों की बर्फ पर जमा हो रहा है, जिससे वे काली होती जा रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट, काठमांडू की हिंदुकुश हिमालय असेसमेंट रिपोर्ट भी इस बात की ताकीद कर रही है कि 2010 के बाद से हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिसका बड़ा कारण प्रदूषण की वजह से जमा होने वाला ब्लैक कार्बन है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	प्रदूषण में बिहार-बंगाल सबसे अव्वल</h3>
<p>
	कोलकाता के बोस इंस्टीट्यूट के स्रोतों के हवाले से जारी इस रिपोर्ट में वायु में मौजूद प्रदूषण और धुएं के कणों (एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ) को मापा गया है। हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार बिहार और बंगाल में प्रदूषण का स्तर सबसे घातक स्तर पर सबसे अधिक क्रमश: 0.71 और 0.70 पाया गया है। ये दोनों राज्य देश के प्रदूषण हॉटस्पॉट बन गए हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वहीं, फसल अवशेष (पराली) और धूल की वजह से पंजाब व हरियाणा का संयुक्त इंडेक्स 0.51 रहा। जबकि, उत्तर-पूर्व भारत में यह स्कोर 0.40 रहा। थर्मल पावर प्लांट, बायोमास जलने और शहरी ठोस कचरा जलने के  कारण लगातार होने वाले उत्सर्जन से प्रदूषण की स्थिति गंभीर होती जा रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इससे यह भी साफ हो गया है कि अभी तक देश में बायोमास (यथा, लकड़ी व गोबर के उपले) जलाने की समस्या का समाधान नहीं हो सका है।<br />
	<br />
	पर्यावरणविद् पीके दास कहते हैं, ‘‘दक्षिण एशियाई देश भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में जनसंख्या का घनत्व ज्यादा है और यहां तेजी से हो रहे औद्योगिकीकरण तथा इंफ्रास्ट्रक्चर व विकास के अन्य कारणों की वजह से एटमॉस्फेरिक एरोसोल के कारण वायु की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। बिहार व बंगाल भौगोलिक रूप से पूर्वी हिमालय के नजदीक है, इसलिए वायुमंडलीय हवाओं की वजह से सिक्किम, भूटान व नेपाल के ग्लेशियर प्रदूषण से जल्द प्रभावित हो जा रहे। ये आने वाले दिनों में बड़ी तबाही के संकेत हैं।&#39;&#39;</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	कैसे प्रभावित हो रहा हिमालय</h3>
<p>
	शोध के अनुसार, मैदानों में हो रहा उत्सर्जन मानसूनी और सर्द हवाओं के साथ उडक़र हिमालय परिक्षेत्र में पहुंच रहा और वहां एरोसोल की मात्रा को प्रभावित कर रहा। एरोसोल वातावरण में धूल, कालिख और रासायनिक बूंदों जैसे सूक्ष्म ठोस या तरल कणों के सस्पेंशन को कहा जाता है। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली का प्रदूषण हिमालय की पश्चिमी और मध्य श्रेणियों तक पहुंच रहा, जबकि बिहार और पश्चिम बंगाल का प्रदूषण पूर्वी हिमालय को नुकसान पहुंचा रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रिपोर्ट के अनुसार जो प्रदूषण 2000-2009 के दौरान बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तरी पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में केंद्रित था, वह 2020-2024 तक पूरे बंगाल, बिहार, बांग्लादेश और असम, मेघालय और त्रिपुरा तक फैल गया। सूर्य की रोशनी को रिफ्लेक्ट करना बर्फ का प्राकृतिक गुण है, जिसे अल्बीडो इफेक्ट कहा जाता है। लेकिन ब्लैक कार्बन जमा होने की वजह से यह रोशनी को रिफ्लेक्ट करने की बजाय सोखने लगती है, जिससे बर्फ पिघलने लगती है। दास कहते हैं, ‘‘भारत सरकार का नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनसीएपी) शहरों में तो वायु गुणवत्ता सुधारने की दिशा में बेहतर काम कर रहा है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में समन्वय के साथ काफी कुछ करना शेष है। बिहार सरकार को प्रदूषण रोकने की दिशा में और भी व्यावहारिक और कठोर निर्णय लेने की जरूरत है।&#39;&#39; </p>
<p>
	 </p>
<p>
	वहीं, मौसम वैज्ञानिक एन के कर्ण कहते हैं, ‘‘हिमालय की बर्फ तेजी से पिघलने लगी तो इस प्रक्षेत्र में जबरदस्त गर्मी पड़ेगी और समीपवर्ती इलाकों में रहना मुश्किल हो जाएगा। यह जलवायु परिवर्तन का भी वाहक बनेगा। पर्वतीय इलाकों में बढ़ते टूरिज्म का आफ्टर इफेक्ट भी प्रदूषण का कारण बन रहा। इन इलाकों में पर्यटकों द्वारा छोड़ी जा रही पॉलीथिन व अन्य सामग्रियां हिमालय को दीमक की तरह नुकसान पहुंचा रहीं। हर हाल में हिमालय को बचाना होगा।&#39;&#39;</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 09:11:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 10 Jun 2026 09:25:48 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पश्चिम बंगाल में मदरसों का सर्वेक्षण क्यों करा रही है सरकार?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/bengal-madrasa-survey-khudiram-tudu-126060900011_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/bengal-madrasa-survey-khudiram-tudu-126060900011_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/09/thumb/1_1/1780987395-6023.jpg"/>
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      <description><![CDATA[पहली बार राज्य की सत्ता संभालने के एक महीने के भीतर ही सरकार के इस फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। अल्पसंख्यक संगठनों और विपक्षी दलों का सवाल है कि क्या बंगाल सरकार भी पड़ोसी असम की हिमंत बिस्वा सरमा सरकार की तर्ज पर अल्पसंख्यकों को निशाने पर लेने का ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="madarsa survey" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/09/full/1780987395-6023.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="photo : DW/Subho Singha" width="1200" /></p>
	</p>
	<strong>प्रभाकर मणि तिवारी</strong></p>
<p>
	पहली बार राज्य की सत्ता संभालने के एक महीने के भीतर ही सरकार के इस फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। अल्पसंख्यक संगठनों और विपक्षी दलों का सवाल है कि क्या बंगाल सरकार भी पड़ोसी असम की हिमंत बिस्वा सरमा सरकार की तर्ज पर अल्पसंख्यकों को निशाने पर लेने का प्रयास कर रही है। असम के मुख्यमंत्री पर लगातार विभिन्न फैसलों के जरिए अल्पसंख्यकों पर निशाना साधने के आरोप लगते रहे हैं। इससे पहले सरकार ने यहां तमाम मदरसों में &#39;वंदे मातरम&#39; का गायन अनिवार्य कर दिया था। बीजेपी पंद्रह साल तक सत्ता में रही ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के आरोप लगाती रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	राज्य में फिलहाल वेस्ट बंगाल बोर्ड आफ मदरसा एजुकेशन के तहत 614 सरकारी मान्यता और सहायता-प्राप्त मदरसे हैं। इसके अलावा गैर-मान्यताप्राप्त और निजी संगठनों की ओर से या जकात से चलाए जाने वाले मदरसों की संख्या दो हजार से ज्यादा है। लेकिन इन तमाम मदरसों में सर्वेक्षण का आदेश दिया गया है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्या होगा मदरसों के सर्वे में</h3>
<p>
	सरकारी अधिकारियों का कहना है कि तमाम जिला शासकों को सर्वेक्षण के निर्देश भेज दिए गए हैं। उनको पांच जुलाई तक इसकी रिपोर्ट सौंपनी है। इसके तहत मदरसों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या के अलावा उनको पढ़ाने वाले शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता, आधारभूत ढांचा और आर्थिक स्रोत का ब्योरा हासिल किया जाएगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लेकिन राज्य के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री खुदीराम टुडू का कहना है कि सरकार ने अवैध मदरसों को बंद कर वहां पढ़ने वाले छात्रों को सरकारी स्कूलों या अनुमोदित मदरसों में स्थानांतरित करने की योजना बनाई है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	मंत्री ने डीडब्ल्यू को बताया, "सर्वेक्षण रिपोर्ट के बाद राज्य में चलने वाले तमाम गैर-अनुमोदित या अवैध मदरसों को बंद कर दिया जाएगा। शिक्षा के नाम पर अवैध गतिविधियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। सरकार मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को आधुनिक शिक्षा मुहैया कराना चाहती है ताकि आगे चल कर रोजगार की दौड़ में वो पिछड़े नहीं रहें।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हाल के वर्षों में राज्य के विभिन्न इलाकों में तेजी से बढ़ते मदरसों पर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है। कई बार वहां आतंकवादियों को शरण देने के भी आरोप लगे हैं। इनमें से ज्यादातर मदरसे जकात से चलते हैं। अब अल्पसंख्यक संगठनों को डर है कि यह सर्वेक्षण उनको निशाना बनाने के मकसद से ही शुरू किया गया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना जिले के एक मदरसे में पढ़ाने वाले मोहम्मद हफीज (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सरकार जकात से चलने वाले मदरसों में तमाम कमियां निकाल कर उनको किसी तरह बंद करने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन हम इसका विरोध करेंगे। इसके लिए कानून की मदद ली जाएगी।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लेकिन मंत्री खुदीराम टुडू कहते हैं, "यह किसी धर्म पर हमला नहीं है। नियमों के मुताबिक चलने वाले मदरसों को सरकार आर्थिक सहायता देगी। वहां शिक्षा के स्तर को सुधारने और आधारभूत सुविधाएं बेहतर बनाने की योजनाएं लागू की जाएंगी।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बीजेपी सरकार ने बीते महीने एक आदेश जारी कर तमाम मदरसों और सरकारी स्कूलों में सुबह वंदे मातरम का गायन अनिवार्य कर दिया था। इस आदेश को लागू करने के लिए तमाम मदरसा प्रमुखों को सुबह-सुबह वीडियो बनाकर अपलोड करने के निर्देश दिए गए हैं। इस पर अल्पसंख्यक संगठनों में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। एक संगठन ने इस फैसले के खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की है। तृणमूल कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने इसे मनमाना फैसला बताते हुए कहा है कि किसी भी धर्म में हस्तक्षेप उचित नहीं है। इससे राज्य का सामाजिक ताना-बाना प्रभावित हो सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लेकिन राज्य के अल्पसंख्यक और मदरसा शिक्षा मंत्री खुदीराम टुडू डीडब्ल्यू से कहते हैं, "जब सरकारी स्कूलों में वंदे मातरम का गायन अनिवार्य हो सकता है तो मदरसों को इससे अलग क्यों रखा जाएगा? सरकार पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के आरोप निराधार हैं।"</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	विरोध किस बात पर हो रहा है</h3>
<p>
	कई अल्पसंख्यक संगठनों और विपक्षी दलों ने सरकार के ताजा फैसले पर विरोध जताया है। कोलकाता खिलाफत कमेटी के प्रमुख मोहम्मद अशरफ डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सरकार को किसी धर्म पर कोई चीज नहीं थोपनी चाहिए। हम वंदे मातरम के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन इस गीत को गाना हमारे धर्म के खिलाफ है। सरकार को यह फैसला वापस ले लेना चाहिए।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सरकार ऐसे फैसलों के जरिए मूल समस्याओं की ओर से लोगों का ध्यान भटकाना चाहती है। वंदे मातरम को अनिवार्य करने और मदरसों के सर्वेक्षण के फैसले से साफ है कि सरकार अल्पसंख्यक तबके को निशाना बनाने की नीति पर आगे बढ़ रही है। स्कूलों में वंदे मारम गाने भर से शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त नहीं होगी। इसके लिए मूल समस्याओं को दूर करना जरूरी है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उनका कहना था कि बंगाल की सत्ता में आने के बाद बीजेपी अपने हिंदुत्व को एजेंडे को आगे बढ़ाने में जुट गई है। सरकार के हाल के फैसले इसका सबूत हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विपक्षी नेताओं का कहना है कि जो मदरसे निजी संस्थाओं की ओर से चल रहे हैं उनमें हस्तक्षेप का सरकार को कोई अधिकार नहीं है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	तृणमूल कांग्रेस के पूर्व विधायक और आम जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बीजेपी सरकार ने सत्ता में आते ही इन फैसलों के जरिए अपना एजेंडा साफ कर दिया है। मुसलमानों पर कोई फैसला थोपना गलत है। यह हमारी धार्मिक मान्यता का सवाल है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बीजेपी असम की तरह यहां भी अल्पसंख्यकों पर निशाना साध रही है। उसे शायद इस बात की खुन्नस है कि ये लोग अब तक तृणमूल कांग्रेस का समर्थन क्यों करते रहे हैं। लेकिन सरकार को किसी तबके के खिलाफ बदले की भावना से काम नहीं करना चाहिए।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लेकिन प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य सरकार के फैसले को सही ठहराते हैं। वो डीडब्ल्यू से कहते हैं, "इसमें गलत क्या है? वंदे मातरम को धार्मिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। इसका हिंदू-मुस्लिम से कोई संबंध नहीं है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बीजेपी ने मदरसों के सर्वेक्षण के फैसले को भी सही ठहराया है। भट्टाचार्य कहते हैं, "सरकार ने मदरसों की मौजूदी स्थिति का पता लगाने के लिए ही सर्वेक्षण का आदेश दिया है। राज्य के कई मदरसों पर पहले सीमा पार के आतंकवादियों को पनाह देने के आरोप लगते रहे हैं। इस सर्वेक्षण का मकसद जमीनी हकीकत का पता लगाना है। सर्वेक्षण की रिपोर्ट के बाद आगे की रणनीति तय करने में मदद मिलेगी।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शिक्षाविदों में सरकार की मंशा पर संदेह है। कोलकाता के एक कॉलेज में प्रोफेसर रहे दिलीप कुमार बाग डीडब्ल्यू से कहते हैं, "कागज पर तो सरकार की मंशा सही लगती है। लेकिन सत्ता में आने के फौरन बाद मदरसों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई से संदेह स्वाभाविक है। इससे खासकर अल्पसंख्यक संगठनों में डर का माहौल है। उनको लगता है कि सर्वेक्षण के बहाने सरकार मदरसों पर नकेल कसना चाहती है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "सरकार की मंशा संदेह के घेरे में है। बीजेपी तमाम राज्यों में लंबे समय से अल्पसंख्यकों को निशाना बनाती रही है। वह ममता बनर्जी सरकार को तुष्टिकरण के आरोप में कटघरे में खड़ा करती रही है। अब बंगाल में मदरसों के सर्वेक्षण और उसके आधार पर कार्रवाई की आड़ में पार्टी अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है।"</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 12:06:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 09 Jun 2026 12:24:31 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[दुनिया की प्रमुख विचारधाराएं कौन-कौन सी हैं? जानिए पूरी सूची और उनकी खासियतें]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/religious-article/capitalism-socialism-communism-and-other-ideologies-list-126060800024_1.html</link>
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      <description><![CDATA[ideologies list: विश्व के इतिहास में दर्शन (Philosophy), राजनीति, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में विचारों और सिद्धांतों की एक विशाल श्रृंखला रही है। इन सिद्धांतों को ही हिंदी में 'वाद' और अंग्रेजी में '-ism' कहा जाता है। दुनिया के सभी ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="ideologies list" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/08/full/1780906769-1825.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="ideologies list" width="1200" /></p>
	</p>
	ideologies list: विश्व के इतिहास में दर्शन (Philosophy), राजनीति, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में विचारों और सिद्धांतों की एक विशाल श्रृंखला रही है। इन सिद्धांतों को ही हिंदी में &#39;वाद&#39; और अंग्रेजी में &#39;-ism&#39; कहा जाता है। दुनिया के सभी प्रमुख &#39;वादों&#39; को उनके विषय के आधार पर निम्नलिखित प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	1. धार्मिक और आध्यात्मिक वाद (Religious & Spiritual Isms)</h3>
<p>
	ये वाद ईश्वर, ब्रह्मांड और आत्मा के अस्तित्व की व्याख्या करते हैं:</p>
<p>
	<strong>आस्तिकता (Theism):</strong> ईश्वर के अस्तित्व और उसकी सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार करना।</p>
<p>
	<strong>नास्तिकता (Atheism):</strong> ईश्वर और अलौकिक शक्तियों के अस्तित्व को पूरी तरह खारिज करना (जैन, बौद्ध)।</p>
<p>
	<strong>अज्ञेयवाद (Agnosticism): </strong>यह मानना कि ईश्वर है या नहीं, इसे मनुष्य निश्चित रूप से नहीं जान सकता। (ताओ, जैन, बौद्ध और हिंदू धर्म का सांख्य एवं अद्वैत दर्शन इसके करीब हैं)।</p>
<p>
	<strong>एकेश्वरवाद (Monotheism): </strong>केवल एक ही ईश्वर को मानना (जैसे यहूदी, ईसाई और इस्लाम)।</p>
<p>
	<strong>बहुदेववाद (Polytheism):</strong> एक से अधिक को ईश्‍वर मानना या अधिक देवी-देवताओं की पूजा और अस्तित्व को मानना।</p>
<p>
	<strong>सर्वेश्वरवाद (Pantheism): </strong>यह मानना कि संपूर्ण ब्रह्मांड और प्रकृति ही ईश्वर है; प्रकृति से अलग कोई भगवान नहीं है।</p>
<p>
	<strong>एकात्मवाद (Monism): </strong>यह मानना कि संपूर्ण जगत में केवल एक ही तत्व (जैसे ब्रह्म या चेतना) सत्य है, बाकी सब उसका रूप हैं।</p>
<p>
	<strong>नियतिवाद: (Determinism): </strong>सबकुछ नियत है। ईश्वर या कर्म में जैसा कुछ नहीं है। जो कुछ है नियतिवाद है। पुरुषार्थ, पराक्रम वीर्य से नहीं, किंतु नियति से ही जीव की शुद्धि या अशुद्धि होती है। इन्हें आजीवक भी कहते हैं।<br />
	 </p>
<p>
	<strong>नोट:</strong> हिंदू धर्म में उपरोक्त सभी दर्शनों का समावेश है, क्योंकि हिंदुइज्म मानता है कि सत्य को किसी वाद में नहीं समेट सकते हैं। ऋग्वेद में सभी तरह के वादों का वर्णन मिलता है। हिंदू दर्शन मुलत: खोज और मोक्ष को महत्व देता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	2. राजनैतिक और आर्थिक वाद (Political & Economic Isms)</h3>
<p>
	इन वादों ने दुनिया की सरकारों, देशों की सीमाओं और अर्थव्यवस्थाओं को आकार दिया है:</p>
<p>
	<strong>पूंजीवाद (Capitalism): </strong>मुक्त बाजार (Free Market) और निजी संपत्ति का समर्थन करने वाली व्यवस्था, जहां उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व होता है।</p>
<p>
	<strong>समाजवाद (Socialism): </strong>संपत्ति और संसाधनों पर समाज या सरकार के नियंत्रण का समर्थन, ताकि अमीरी-गरीबी की खाई कम हो। (हालांकि कोई भी सरकार ऐसा कर नहीं पाती है और संभव भी नहीं है, बगीचे में एक ही तरह के फूल को उगाना तर्कसंगत नहीं है)</p>
<p>
	<strong>साम्यवाद (Communism): </strong>कार्ल मार्क्स के विचारों पर आधारित, जो एक वर्गहीन और राज्यहीन समाज की कल्पना करता है जहां सब कुछ सबका होता है (जैसे सोवियत संघ या चीन का मूल मॉडल)। (हालांकि कोई भी सरकार ऐसा कर नहीं पाती है और संभव भी नहीं है, बगीचे में एक ही तरह के फूल को उगाना तर्कसंगत नहीं है)</p>
<p>
	<strong>फासीवाद / नाजीवाद (Fascism / Nazism): </strong>उग्र राष्ट्रवाद और तानाशाही का समर्थन करने वाली विचारधारा, जहां राष्ट्र सर्वोपरि होता है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता खत्म कर दी जाती है।</p>
<p>
	<strong>साम्राज्यवाद (Imperialism):</strong> किसी शक्तिशाली देश द्वारा अपनी सीमाओं का विस्तार करने और दूसरे कमजोर देशों को गुलाम बनाने की नीति।</p>
<p>
	<strong>उपनिवेशवाद (Colonialism): </strong>एक देश द्वारा दूसरे देश पर आर्थिक और राजनैतिक नियंत्रण स्थापित करना (जैसे अंग्रेजों का भारत पर राज)।</p>
<p>
	<strong>अराजकतावाद (Anarchism):</strong> किसी भी प्रकार की सरकार, राज्य या कानून का विरोध करना; इनका मानना है कि समाज बिना किसी सत्ता के खुद चल सकता है।</p>
<p>
	<strong>लोकतंत्रवाद (Democratism): </strong>जनता के शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों (चुनाव, समानता) का समर्थन।</p>
<p>
	<strong>नोट: </strong>भारतीय दर्शन और परंपरा लोकतंत्र और अधिनायकवाद को बीच के रास्ते का समर्थन करता है। जैसे रामराज्य और विक्रमादित्य का राज्य।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	3. दार्शनिक और ज्ञानमीमांसीय वाद (Philosophical Isms)</h3>
<p>
	ये मनुष्य की बुद्धि, सत्य की खोज और जीवन जीने के नजरिए से जुड़े हैं:</p>
<p>
	<strong>आदर्शवाद (Idealism):</strong> भौतिक संसार की तुलना में विचारों (Ideas), चेतना और आत्मा को प्राथमिक मानना।</p>
<p>
	<strong>भौतिकवाद (Materialism):</strong> यह मानना कि केवल पदार्थ (Matter) ही सत्य है, आत्मा या चेतना जैसी कोई चीज नहीं होती।</p>
<p>
	<strong>यथार्थवाद (Realism): </strong>चीजों को वैसी ही देखना जैसी वे वास्तव में हैं, न कि कल्पना या आदर्श के रूप में।</p>
<p>
	<strong>अस्तित्ववाद (Existentialism): </strong>यह मानना कि मनुष्य का अस्तित्व पहले आता है और वह अपने जीवन का अर्थ और उद्देश्य खुद चुनता है (फ्री विल)।</p>
<p>
	<strong>बुद्धिवाद (Rationalism): </strong>ज्ञान प्राप्ति के लिए केवल तर्क और बुद्धि को ही एकमात्र साधन मानना।</p>
<p>
	<strong>अनुभववाद (Empiricis</strong>m): यह मानना कि सच्चा ज्ञान केवल इंद्रियों के अनुभव और प्रयोगों (Observations) से ही मिल सकता है।</p>
<p>
	<strong>उपयोगितावाद (Utilitarianism):</strong> वह सिद्धांत जो कहता है कि वही कार्य सही है जिससे "अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख" मिले।</p>
<p>
	<strong>घोर निराशावाद (Nihilism): </strong>यह मानना कि जीवन का कोई अंतर्निहित अर्थ, उद्देश्य या नैतिक मूल्य नहीं है; सब कुछ शून्य है।</p>
<p>
	<strong>नोट: </strong>भारतीय दर्शन और धर्म में यथार्थवाद, अस्तित्ववाद, बुद्धिवाद और अनुभववाद की चर्चा अधिक होती है। </p>
<p>
	 </p>
<h3>
	4. सामाजिक और सांस्कृतिक वाद (Social & Cultural Isms)</h3>
<p>
	ये समाज के ढांचे, अधिकारों और इंसानी व्यवहार को प्रभावित करते हैं:</p>
<p>
	<strong>नारीवाद (Feminism): </strong>महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक अधिकारों और लैंगिक समानता (Gender Equality) का समर्थन।</p>
<p>
	<strong>मानवतावाद (Humanism):</strong> किसी दैवीय शक्ति के बजाय मनुष्य, उसकी भलाई और उसकी क्षमताओं को केंद्र में रखना।</p>
<p>
	<strong>व्यक्तिवाद (Individualism): </strong>समाज या राज्य की तुलना में व्यक्ति की स्वतंत्रता और अधिकारों को अधिक महत्व देना।</p>
<p>
	<strong>राष्ट्रवाद (Nationalism): </strong>अपने देश के प्रति वफादारी, गर्व और देशहित को सर्वोपरि रखने की भावना।</p>
<p>
	<strong>वैश्वीकरण / भूमंडलीकरण (Globalism): </strong>पूरी दुनिया को एक साझा बाजार और समाज के रूप में देखना (वसुधैव कुटुंबकम का आधुनिक रूप)।</p>
<p>
	<strong>पर्यावरणवाद (Environmentalism): </strong>प्रकृति, पर्यावरण और वन्यजीवों के संरक्षण को समर्पित विचारधारा।</p>
<p>
	नोट: भारतीय धर्म, दर्शन और परंपरा में सभी को महत्व दिया गया है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	संक्षेप में कहें तो:</h3>
<p>
	इंसानी दिमाग ने जब भी किसी एक विचार को बहुत गहराई से पकड़ा और उसे जीवन जीने का आधार बनाया, तो वहां एक नए &#39;वाद&#39; का जन्म हुआ। आज भी दुनिया इन्हीं वादों के टकराव और तालमेल से चल रही है, लेकिन जरूरत इस बात की है कि मनुष्‍य को यह समझना होगा कि सभी वादों से ज्याद महत्वपूर्ण है मनुष्‍य-मनुष्‍यता, व्यक्ति स्वतंत्रता, ज्ञान-विज्ञानता और प्रकृति संवरक्षण।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>संकलन: अनिरुद्ध जोशी</strong></p>
<p>
	 </p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 13:47:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Mon, 08 Jun 2026 16:32:13 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Religious Article]]></category>
      <authorname>वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर आत्महत्या क्यों कर रहे हैं भारत में विवाहित पुरुष]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/ncrb-report-2024-married-men-suicide-family-disputes-mental-health-crisis-126060500037_1.html</link>
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      <description><![CDATA[एनसीआरबी की ओर से जारी 'भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024 (एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया)' शीर्षक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2024 के दौरान देश में करीब 1.70 लाख लोगों ने आत्महत्या कर ली। वर्ष 2023 के आंकड़ों के मुकाबले यह 0.4 ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="Married Men Suicide India" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2025-07/25/full/1753382693-17.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Married Men Suicide India" width="1200" /></p>
	प्रभाकर मणि तिवारी</p>
<p>
	एनसीआरबी की ओर से जारी &#39;भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024 (एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया)&#39; शीर्षक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2024 के दौरान देश में करीब 1.70 लाख लोगों ने आत्महत्या कर ली। वर्ष 2023 के आंकड़ों के मुकाबले यह 0.4 फीसदी कम जरूर है। हालांकि इस दौरान शादीशुदी पुरुषों में बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं ने चिंता बढ़ा दी है। इसकी वजह यह है कि ऐसी एक आत्महत्या सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे परिवार की बर्बादी होती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रिपोर्ट में कहा गया है कि पारिवारिक कलह बढ़ती आत्महत्याओं की सबसे बड़ी वजह (33.5 फीसदी) के तौर पर सामने आई है। इसके अलावा नशाखोरी, शादी संबंधित विवाद, दहेज, वित्तीय बदहाली और बेरोजगारी का स्थान है। छात्र-छात्राओं आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह परीक्षाओं में नाकाम रहना है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रिपोर्ट में कहा गया है कि आत्महत्या करने वाले शादीशुदा पुरुषों की तादाद लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2024 के दौरान आत्महत्या करने वालों में 67.5 फीसदी लोग विवाहित थे। पारिवारिक कारणों से विवाहित पुरुषों के आत्महत्या की बात जब सामने आती है तो कई बार उनकी पत्नियों की ओर उंगली उठती है। बीते सालों में दो तीन ऐसे मामले हुए जिसमें पत्नियों को जिम्मेदार बताया गया और ऐसे मामलों ने मीडिया की खूब सुर्खियां बटोरीं। </p>
<p>
	 </p>
<h3>
	बढ़ते मामलों की वजह</h3>
<p>
	हालांकि सवाल है कि क्या पारिवारिक कलह का मतलब सिर्फ पति-पत्नी विवाद है। महिला अधिकार कार्यकर्ता इस व्याख्या से सहमत नहीं हैं। पश्चिम बंगाल राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष लीना गांगुली डीडब्ल्यू से कहती हैं, "पारिवारिक कलह का दायरा व्यापक है। यह सिर्फ पति-पत्नी के बीच आपसी विवाद नहीं हैं। भाई-बहन, माता-पिता और रिश्तेदारों से विवाद भी पारिवारिक कलह के दायरे में आता है। ऐसे में शादीशुदा पुरुषों की आत्महत्या के लिए सिर्फ पत्नियों या महिलाओं को दोषी ठहराना उचित नहीं है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उनका कहना है कि पुरुष शादी के बाद विभिन्न वजहों से मानसिक दबाव में रह सकते हैं। इसमें दफ्तर की राजनीति और नौकरी की दिक्कतों के अलावा आर्थिक मुश्किलों जैसे मुद्दे भी शामिल हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोलकाता की महिला अधिकार कार्यकर्ता सुष्मिता बारुई भी यही बात कहती हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "पारिवारिक कलह से होने वाली मौतों के लिए सीधे पत्नी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। एनसीआरबी ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर ऐसा कुछ नहीं कहा है। पारिवारिक कलह शब्द का दायरा बहुत बड़ा है। हमें तस्वीर के दूसरे पहलू को भी ध्यान में रखना चाहिए। देश में हर साल भारी तादाद में दहेज उत्पीड़न के कारण महिलाओं की मौत की खबरें भी आती हैं।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा सामाजिक स्थिति और कई अन्य वजहों से पुरुष ऐसी स्थिति में मन ही मन घुटते हुए मानसिक अवसाद का शिकार हो जाता है। महिलाओं के उलट ज्यादातर मामलों में किसी सहयोगी या परिजन से अपने मन की पीड़ा भी साझा नहीं कर पाता।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	आत्महत्या पर कैसे लगे अंकुश?</h3>
<p>
	मनोचिकित्सकों का कहना है कि विवाहित पुरुषों में आत्महत्या एक मूक महामारी के तौर पर फैल रही है। लेकिन इस महामारी पर आखिर अंकुश कैसे लगाया जा सकता है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस संकट से निपटने के लिए व्यवहार में बदलाव के संकेतों को समय रहते पहचानने और मानसिक और भावनात्मक काउंसलिंग शुरू करने का सुझाव देते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उनका कहना है कि विवाहित पुरुष कई वजहों से ज्यादा संवेदनशील होते हैं। पुरुष पारंपरिक रूप से पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य सहायता या भावनात्मक समर्थन लेने में हिचकते हैं और मन ही मन घुटते रहते हैं। कोलकाता के मशहूर मनोचिकित्सक डा। अयन मुखर्जी ने डीडब्ल्यू से कहा, "पुरुष अमूमन अपनी मानसिक पीड़ा किसी और के सामने जाहिर नहीं करते। लंबे समय तक ऐसी स्थिति में रहने की वजह से वो मानसिक अवसाद के शिकार हो जाते हैं और किसी कमजोर पल में आत्महत्या का फैसला कर लेते हैं।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उनका कहना था कि ऐसी परिस्थिति के लिए सिर्फ दांपत्य जीवन के विवाद को दोष नहीं दिया जा सकता। एक पुरुष को जीवन में कई मोर्चों पर जूझना पड़ता है। खासकर शादी के बाद उस पर जिम्मेदारियों का बोझ काफी बढ़ जाती है। ऐसे में मानसिक अवसाद की वजह कुछ भी हो सकती है। किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने के लिए विस्तृत अध्ययन जरूरी है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोलकाता के एक अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ। मानसी घोष डीडब्ल्यू से कहती हैं, "कुछ मामलों में महिला सुरक्षा कानूनों के दुरुपयोग की आशंका भी पुरुष को आत्महत्या जैसा कदम उठाने पर मजबूर कर देती है। लेकिन आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं के लिए यही अकेली या सबसे बड़ी वजह नहीं हो सकती।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मनोचिकित्सकों का कहना है कि विवाहित पुरुषों में अक्सर आत्महत्या से पहले कई संकेत मिलने लगते हैं। इनको समय रहते पहचान कर अवसाद के इलाज से इस समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है ताकि विभिन्न समस्याओं के कारण मानसिक अवसाद से जूझते पुरुष अपनी झिझक छोड़ कर समय रहते काउंसलिंग के लिए सामने आ सकें।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 14:57:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 05 Jun 2026 15:03:51 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[दिल्ली के गेस्टहाउस में आग लगने पर लोग क्यों नहीं भाग सके]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/delhi-malviya-nagar-guest-house-fire-illegal-construction-fire-noc-violation-21-deaths-126060400014_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/delhi-malviya-nagar-guest-house-fire-illegal-construction-fire-noc-violation-21-deaths-126060400014_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/04/thumb/1_1/1780555100-1158.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/04/thumb/1_1/1780555100-1158.jpg</image>
      <description><![CDATA[गेस्ट हाउस में बुधवार सुबह भीषण आग लगने से 21 लोगों की मौत हो गई। आग लगने के कारणों की जांच की जा रही है। हालांकि शुरुआती पड़ताल में अग्नि सुरक्षा मानकों के उल्लंघन और निर्माण से जुड़ी गडबड़ियों के संकेत मिले हैं। मरने वालों में 9 भारतीय और 12 ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="delhi hotel fire" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/04/full/1780555100-1158.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="delhi hotel fire photo : Somnath Bharti X account" width="1200" /></p>
	</p>
	शिवांगी सक्सेना</p>
<p>
	गेस्ट हाउस में बुधवार सुबह भीषण आग लगने से 21 लोगों की मौत हो गई। आग लगने के कारणों की जांच की जा रही है। हालांकि शुरुआती पड़ताल में अग्नि सुरक्षा मानकों के उल्लंघन और निर्माण से जुड़ी गडबड़ियों के संकेत मिले हैं। मरने वालों में 9 भारतीय और 12 विदेशी नागरिक शामिल हैं। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	हादसे के  कुछ वीडियो सामने आए। कई लोगों ने जलती इमारत से छलांग लगा दी। उनकी जान बचाने के लिए स्थानीय निवासियों ने पास की एक दुकान से गद्दे लाकर जमीन पर बिछा दिए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	&#39;फ्लरिश स्टे बी एन बी&#39; पिछले 7-8 साल से हौज रानी इलाके में चल रहा था। इसे केवल 6 कमरे बनाने की इजाजत थी। लेकिन समय के साथ चार मजिलें और बन गईं। इसमें 25 कमरे बना दिए गए। यह गेस्ट हाउस बिना वैध फायर एनओसी के संचालित हो रहा था। इसके बेसमेंट में भी लोग रुके हुए थे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मालवीय नगर मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 3 के निकट बने इस गेस्ट हाउस में प्रति बिस्तर के हिसाब से सुविधा दी जाती थी। दिल्ली अग्निशमन सेवा (डीएफएस) की शुरुआती जांच में संकेत मिले हैं कि आग की शुरुआत भूतल पर सीढ़ियों के पास हुई हो सकती है। जांच में यह भी सामने आया है कि इमारत की खिड़कियां सील थीं, जिसके कारण अंदर मौजूद लोगों के लिए बाहर निकलना मुश्किल हो गया। बचाव कार्य में भी मुश्किलें आईं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	स्थानीय लोगों ने बचाया, फंसे लोगों को निकाला</h3>
<p>
	चश्मदीद इसरार अली मौके पर पहुंचने वाले शुरूआती लोगों में थे। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर फंसे लोगों को बाहर निकालने में मदद की। वह डीडब्ल्यू को बताते हैं, "जैसे ही धुआं दिखाई दिया, हम होटल की ओर दौड़ पड़े। उस समय सुबह करीब 8:45 बजे का समय रहा होगा। हम लगातार लोगों को आवाज देकर बाहर निकलने और जान बचाने के लिए कूदने को कह रहे थे। होटल में कई विदेशी नागरिक भी ठहरे हुए थे। वे हमारी भाषा नहीं समझ पा रहे थे।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दिल्ली पुलिस के अनुसार आग सुबह करीब 9 बजे लगी। जिसके बाद मौके पर दमकल विभाग की आठ गाड़ियां भेजी गईं और आग बुझाने का अभियान शुरू किया गया। हालांकि स्थानीय निवासियों का आरोप है कि दमकल की गाड़ियां 45 मिनट देरी से आईं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अग्निशमन अधिकारियों ने बताया कि पांच मंजिला यह इमारत गेस्ट हाउस के रूप में संचालित की जा रही थी। यहां ठहरे यात्री बांग्लादेश, अफ्रीका, मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के दूसरे देशों से आए थे। इनमें से अधिकांश लोग अपने परिजनों के साथ चिकित्सा उपचार के लिए दिल्ली पहुंचे थे। पास ही में साकेत के मैक्स अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसरार ने डीडब्ल्यू बताया, "कई शव बाथरूम और बिस्तरों के नीचे मिले। आग और धुएं से बचने के लिए लोगों ने वहां छिपने की कोशिश की थी। होटल में आने-जाने के लिए केवल एक ही मुख्य गेट था। उस पर इलेक्ट्रॉनिक लॉक लगा हुआ था। आग लगने के बाद बिजली चली गई, जिसके कारण लॉक ने काम करना बंद कर दिया और गेट नहीं खुल सका। कई लोग इमारत में ही फंसे रह गए।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इलाके के निवासी मोहम्मद अफजल ने बताया कि आग लगने के बाद लोगों को बाहर निकालने के लिए स्थानीय लोगों ने पत्थरों और हथौड़ों की मदद से गेट का लॉक तोड़ा। अफजल बताते हैं कि हौज रानी में इस तरह से संचालित होने वाली यह अकेली इमारत नहीं है। पास में अस्पतालों और कॉलेजों की मौजूदगी के कारण बड़ी संख्या में मरीज, उनके परिजन और छात्र यहां के होटलों और गेस्ट हाउसों में ठहरते हैं। इसी मांग का फायदा उठाने के लिए इलाके में कई ऐसे होटल और गेस्ट हाउस चल रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अफजल ने यह भी कहा,"जांच की जाए तो कई रिहायशी मकानों के बेसमेंट या एक मंजिल को बेड-एंड-ब्रेकफास्ट (बी एंड बी) में बदल दिया गया है। आशंका है कि ये बिना एनओसी से चल रहे हैं। इन सबकी जांच होनी चाहिए।"</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	मामले की जांच जारी</h3>
<p>
	पुलिस, दमकल विभाग और दूसरी आपातकालीन सेवाओं के संयुक्त प्रयास से कुल 49 लोगों को इलाज के लिए मैक्स अस्पताल साकेत, एम्स ट्रॉमा सेंटर और पंडित मदन मोहन मालवीय अस्पताल में भर्ती कराया गया। इनमें से आठ लोगों को उपचार के बाद छुट्टी दे दी गई।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मुख्य अग्निशमन अधिकारी अभिलाष कुमार मलिक ने बताया कि इमारत में बेसमेंट, भूतल और उसके ऊपर पांच मंजिलें थीं। हर मंजिल, यहां तक कि छत पर भी कमरे बनाए गए थे। इमारत की बनावट ने अंदर फंसे लोगों की स्थिति को और गंभीर बना दिया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कुमार ने आधिकारिक बयान में कहा, "इसकी वजह से फंसे लोगों के पास बाहर निकलने की बहुत कम गुंजाइश बची थी। खिड़कियां सील थीं। हवा के आने-जाने का कोई रास्ता नहीं था। ऐसी इमारतें एक शाफ्ट की तरह काम करती हैं, जहां गर्मी और धुआं कुछ ही सेकंड में पूरी इमारत में फैल जाता है। इससे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना बेहद मुश्किल हो गया।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पुलिस ने बताया कि मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। होटल के मालिक लवकेश बजाज को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। बताया जा रहा है कि लवकेश बजाज के उसी इलाके में दो और गेस्ट हॉउस थे। घटना के बाद से ही इन सभी के गेट पर ताला लग गया और स्टाफ भाग गया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दिल्ली सरकार में गृह मंत्री आशीष सूद भी घटनास्थल पहुंचे। उन्होंने कहा कि मामले की पड़ताल जारी है। यदि अग्नि सुरक्षा नियमों से संबंधी नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मालवीय नगर अग्निकांड पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने मृतकों के परिजनों को दो लाख रुपये और घायलों को 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	बंद किए जाएंगे बी एंड बी</h3>
<p>
	सूत्रों के अनुसार, इमारत के मालिक लवकेश बजाज ने दिल्ली पुलिस को बताया कि उनके पास गेस्ट हाउस के रोजमर्रा के कामकाज की निगरानी के लिए पर्याप्त समय नहीं था। इसलिए उन्होंने इसकी जिम्मेदारी एक अन्य व्यक्ति को सौंप रखी थी, जो बुकिंग, खातों और पूरे प्रबंधन का काम देखता था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उन्होंने यह भी बताया कि इमारत में किए गए कुछ बदलाव, जैसे कमरों का आकार बढ़ाना और अन्य परिवर्तन, एक अन्य व्यक्ति के सुझाव पर किए गए थे। उस व्यक्ति ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि दिल्ली में कई जगह इसी तरह की व्यवस्था अपनाई जाती है और यह आम बात है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बताया कि विदेश मंत्रालय संबंधित देशों के दूतावासों के संपर्क में है और प्रभावित लोगों को हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	घटना के बाद इलाके में मौजूद सभी होटलों, गेस्ट हॉउस और बी एंड बी ने शटर गिरा दिए। ये सभी मालवीय नगर की संकरी गलियों और आवासीय इलाकों में चल रहे थे। फिलहाल आशीष सूद ने नियमों का उल्लंघन करने वाले सभी बी एंड बी (बेड एंड ब्रेकफास्ट) को तुरंत सील करने के निर्देश दिए हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वहीं, पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि दिल्ली सरकार की बी एंड बी नीति करीब एक महीने पहले ही वापस ले ली गई थी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने आश्वासन दिया कि मामले में तेज कार्रवाई हो रही है। अग्नि सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वाली अवैध संपत्तियों, अनधिकृत गेस्ट हाउसों और अन्य प्रतिष्ठानों के खिलाफ पूरे शहर में विशेष अभियान चलाया जाएगा।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 11:56:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 04 Jun 2026 12:09:00 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[किडनी प्रत्यारोपण के लिए भारत में क्यों है लंबा इंतजार?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/kidney-disease-cases-in-india-organ-donation-shortage-126060300003_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/03/thumb/1_1/1780456417-2211.jpg"/>
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      <description><![CDATA[भारत में क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। अंगदान (Organ Donation) की भारी कमी और डायलिसिस के भारी-भरकम खर्च के कारण देश में अवैध किडनी रैकेट की जड़ें फैल रही हैं। जानिए इसके लक्षण, इलाज का खर्च और जमीनी हकीकत।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Kidney disease in India" class="imgCont" height="800" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/03/full/1780456417-2211.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Kidney disease in India" width="1200" /></p>
	</p>
	<strong>-रामांशी मिश्रा</strong></p>
<p>
	30 मार्च 2026 को उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में पुलिस ने एक किडनी रैकेट का भंडाफोड़ किया। इसकी जांच में पता चला कि यह नेटवर्क सिर्फ कानपुर तक ही सीमित नहीं था बल्कि नोएडा, लखनऊ, मेरठ और दिल्ली से लेकर देहरादून तक इसकी जड़ें फैली हुईं थी। देश भर के अलग-अलग हिस्सों से लोगों को बरगलाकर, उनसे किडनी लेकर अवैध तरीके से जरूरतमंद लोगों को बेची जा रही थी।  </p>
<p>
	 </p>
<h3>
	भारत में 13.8 करोड़ मरीज</h3>
<p>
	क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) से दुनिया भर में 78.8 करोड़ लोग जूझ रहे हैं। भारत में यह संख्या 13.8 करोड़ है, जो चीन के बाद दुनिया में किसी देश की दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। यह भी कहा जा सकता है कि भारत के लगभग हर 10 में से एक व्यक्ति को किडनी से जुड़ी किसी ने किसी तरह की बीमारी है। लगभग दो लाख नए मरीज हर साल एंड स्टेज रीनल डिजीज (ईएसआरडी) की चपेट में आ रहे हैं। यह अवस्था तब आती है जब किडनी लगभग काम करना बंद कर देती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	1990 से 2016 के बीच भारत में क्रॉनिक किडनी डिजीज से होने वाली मौतें 5.2 लाख से बढ़कर 11.8 लाख हो गईं थीं। द मिलियन डेथ स्टडी शोध पत्र के अनुसार, 2015 में ही सिर्फ किडनी फेल होने से भारत में एक लाख 36 हजार लोगों की मौत हुई।जाहिर है कि भारतीय लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े बड़े खतरों में किडनी की बीमारी भी शामिल हो गई है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	जो दो लाख मरीज किडनी की बीमारी की गंभीर स्थिति में पहुंचते हैं, उनमें से कितनों का किडनी ट्रांसप्लांट हो पाता है? इस सवाल के जवाब में 2024 के आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ष भारत में कुल 18 हजार 911 ऑर्गन ट्रांसप्लांट हुए थे, जिनमें सिर्फ 13 हजार 476 किडनी ट्रांसप्लांट था। बाकी बचे लोग या तो डायलिसिस पर होते हैं या फिर उनकी मौत हो जाती है, और यहीं से शुरुआत होती है अवैध ट्रांसप्लांट के रैकेट की।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	अंगदान की कमी  </h3>
<p>
	नेशनल ऑर्गन एंड टिशु ट्रांसप्लांट यूनिट (नोट्टो) के 2023 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में ब्रेन डेड या मौत के बाद अंगदान करने वालों से महज 1,099 अंगदान हुए। इनमें पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या ज्यादा है। अंगदान के 90% मामले भी केवल पांच दक्षिणी राज्यों के हैं। उत्तर प्रदेश में सिर्फ तीन लोगों के परिवार ने मौत के बाद उनके अंगदान की मंजूरी दी, जबकि देश की आबादी में सबसे बड़ा हिस्सा इसी राज्य का है। 2024 में इस राज्य में कुल 447 किडनी ट्रांसप्लांट हुए। से में उत्तर प्रदेश की स्थिति और भी ज्यादा विकराल दिखती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डॉ राजेश हर्षवर्धन खनऊ के संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट में कार्यरत हैं। वह हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन के प्रमुख और  ऑर्गन एंड टिशु ट्रांसप्लांट यूनिट (सोट्टो) के नोडल अधिकारी भी हैं। वह कहते हैं, "क्रॉनिक किडनी डिजीज को ‘साइलेंट डिजीज&#39; भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसके लक्षण काफी बाद में दिखाई पड़ते हैं। किडनी की कार्यक्षमता 60 से 70% तक गिरने के बाद ही इस बीमारी के संकेत सामने आते हैं।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	क्रॉनिक किडनी डिजीज के लक्षणों में पैरों और चेहरे पर सूजन, थकान, भूख का खत्म होना, पेशाब में झाग या खून और रात को बार-बार उठना जैसी बातें शामिल होती हैं। इस बीमारी के संभावित कारणों में लगातार खराब जीवनशैली, प्रदूषित पानी का अधिक समय तक उपयोग, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या बार-बार किडनी में संक्रमण होना हो सकता है। डॉ हर्षवर्धन का कहना है कि भारत में पर्चे के यानी ओवर द काउंटर दर्द निवारक दवाएं आसानी से मिल जाती हैं। इनका लंबे समय तक उपयोग भी किडनी को प्रभावित करता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	किडनी के रोगियों का इलाज</h3>
<p>
	डॉ हर्षवर्धन बताते हैं कि किडनी के गंभीर रोगियों के लिए डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट, यही दो इलाज हैं। डायलिसिस वह प्रक्रिया है जो एक मशीन के जरिए किडनी का काम करती है। डायलिसिस की प्रक्रिया भारत जैसे विकासशील देश में एक आम व्यक्ति के लिए आसान नहीं है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	किडनी फेल होने की स्थिति में सप्ताह में दो से तीन बार और हर प्रक्रिया में तीन से चार घंटे का समय मरीज को अस्पताल में बिताना पड़ता है। एक निजी केंद्र में डायलिसिस की एक प्रक्रिया में 2,200 रुपए से 5,200 रुपए तक का खर्च आता है। इस लिहाज से प्रति व्यक्ति सालाना ढाई लाख से सात लाख रुपए तक का खर्च सिर्फ डायलिसिस की प्रक्रिया पर आता है। एक अनुमान के अनुसार, 2018 में एक लाख 75 हजार मरीज क्रॉनिक डायलिसिस पर थे। इनमें से दो तिहाई मरीज बिना इलाज के ही मर गए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	किडनी ट्रांसप्लांट के बारे में डॉ हर्षवर्धन का कहना है, "किडनी मरीजों के लिए ट्रांसप्लांट हमेशा से ही एक बेहतर विकल्प रहा है। इससे न केवल जीवन की अवधि बढ़ती है पर साथ ही क्वालिटी आफ लाइफ में भी सुधार होता है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसके अलावा ट्रांसप्लांट पर सरकारी व्यवस्था में खर्च भी लगभग आधा हो जाता है। डॉ हर्षवर्धन के अनुसार, अगर दो वर्ष के किडनी के इलाज के खर्च की तुलना की जाए तो डायलिसिस पर लगभग पांच लाख रुपए सरकारी व्यवस्था में खर्च हो जाता है। वहीं, ट्रांसप्लांट पर सिर्फ 3.5 लाख रुपए का खर्च आता है। इस लिहाज से किडनी ट्रांसप्लांट जीवन की गुणवत्ता को संवारने के साथ ही आर्थिक बोझ भी कम करता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	भारत में अंगदान की स्थिति</h3>
<p>
	भारत में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए मरीजों के इंतजार पर डॉ हर्षवर्धन काफी अहम जानकारी साझा करते हैं। वह कहते हैं कि भारत में परिवार के सदस्यों की ओर से अगर ट्रांसप्लांट के लिए किडनी मिल जाए तो एक से तीन महीने में किडनी ट्रांसप्लांट संभव है। कैडेवर डोनेशन यानी मृत व्यक्तियों के अंगदान से मिले किडनी के लिए मरीज को छह महीने से कई वर्षों तक इंतजार करना पड़ सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	नोट्टो के आंकड़े बताते हैं कि 2020 से 2024 के बीच देशभर में किडनी ट्रांसप्लांट की प्रतीक्षा सूची में शामिल दो हजार 850 मरीजों की मृत्यु हो गई। दिसंबर 2025 तक देश में 60 हजार 590 किडनी के मरीज प्रतीक्षा सूची में थे। 2024 में मृत-दाताओं (डिसीज्ड डोनर) की संख्या सिर्फ 1,128 थी, जबकि इस साल सड़क दुर्घटना में 1.73 लाख लोग मारे गए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डॉ. हर्षवर्धन कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में कैडेवर डोनेशन अभी भी ना के बराबर है। इसलिए यहां पर मरीज को काफी ज्यादा इंतजार करना पड़ता है और इसी के कारण अवैध ट्रांसप्लांट के रैकेट तेजी से बढ़ते हैं।" नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2022 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में ऑर्गन ट्रैफिकिंग से जुड़े 150 केस दर्ज हुए। औसतन हर साल दो से पांच किडनी के अवैध रैकेट मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पीजीआई के लखनऊ निदेशक डॉक्टर आरके धीमन और डॉक्टर हर्षवर्धन ने अंगदान की व्यवस्था पर एक रिसर्च रिपोर्ट भी प्रकाशित किया है। जर्नल ऑफ इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में प्रकाशित इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि भारत में मरने वालों के अंगदान की सबसे बड़ी रुकावट ब्रेन डेड मरीजों की पहचान ना हो पाना और परिवार को सही काउंसलिंग ना मिलना है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ब्रेन डेड का अर्थ होता है कि व्यक्ति का मस्तिष्क काम करना बंद कर देना। हालांकि इस स्थिति में भी किडनी और लिवर जैसे अंग मशीनों की मदद से कुछ समय तक सही सलामत रहते हैं और वह ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त होते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जमीनी हकीकत यह है कि देश के अधिकांश आईसीयू में कार्यरत विशेषज्ञ मरीज के ब्रेन डेड होने की घोषणा की प्रक्रिया के बारे में नहीं जानते हैं। ब्रेन डेड घोषित करने के लिए न्यूरोलॉजिस्ट समेत चार डॉक्टरों की एक स्वतंत्र टीम होती है, जो इस बात की जांच करती है। अगर मरीज को देर से ब्रेन डेड घोषित किया जाए तो ऑर्गन फेल होने की वजह से शरीर के अंग ट्रांसप्लांट के लायक नहीं रह जाते।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	स्वास्थ्य विभाग की कुछ कमियां देती हैं अवैध रैकेट को जन्म</h3>
<p>
	किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के ऑर्गन ट्रांसप्लांट यूनिट के कॉर्डिनेटर पीयूष श्रीवास्तव कहते हैं कि एक व्यक्ति के ब्रेन डेड होने की स्थिति में सबसे जरूरी होता है- परिवार के सदस्यों को इस बात के लिए मनाना कि उनके शरीर के अंग किसी और की जिंदगी बचा सकते हैं। इसे समझाने की जिम्मेदारी निभाते हैं प्रशिक्षित काउंसलर। हालांकि उत्तर भारत के अधिकांश जिला और सामुदायिक अस्पतालों में काउंसलर के पद या तो खाली है या फिर कभी भरे ही नहीं गए। इसके कारण दाता अंगदान की प्रक्रिया तक नहीं पहुंच पाते।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डॉक्टर हर्षवर्धन कहते हैं कि जब 60 हजार से अधिक मरीज प्रतीक्षा सूची में हों और हर साल दो लाख नए मरीज गंभीर श्रेणी में पहुंच रहे हैं तो अवैध ट्रांसप्लांट के रैकेट से जुड़े अपराधी इसे अपने फायदे का जरिया बना लेते हैं। इस रैकेट में शामिल लोग डायलिसिस केंद्रों में जाने वाले मरीजों को अपना निशाना बनाते हैं और उन्हें जल्दी ट्रांसप्लांट करवाने की आशा देते हैं। उनकी हामी के बाद गरीब दाताओं को खोज कर मरीज के साथ फर्जी रिश्तेदारी के दस्तावेज तैयार किए जाते हैं। ज्यादातर ऑपरेशन रात को होते हैं और मरीज से बड़ी रकम वसूली जाती है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	अवैध रैकेट के खिलाफ बना है कानून</h3>
<p>
	भारत में 1994 में ट्रांसप्लांटेशन आफ ह्यूमन ऑर्गन एंड टिश्यू एक्ट (टीएचओए) बनाया गया है जिसमें अंग व्यापार को अपराध घोषित किया गया है और ब्रेनडेथ को कानूनी मान्यता दी गई है। अंग व्यापार के दोषियों पर 20 लाख रुपए तक के जुर्माने के साथ 10 साल की जेल का प्रावधान है। हालांकि कम ही अपराधी पकड़े या भी दोषी करार दिए जाते हैं। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	डॉ हर्षवर्धन कहते हैं कि भारत की समस्या केवल अवैध रैकेट नहीं है। वह कहते हैं, "भारत दुनिया में तीसरा सबसे अधिक ट्रांसप्लांट करने वाला देश है लेकिन प्रति 10 लाख की जनसंख्या पर अंगदान की दर स्पेन से भी 60 गुना कम है। यहां साल भर में 1.73 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं लेकिन उनके अंग किसी की जान बचाने के काम नहीं आते हैं। कानून मजबूत है लेकिन प्रशासनिक कमेटी जवाबदेह नहीं है।"</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 08:37:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 03 Jun 2026 08:45:02 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[इतना गर्म कैसे हो गया यूपी का बांदा जिला?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/up-weather-banda-becomes-hottest-city-reaches-48-degree-celsius-bundelkhand-heatwave-126060200003_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/up-weather-banda-becomes-hottest-city-reaches-48-degree-celsius-bundelkhand-heatwave-126060200003_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/02/thumb/1_1/1780370259-0693.jpg"/>
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      <description><![CDATA[उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर बुंदेलखंड के बांदा जिले में इस साल गर्मी में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तक पहुंच गया। पिछले कई दिनों तक यहां का तापमान 47-48 डिग्री ही बना रहा। तापमान के असर के चलते शहरी और ग्रामीण इलाकों में दोपहर में ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="banda heat" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/02/full/1780370259-0693.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="banda heat photo : AI Generated" width="1200" /></p>
	</p>
	समीरात्मज मिश्र</p>
<p>
	उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर बुंदेलखंड के बांदा जिले में इस साल गर्मी में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तक पहुंच गया। पिछले कई दिनों तक यहां का तापमान 47-48 डिग्री ही बना रहा। तापमान के असर के चलते शहरी और ग्रामीण इलाकों में दोपहर में बिल्कुल सन्नाटा पसर जाता है और भीड़ सिर्फ अस्पतालों में दिखती है जहां मौसम की मार नहीं झेल पाने वाले लोग बीमार होकर पहुंच रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भारतीय मौसम विभाग की ताजा रिपोर्ट में 48 डिग्री सेल्सियस तापमान के साथ बांदा कई दिनों तक लगातार देश का सबसे गर्म जिला बना रहा और यह तापमान सामान्य से 4.5 डिग्री ज्यादा था। हालांकि बांदा के आस-पास के जिलों मसलन, प्रयागराज, झांसी, कानपुर का भी हाल लगभग ऐसा ही था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यही नहीं, बीते 21 मई को तो बांदा में तापमान 48.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया और इस तापमान के साथ वह ना सिर्फ भारत का बल्कि उस हफ्ते दुनिया के सबसे गर्म शहरों में भी शामिल हो गया। राजस्थान के चुरू को पीछे छोड़ते हुए बांदा ग्लोबल हीट मैप पर आ गया। मौसम विभाग ने बांदा और दक्षिणी यूपी के कई जिलों के लिए रेड अलर्ट जारी किया। पिछले हफ्ते कुछ बूंदाबांदी के साथ स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ लेकिन बांदा में यह तापमान अभी भी 40 डिग्री से ऊपर ही बना हुआ है। यहां तक कि रात में भी लोगों को राहत नहीं मिल रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने दोपहर 12 बजे से लेकर शाम चार बजे तक लोगों को घरों में रहने की एडवाइजरी जारी की है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	बांदा की भौगोलिक स्थिति</h3>
<p>
	बांदा उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में स्थित है जिसका ज्यादातर हिस्सा पठारी है। राजस्थान और सिंध के रेगिस्तानों से आने वाली सूखी और गर्म हवाएं, जिन्हें लू कहते हैं, इस इलाके को गर्म कर देती हैं। बुंदेलखंड की स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि जिन पश्चिमी विक्षोभों ने इस महीने उत्तर भारत के दूसरे हिस्सों को थोड़ी ठंडक भी दी, उनका भी असर यहां नहीं देखने को मिला।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बांदा की भौगोलिक स्थिति की बात करें तो यह पथरीले और ऊंचे इलाके पर बसा है, जहां जमीन के नीचे कठोर ग्रेनाइट पत्थर की चट्टानें हैं। यह पथरीली जमीन दिन भर सूरज की तेज गर्मी और लपटों को अपने अंदर सोख लेती है और फिर रात के समय उसी गर्मी को वापस हवा में बिखेरने लगती है। इस वजह से यहां रात में भी गर्मी से राहत नहीं मिल पाती।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, ग्लोब पर बांदा की स्थिति ऐसी है जहां गर्मियों में सूरज ठीक सिर के ऊपर होता है और उसकी किरणें बिल्कुल सीधी पड़ती हैं। ऐसे में साफ आसमान, पथरीली जमीन, ग्रेनाइट की चट्टानें और पानी की कमी जैसी स्थितियां मिलकर यहां ऐसी गर्मी बिखेरती हैं, मानो आग बरस रही हो।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	अवैध खनन का बोलबाला</h3>
<p>
	हालांकि सिर्फ भौगोलिक स्थिति ही इस इलाके को करीब पचास डिग्री सेल्सियस तापमान प्रदान करने के लिए जिम्मेदार नहीं है बल्कि स्थानीय लोग भी इसे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रखे हैं। पूरे बुंदेलखंड में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और भूजल लगभग खत्म होने की वजह से मिट्टी में नमी लगभग गायब है। रही सही कसर पत्थर और बालू के लिए होने वाला अंधाधुंध खनन इस आग में घी का काम कर रहा है। इन सब वजहों से पर्यावरण तेजी से बदल रहा है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	बांदा के निवासी और पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष सागर बताते हैं, "बांदा की जीवनरेखा कही जाने वाली केन नदी से जिस तरह अंधाधुंध बालू निकाली जा रही है और पेड़-पौधे खत्म होते जा रहे हैं, उसकी वजह से गर्मी लगातार बढ़ रही है। बांदा जिले में इस वक्त बीस से ज्यादा लाल मौरम यानी बालू का उत्खनन करने वाली खदानों का संचालन हो रहा है। इस खनन का विस्तार सिर्फ केन नदी तक नहीं है बल्कि यमुना, रंज और बाघेन नदियों तक है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से बांदा और बुंदेलखंड के दूसरे जिले पहले भी गरम रहते रहे हैं, लेकिन ऐसी जानलेवा स्थितियां पिछले कुछ सालों में बनती गई है। यहां प्राकृतिक स्थितियों की वजह से गर्मी भले ही पड़ती रही हो लेकिन तापमान को नियंत्रित करने के तमाम तरीके प्रकृति में ही मौजूद थे। अब उन्हीं चीजों को कुछ लोग अपने लाभ के लालच में नष्ट कर रहे हैं। जिसका नतीजा ना सिर्फ बांदा के लोगों को बल्कि आस-पास के लोगों को भी भुगतना पड़ रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	महिला किसान नेता और पर्यावरण कार्यकर्ता उषा निषाद कहती हैं कि अवैध खनन के खिलाफ तमाम शिकायतें होती रहती हैं लेकिन कोई लगाम नहीं लगती। डीडब्ल्यू से बातचीत में उषा निषाद कहती हैं, "हम लोगों ने चित्रकूटधाम मंडल के मंडलायुक्त से मिलकर इसकी लिखित शिकायत की है। यहां तक कि हम लोग नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल में और मुख्यमंत्री पोर्टल पर भी कर चुके हैं लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ।”</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	भीषण गर्मी की आर्थिक मार</h3>
<p>
	इस भीषण गर्मी के चलते फसलें तो तबाह होती ही हैं गर्मी की वजह से दिन भर लोग घरों के बाहर भी नहीं निकलते। इसका सबसे ज्यादा नुकसान किसानों और गरीबों को होता है। सुषमा देवी बांदा जिले की रहने वाली हैं। अपने परिवार के साथ गर्मी के मौसम में कच्चे आम का रस यानी पना और गन्ने का जूस बेचती हैं। डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहती हैं, "किसानों और मजदूरों पर तो गर्मी की मार पड़ ही रही है। हमारी तरह के छोटे दुकानदार हैं, वो भी परेशान हैं। दिन में लोग बाहर निकलते ही नहीं। दस बजे से पहले ही अपना काम निपटा लेते हैं। वैसे ज्यादातर लोग तो दूसरे शहरों में जाकर नौकरी या व्यापार कर रहे हैं। यहां रोजगार का कोई साधन वैसे भी नहीं है, ऊपर से ये गर्मी और जान ले रही है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस गर्मी की मार ना सिर्फ इंसानों पर बल्कि पशुओं पर भी पड़ रही है। इस तपती धूप में इन बेजुबान जानवरों को न तो कहीं चरने के लिए घास मिलती है और न ही पीने का पानी। नतीजा यह होता है कि हर साल मई और जून के महीने में सैकड़ों गाय-बैल लू और प्यास के कारण तड़प-तड़प कर दम तोड़ देते हैं। सिर्फ पालतू या आवारा ही नहीं, बल्कि जंगलों में पानी के छोटे-मोटे गड्ढे और सोते सूख जाने से जंगली जानवर और पक्षी भी भारी तादाद में मर रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	पेड़ों की अंधाधुंध कटाई</h3>
<p>
	ना सिर्फ अवैध खनन बल्कि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने भी यहां के मौसम को बदहाल किया है। एक ओर हजारों की संख्या में पुराने और घने पेड़ काटे जा रहे हैं तो दूसरी ओर खानापूर्ति के लिए करोड़ों पौधे रोपने का रिकॉर्ड दर्ज किया जाता है, लेकिन धरातल पर वो पौधे कहीं नहीं दिखते।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आशीष सागर कहते हैं, "सरकार ने बुंदेलखंड में रिकॉर्ड तोड़ हरित क्रांति की है, लेकिन सिर्फ कागजों में। राज्य सरकार एक ही दिन में सर्वाधिक पौधारोपण का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड छह बार बना चुकी है। इस हिसाब से करोड़ों पौधे लगाए गए, लेकिन जमीन पर कितने मौजूद हैं, यह बड़ा सवाल है। वहीं सड़कों के चौड़ीकरण की वजह से पूरे बुंदेलखंड में बड़े पैमाने पर पुराने पेड़ों को काटा गया है। उदाहरण के तौर पर बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के निर्माण में ही करीब दो लाख पुराने पीपल, महुआ, शीशम, और नीम जैसे छायादार पेड़ काट दिए गए।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का यही नतीजा है कि बांदा का वन क्षेत्र काफी सिकुड़ गया है। मौजूदा समय में बांदा जिले में सिर्फ 3 फीसदी ग्रीन कवर यानी हरियाली बची है। जबकि पड़ोसी जिले चित्रकूट में स्थिति काफी अच्छी है और गर्मी की मार भी वहां कम पड़ती है जबकि भौगोलिक स्थिति दोनों जगह की एक जैसी है। चित्रकूट में ग्रीन कवर 18 फीसदी है। पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, पेड़ों की इस भारी कमी के कारण जमीन के अंदर की प्राकृतिक नमी लगभग पूरी तरह खत्म हो चुकी है। पेड़ों की कमी के कारण यहां &#39;अल्बीडो इफेक्ट&#39; काफी बढ़ गया है, जिससे धूप जमीन के भीतर अवशोषित नहीं हो पा रही है और वापस लौटकर वातावरण को और ज्यादा गर्म कर रही है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	पर्यावरणविदों के मुताबिक, जानलेवा गर्मी से बचने के लिए तालाब और कुओं जैसे स्थानीय जलस्रोतों को पुनर्जीवित करना होगा। वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर और पर्यावरणविद अजय कुमार कहते हैं, "सिर्फ पौधारोपण नहीं, बल्कि उनका संरक्षण भी जरूरी है। छायादार प्रजातियां, स्थानीय प्रजातियां और हरित पट्टियां मदद कर सकती हैं। जरूरी होने पर यदि पुराने पेड़ काटने भी पड़ें तो उस अनुपात में नए पेड़ लगाए भी जाने चाहिए। सिर्फ पौधे लगा देने से कागजी कार्रवाई पूरी हो सकती है, प्रकृति और इंसान की जरूरतें नहीं।”</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 08:36:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 02 Jun 2026 08:49:39 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भारत-नेपाल सीमा विवाद का पूरा सच: आखिर क्यों उलझे हैं दोनों पड़ोसी देश?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/current-affairs/india-nepal-border-dispute-explained-in-hindi-126060100023_1.html</link>
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      <description><![CDATA[भारत और नेपाल के बीच 1,850 किलोमीटर लंबी सरहद है, जो सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से सटी हुई है। भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है, जिसमें ऐतिहासिक संधियों की अलग-अलग व्याख्याएं और भूगोल (नदियों के ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="The image features the flags of India and Nepal, India Gate and Kathmandu, a milestone, and—within a circular frame—the India-Nepal border." class="imgCont" height="800" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/01/full/1780296679-5352.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="India-Nepal Border Dispute" width="1200" /></p>
	</p>
	काठमांडू पोस्ट के मुताबिक़, रविवार को नेपाली संसद (प्रतिनिधि सभा) में बोलते हुए बालेन शाह ने कहा, "प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे पता चला कि केवल भारत ने ही नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की ज़मीन पर अतिक्रमण किया है।"उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को बैठकर इस मामले को देखना चाहिए। ...उनके इस बयान के बाद नेपाल में उनकी आलोचना होने लगी है। <br />
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/international-hindi-news/balen-shah-government-s-new-decision-regarding-india-nepal-border-126051100002_1.html" target="_blank">अब नेपाल बॉर्डर पर लगेगा ID कार्ड, बालेन सरकार ने लिया कड़ा फैसला, नए नियम का भारतीयों पर क्‍या होगा असर?</a></strong></p>
	भारत और नेपाल के बीच 1,850 किलोमीटर लंबी सरहद है, जो सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से सटी हुई है। भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है, जिसमें ऐतिहासिक संधियों की अलग-अलग व्याख्याएं और भूगोल (नदियों के बदलते रास्ते) मुख्य वजह हैं। यह कोई अचानक पैदा हुआ विवाद नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें 200 साल पुरानी हैं।  इस विवाद के मुख्य पहलुओं और इसके पीछे के &#39;सच&#39; को हम कुछ आसान बिंदुओं में समझ सकते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	1. विवाद की जड़: सुगौली संधि (Treaty of Sugauli, 1816)</h3>
<p>
	इस पूरे विवाद का केंद्र 1816 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच हुई &#39;सुगौली संधि&#39; है। इस संधि के तहत तय हुआ था कि महाकाली (काली) नदी भारत और नेपाल के बीच की पश्चिमी सीमा होगी। नदी के पूर्वी का हिस्सा नेपाल का होगा और पश्चिमी हिस्सा भारत का। भारत इस इलाक़े को उत्तराखंड का हिस्सा मानता है। दोनों देशों के बीच विवाद इस बात पर नहीं है कि नदी सीमा है या नहीं, बल्कि विवाद इस बात पर है कि महाकाली नदी का उद्गम (Origin या शुरुआत) कहाँ से होता है?</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	2. विवादित क्षेत्र: कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा</h3>
<p>
	यह मुख्य रूप से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले और नेपाल के सुदूरपश्चिम प्रांत के बीच का 372 वर्ग किलोमीटर का इलाका है।</p>
<p>
	<strong>नेपाल का पक्ष: </strong>नेपाल का मानना है कि महाकाली नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है। इस हिसाब से लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी तीनों क्षेत्र नेपाल के हिस्से में आने चाहिए। नेपाल इसके समर्थन में पुराने नक्शों और राजस्व रिकॉर्ड का हवाला देता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>भारत का पक्ष: </strong>भारत का मानना है कि काली नदी का उद्गम कालापानी के पास मौजूद झरनों/धाराओं से होता है। भारत इस क्षेत्र पर 1962 (भारत-चीन युद्ध) से या उससे भी पहले से प्रशासनिक नियंत्रण रखता आया है। भारत के अनुसार, 19वीं सदी के उत्तरार्ध के सभी ब्रिटिश नक्शों में इसी सीमा को सही माना गया है।</p>
<p>
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/uttar-pradesh/up-north-south-corridor-yogi-government-road-connectivity-bundelkhand-nepal-border-news-126052500078_1.html" target="_blank">योगी सरकार का मेगा प्लान, नेपाल बॉर्डर से बुंदेलखंड तक दौड़ेगा नार्थ-साउथ कॉरिडोर</a></strong></p>
</p>
<h3>
	3. यह विवाद अचानक चर्चा में क्यों आया? (2019-2020 का घटनाक्रम)</h3>
<p>
	सालों से यह मुद्दा शांत था, लेकिन दो बड़ी घटनाओं ने इसे दोबारा गरमा दिया:-</p>
<p>
	<strong>नवंबर 2019:</strong> भारत ने जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी किया। इसमें कालापानी को हमेशा की तरह भारतीय क्षेत्र के रूप में दिखाया गया था, जिस पर नेपाल ने आपत्ति जताई और कहा कि भारत अपना नक्शा बदले क्योंकि कालापानी उसका क्षेत्र है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>मई 2020:</strong> भारत द्वारा जारी नक्क्षे के 5 माह बाद मई 2020 में लिपुलेख को लेकर दोनों देशों के बीच फिर तनाव बढ़ गया। भारत के रक्षामंत्री ने लिपुलेख दर्रे (Lipulekh Pass) तक जाने वाली एक नई सड़क का उद्घाटन किया। यह सड़क कैलाश मानसरोवर यात्रा के समय को कम करने के लिए बनाई गई थी। नेपाल ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन माना। धारचूला से लिपुलेख को जोड़ने वाली सड़क कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग के नाम से भी प्रसिद्ध है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	नेपाल का नया नक्शा:</h3>
<p>
	जवाब में, 18 जून 2020 में नेपाल की तत्कालीन के.पी. शर्मा ओली सरकार ने संविधान में संशोधन कर देश का एक नया राजनीतिक नक्शा जारी कर दिया। इस नक्शे में नेपाल ने लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को अपने क्षेत्र में दिखा दिया और इसे संसद से सर्वसम्मति से पास भी करवा लिया। भारत ने इसे &#39;एकतरफा कदम&#39; बताते हुए नेपाल के क्षेत्रीय दावों को &#39;कृत्रिम विस्तार&#39; मानने से साफ इनकार कर दिया।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	4. दूसरा छोटा विवाद: सुस्ता (Susta) क्षेत्र</h3>
<p>
	यह विवाद भारत के बिहार (पश्चिम चंपारण) और नेपाल के सीमावर्ती इलाके में है। यहाँ सीमा गंडक (नारायणी) नदी तय करती है। दिक्कत यह है कि गंडक नदी समय के साथ अपना रास्ता बदलती रही है। नदी के रास्ता बदलने के कारण सैकड़ों एकड़ जमीन कभी इस पार तो कभी उस पार हो जाती है, जिससे स्थानीय स्तर पर खेती और जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद होता रहता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	आखिर सच क्या है?</h3>
<p>
	इस विवाद का सच यह है कि यह एक ही ऐतिहासिक दस्तावेज (सुगौली संधि) की दो अलग-अलग व्याख्याओं और नदियों के भौगोलिक बदलाव का नतीजा है।</p>
<p>
	<strong>भारत के लिए: </strong>यह क्षेत्र रणनीतिक (Strategic) रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि लिपुलेख दर्रे से चीन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। साथ ही, भारत का यहाँ दशकों से प्रशासनिक नियंत्रण है।</p>
<p>
	<strong>नेपाल के लिए:</strong> यह उसकी राष्ट्रीय संप्रभुता (Sovereignty) और क्षेत्रीय अखंडता का मामला है, जिसे वहां की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा माना जाता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>विवाद का शांतिपूर्ण हल:</strong> दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता है, खुली सीमाएं हैं और गहरी सांस्कृतिक समानताएं हैं। इसलिए, दोनों ही पक्ष यह मानते हैं कि इस सीमा विवाद को किसी तीसरे देश के हस्तक्षेप के बिना, केवल आपसी कूटनीतिक बातचीत (Diplomatic Dialogue) और तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से ही सुलझाया जा सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<span style="color:#b22222;">अस्वीकरण (Disclaimer) : </span>चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 12:06:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Mon, 01 Jun 2026 12:22:30 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Current Affairs]]></category>
      <authorname>वेबदुनिया फीचर टीम</authorname>
    </item>
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